क्या शांति नगर की जनता को कभी न्याय मिलेगा?

बालको-वेदांता पर वादाखिलाफी, जमीन हड़पने और पुनर्वास छल का गंभीर आरोप फिर भी जिला प्रशासन से लेकर छत्तीसगढ़ सरकार व केन्द्र सरकार सभी अब तक मौन क्यों ???
कोरबा। आखिर शांति नगर की गरीब, आदिवासी और विस्थापित जनता कब तक अपने ही अधिकारों के लिए सड़क पर संघर्ष करती रहेगी? क्या बड़े उद्योगों के सामने गरीबों की जमीन, उनका घर, उनका भविष्य और उनका सम्मान कोई मायने नहीं रखता? यही सवाल आज शांति नगर की जनता शासन और प्रशासन से पूछ रही है।
बालको-वेदांता प्रबंधन पर आरोप है कि उद्योग विस्तार के नाम पर वर्षों पहले प्रभावित परिवारों से जमीन ली गई, पुनर्वास और रोजगार के बड़े-बड़े वादे किए गए, लिखित आश्वासन तक दिए गए, लेकिन आज तक उन वादों पर अमल नहीं हुआ। जिन परिवारों ने विकास के नाम पर अपनी पुश्तैनी जमीन छोड़ी, वे आज भी न्याय, पुनर्वास और सम्मानजनक जीवन के लिए दर-दर भटक रहे हैं।
दस्तावेजों में वर्ष 2013 में बालको प्रबंधन द्वारा शांति नगर के विस्थापितों को पुनर्वास संबंधी लिखित आश्वासन देने का उल्लेख है। प्रभावितों का कहना है कि कंपनी ने कागजों में भरोसा दिया, लेकिन जमीन पर सिर्फ धोखा मिला। सवाल यह है कि यदि लिखित वादों का भी कोई मूल्य नहीं, तो आखिर गरीब जनता किस पर भरोसा करे?
15 वर्षों से जारी संघर्ष
शांति नगर की जनता वर्ष 2010 से लगातार आंदोलन कर रही है। धरना, प्रदर्शन और चक्काजाम के जरिए लोग अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं —
– मार्च 2023 — तीन दिवसीय पूर्ण चक्काजाम
– मई 2023 — एक दिवसीय चक्काजाम
– अगस्त 2023 — दो दिवसीय चक्काजाम
– जून 2024 — तीन दिवसीय धरना
– फरवरी 2025 — दो दिवसीय चक्काजाम
– 16 फरवरी 2026 से 28 अप्रैल 2026 तक — लगातार 75 दिनों का शांतिपूर्ण धरना
इसके बावजूद अब तक स्थायी समाधान नहीं निकल पाया।
जांच रिपोर्टों में भी उठे गंभीर सवाल
जिला स्तरीय जांच प्रतिवेदनों और विभागीय दस्तावेजों में श्रमिक सुरक्षा, पुनर्वास, पर्यावरणीय दायित्वों और फैक्ट्री नियमों के उल्लंघन जैसे गंभीर बिंदु सामने आए हैं। प्रभावितों का आरोप है कि जब सरकारी दस्तावेजों में अनियमितताओं का उल्लेख मौजूद है, तो कार्रवाई आखिर क्यों नहीं हो रही?
शांति नगर की जनता आज पूछ रही है
- क्या उद्योगों के लिए गरीबों की जमीन लेना आसान है, लेकिन उन्हें न्याय देना इतना मुश्किल?
- क्या पुनर्वास सिर्फ कागजों तक सीमित रहेगा?
- क्या वर्षों से आंदोलन कर रहे विस्थापितों की आवाज शासन तक पहुंचेगी या फिर उन्हें यूं ही संघर्ष करना पड़ेगा?
अब यह लड़ाई केवल जमीन की नहीं, बल्कि अधिकार, सम्मान और न्याय की लड़ाई बन चुकी है। अब देखना होगा की क्या जिला प्रशासन व राज्य सरकार कब इन लोगों के लिए मसिहा बन कर न्याय दिलाने में सफल होते हैं
या ये सभी यूंही भटकते रहेंगे!
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