क्या आदिवासियों की जमीन पर विकास का खेल ?

BALCO–Vedanta पर कोरबा से उठे बड़े सवाल
पुनर्वास, मुआवजा और रोजगार के दावों पर फिर घिरा प्रबंधन
कोरबा, छत्तीसगढ़ | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज़ नेटवर्क की खोजी पड़ताल क्या देश के विकास की कीमत आदिवासी चुका रहे हैं?
क्या उद्योगों के नाम पर जमीन लेने के बाद प्रभावित परिवारों को उनके अधिकारों से वंचित किया गया? और क्या कॉर्पोरेट ताकत के सामने वर्षों से न्याय की लड़ाई लड़ रहे हैं शांतिनगर के लोग? छत्तीसगढ़ के कोरबा से सामने आई यह रिपोर्ट अब सिर्फ स्थानीय विवाद नहीं…। बल्कि आदिवासी अधिकार, पुनर्वास और कॉर्पोरेट जवाबदेही पर बड़ा राष्ट्रीय सवाल बनती जा रही है…”
BALCO का दावा बनाम जमीनी हकीकत
BALCO प्रबंधन ने प्रशासन को भेजे अपने जवाब में दावा किया है कि: 86 प्रभावित परिवारों को मुआवजा दिया गय। 26 आदिवासी परिवारों को नियमानुसार भुगतान हुआ
शिकायतें “दुर्भावनापूर्ण” हैं
लेकिन दूसरी तरफ शांतिनगर बचाव समिति और प्रभावित परिवार गंभीर आरोप लगा रहे हैं कि: पुनर्वास अधूरा है रोजगार के वादे पूरे नहीं हुए प्रदूषण और कूलिंग टावर का असर अब भी जारी है। असली पीड़ित परिवार आज भी न्याय के लिए भटक रहे है
सबसे बड़ा सवाल — अगर सब ठीक था तो आंदोलन क्यों?
यदि पुनर्वास पूरा हो चुका था। तो 87 परिवार आज भी पुलिस और प्रशासन के दरवाजे क्यों खटखटा रहे हैं?”
दस्तावेजों में क्या-क्या सामने आया?
दस्तावेज बताते हैं कि। 2011 से लगातार शिकायतें होती रहीं। प्रशासनिक बैठकों और समझौतों का रिकॉर्ड मौजूद है। हाईकोर्ट और विभागीय पत्राचार का हवाला दिया गया है। प्रभावित परिवारों की सूची, नक्शे और भूमि विवरण संलग्न हैं
लेकिन प्रभावितों का आरोप है कि: कुछ लोगों को लाभ देकर बाकी परिवारों को नजरअंदाज किया गया…”*
क्या आदिवासी अधिकारों की अनदेखी हुई?
यह सवाल अब और गंभीर हो गया है क्योंकि मामला आदिवासी भूमि से जुड़ा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि पुनर्वास, सहमति या मुआवजा प्रक्रिया में गड़बड़ी साबित होती है, तो यह मामला कई संवैधानिक और कानूनी सवाल खड़े कर सकता है।
संभावित कानूनी असर
यदि आरोपों की निष्पक्ष जांच होती है, तो मामला पहुंच सकता है: राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग । राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग। पर्यावरणीय नियामक संस्थाओं। और उच्च न्यायालय तक
ग्राउंड जीरो से आवाज
स्थानीय लोगों का कहना है: “यह सिर्फ जमीन नहीं हमारी पीढ़ियों का भविष्य है…”
विकास के नाम पर अगर लोग ही उजड़ जाएं। तो सवाल उठना स्वाभाविक है…
विपक्ष और सामाजिक संगठनों की नजर
सूत्रों के अनुसार यह मामला अब राजनीतिक और सामाजिक संगठनों के बीच भी चर्चा का विषय बन चुका है। आने वाले दिनों में यह विवाद और बड़ा रूप ले सकता है।
BALCO–Vedanta पर उठते सवाल
अब सबसे बड़ा सवाल यह है: क्या कॉर्पोरेट दावों और जमीनी हकीकत में फर्क है? क्या पुनर्वास नीति का पूरी तरह पालन हुआ? क्या आदिवासी परिवारों को उनका पूरा अधिकार मिला? और आखिर जिम्मेदार कौन?
धमाकेदार
कोरबा की यह लड़ाई अब सिर्फ 87 परिवारों की नहीं रही…यह सवाल है विकास मॉडल, आदिवासी अधिकार और कॉर्पोरेट जवाबदेही का…
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज़ नेटवर्क इस पूरे मामले की तह तक जाएगा…
क्योंकि सच दबाया जा सकता है… मिटाया नहीं जा सकता…
विशेष खोजी रिपोर्ट
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज़ नेटवर्क
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