मिट्टी से जुड़ता बचपन : मोबाइल स्क्रीन से निकलकर बच्चों ने थामा चाक, ‘नूर ट्यूशन क्लासेस’ का पॉटरी डे बना प्रेरणादायक पहल
“जहाँ हर बच्चा एक कलाकार है” — कोरबा की एक छोटी शुरुआत, जो बच्चों के समग्र विकास का राष्ट्रीय मॉडल बन सकती है

आशिया खान | कोरबा | मई 2026
आज के डिजिटल युग में बच्चों का बचपन धीरे-धीरे मोबाइल स्क्रीन, वीडियो गेम और सोशल मीडिया की आभासी दुनिया में सिमटता जा रहा है। खेल के मैदानों की जगह अब गैजेट्स ने ले ली है और रचनात्मक गतिविधियों की जगह स्क्रीन टाइम ने। ऐसे समय में छत्तीसगढ़ के औद्योगिक शहर कोरबा से एक ऐसी सकारात्मक पहल सामने आई है, जिसने यह साबित कर दिया कि यदि बच्चों को सही अवसर और सही वातावरण मिले, तो उनकी कल्पनाशक्ति आज भी उतनी ही जीवंत है जितनी कभी हुआ करती थी।
दादर रोड स्थित नूर ट्यूशन क्लासेस में आयोजित ‘पॉटरी डे’ केवल एक सांस्कृतिक या मनोरंजक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह बच्चों को भारतीय पारंपरिक कला, रचनात्मक शिक्षा और मानसिक संतुलन से जोड़ने की एक संवेदनशील एवं दूरदर्शी पहल बनकर उभरा।

इस आयोजन ने यह संदेश भी दिया कि बच्चों का वास्तविक विकास केवल किताबों और अंकों से नहीं, बल्कि अनुभवों, कला और प्रकृति से जुड़ाव से भी होता है।
मिट्टी में छिपी रचनात्मकता : छोटे हाथों ने गढ़े सपने
शाम 5:30 बजे से रात 8:00 बजे तक चले इस विशेष आयोजन में 5 से 14 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 30 बच्चों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। अनुभवी कुम्हार की देखरेख में बच्चों ने मिट्टी गूंथना, चाक चलाना और अपने हाथों से दीये, कुल्हड़ तथा छोटे सजावटी बर्तन बनाना सीखा।
कार्यक्रम में शामिल मान्या, चांसी, दुर्गेश, भूपेश, यश, गोलू, आफरीन, पूजा, जया, प्रनिषा, हंसिका और शिफा जैसे बच्चों के चेहरे पर उत्साह और जिज्ञासा साफ झलक रही थी। कोई अपने कुल्हड़ को देखकर मुस्कुरा रहा था, तो कोई पहली बार चाक पर मिट्टी को आकार देने का अनुभव महसूस कर रहा था।
किसी का दीया थोड़ा टेढ़ा बना, किसी का कुल्हड़ साधारण रहा, लेकिन हर बच्चे के प्रयास में आत्मविश्वास, कल्पनाशक्ति और सीखने की खुशी स्पष्ट दिखाई दे रही थी।
क्यों महत्वपूर्ण हैं ऐसी रचनात्मक गतिविधियाँ ?
शिक्षाविदों और बाल मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि पॉटरी जैसी गतिविधियाँ बच्चों के मानसिक, भावनात्मक और बौद्धिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। मिट्टी के साथ काम करना केवल कला नहीं, बल्कि धैर्य, संतुलन और संवेदनशीलता सीखने की प्रक्रिया भी है।
- बच्चों की एकाग्रता और धैर्य में वृद्धि होती है
- स्क्रीन टाइम कम करने में मदद मिलती है
- रचनात्मक सोच और कल्पनाशक्ति विकसित होती है
- हाथ और दिमाग के समन्वय में सुधार होता है
- मानसिक तनाव और बेचैनी कम होती है
- भारतीय पारंपरिक कला एवं संस्कृति से जुड़ाव बढ़ता है
- बच्चों में आत्मविश्वास और आत्म-अभिव्यक्ति की भावना विकसित होती है
विशेषज्ञों के अनुसार मिट्टी के साथ काम करना बच्चों को प्रकृति के करीब लाता है और उन्हें वास्तविक दुनिया से जोड़ता है। आज के दौर में, जब डिजिटल उपकरण बच्चों के व्यवहार और दिनचर्या को प्रभावित कर रहे हैं, तब ऐसी गतिविधियाँ मानसिक संतुलन और भावनात्मक स्वास्थ्य के लिए बेहद आवश्यक मानी जा रही हैं।
बच्चों की मासूम खुशी बनी कार्यक्रम की सबसे खूबसूरत तस्वीर
पूरे आयोजन के दौरान बच्चों की हँसी, उत्साह और जिज्ञासा ने वातावरण को जीवंत बनाए रखा। कोई अपनी बनाई वस्तु दोस्तों को दिखा रहा था, तो कोई बार-बार अपने कुल्हड़ को निहार रहा था।
“मैम, मेरा दीया थोड़ा टेढ़ा हो गया…”
“देखिए ना, मेरा कुल्हड़ बिल्कुल असली जैसा बना है…”
इन मासूम आवाज़ों ने यह एहसास कराया कि बच्चों को खुश करने के लिए महंगे गैजेट्स नहीं, बल्कि रचनात्मक अवसर, प्रोत्साहन और अपनापन चाहिए।
कला के साथ सम्मान और आत्मविश्वास भी
कार्यक्रम के समापन पर सभी बच्चों को उनके द्वारा बनाए गए मिट्टी के बर्तन स्मृति-उपहार के रूप में प्रदान किए गए। साथ ही जलपान की व्यवस्था भी की गई। अपने हाथों से बनाई गई वस्तुओं को साथ लेकर लौटते समय हर बच्चे के चेहरे पर गर्व, आत्मविश्वास और उपलब्धि की चमक दिखाई दे रही थी।
नई शिक्षा नीति के दौर में प्रेरणादायक मॉडल बन सकती है यह पहल
देशभर में लागू नई शिक्षा नीति (NEP) बच्चों की क्रिएटिव लर्निंग, स्किल बेस्ड एजुकेशन और एक्सपीरियंस बेस्ड लर्निंग पर विशेष जोर देती है। ऐसे में नूर ट्यूशन क्लासेस जैसी पहलें छोटे शहरों के लिए एक प्रेरणादायक मॉडल बन सकती हैं।
जहाँ महानगरों में बच्चे डिजिटल थकान, मानसिक दबाव और सामाजिक दूरी जैसी समस्याओं का सामना कर रहे हैं, वहीं कोरबा की यह पहल यह मजबूत संदेश देती है कि —
“बच्चों को केवल पढ़ाई नहीं, बल्कि अनुभव, संवेदनाएँ और रचनात्मक अवसर भी चाहिए।”
‘जहाँ हर बच्चा एक कलाकार है’ — सिर्फ स्लोगन नहीं, एक सोच
नूर ट्यूशन क्लासेस का संदेश —
“जहाँ हर बच्चा एक कलाकार है”
यह केवल एक टैगलाइन नहीं, बल्कि बच्चों को किताबों के साथ जीवन की कला सिखाने वाली एक सकारात्मक सोच है। यह पहल इस बात का उदाहरण है कि शिक्षा केवल परीक्षा तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि बच्चों के व्यक्तित्व, संवेदनशीलता और रचनात्मकता को भी विकसित करना चाहिए।
नूर ट्यूशन क्लासेस
📍 दादर Road, नूर कॉटेज, कोरबा
👩🏫 आयोजक : आशिया खान
यदि देशभर के स्कूल, कोचिंग संस्थान और शैक्षणिक संगठन भी ऐसी रचनात्मक गतिविधियों को अपने पाठ्यक्रम और आयोजनों का हिस्सा बनाएं, तो बच्चों का बचपन केवल अंकों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि अनुभवों, संवेदनाओं और रचनात्मकता से भी समृद्ध होगा।
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