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करोड़ों के CSR फंड का हिसाब किसके पास? कोरबा कलेक्टर कार्यालय का चौंकाने वाला जवाब: “जानकारी उपलब्ध नहीं” क्या उद्योगों के CSR खर्च पर कोई निगरानी नहीं? आखिर जनता के नाम पर खर्च हुए करोड़ों रुपये का हिसाब कौन देगा?

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कोरबा/नई दिल्ली।

देश के सबसे बड़े औद्योगिक जिलों में शामिल कोरबा से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) फंड की निगरानी, पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज़ नेटवर्क के संपादक अब्दुल सुल्तान द्वारा सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत जिला प्रशासन को भेजे गए आवेदन में BALCO (Vedanta Group) सहित विभिन्न CSR गतिविधियों से संबंधित जानकारी मांगी गई थी। लेकिन जिला प्रशासन का जवाब हैरान करने वाला है।

कलेक्टर कार्यालय ने लगभग हर प्रश्न के उत्तर में कहा है कि “वांछित जानकारी से संबंधित दस्तावेज शाखा में उपलब्ध नहीं है।”

आखिर किस बात की जानकारी मांगी गई थी?

आरटीआई में पूछा गया था—

  • रायपुर कैंसर अस्पताल में CSR मद से कितना खर्च किया गया?
  • क्या यह परियोजना विधिवत स्वीकृत थी?
  • CSR निगरानी समिति का गठन हुआ या नहीं?
  • समिति की बैठकों की कार्यवाही (Minutes) क्या है?
  • अस्पताल में गरीबों और स्थानीय लोगों के लिए क्या रियायतें हैं?
  • कंपनी द्वारा 11,000 युवाओं को प्रशिक्षण देने के दावे का आधार क्या है?
  • कितने युवाओं को रोजगार मिला?
  • वर्ष 2018 से अब तक BALCO द्वारा CSR मद में कितना खर्च किया गया?
  • जिले में CSR के तहत कौन-कौन से कार्य हुए?

लेकिन इन सभी सवालों पर जिला प्रशासन ने लगभग एक जैसा जवाब दिया—

“रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है।”

अब सबसे बड़ा सवाल: अगर जिला प्रशासन को नहीं पता, तो किसे पता है?

कोरबा कोई सामान्य जिला नहीं है।

यह देश के सबसे बड़े कोयला, बिजली और एल्यूमिनियम उत्पादन केंद्रों में से एक है। यहां BALCO, SECL, NTPC, CSPGCL और अनेक बड़े औद्योगिक प्रतिष्ठान कार्यरत हैं।

कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 135 के तहत निर्धारित कंपनियों के लिए अपने औसत शुद्ध लाभ (Net Profit) का कम से कम 2 प्रतिशत CSR गतिविधियों पर खर्च करना अनिवार्य है।

यह राशि ग्रामीण क्षेत्रों में—

  • शुद्ध पेयजल,
  • सड़क निर्माण,
  • शिक्षा,
  • स्वास्थ्य सेवाएं,
  • कौशल विकास,
  • रोजगार सृजन,
  • महिला सशक्तिकरण,
  • पर्यावरण संरक्षण

जैसे कार्यों पर खर्च की जाती है।

ऐसे में यदि जिला प्रशासन को यह तक जानकारी नहीं है कि जिले में करोड़ों रुपये के CSR फंड से कौन-कौन से कार्य हुए, तो यह केवल सूचना का अभाव नहीं बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर प्रश्नचिह्न है।

निगरानी नहीं तो सत्यापन कैसे?

यदि प्रशासन के पास रिकॉर्ड नहीं है तो—

  • CSR खर्च की सत्यता कौन जांचेगा?
  • कंपनियों द्वारा प्रस्तुत दावों का सत्यापन कौन करेगा?
  • लाभार्थियों की वास्तविक संख्या कौन बताएगा?
  • फर्जी या कागजी परियोजनाओं की पहचान कैसे होगी?
  • जनता के नाम पर खर्च दिखाए गए करोड़ों रुपये का सामाजिक ऑडिट कौन करेगा?

विशेषज्ञों का मानना है कि CSR फंड सार्वजनिक धन तो नहीं है, लेकिन यह सार्वजनिक हित के लिए निर्धारित धनराशि है। इसलिए इसकी पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना शासन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

RTI कानून की भावना पर भी सवाल

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 का उद्देश्य सरकारी कार्यों में पारदर्शिता लाना है।

यदि जिला प्रशासन के पास जानकारी नहीं है तो यह भी एक गंभीर प्रशासनिक प्रश्न है कि:

  • क्या जिले में CSR कार्यों की कोई निगरानी व्यवस्था ही नहीं है?
  • क्या जिला प्रशासन ने कभी कंपनियों से CSR रिपोर्ट नहीं मांगी?
  • क्या करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद कोई आधिकारिक अभिलेख नहीं रखा गया?

राज्य और केंद्र सरकार को लेना चाहिए संज्ञान

यह मामला केवल कोरबा तक सीमित नहीं है।

यदि देश के एक प्रमुख औद्योगिक जिले में CSR खर्च का समुचित रिकॉर्ड और निगरानी तंत्र नहीं है, तो यह राष्ट्रीय स्तर पर CSR प्रणाली की पारदर्शिता पर सवाल खड़ा करता है।

इसलिए आवश्यकता है कि—

  • छत्तीसगढ़ शासन इस मामले की उच्च स्तरीय जांच कराए।
  • कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय (MCA) CSR खर्च का स्वतंत्र ऑडिट कराए।
  • जिला स्तर पर CSR मॉनिटरिंग मैकेनिज्म की समीक्षा हो।
  • कंपनियों द्वारा किए गए दावों और वास्तविक कार्यों का सामाजिक अंकेक्षण (Social Audit) कराया जाए।

जनता का सवाल

यदि CSR के करोड़ों रुपये खर्च हुए हैं तो उसका रिकॉर्ड कहां है?

यदि रिकॉर्ड नहीं है तो जवाबदेह कौन है?

और यदि जवाबदेह कोई नहीं, तो फिर पारदर्शिता का दावा किस आधार पर किया जा रहा है?

कोरबा से उठे ये सवाल अब केवल एक जिले के नहीं रहे। यह देशभर में CSR फंड की निगरानी और जवाबदेही पर राष्ट्रीय बहस का विषय बन सकते हैं।

ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज़ नेटवर्क इस जनहित के मुद्दे को जनता, शासन और संसद तक पहुंचाने के अपने दायित्व का निर्वहन करता रहेगा।

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