SECL की खदानों में ‘टन टैक्स’ से स्टॉक की लूट तक—दस साल की संपत्ति खुली तो कितनी कुर्सियां होंगी बेनकाब?

मानिकपुर, गेवरा और दीपका सहित खदानों में ₹10 से ₹50 प्रति टन कथित वसूली—कोयला उपलब्ध कराने, स्टॉक में हेरफेर और ओवरलोडिंग के पीछे क्या एक ही संगठित काला तंत्र?
खदान से GM कार्यालय और बिलासपुर मुख्यालय से जुड़े संवेदनशील विभागों में दस वर्षों से पदस्थ अधिकारियों-कर्मचारियों की आय, संपत्ति, बैंक खातों और बेनामी निवेश की जांच की मांग
प्रति टन कथित रेट-कार्ड यदि वर्षों तक चला तो मामला करोड़ों का नहीं, अरबों रुपये की संभावित बंदरबांट का—हर DO, हर टन और हर जिम्मेदार कुर्सी का हिसाब दे SECL
कोरबा | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क
खदान सरकारी। कोयला राष्ट्र का। अधिकारी सार्वजनिक कंपनी के। मशीन, कांटा, गेट, कैमरा और कंप्यूटर भी सरकारी व्यवस्था के। लेकिन आरोप है कि कोयला उपलब्ध कराने का भाव निजी है, ओवरलोडिंग का रास्ता कथित रूप से तय है और प्रत्येक टन पर कई कुर्सियों की प्यास बुझाने वाला अलग रेट-कार्ड चल रहा है! गेवरा, दीपका और मानिकपुर सहित SECL की खदानों से सामने आ रही सूचनाएं अब किसी एक कर्मचारी अथवा एक गेट पर होने वाली छुटपुट वसूली तक सीमित नहीं हैं।
आरोपों की अलग-अलग कड़ियां एक संभावित संगठित तंत्र की ओर संकेत करती हैं—
– कोयला उपलब्ध कराने के नाम पर ₹10 से ₹50 प्रति टन कथित वसूली;
– विशेष खरीदारों को प्राथमिकता देने का आरोप;
– कोयला स्टॉक और ग्रेड में संभावित हेरफेर;
– कांटा एवं वजन प्रणाली पर सवाल;
– ओवरलोडिंग के माध्यम से अतिरिक्त कोयला बाहर निकालने की आशंका;
– तकनीकी नियमों का चुनिंदा इस्तेमाल;
– और नीचे से ऊपर तक कथित संरक्षण तथा हिस्सेदारी की व्यवस्था।
इन आरोपों की अंतिम पुष्टि स्वतंत्र जांच से होनी है। लेकिन यदि इनका एक हिस्सा भी सही निकला, तो यह कुछ लोगों की जेब गर्म करने का मामला नहीं होगा। यह सार्वजनिक क्षेत्र की खदानों के भीतर कथित रूप से खड़ा एक ऐसा समानांतर आर्थिक तंत्र हो सकता है, जिसमें कोयला SECL का और मुनाफा किसी अदृश्य सिंडिकेट का है!
“कोयला चाहिए तो कथित टैक्स दीजिए”—क्या सरकारी स्टॉक पर निजी टोल नाका?
सूत्रों का आरोप है कि कोयला उपलब्ध कराने, गिरवाने, उठाव में प्राथमिकता दिलाने अथवा विशेष श्रेणी का कोयला दिलाने के नाम पर ₹10 से ₹50 प्रति टन तक रकम मांगी अथवा वसूली जा सकती है। कथित व्यवस्था में प्रत्येक खरीदार का भाव समान नहीं बताया जा रहा।
आरोप है कि रकम कथित रूप से इन बातों को देखकर तय हो सकती है—
– DO की कुल मात्रा;
– खरीदार की तत्काल आवश्यकता;
– कोयला उठाव की समय-सीमा;
– स्टॉक की वास्तविक अथवा बताई गई उपलब्धता;
– कोयले का ग्रेड;
– वाहन या रेक की प्राथमिकता;
– कारोबारी की भुगतान क्षमता;
– और संबंधित व्यक्ति की राजनीतिक अथवा प्रशासनिक पहुंच।
सवाल सीधा है—
यदि ₹10, ₹20, ₹40 अथवा ₹50 वैधानिक शुल्क है, तो SECL उसका आदेश, दर-सूची और रसीद सार्वजनिक करे।
यदि कोई आदेश नहीं है, रसीद नहीं है और रकम कंपनी के खाते में जमा नहीं हुई, तो यह पैसा किस अधिकार से मांगा गया?
किसने वसूला?
किसके बीच बांटा गया?
और कथित भुगतान के बाद कौन-सी सरकारी सुविधा निजी एहसान की तरह दी गई?
क्या राष्ट्रीय कोयले पर कथित सिंडिकेट ने अपना निजी टोल नाका खोल रखा है?
“स्टॉक नहीं है”—लेकिन कथित भुगतान के बाद कोयला कहां से प्रकट होता है?
सबसे गंभीर आरोप स्टॉक की उपलब्धता को लेकर है। सूत्रों का दावा है कि सामान्य कारोबारी को कई बार “कोयला उपलब्ध नहीं” अथवा “स्टॉक कम है” बताया जाता है। लेकिन विशेष पहुंच रखने वाले अथवा कथित भुगतान करने वाले खरीदार के लिए अचानक कोयले की व्यवस्था बन जाती है।
यदि ऐसा हुआ तो जांच में पूछा जाना चाहिए—
– अतिरिक्त कोयला किस stockyard से निकला?
– वह किस ग्रेड में दर्ज था?
– किस DO में उसका समायोजन किया गया?
– किस अधिकारी ने लोडिंग स्वीकृत की?
– क्या किसी अन्य वैध खरीदार का हिस्सा घटाया गया?
– क्या उच्च ग्रेड को निम्न ग्रेड दिखाया गया?
– क्या पुराने अथवा अनुपलब्ध स्टॉक को कागज पर जीवित रखा गया?
– क्या book stock और physical stock में अंतर था?
– और इस कथित “चमत्कार” का आर्थिक लाभ किसे मिला?
कोयला धरती के नीचे प्राकृतिक रूप से बनता है। लेकिन सरकारी कंप्यूटर में स्टॉक का अचानक प्रकट और गायब होना प्रकृति का नहीं—मानवीय हस्तक्षेप का विषय होगा। यदि भुगतान के बाद “स्टॉक नहीं” से “स्टॉक उपलब्ध” हो जाता है, तो जांच को कंप्यूटर से पहले उस कुर्सी को पढ़ना होगा, जिसकी अनुमति से चमत्कार हुआ।
स्टॉक का खेल—कागज पर पहाड़, जमीन पर गड्ढा?
कोयला स्टॉक में हेरफेर कई संभावित रास्तों से किया जा सकता है। इन संभावनाओं को प्रमाणित अथवा खारिज करने के लिए तकनीकी फोरेंसिक ऑडिट आवश्यक है—
– दैनिक उत्पादन अधिक या कम दर्ज करना;
– physical stock और book stock में अंतर;
– grade बदलकर आर्थिक मूल्य छिपाना;
– reject, slurry अथवा अन्य श्रेणी के नाम पर बेहतर कोयला निकालना;
– पहले से निकाले गए कोयले को दोबारा रिकॉर्ड में दिखाना;
– कम वजन दर्ज कर अधिक मात्रा बाहर भेजना;
– dispatch और gate records का गलत मिलान;
– drone survey तथा manual stock report में अंतर;
– DO modification के जरिए बाद में हिसाब बैठाना।
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क इनमें से किसी एक तरीके के अपनाए जाने को अभी प्रमाणित तथ्य घोषित नहीं करता। लेकिन आरोपों की गंभीरता को देखते हुए जांच एजेंसी को पिछले दस वर्षों का—
– mine-wise production;
– grade-wise stock;
– buyer-wise allocation;
– DO creation और modification history;
– actual lifting;
– physical stock;
– drone volumetric survey;
– weighbridge raw data;
– तथा financial reconciliation
का स्वतंत्र मिलान कराना चाहिए। यदि सब कुछ साफ है तो अधिकारियों के पास छिपाने को कुछ नहीं होगा। और यदि आंकड़े आपस में नहीं मिलते, तो कोयले की काली धूल कई सफेदपोश चेहरों पर चिपक सकती है।
ओवरलोडिंग—वाहन भारी, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड हल्का क्यों?
ओवरलोडिंग केवल सड़क सुरक्षा अथवा परिवहन कानून का उल्लंघन नहीं है। यदि वाहन में दर्ज मात्रा से अधिक कोयला लोड कर बाहर भेजा गया, तो वह अतिरिक्त कोयला किस खाते में गया?
जांच में प्रत्येक वाहन और रेक के लिए मिलान होना चाहिए—
Loading point weight
↓
Mine weighbridge
↓
Gate exit data
↓
Road/Railway record
↓
Destination weighment
↓
Buyer inward register
यदि स्रोत पर वजन कम और गंतव्य पर अधिक निकला तो अंतर का कारण क्या था?
क्या weighbridge calibration सही था?
क्या software में manual intervention संभव था?
Administrator password किसके पास था?
क्या overload alarm को निष्क्रिय किया गया?
क्या CCTV में वाहन की वास्तविक स्थिति और पर्ची का रिकॉर्ड मेल खाता है?
क्या ओवरलोड वाहन को रोकने के बजाय कथित सुविधा शुल्क लेकर बाहर जाने दिया गया?
ट्रक अथवा वैगन पर चढ़ा अतिरिक्त कोयला केवल वजन नहीं—राष्ट्रीय संपत्ति का वह हिस्सा हो सकता है, जिसे सरकारी हिसाब से गायब कर दिया गया। मानिकपुर—जहां खुली चोरी ने सुरक्षा व्यवस्था का मुखौटा फाड़ दिया जुलाई 2026 में प्रकाशित रिपोर्ट में मानिकपुर खदान क्षेत्र से रात के समय स्कूटी और साइकिल से कोयला ले जाने, सोशल मीडिया पर वीडियो सामने आने तथा चोरी के कोयले को स्थानीय ढाबों, ईंट-भट्ठों और अन्य ठिकानों पर खपाने के आरोप दर्ज हुए। रिपोर्ट में पुलिस अधिकारी ने गश्त बढ़ाने की बात कही थी, जबकि SECL प्रवक्ता ने क्षेत्रीय प्रबंधन से वस्तुस्थिति की जानकारी लेने और आवश्यकता पड़ने पर पुलिस से सहयोग लेने की बात कही थी। “मानिकपुर कोयला चोरी संबंधी रिपोर्ट” (https://www.amarujala.com/chhattisgarh/korba/coal-theft-continues-at-secl-manikpur-mine-despite-rains-scooters-and-cycles-used-thieves-gather-nightly-management-and-police-unaware-of-ongoing-illegal-activity-korba-news-c-1-1-noi1487-4529155-2026-07-22) यह रिपोर्ट बड़ी संस्थागत लूट का स्वतः प्रमाण नहीं है। लेकिन यह सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर और दस्तावेजी सवाल अवश्य खड़ा करती है।
यदि लोग रात में खदान क्षेत्र तक पहुंचकर कोयला ले जा सकते हैं, तो—
– सुरक्षा गश्त कहां थी?
– CCTV क्या देख रहा था?
– प्रवेश का रास्ता किसने खुला छोड़ा?
– चोरी का कोयला एकत्र करने वाले बड़े खरीदार कौन थे?
– कितने मामले दर्ज हुए?
– कितने संग्रह केंद्रों पर छापे पड़े?
– जिम्मेदार सुरक्षा अधिकारियों पर क्या कार्रवाई हुई?
– और चोरी की मात्रा stock register में कैसे समायोजित हुई?
केवल बोरी, साइकिल और स्कूटी पकड़ना पर्याप्त नहीं। उस कोयले को खरीदने, जमा करने और बड़े वाहन से आगे भेजने वाले कथित सफेदपोश नेटवर्क की जांच होनी चाहिए। गरीब की साइकिल पकड़कर फोटो खिंचवाना आसान है; कथित सिंडिकेट की तिजोरी तक पहुंचना ही असली कार्रवाई है।
गेवरा–दीपका—क्या उपलब्धता, प्राथमिकता और तकनीकी नियम बिकाऊ बना दिए गए?
गेवरा–दीपका में आरोप केवल प्रति टन रकम तक सीमित नहीं हैं। सूत्रों के अनुसार खरीदार की आवश्यकता, DO, स्टॉक और लोडिंग से संबंधित संवेदनशील जानकारी कथित वसूली का आधार बन सकती है। तकनीकी आपत्तियों का चुनिंदा उपयोग करने का आरोप भी जांच योग्य है।
जांच एजेंसी मिलान करे—
– भुगतान से इनकार करने वाले खरीदारों के वाहन कितनी देर रोके गए?
– किन कारोबारियों को लगातार प्राथमिकता मिली?
– किन DO में बार-बार संशोधन हुआ?
– किन खरीदारों को “स्टॉक नहीं” बताया गया?
– उसी अवधि में किन लोगों को कोयला मिला?
– तकनीकी आपत्तियां सबके लिए समान थीं?
– किन बाहरी व्यक्तियों को बिक्री और तकनीकी कार्यालयों तक नियमित पहुंच मिली?
– और उन व्यक्तियों का संबंधित अधिकारियों से क्या वित्तीय अथवा डिजिटल संपर्क था?
यदि नियम सबके लिए समान थे तो रिकॉर्ड इसे प्रमाणित करेगा। यदि रिकॉर्ड में चुनिंदा कठोरता और चुनिंदा मेहरबानी दिखाई देती है, तो कथित रेट-कार्ड की परत और मोटी हो जाएगी।
मुख्यालय से जुड़ी सभी खदानें—व्यापक ऑडिट से डर क्यों?
यह कहना अभी उचित नहीं होगा कि SECL मुख्यालय के अधीन प्रत्येक खदान में अवैध वसूली अथवा कोयला लूट प्रमाणित है। लेकिन कई प्रमुख खदानों से उठते गंभीर आरोपों के बाद केवल उन्हीं खदानों की जांच पर्याप्त नहीं होगी, जिनके नाम मीडिया में आ चुके हैं।
SECL को जोखिम-आधारित कंपनी-व्यापी जांच करानी चाहिए, विशेष रूप से उन खदानों और साइडिंग में जहां—
– उत्पादन और dispatch अत्यधिक है;
– स्टॉक में बार-बार अंतर मिला;
– weighbridge शिकायतें हुईं;
– संवेदनशील पदों पर अधिकारी लंबे समय से जमे हैं;
– सीमित खरीदारों को असामान्य लाभ मिला;
– DO में बार-बार संशोधन हुआ;
– अथवा चोरी और अवैध वसूली की शिकायतें सामने आईं।
सभी संबंधित क्षेत्रों का audit हो—
– buyer-wise lifting pattern;
– grade variation;
– stock reconciliation;
– overload data;
– source–destination weight;
– DO modification;
– gate और CCTV record;
– तथा sensitive-post tenure।
यदि पूरी व्यवस्था पाक-साफ है, तो पारदर्शी ऑडिट SECL की प्रतिष्ठा बढ़ाएगा। फिर स्वतंत्र जांच से बेचैनी क्यों?
दस वर्षों से संवेदनशील पदों पर बैठे लोगों की संपत्ति खुले अब जांच केवल कोयले तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। पिछले दस वर्षों में बिक्री, डिस्पैच, स्टॉक, गुणवत्ता, तकनीकी, कांटा, सुरक्षा, साइडिंग, वित्त, कार्मिक, विजिलेंस और कोलियरी प्रबंधन के संवेदनशील पदों पर रहे अधिकारियों-कर्मचारियों की कानूनसम्मत संपत्ति जांच होनी चाहिए।
सक्षम एजेंसी जांच करे—
– नियुक्ति के समय घोषित संपत्ति;
– वार्षिक Immovable Property Returns;
– वर्तमान चल-अचल संपत्ति;
– बैंक खाते और असामान्य नकद जमा;
– निवेश, शेयर, म्यूचुअल फंड और बीमा;
– महंगी गाड़ियां;
– जमीन, मकान और व्यावसायिक संपत्ति;
– परिजनों अथवा आश्रितों के नाम अचानक खरीदी संपत्ति;
– संदिग्ध फर्मों, एजेंसियों और ठेकेदारों से लेन-देन;
– ज्ञात आय और जीवनशैली का अंतर;
– तथा कथित बिचौलियों से डिजिटल एवं वित्तीय संपर्क।
यह जांच कानून के अनुसार और सक्षम एजेंसी द्वारा हो। केवल लंबे कार्यकाल या आरोप के आधार पर किसी को दोषी न माना जाए। लेकिन जहां घोषित आय और वास्तविक संपत्ति के बीच असंगत अंतर मिले, वहां Prevention of Corruption Act सहित लागू कानूनों के अंतर्गत कार्रवाई पर विचार होना चाहिए। दस साल तक कोयले का हिसाब रखने वालों से अब उनकी दौलत का हिसाब भी मांगा जाए।
केवल अधिकारी नहीं—कथित बिचौलियों और एजेंसी प्रतिनिधियों की आर्थिक कुंडली भी खुले यदि कथित रकम अधिकारियों तक पहुंचाई गई, तो बीच में संग्रह और वितरण करने वाला कोई माध्यम भी रहा होगा।
जांच में शामिल हों—
– एजेंसी प्रतिनिधि;
– ठेकेदार;
– ट्रांसपोर्टर;
– नियमित बाहरी आगंतुक;
– कथित कोयला दलाल;
– विशेष लाभ पाने वाले खरीदार;
– और अधिकारियों से निकट वित्तीय संबंध रखने वाली फर्में।
देखा जाए—
किसकी आय अचानक बढ़ी?
किसने जमीन और वाहन खरीदे?
किसके खाते से अधिकारियों अथवा उनके निकट व्यक्तियों को रकम गई?
किसकी कंपनी को बार-बार काम मिला?
और कौन खदान से GM कार्यालय तक बिना रोक-टोक घूमता रहा?
रिश्वत लेने वाला अकेला भ्रष्ट नहीं होता; उसे पहुंचाने और बदले में अवैध लाभ लेने वाला भी कथित श्रृंखला की महत्वपूर्ण कड़ी हो सकता है। CVC की निगरानी में CBI से जांच की मांग
मामले की व्यापकता देखते हुए ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क मांग करता है—
1. CVC की निगरानी में स्वतंत्र प्रारंभिक जांच हो।
2. प्रथमदृष्टया आपराधिक संकेत मिलने पर मामला CBI को सौंपा जाए।
3. पिछले दस वर्षों का mine-wise forensic stock audit कराया जाए।
4. source–destination weighment का वाहन और वैगनवार मिलान हो।
5. ₹10–₹50 प्रति टन कथित वसूली की वित्तीय श्रृंखला जांची जाए।
6. ओवरलोडिंग, grade manipulation और DO modification का डिजिटल ऑडिट हो।
7. संवेदनशील पदों पर रहे अधिकारियों-कर्मचारियों की आय और घोषित संपत्ति का सत्यापन हो।
8. एजेंसी प्रतिनिधियों, बिचौलियों और विशेष लाभार्थी खरीदारों के वित्तीय संबंधों की जांच हो।
9. जांच प्रभावित कर सकने वाले व्यक्तियों को संवेदनशील पदों से अस्थायी रूप से हटाया जाए।
10. whistleblowers और कारोबारी शिकायतकर्ताओं की पहचान सुरक्षित रखी जाए।
SECL से 15 जहरीले लेकिन सीधे सवाल
1. ₹10–₹50 प्रति टन वसूली की कितनी शिकायतें मिलीं?
2. क्या किसी शिकायत में बिक्री अथवा तकनीकी शाखा का नाम आया?
3. पिछले दस वर्षों में कितना physical–book stock difference मिला?
4. किस खदान में सबसे अधिक stock variation रहा?
5. कितने DO बाद में संशोधित अथवा निरस्त हुए?
6. किन खरीदारों को लगातार असामान्य प्राथमिकता मिली?
7. कितने overload मामले दर्ज हुए?
8. source और destination weight में कितना अंतर मिला?
9. weighbridge software का administrator access किसके पास था?
10. मानिकपुर की रिपोर्ट के बाद क्षेत्रीय जांच का निष्कर्ष क्या रहा?
11. संवेदनशील पदों पर दस वर्षों से अथवा बार-बार पदस्थ अधिकारी कौन हैं?
12. क्या उनकी संपत्ति घोषणाओं का स्वतंत्र सत्यापन हुआ?
13. कितने अधिकारियों पर major penalty अथवा आपराधिक कार्रवाई हुई?
14. क्या SECL पूरा raw digital data CVC अथवा CBI को देगा?
15. यदि हर टन का हिसाब साफ है तो दस वर्षों का forensic audit कराने में डर किस बात का है?
हर टन पर कथित जहर—साल के अंत में अरबों की काली फसल?
₹10 प्रति टन मामूली दिखाई देता है। ₹50 प्रति टन भी एक ट्रक के सामने छोटा लग सकता है। लेकिन लाखों और करोड़ों टन के सामने यही रकम संभावित रूप से करोड़ों-अरबों रुपये में बदल सकती है।
इसके साथ यदि स्टॉक हेरफेर, ग्रेड का अंतर और ओवरलोडिंग से बाहर गए अतिरिक्त कोयले का मूल्य जुड़ जाए, तो कथित आर्थिक नुकसान का आकार कहीं अधिक गंभीर हो सकता है। अंतिम रकम स्वतंत्र ऑडिट से निकलेगी।
लेकिन इतना स्पष्ट है—
हर टन से थोड़ा-थोड़ा निचोड़ा गया कथित जहर वर्षों में राष्ट्रीय संपत्ति पर अरबों की काली फसल उगा सकता है। अब छोटी मछलियों की गिरफ्तारी और निचले कर्मचारियों के निलंबन से काम नहीं चलेगा।
हर जिम्मेदार पद की जांच हो।
हर संदिग्ध संपत्ति का सत्यापन हो।
हर बिचौलिए का बैंक खाता खुले।
हर DO का डिजिटल इतिहास निकले।
हर कांटे का raw data सुरक्षित हो।
और हर उस कुर्सी से जवाब लिया जाए, जिसकी निगरानी में राष्ट्रीय कोयले को कथित निजी जागीर समझकर लूटा गया।
यह केवल एक खबर नहीं—राष्ट्रीय संपत्ति का हिसाब मांगता देशहित का दस्तावेज है। पड़ताल जारी है…अगले एपिसोड में—खदान से GM कार्यालय और SECL मुख्यालय बिलासपुर तक कथित संरक्षण की पूरी सीढ़ी: किसने शिकायत दबाई, किसने पदस्थापना बचाई और किस बड़ी कुर्सी तक पहुंची कथित हिस्सेदारी?
संपादक—अब्दुल सुल्तान
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क
कानूनी एवं संपादकीय टिप्पणी
इस समाचार में प्रति टन कथित वसूली, स्टॉक एवं ग्रेड हेरफेर, ओवरलोडिंग, विशेष खरीदारों को लाभ, पदवार हिस्सेदारी और संरक्षण से संबंधित विवरण सूत्रों, प्रकाशित रिपोर्टों तथा जांच योग्य आरोपों पर आधारित हैं। किसी अधिकारी, कर्मचारी, कारोबारी, एजेंसी या संस्था को दोषी घोषित नहीं किया गया है।
मानिकपुर से संबंधित संदर्भ प्रकाशित समाचार और उसमें दर्ज अधिकारियों की प्रतिक्रिया पर आधारित है। संपत्ति जांच की मांग कानूनसम्मत सत्यापन के लिए है; लंबे कार्यकाल अथवा किसी पद पर नियुक्ति मात्र से भ्रष्टाचार प्रमाणित नहीं होता। वास्तविक नुकसान और जिम्मेदारी सक्षम एजेंसी की स्वतंत्र जांच के बाद ही निर्धारित होगी। संबंधित पक्षों का प्रमाण सहित उत्तर प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
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