आयुक्त की कार्यशैली पर तीखे सवाल: व्यापारियों की नाराजगी की कीमत भाजपा क्यों चुकाए?

ग्राम यात्रा का संपादकीय मत—निगम के प्रति बढ़ता अविश्वास भाजपा की नगर सरकार और कोरबा विधानसभा क्षेत्र में उसकी साख को नुकसान पहुंचा रहा है; राज्य शासन प्रशासनिक व्यवहार की समीक्षा करे
कोरबा | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क | संपादकीय टिप्पणी फैसले अधिकारी लें, नाराजगी जनता झेले और राजनीतिक कीमत निर्वाचित सरकार चुकाए—कोरबा में यह स्थिति स्वीकार नहीं की जा सकती। नगर निगम की कार्रवाई को लेकर व्यापारियों में उठी नाराजगी के बीच आयुक्त आशुतोष पांडेय की कार्यशैली और प्रशासनिक जवाबदेही पर सीधे सवाल खड़े होते हैं। कोरबा में तीन दुकानों पर ₹6 हजार की कार्रवाई पर उठे सवाल; व्यापारियों में भय की शिकायत के बीच जयसिंह अग्रवाल का बयान—“अधिकारियों से डरने की जरूरत नहीं”
क्या जानबूझकर कर विपक्ष को मौका दे रहे आयुक्त…
जनता की नाराज़गी तो नगर सरकार से हों रही??
जवाब तो आयुक्त महोदय को देना होगा…
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क का स्पष्ट संपादकीय मत है कि ऐसी कार्यशैली से भाजपा की छवि धूमिल हो रही है। इसका नुकसान भाजपा की निर्वाचित नगर सरकार और कोरबा विधानसभा क्षेत्र में पार्टी की साख को हो रहा है। यह हमारा राजनीतिक आकलन है; इसे किसी जनमत सर्वेक्षण या निश्चित चुनावी परिणाम का निष्कर्ष नहीं बताया जा रहा है। लेकिन इस आकलन का केंद्रीय प्रश्न टाला नहीं जा सकता—जब नागरिक निगम के व्यवहार से नाराज होते हैं, तो क्या वे अधिकारी और सत्तारूढ़ दल के बीच हर बार अलग हिसाब रखते हैं?
तीन दुकानों पर जुर्माना—अब आयुक्त कार्रवाई का पूरा आधार बताएं
प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार, पावरहाउस रोड पर निर्माणाधीन सड़क में पानी डालने के मामले में नवीन इलेक्ट्रिकल, अग्रवाल स्टोर और मोती ब्रदर्स पर दो-दो हजार रुपये, कुल छह हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया। निगम का कहना है कि समझाइश के बावजूद पानी बहाने जैसी गतिविधियों से सड़क निर्माण की गुणवत्ता प्रभावित होने की आशंका थी। सार्वजनिक निर्माण की सुरक्षा जरूरी है। मगर जुर्माने की ताकत दिखाने के साथ कार्रवाई का नियम, प्रमाण और प्रक्रिया बताने की जिम्मेदारी भी निभानी होगी।
आयुक्त बताएं—संबंधित दुकानों के विरुद्ध क्या तथ्य दर्ज हुए?
क्या लिखित चेतावनी दी गई?
व्यापारियों का पक्ष कैसे सुना गया?
निर्माण एजेंसी को किन सावधानियों का पालन करना था और उनकी निगरानी किसने की?
दुकानदार की जिम्मेदारी लिखी जा सकती है, तो ठेकेदार और निगरानी करने वाले अधिकारियों की जिम्मेदारी भी स्पष्ट लिखी जानी चाहिए। बारिश पर जुर्माना नहीं लगेगा—लेकिन निकासी का जवाब तो देना होगा। “बारिश हुई तो भगवान पर कौन जुर्माना लगाएगा?”—यह सवाल व्यंग्य है, लेकिन इसके पीछे निर्माण व्यवस्था की गंभीर परीक्षा है।
दुकान से पानी बहाना और प्राकृतिक बारिश अलग परिस्थितियां हैं। निगम इसी अंतर को तकनीकी आधार पर स्पष्ट करे। बारिश के दौरान निर्माणाधीन हिस्से की सुरक्षा कैसे होगी? जलभराव रोकने का इंतजाम क्या है? फ्लाईओवर से नीचे गिरते पानी की शिकायत की जांच कौन करेगा? व्यापारी से सहयोग मांगने वाला प्रशासन अपनी तैयारी का हिसाब भी दे। जवाबदेही केवल दुकान के दरवाजे तक सीमित नहीं रह सकती।
सुशासन का दावा और भय की शिकायत साथ कैसे चलेंगे?
भाजपा सरकार सुशासन की बात करती है। उस दावे की असली परीक्षा नागरिक के रोजमर्रा के अनुभव में होती है—क्या उसकी बात सुनी जाती है? क्या उसे कार्रवाई का कारण समझाया जाता है? क्या नियम सब पर समान रूप से लागू होते हैं? हमारा मानना है कि जहां नागरिक संवाद की जगह डर महसूस करे, वहां प्रशासन सरकार के सुशासन के संदेश को कमजोर कर रहा है। कोरबा के व्यापारियों की भय और असंतोष संबंधी शिकायतों को इसी गंभीरता से सुनना होगा। यह कहना प्रमाणित नहीं है कि आयुक्त जानबूझकर भाजपा को नुकसान पहुंचा रहे हैं। लेकिन प्रशासनिक निर्णयों का राजनीतिक असर हो रहा हो, तो मंशा पर बहस करके उसके परिणामों से आंख नहीं मूंदी जा सकती।
अधिकारी निर्णय लें और जनप्रतिनिधि सफाई देते रहें—यह कब तक?
नगर सरकार जनता के प्रति जवाबदेह है। महापौर और पार्षद नागरिकों के बीच जाते हैं, उनकी समस्याएं सुनते हैं और चुनाव में अपने काम का हिसाब देते हैं। इसलिए प्रशासनिक कार्यशैली से पैदा नाराजगी का बोझ भी अंततः निर्वाचित नेतृत्व पर आता है। ग्राम यात्रा का मत है कि कोरबा में भाजपा नेतृत्व को यह स्थिति गंभीरता से लेनी चाहिए। प्रशासनिक निर्णयों से पैदा असंतोष को केवल अधिकारी का विषय मानकर छोड़ना राजनीतिक भूल होगी।
महापौर और परिषद कार्रवाई का आधार मांगें। व्यापारियों की शिकायतें सुनें। जहां कार्रवाई सही है, वहां तथ्य सामने रखें; जहां प्रक्रिया या व्यवहार में त्रुटि है, वहां सुधार सुनिश्चित कराएं।
राज्य शासन संज्ञान ले—निष्पक्ष समीक्षा और आवश्यक कार्रवाई हो
राज्य सरकार और नगरीय प्रशासन विभाग को आयुक्त आशुतोष पांडेय के नेतृत्व में अपनाई जा रही संबंधित कार्रवाई की प्रक्रिया तथा व्यापारियों की शिकायतों की समीक्षा करनी चाहिए। जुर्माने के अभिलेख, चेतावनी, निरीक्षण विवरण और निर्माण की निगरानी का रिकॉर्ड जांचा जाए। संबंधित व्यापारियों, अधिकारियों और निर्माण एजेंसी का पक्ष लिया जाए। अधिकार के दुरुपयोग, असमान कार्रवाई या प्रक्रिया के उल्लंघन का प्रमाण मिले तो जिम्मेदारी तय कर उचित कार्रवाई हो।
हमारी राय स्पष्ट है: व्यापारियों और नागरिकों का भरोसा टूटेगा तो नुकसान भाजपा की नगर सरकार और विधानसभा क्षेत्र में उसकी साख को भी होगा। सरकार को यह भरोसा बचाने के लिए अभी हस्तक्षेप करना चाहिए।
आयुक्त से सवाल पूछना प्रशासन का विरोध नहीं, जवाबदेही की मांग है। कोरबा को ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें नियम स्पष्ट हों, कार्रवाई निष्पक्ष हो और नागरिक को अपनी बात रखने के लिए किसी राजनीतिक दरवाजे की तलाश न करनी पड़े।
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