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हाईकोर्ट का आदेश जिला प्राधिकारी को—फिर निगम के अधिकारियों ने कैसे खोल दिया अनुमति का दरवाजा?

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कोरबा में कानून को किनारे रखकर ‘नक्शा पास’ करने का खेल?

 

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HIG-30 के छह मंजिला निर्माण में FAR और ग्राउंड कवरेज पर बार-बार आपत्ति, फिर भी भवन-अनुज्ञा Approved—शिकायतकर्ता ने पूछा: नियम बदले, नक्शा बदला या फाइल का रास्ता?

 

जिला नियमितीकरण प्राधिकारी का कारणयुक्त आदेश सार्वजनिक रिकॉर्ड में स्पष्ट नहीं होने का आरोप—संपदा एवं भवन शाखा के अधिकारियों को हटाने, अनुमति रोकने, ई-फाइल जब्त करने और EOW-ACB जाँच की मांग

 

कोरबा | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क कोरबा नगर निगम में भवन-अनुज्ञा का एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसमें सवाल ईंट, सीमेंट और नक्शे से कहीं आगे निकलकर सीधे अधिकार-क्षेत्र, प्रशासनिक जवाबदेही और सरकारी पद के संभावित दुरुपयोग तक पहुंच गया है। पंडित रविशंकर शुक्ल नगर स्थित HIG-30 के प्रस्ताव क्रमांक 2863, प्रोजेक्ट कोड VISI-KMC-2025-0071 से जुड़े रिकॉर्ड को आधार बनाकर मुख्य सचिव से गंभीर शिकायत की गई है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि जिस निर्माण के नक्शे पर निगम के तकनीकी अधिकारियों ने स्वयं बार-बार FAR और ग्राउंड कवरेज निर्धारित सीमा से अधिक होने की आपत्ति दर्ज की, उसी प्रस्ताव को बाद में स्वीकृत कर दिया गया।

अब सवाल जहरीला भी है और सीधा भी—

क्या कोरबा नगर निगम में नियम नक्शे पर लागू होते हैं, या फाइल की पहुंच और प्रभाव देखकर उनका आकार बदल जाता है?

शिकायतकर्ता अब्दुल सुल्तान ने मुख्य सचिव से मांग की है कि भवन-अनुज्ञा तत्काल स्थगित की जाए, संपदा एवं भवन शाखा से संबंधित अधिकारियों को हटाया जाए, पूरी ई-फाइल और डिजिटल लॉग सुरक्षित किए जाएं तथा स्वतंत्र तकनीकी, विभागीय और आवश्यकता पड़ने पर आपराधिक जाँच कराई जाए।

हाईकोर्ट ने जिला प्राधिकारी को कहा था—निगम अधिकारियों को नहीं. शिकायत का सबसे गंभीर आधार छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय का 27 फरवरी 2025 का आदेश बताया गया है।

Vikas Singh v. State of Chhattisgarh, WPC No.1087/2025, Neutral Citation 2025:CGHC:9889 में न्यायालय ने कथित रूप से 4 जुलाई 2023 के नियमितीकरण आवेदन पर जिला नियमितीकरण प्राधिकारी को कानून के अनुसार निर्णय लेने का निर्देश दिया था।

शिकायत के अनुसार हाईकोर्ट ने:

– भवन को वैध घोषित नहीं किया;
– अनधिकृत निर्माण नियमित करने का आदेश नहीं दिया;
– FAR अथवा ग्राउंड कवरेज में कोई छूट नहीं दी;
– नगर निगम आयुक्त को जिला प्राधिकारी के स्थान पर निर्णय लेने का अधिकार नहीं दिया;
– संपदा अधिकारी अथवा भवन अधिकारी को भवन-अनुज्ञा जारी करने का निर्देश नहीं दिया।

ऐसे में मूल प्रश्न यह है कि यदि जिला नियमितीकरण प्राधिकारी का विधिवत सामूहिक और कारणयुक्त आदेश उपलब्ध नहीं है, तो नगर निगम की संपदा अथवा भवन शाखा ने किस कानूनी आधार पर अनुमति जारी की?

क्या हाईकोर्ट के सीमित निर्देश को निगम के अधिकारियों ने अपने लिए ‘खुली छूट’ समझ लिया?

कलेक्टर की अध्यक्षता वाली समिति का फैसला कहां है?

छत्तीसगढ़ अनधिकृत विकास का नियमितीकरण अधिनियम, 2002 के अंतर्गत जिला नियमितीकरण प्राधिकारी एक वैधानिक निकाय है। शिकायत में बताया गया है कि इसमें कलेक्टर अध्यक्ष तथा पुलिस अधीक्षक, नगर निगम आयुक्त, विकास प्राधिकरण के अधिकारी और नगर तथा ग्राम निवेश विभाग के जिला प्रभारी अधिकारी सदस्य होते हैं। नगर निगम आयुक्त स्वयं इस प्राधिकारी के केवल एक सदस्य हैं। संपदा अधिकारी और भवन अधिकारी इसके सदस्य तक नहीं हैं।

इसके बावजूद यदि जिला प्राधिकारी के स्पष्ट आदेश के बिना निगम स्तर से भवन-अनुज्ञा जारी हुई है, तो सवाल उठता है—

 

क्या एक वैधानिक समिति की कुर्सियां खाली छोड़कर नगर निगम की शाखा ने खुद ही अदालत, प्राधिकारी और अनुमति प्रदाता—तीनों भूमिकाएं निभा लीं?

शिकायत में शासन से जिला प्राधिकारी की बैठक का नोटिस, एजेंडा, सदस्यों की उपस्थिति, कार्यवाही विवरण, निर्णय और कारणयुक्त आदेश सार्वजनिक करने की मांग की गई है। यदि ऐसा कोई आदेश मौजूद नहीं है, तो अनुमति की वैधानिक बुनियाद ही गंभीर संदेह के घेरे में आ सकती है। तकनीकी रिकॉर्ड स्वयं दे रहा खतरे की घंटी

शिकायत में नगर निगम पोर्टल पर दर्ज चार टिप्पणियों का उल्लेख किया गया है:

– “As Per Drawing Attached FAR is More.”
– “Reassigned due to incorrect drawing and FAR limit exceed.”
– “Ground Coverage and FAR is More.”
– “As Per Attached Drawing FAR is More than limit Exceed.” अर्थात तकनीकी परीक्षण के दौरान कथित रूप से यह सामने आ चुका था कि:

– प्रस्तुत ड्राइंग गलत थी;
– FAR निर्धारित सीमा से अधिक था;
– ग्राउंड कवरेज भी अधिक था।

जब आपत्तियां इतनी साफ थीं तो वे दूर कैसे हुईं?

क्या संशोधित नक्शा प्रस्तुत हुआ? क्या उसका दोबारा तकनीकी परीक्षण हुआ? क्या आपत्तियां कारण लिखकर समाप्त की गईं? या फाइल में ऐसा कोई प्रशासनिक ‘डिटर्जेंट’ डाल दिया गया, जिससे सारे लाल निशान अचानक साफ हो गए?

अब अनुमति तैयार करने वाले कर्मचारी से लेकर नक्शा परीक्षक, उप अभियंता, सहायक अभियंता, भवन अधिकारी, संपदा अधिकारी, डिजिटल हस्ताक्षरकर्ता और अंतिम अनुमोदनकर्ता तक प्रत्येक व्यक्ति की नामवार भूमिका जाँचने की मांग उठी है। 252 वर्गमीटर की जमीन पर निर्माण के आंकड़े चौंकाने वाले

शिकायत में उपलब्ध नक्शे के आधार पर निम्न विवरण दिया गया है:

– भूखंड क्षेत्रफल—252 वर्गमीटर;
– ग्राउंड फ्लोर निर्माण—231.79 वर्गमीटर;
– ग्राउंड कवरेज—91.98 प्रतिशत;
– खुला क्षेत्र—लगभग 20.21 वर्गमीटर;
– घोषित FAR—2.91;
– कुल निर्माण—लगभग 1,248.69 वर्गमीटर;
– निर्माण—ग्राउंड फ्लोर से पांचवीं मंजिल तक।

नक्शे की तालिका में अनुमेय FSI 1.50 और अनुमेय फ्लोर एरिया 378 वर्गमीटर दिखाया गया है, जबकि घोषित FAR क्षेत्र 734.40 वर्गमीटर बताया गया है। इस हिसाब से घोषित FAR क्षेत्र अनुमेय क्षेत्र से लगभग 356.40 वर्गमीटर अधिक दिखाई देता है। यदि ये आंकड़े सही हैं, तो भवन-अनुज्ञा जारी करने वाले अधिकारियों को स्पष्ट करना होगा कि यह अतिरिक्त निर्माण किस नियम, किस छूट, किस नियमितीकरण आदेश और किस तकनीकी गणना के आधार पर स्वीकार किया गया।

कोरबा विकास योजना कागज पर लागू है या प्रभावशाली फाइलों के सामने उसके नियम घुटने टेक देते हैं?

दस प्रतिशत से अधिक निर्माण भी नियमित नहीं किया जा सकता—शिकायत में दावा. शिकायतकर्ता का स्पष्ट आरोप है कि नियमितीकरण प्राधिकारी को भी निर्धारित वैधानिक सीमा से बाहर जाकर मनमाने निर्माण को नियमित करने की असीमित शक्ति प्राप्त नहीं है। शिकायत में दावा किया गया है कि 10 प्रतिशत से अधिक अतिरिक्त निर्माण को नियमित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। यदि निर्माण उस सीमा से भी बाहर है, तो केवल जुर्माना जमा करवा देना अवैध निर्माण को वैध बनाने की जादुई छड़ी नहीं हो सकता। इस दावे और उस पर लागू नियमों की स्वतंत्र कानूनी एवं तकनीकी जाँच आवश्यक है।

चारों तरफ खुली जगह कहां गई?

नक्शे में निर्माण भूखंड की सीमाओं तक जाता दिखाई देने का आरोप है। शिकायत के अनुसार संकरा “OPEN” भाग अथवा आंतरिक शाफ्ट को भवन के चारों ओर आवश्यक फ्रंट, रियर और साइड मार्जिन का विकल्प नहीं माना जा सकता। आयुक्त की टिप्पणी में Satish Nayak v. State of Madhya Pradesh, 2018(3) MPLJ 651 का पालन करने का उल्लेख बताया गया है। इस निर्णय के संदर्भ में शिकायतकर्ता ने कहा है कि खुली भूमि भूखंड के भीतर और आकाश के लिए खुली होनी चाहिए तथा पार्किंग, प्रकाश-वायु और अनिवार्य मार्जिन की जरूरतें अलग-अलग हैं।

जब अंतिम टिप्पणी में ही न्यायिक निर्णय का पालन करने की शर्त थी, तब सवाल है कि भवन अधिकारी ने इसका भौतिक और तकनीकी सत्यापन कब और कैसे किया?
क्या अधिकारी मौके पर गए थे, माप लिया गया था और वीडियोग्राफी हुई थी—या फाइल में ‘OPEN’ लिख देने से जमीन भी अपने आप खुली मान ली गई?

13 अप्रैल के जुर्माने की गणना भी जाँच के घेरे में शिकायत में 13 अप्रैल 2026 के कथित जुर्माना आदेश, मांग-पत्र, गणना-पत्र, चालान और भुगतान रसीद का विशेष ऑडिट कराने की मांग की गई है।

शासन से यह जाँचने कहा गया है कि:

– जुर्माना किस निर्माण क्षेत्र पर लगाया गया?
– किस दर और गुणक का प्रयोग हुआ?
– नियमितीकरण योग्य तथा अयोग्य निर्माण अलग-अलग चिन्हित किया गया या नहीं?
– क्या किसी गलत गणना से आवेदक को आर्थिक लाभ पहुंचा?
– क्या निगम अथवा शासन को राजस्व हानि हुई?

यहाँ सबसे बड़ा प्रश्न है

यदि निर्माण नियमों के तहत नियमितीकरण योग्य ही नहीं था, तो जुर्माना किस बात का लिया गया और किस अधिकार से अनुमति दी गई?

ई-फाइल सुरक्षित नहीं हुई तो सच के डिजिटल निशान मिट सकते हैं शिकायत में पूरी ई-फाइल, सर्वर बैकअप और पोर्टल इतिहास तत्काल सुरक्षित करने की मांग की गई है। इसमें विशेष रूप से निम्न रिकॉर्ड शामिल हैं:

प्रत्येक अधिकारी की लॉगिन हिस्ट्री;
– फाइल अग्रेषण का समय;
– डिजिटल हस्ताक्षर का टाइम-स्टैम्प;
– IP लॉग;
– पुराने और संशोधित नक्शों के संस्करण;
– तकनीकी टिप्पणियों की एडिट हिस्ट्री;
– ई-मेल तथा inward-outward रिकॉर्ड;
– जुर्माना गणना की एक्सेल अथवा सॉफ्टवेयर फाइल;
– मूल हार्ड कॉपी और नोटशीट।

आशंका जताई गई है कि जाँच शुरू होने से पहले पोर्टल प्रविष्टि बदलने, पुराने नक्शे के स्थान पर नया नक्शा लगाने अथवा टिप्पणियां हटाने की कोशिश हुई तो प्रकरण की सच्चाई तक पहुंचना कठिन हो सकता है।  इसलिए रिकॉर्ड सुरक्षित करना महज औपचारिकता नहीं, बल्कि जाँच की पहली अनिवार्य शर्त है। गलत अनुमति हुई तो नौकरी तक जा सकती है

शिकायत में छत्तीसगढ़ नगर पालिक निगम अधिनियम, 1956 की धाराओं 60, 299-A, 420 और 421 का उल्लेख करते हुए दावा किया गया है कि शासन नियम-विरुद्ध अनुमति का क्रियान्वयन रोक सकता है, उसे संशोधित या निरस्त कर सकता है तथा दोषी अधिकारियों के विरुद्ध निलंबन, पदावनति, आर्थिक हानि की वसूली, सेवा से हटाने और बर्खास्तगी तक की कार्रवाई की जा सकती है।  यदि किसी अधिकारी ने जानते हुए तकनीकी आपत्तियां दबाईं, गलत इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड बनाया अथवा अस्तित्वहीन आदेश को अनुमति का आधार बनाया, तो शिकायत में भारतीय न्याय संहिता की धाराओं 198 और 201 के परीक्षण की मांग भी की गई है।

अनुचित आर्थिक लाभ अथवा रिश्वत का प्रमाण मिलने पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के अंतर्गत अपराध दर्ज करने की मांग की गई है। हालांकि शिकायतकर्ता ने स्पष्ट किया है कि स्थानीय स्तर पर चर्चित लेन-देन के आरोपों को अभी प्रमाणित तथ्य नहीं माना गया है। इनकी पुष्टि निष्पक्ष जाँच के बाद ही हो सकती है।

सिर्फ आयुक्त के नाम पर फाइल बंद नहीं होनी चाहिए इस प्रकरण में जवाबदेही को किसी एक बड़े अधिकारी के नाम तक सीमित करके छोटे हस्ताक्षरों को बचाने का प्रयास नहीं होना चाहिए।

जाँच में यह सामने आना चाहिए कि:

पहली तकनीकी आपत्ति किसने दर्ज की?
– गलत ड्राइंग किसने स्वीकार की?
– आपत्तियों को किसने और किस कारण हटाया?
– संशोधित नक्शे की जाँच किसने की?
– जिला नियमितीकरण प्राधिकारी का आदेश किसने सत्यापित किया?
– अनुमति किसने तैयार की?
– किसने डिजिटल हस्ताक्षर किए?
– किसने अंतिम अनुमति जारी की?

सरकारी फाइल में हर क्लिक, हर टिप्पणी और हर डिजिटल हस्ताक्षर की अपनी जिम्मेदारी होती है। कुर्सी बड़ी हो या छोटी—कानून के सामने हस्ताक्षर का वजन समान होना चाहिए।

शिकायत में 15 दिन के भीतर कार्रवाई की मांग

मुख्य सचिव को भेजी गई शिकायत की प्रतिलिपि नगरीय प्रशासन विभाग, आवास एवं पर्यावरण विभाग, नगर तथा ग्राम निवेश, बिलासपुर संभागायुक्त, कोरबा कलेक्टर, निगम आयुक्त तथा EOW-ACB के पुलिस महानिदेशक को भेजी गई है।

शिकायत में प्रमुख रूप से मांग की गई है कि:

भवन-अनुज्ञा तत्काल स्थगित हो;
– निर्माण एवं सभी अनुवर्ती अनुमतियों पर रोक लगे;
– पूर्णता और अधिभोग प्रमाणपत्र जारी न किया जाए;
– संबंधित अधिकारियों को शाखा से हटाया जाए;
– ई-फाइल और मूल फाइल सीलबंद की जाए;
– स्वतंत्र संयुक्त तकनीकी समिति से स्थल मापन कराया जाए;
– FAR, कवरेज, पार्किंग और खुले स्थान की वीडियोग्राफी सहित जाँच हो;
– जिला प्राधिकारी का मूल कारणयुक्त आदेश सार्वजनिक किया जाए;
– जुर्माना गणना का विशेष ऑडिट हो;
– प्रत्येक अधिकारी की नामवार जवाबदेही निर्धारित की जाए;
– 15 दिवस में शिकायतकर्ता को कार्रवाई से अवगत कराया जाए।

निगम प्रशासन से जवाब अपेक्षित यह समाचार मुख्य सचिव को प्रस्तुत शिकायत, उसमें उल्लिखित पोर्टल टिप्पणियों और उपलब्ध दस्तावेजों पर आधारित है। आरोपों की अंतिम पुष्टि सक्षम प्राधिकारी की निष्पक्ष जाँच के बाद ही होगी।

ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क इस विषय पर नगर निगम आयुक्त, संबंधित भवन अधिकारी, संपदा अधिकारी, आवेदकों तथा जिला नियमितीकरण प्राधिकारी का पक्ष आमंत्रित करता है। उनका तथ्यात्मक उत्तर प्राप्त होने पर उसे प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।  लेकिन जब सरकारी रिकॉर्ड में पहले लिखा जाए कि “FAR अधिक है, ग्राउंड कवरेज अधिक है और ड्राइंग गलत है”, और बाद में वही फाइल Approved दिखाई देने लगे, तब जनता का सवाल पूछना स्वाभाविक है—

नियम पूरे हुए या रास्ता साफ किया गया?

जिला प्राधिकारी ने नियमितीकरण किया या निगम की शाखा ने कानून की कुर्सी पर कब्जा कर लिया?

अब ई-फाइल खुलेगी तो पता चलेगा—नक्शा सुधरा था या व्यवस्था झुकी थी!

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