CSR के करोड़ों पर विकास का मुखौटा, कैलाश नगर के हिस्से में चार दिन का अंधेरा!

जनता बिजली के लिए तड़पती रही, बालको–वेदांता का तंत्र कथित तौर पर सोता रहा—महिलाओं ने कैप्टन धनंजय मिश्रा के आवास को घेरा
CEO राजेश सिंह और कॉरपोरेट अफेयर्स प्रमुख कैप्टन धनंजय मिश्रा जवाब दें—क्या प्रभावित बस्तियां केवल CSR रिपोर्ट सजाने का सामान हैं?
कोरबा/बालकोनगर। बालको–वेदांता के चमकदार मंचों पर CSR के करोड़ों रुपये विकास की रोशनी बनकर चमकते हैं, लेकिन उसी प्रबंधन से प्रभावित कैलाश नगर की जनता कथित रूप से तीन–चार दिनों तक अंधेरे में तड़पती रही। घरों की बिजली गुल रही, परिवार परेशान रहे और जिम्मेदार तंत्र की संवेदनशीलता कहीं दिखाई नहीं दी। अंततः बड़ी संख्या में महिलाओं और स्थानीय नागरिकों को बालको के कॉरपोरेट अफेयर्स एवं प्रशासन प्रमुख कैप्टन धनंजय मिश्रा के आवास तक पहुंचकर घेराव करना पड़ा।
सामने आए तीन वीडियो में दो महिलाएं और एक पुरुष मीडिया के सामने अपनी पीड़ा एवं नाराजगी व्यक्त करते दिखाई देते हैं। पीछे बड़ी संख्या में स्थानीय महिला-पुरुष मौजूद हैं। ये दृश्य केवल बिजली खराब होने की कहानी नहीं कहते; ये उस कथित कॉरपोरेट अहंकार की तस्वीर पेश करते हैं, जिसमें जनता की आवाज शायद तभी सुनाई देती है, जब वह अधिकारियों के दरवाजे तक पहुंचकर जवाब मांगती है।
घरों में अंधेरा, CSR की फाइलों में उजाला!
स्थानीय रहवासियों का आरोप है कि कैलाश नगर की बिजली व्यवस्था बालको प्रबंधन द्वारा कराई गई थी। यदि यह दावा सही है, तो उसके संचालन, रखरखाव और खराबी दूर करने की जिम्मेदारी आखिर किसकी थी?
क्या बिजली का ढांचा लगाकर फोटो खिंचवाना और उसे CSR की उपलब्धि बताना ही विकास है? क्या उसके बाद तार जले, ट्रांसफार्मर खराब हो या पूरी बस्ती अंधेरे में डूब जाए—प्रबंधन की जिम्मेदारी समाप्त हो जाती है?
बालको–वेदांता को स्पष्ट करना चाहिए कि कैलाश नगर की बिजली व्यवस्था किस CSR परियोजना के अंतर्गत स्थापित की गई, उस पर कितनी राशि खर्च हुई, रखरखाव किस एजेंसी को सौंपा गया और शिकायत मिलने के बाद भी व्यवस्था बहाल करने में इतना समय क्यों लगा।
जनता के नाम पर करोड़ों का CSR खर्च दिखाया जाए और वही जनता बिजली के लिए अधिकारियों के आवास का घेराव करे—तो यह विकास नहीं, कॉरपोरेट दावों और जमीनी सच्चाई के बीच खड़ी एक शर्मनाक दीवार है।
कैप्टन धनंजय मिश्रा के दरवाजे तक क्यों पहुंची महिलाएं?
किसी बस्ती की महिलाएं अपना घर और रोजमर्रा का काम छोड़कर किसी अधिकारी के आवास का घेराव मनोरंजन के लिए नहीं करतीं। यह स्थिति तभी बनती है, जब शिकायतों की सुनवाई बंद हो जाए, जवाबदेही गायब हो जाए और व्यवस्था जनता के धैर्य को उसकी कमजोरी समझ बैठे।
कैप्टन धनंजय मिश्रा बालको के कॉरपोरेट अफेयर्स एवं प्रशासन से जुड़े प्रमुख अधिकारी हैं। ऐसे में सवाल उनसे भी है—
कैलाश नगर के रहवासियों की शिकायत किस स्तर पर अटकी रही?
जिम्मेदार विभाग और ठेकेदार कौन थे?
तत्काल वैकल्पिक बिजली व्यवस्था क्यों नहीं कराई गई?
क्या महिलाओं के आवास तक पहुंचने से पहले प्रबंधन को उनका दर्द दिखाई नहीं दिया?
यदि जनता को हर बुनियादी सुविधा के लिए आंदोलन, घेराव और मीडिया का सहारा लेना पड़े, तो भारी-भरकम कॉरपोरेट प्रशासन किस काम का?
CEO राजेश सिंह की कमान में जनता बेहाल क्यों?
बालको CEO राजेश सिंह को भी इस पूरे मामले पर सार्वजनिक जवाब देना चाहिए। कंपनी का शीर्ष प्रबंधन केवल उत्पादन, मुनाफे, समारोह और उद्घाटन के समय सामने नहीं आ सकता। संयंत्र से प्रभावित जनता की परेशानियों की जवाबदेही भी उसी नेतृत्व की है।
क्या CEO कार्यालय को कैलाश नगर की बिजली बंद होने की सूचना नहीं थी?
यदि सूचना थी, तो तत्काल कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
यदि सूचना नहीं थी, तो फिर कंपनी का शिकायत और निगरानी तंत्र किसलिए है?
क्या बालको की प्रशासनिक मशीनरी केवल बड़े अधिकारियों के दौरे, स्वागत, प्रचार और कॉरपोरेट कार्यक्रमों के लिए तेजी दिखाती है?
प्रभावित बस्तियों की बिजली, पानी, सड़क और स्वास्थ्य जैसी समस्याएं उसकी प्राथमिकता सूची में सबसे नीचे क्यों दिखाई देती हैं?
प्रभावित जनता—CSR का चेहरा या खर्च का बहाना?
सबसे बड़ा सवाल बालको–वेदांता के CSR खर्च पर है। कंपनी को पिछले पांच वर्षों का ग्रामवार और मदवार हिसाब सार्वजनिक करना चाहिए—
– कैलाश नगर तथा आसपास की प्रभावित बस्तियों के नाम पर कुल कितनी CSR राशि स्वीकृत हुई?
– वास्तव में कितना पैसा खर्च हुआ?
– किन संस्थाओं, एजेंसियों और ठेकेदारों को काम दिया गया?
– किन कार्यों की उपयोगिता और गुणवत्ता की जांच हुई?
– कितनी परियोजनाएं आज चालू हैं और कितनी केवल कागजों में उपलब्धि बनकर दर्ज हैं?
– स्थानीय लोगों से कार्य पूर्ण होने का सत्यापन कब लिया गया?
– बिजली व्यवस्था के रखरखाव पर कितनी राशि खर्च की गई?
CSR कोई कॉरपोरेट दान नहीं, बल्कि प्रभावित समाज के प्रति वैधानिक और नैतिक जिम्मेदारी है। जनता के नाम पर खर्च दिखाकर जनता को ही अंधेरे में छोड़ देना गंभीर जांच का विषय है।
प्रचार की रोशनी से जमीनी अंधेरा नहीं छिपेगा
भव्य कार्यक्रम, मंच, बैनर और प्रेस-विज्ञप्तियां किसी कंपनी की संवेदनशीलता का प्रमाण नहीं होतीं। असली परीक्षा तब होती है, जब किसी बस्ती के घरों में अंधेरा हो, बच्चों की पढ़ाई ठप हो, बुजुर्ग परेशान हों और बीमार व्यक्ति बिजली के अभाव में जोखिम झेल रहा हो।
कैलाश नगर की घटना ने बालको–वेदांता की कथित CSR चमक के पीछे छिपे जमीनी अंधेरे को सार्वजनिक कर दिया है। यह सवाल अब केवल बिजली बहाली का नहीं, बल्कि यह पता लगाने का है कि करोड़ों के CSR दावों का लाभ वास्तव में जनता तक पहुंच भी रहा है या नहीं।
जिला प्रशासन कराए स्वतंत्र सामाजिक अंकेक्षण
जिला प्रशासन को केवल बिजली बहाल होने की सूचना लेकर मामला बंद नहीं करना चाहिए। कैलाश नगर सहित बालको से प्रभावित सभी बस्तियों में पिछले पांच वर्षों के CSR कार्यों का स्वतंत्र सामाजिक अंकेक्षण कराया जाना चाहिए।
जांच में स्वीकृति आदेश, अनुमान, कार्यादेश, एजेंसी का नाम, बिल, भुगतान, कार्य पूर्णता प्रमाणपत्र, स्थल निरीक्षण और लाभार्थियों के बयान शामिल किए जाएं। जांच समिति में प्रभावित क्षेत्र के नागरिकों और स्वतंत्र तकनीकी विशेषज्ञों को भी प्रतिनिधित्व दिया जाए।
यदि काम वास्तव में हुए हैं, तो बालको को विवरण सार्वजनिक करने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। और यदि विवरण सार्वजनिक करने से प्रबंधन बचता है, तो संदेह और गहरा होगा।
जनता के सात सीधे सवाल
1. कैलाश नगर को लगातार तीन–चार दिनों तक अंधेरे में क्यों रहना पड़ा?
2. पहली शिकायत कब दर्ज हुई और उस पर क्या कार्रवाई की गई?
3. खराबी दूर करने के लिए जिम्मेदार अधिकारी एवं एजेंसी कौन थे?
4. प्रभावित परिवारों के लिए वैकल्पिक बिजली व्यवस्था क्यों नहीं की गई?
5. कैलाश नगर में पिछले पांच वर्षों के दौरान CSR से कितना खर्च हुआ?
6. उस खर्च का भौतिक सत्यापन किस अधिकारी ने किया?
7. क्या लापरवाही के जिम्मेदार अधिकारियों अथवा ठेकेदार पर कार्रवाई होगी?
घेराव जनता की मजबूरी का विस्फोट है
बालको प्रबंधन इस विरोध को केवल भीड़ या क्षणिक नाराजगी बताकर खारिज करने की भूल न करे। अधिकारियों के आवास तक पहुंची महिलाएं उस व्यवस्था को आईना दिखा रही हैं, जो कथित रूप से जनता की पीड़ा तब तक नहीं सुनती, जब तक आक्रोश उसके दरवाजे पर दस्तक न दे।
कैलाश नगर पूछ रहा है—हमारे नाम पर दिखाए गए CSR के करोड़ों आखिर गए कहां?
बालको के शीर्ष प्रबंधन को प्रेस-विज्ञप्ति नहीं, दस्तावेजों के साथ जवाब देना होगा। क्योंकि प्रचार की रोशनी कितनी भी तेज क्यों न हो, जनता के घरों का अंधेरा अब छिपने वाला नहीं है।
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क इस मामले में बालको– वेदांता प्रबंधन, CEO राजेश सिंह और कॉरपोरेट अफेयर्स एवं प्रशासन प्रमुख कैप्टन धनंजय मिश्रा का तथ्यात्मक पक्ष आमंत्रित करता है। प्रबंधन बिजली बाधित होने का कारण, शिकायतों पर की गई कार्रवाई तथा कैलाश नगर में हुए CSR खर्च का दस्तावेजी विवरण उपलब्ध कराए; उसका पक्ष प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
संपादक – अब्दुल सुल्तान
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क, कोरबा
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