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विश्व पृथ्वी दिवस : आज धरती माँ को सभी के ध्यान की आवश्यकता है…

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राजनांदगांव (ग्रामयात्रा छत्तीसगढ़ )। 55वें विश्व पृथ्वी दिवस 2025 की थीम हमारी शक्ति, हमारा ग्रह है। 1971 में संयुक्त राष्ट्र महासचिव यू थांट ने न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में एक विशेष समारोह आयोजित किया गया। जिसमें 22 अप्रैल को दुनिया का पहला पृथ्वी दिवस घोषित किया गया था,  हालाँकि यू थांट ने पर्यावरणीय संरक्षण का समर्थन किया, लेकिन 22 अप्रैल पृथ्वी दिवस की स्थापना 1970 में अमेरिकी सीनेटर गेलॉर्ड नेल्सन ने की थी।

भारत दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश है, जिसके पास केवल 2.4 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र, 4 प्रतिशत ताजा पानी और 18 प्रतिशत मानव तथा पशुधन आबादी है। हाल ही में हमारी धरती माता के सामने उभरती चुनौतियों में से एक पराली जलाना है। लोग अंधाधुंध और बेतरतीब ढंग से धान के खेतों को जला रहे हैं, जो आसपास के क्षेत्र में फैल जाता है और झाडिय़ां व पौधे भी जल जाते हैं तथा पारिस्थितिकी को नुकसान पहुँचता है। हम पहले से ही घटते जल संसाधनों और वनों, मिट्टी के कटाव और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र के पतन की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। प्लास्टिक और अन्य अपशिष्ट पहले से ही पानी, भूमि और समुद्री संसाधनों को प्रदूषित कर रहे हैं।

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केंद्रीय भूमिजल बोर्ड के क्षेत्रीय निदेशक डॉ. प्रबीर के नाइक ने इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की है कि कैसे आम जनता इस अंधाधुन्ध आगजनी के बारे में जागरूक नहीं है, जो पर्यावरण को नुकसान पहुँचा रही है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार देश में वन क्षेत्र 25 प्रतिशत है, लेकिन पिछले 40 वर्षों में पेड़ों की संख्या और घनत्व में कमी आई है। यह छत्तीसगढ़ और ओडिशा दोनों राज्यों में एक बहुत प्रचलित प्रथा है। इन बुरी प्रथाओं को रोकने के लिए ग्राम पंचायत स्तर पर लोगों में जागरूकता आवश्यक है।

महात्मा गांधी प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक उपयोग और शोषण के खिलाफ थे। उन्होंने प्रकृति के शोषण के लिए मानव लालच का विरोध किया। उनकी सादा जीवन शैली प्रकृति के अनुकूल थी। उन्होंने उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों के न्यूनतम और कुशल उपयोग पर जोर दिया। सभी धर्मों के हमारे पूर्वज सूर्य, नदी, पेड़, पहाडिय़ों की पूजा करते थे और उनकी रक्षा भी करते थे। लेकिन हम केवल सभी संसाधनों का अंधाधुंध शोषण कर रहे हैं और विलासिता के लिए बर्बाद भी कर रहे हैं। लेकिन अगर हम अब धरती माँ की रक्षा करने में जागरूक नहीं हुए, तो यह एक दिन डायनासोर के विलुप्त होने की तरह मानव जाति को नष्ट कर देगी। समुदाय के पास अपने इलाके का ज्ञान का खजाना होता है जो अपने आसपास के परिवेश को बहुत अच्छी तरह से संरक्षित कर सकते हैं।

पृथ्वी जल रही है, जल संसाधन घट रहे हैं।

पृथ्वी हर किसी की ज़रूरत को पूरा करने के लिए पर्याप्त संसाधन प्रदान करती है, लेकिन किसी के लालच को नहीं। – महात्मा गांधी।

– केंद्रीय भूमिजल बोर्ड के क्षेत्रीय निदेशक डॉ. प्रबीर के नाइक

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