छत्तीसगढ़ DMF का ‘काला कुंड’: खदानों ने गांव निगले, अफसरशाही ने कल्याण का खजाना?

₹4,536.58 करोड़ खर्च—फिर भी 754 खनन प्रभावित गांव खाली हाथ! CAG रिपोर्ट को EOW-ACB जांच में जोड़ने की मांग शासन की चौखट तक पहुंची
₹1,060.70 करोड़ के काम प्रभावित क्षेत्र तय होने से पहले स्वीकृत; ₹709.47 करोड़ के लाभार्थीमूलक खर्च पर पहचान का संकट—अब फाइल, ठेका, भुगतान और मनी ट्रेल खोलेगी असली चेहरा?
वन विभाग ने 25 पन्नों की शिकायत खनिज साधन विभाग को कार्रवाई के लिए भेजी; सवाल—यह जांच की शुरुआत है या अरबों के आरोपों को दफनाने की नई सरकारी सुरंग?
रायपुर/कोरबा | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क छत्तीसगढ़ की धरती से खनिज निकला, कंपनियों की तिजोरियां भरीं, सरकार को राजस्व मिला और खनन प्रभावित गांवों के हिस्से में आई धूल, प्रदूषण, विस्थापन, बीमारी और उजड़ी हुई जिंदगी। इन्हीं घावों पर मरहम लगाने के लिए जिला खनिज संस्थान न्यास—DMFT बनाया गया था। लेकिन भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की Report No. 5 of 2026 ने इस कथित कल्याणकारी व्यवस्था का ऐसा एक्स-रे सामने रखा है, जिसमें योजनाओं से अधिक प्रश्न, जवाबदेही से अधिक खालीपन और जनकल्याण से अधिक प्रशासनिक अंधेरा दिखाई देता है। आधिकारिक जानकारी के अनुसार छत्तीसगढ़ के जांचे गए DMFT न्यासों ने उपलब्ध निधि का करीब 81 प्रतिशत, यानी ₹4,536.58 करोड़ खर्च कर दिया। इसके बावजूद 11 चयनित जिलों के 1,734 प्रत्यक्ष खनन प्रभावित गांवों में से 754 गांव—लगभग 44 प्रतिशत—योजनाओं के कवरेज से बाहर रहे। भारत सरकार के पत्र सूचना कार्यालय द्वारा जारी CAG निष्कर्ष
यानी सरकारी खाते चिल्ला रहे हैं—“करोड़ों खर्च हो गए”; लेकिन खनन प्रभावित गांव पूछ रहे हैं—“हमारे हिस्से में आया क्या?”
DMF था घाव भरने के लिए—कहीं इसे सत्ता और ठेकेदारी का खजाना तो नहीं बना दिया गया?
DMF कोई मुख्यमंत्री, मंत्री, कलेक्टर अथवा अधिकारी की निजी दान-पेटी नहीं है। यह खनन प्रभावित लोगों और क्षेत्रों के हित में स्थापित वैधानिक न्यास है। केंद्र सरकार ने सितंबर 2015 में प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना—PMKKKY शुरू की थी, ताकि खदानों की कीमत चुका रहे समुदायों को पेयजल, स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण और आजीविका जैसी मूल सुविधाएं मिल सकें। संशोधित केंद्रीय दिशा-निर्देशों में कम-से-कम 70 प्रतिशत DMF निधि सीधे प्रभावित क्षेत्रों और उच्च प्राथमिकता वाले क्षेत्रों पर खर्च करने की व्यवस्था है। केंद्रीय खान मंत्रालय के PMKKKY दिशा-निर्देश इसके बावजूद छत्तीसगढ़ में 754 सीधे प्रभावित गांवों का छूट जाना महज फाइल की भूल नहीं माना जा सकता। यह उस पूरी व्यवस्था के विवेक, प्राथमिकता और नीयत पर सवाल है, जिसने खदान का प्रदूषण गांवों तक पहुंचने दिया—पर DMF का पैसा नहीं!
₹1,060.70 करोड़ की मंजूरी—पहले काम बांटे, प्रभावित क्षेत्र बाद में खोजे?
CAG ऑडिट में खनन प्रभावित क्षेत्रों की पहचान में पांच से 65 महीने तक की देरी सामने आई। इसी अवधि में लगभग ₹1,060.70 करोड़ के कार्य प्रभावित क्षेत्रों की औपचारिक पहचान से पहले ही स्वीकृत कर दिए गए। इतना ही नहीं, प्रत्यक्ष प्रभावित गांवों की सूची DMFT नियमों के अनुसार अधिसूचित करने के स्थान पर जिला कलेक्टरों के कार्यालयीन आदेशों से जारी किए जाने की बात भी सामने आई। आधिकारिक CAG निष्कर्षों पर PIB विज्ञप्ति
अब सवाल धारदार है—
जब प्रभावित क्षेत्र का वैधानिक निर्धारण ही पूरा नहीं हुआ था, तब ₹1,060.70 करोड़ के कार्य किस नक्शे, किस योजना और किस प्राथमिकता के आधार पर स्वीकृत किए गए?
क्या पहले पसंदीदा काम और एजेंसियां तय की गईं और बाद में खनन प्रभावित जनता का नाम कागजों पर चिपकाया गया?
कौन अधिकारी इन स्वीकृतियों का सूत्रधार था? किस बैठक में निर्णय हुआ? किसने नोटशीट लिखी? किसने तकनीकी और वित्तीय सहमति दी? और आखिर किसे इन आदेशों से लाभ मिला?
₹709.47 करोड़ खर्च—लाभार्थियों की पहचान ही सवालों में! शासन को भेजी गई विस्तृत शिकायत में CAG रिपोर्ट के आधार पर करीब ₹709.47 करोड़ के लाभार्थीमूलक व्यय को लेकर गंभीर प्रश्न उठाए गए हैं। शिकायत के मुताबिक वास्तविक प्रभावित लोगों की पहचान सुनिश्चित किए बिना यह व्यय किया गया।
यह सामान्य हिसाब-किताब की त्रुटि नहीं हो सकती। यदि लाभार्थी की पहचान स्पष्ट नहीं, तो भुगतान किसके नाम पर हुआ?
चयन किसने किया? ग्रामसभा की अनुशंसा कहां है? आधार और बैंक खातों का सत्यापन हुआ या नहीं?
क्या वास्तविक पीड़ित कतार में खड़े रहे और कागजी लाभार्थी DMF की मलाई निगलते रहे?
अब प्रत्येक लाभार्थी के नाम, पात्रता, बैंक खाते, भुगतान और जमीनी स्थिति का मिलान आवश्यक है। यदि सूची में अपात्र, काल्पनिक अथवा फर्जी नाम मिले, तो जिम्मेदारी केवल डेटा एंट्री ऑपरेटर की नहीं—चयन से लेकर भुगतान स्वीकृत करने वाली पूरी प्रशासनिक शृंखला की तय होनी चाहिए। खनन की राख गांवों में, ₹4,536 करोड़ का ‘विकास’ आखिर कहां? ऑडिट अवधि में ₹4,536.58 करोड़ खर्च होने के बावजूद 754 प्रत्यक्ष प्रभावित गांवों का कवरेज से बाहर रहना DMF व्यवस्था का सबसे क्रूर विरोधाभास है। जिन गांवों की हवा जहरीली हुई, जलस्रोत प्रभावित हुए, खेतों पर धूल बैठी, सड़कें भारी वाहनों से टूटीं और परिवारों ने विस्थापन झेला—उन्हीं गांवों को विकास की सूची से बाहर किसने किया?
यह जांचना होगा कि—
बाहर रखे गए 754 गांव कौन-कौन से हैं?
उन्हें सूची से हटाने या शामिल नहीं करने का आधार क्या था?
गांवों की सूची किस अधिकारी ने तैयार और अनुमोदित की?
क्या ग्रामसभाओं से कोई प्रस्ताव लिया गया?
क्या किसी राजनीतिक, प्रशासनिक या ठेकेदारी दबाव में प्राथमिकताएं बदली गईं?
जिन क्षेत्रों को धन मिला, वे वास्तविक खनन प्रभावित थे अथवा प्रभावशाली लोगों की पसंद के क्षेत्र?
बिना वार्षिक योजना, बिना मास्टर प्लान—फिर करोड़ों के काम किसकी जुबान पर चुने गए?
CAG ने अनिवार्य वार्षिक बजट, वार्षिक योजना, मास्टर प्लान और विजन डॉक्यूमेंट के बिना निधि खर्च किए जाने पर आपत्ति दर्ज की है। जब दीर्घकालीन योजना नहीं थी, जरूरतों का वैज्ञानिक आकलन नहीं था और प्रभावित समुदायों की प्राथमिकता दर्ज नहीं थी, तो करोड़ों रुपये की परियोजनाएं आखिर कैसे चुनी गईं? क्या किसी गांव की जरूरत से अधिक किसी अधिकारी की कलम महत्वपूर्ण हो गई? क्या परियोजनाएं सार्वजनिक आवश्यकता देखकर चुनी गईं या ठेके की गुंजाइश देखकर? योजना के बिना खर्च का अर्थ है—न लक्ष्य साफ, न प्राथमिकता स्पष्ट, न परिणाम का पैमाना। ऐसी व्यवस्था में जनकल्याण पीछे और मनमाना चयन आगे निकल जाता है।
₹38.82 करोड़ की खरीद—तकनीकी कसौटी गायब, भुगतान पूरा?
शिकायत में CAG रिपोर्ट के हवाले से लगभग ₹38.82 करोड़ की खरीद निर्धारित तकनीकी विनिर्देशों के बिना किए जाने का उल्लेख है।
यदि सामान खरीदने से पहले उसकी गुणवत्ता, क्षमता, मानक और तकनीकी आवश्यकता तय नहीं थी, तो निविदा किस आधार पर बनी? फर्म का चयन कैसे हुआ? माल स्वीकार किसने किया? और भुगतान किस गुणवत्ता प्रमाणपत्र पर किया गया?
कहीं तकनीकी मापदंडों को जानबूझकर धुंधला रखकर पसंदीदा आपूर्तिकर्ताओं के लिए सरकारी तिजोरी का दरवाजा तो नहीं खोला गया?
इसकी जांच केवल फाइल देखकर नहीं, सामग्री के नमूने, गुणवत्ता परीक्षण, तकनीकी समिति की कार्यवाही और थर्ड पार्टी इंस्पेक्शन से होनी चाहिए। ₹41.80 करोड़ की अनुपयोगी परिसंपत्तियां—जनकल्याण के स्मारक या कमीशन की कब्रें? शिकायत में लगभग ₹41.80 करोड़ की ऐसी परिसंपत्तियों का उल्लेख है जो अपेक्षित उद्देश्य पूरा नहीं कर सकीं।
अब हर परिसंपत्ति की जमीन पर जाकर जांच होनी चाहिए—
निर्माण वास्तव में पूरा हुआ या केवल Completion Certificate बना?
भवन, मशीन अथवा सुविधा आज उपयोग में है?
पूरी राशि का भुगतान कब और किसे हुआ?
Measurement Book में दर्ज माप जमीन से मेल खाता है?
घटिया निर्माण के बावजूद भुगतान स्वीकृत किया गया?
रखरखाव की व्यवस्था क्यों नहीं हुई?
यदि करोड़ों की परिसंपत्तियां बंद, अधूरी अथवा बेकार पड़ी हैं, तो वे केवल प्रशासनिक विफलता नहीं—खनन प्रभावित जनता के लूटे गए अधिकारों की खड़ी हुई गवाही हैं। ₹30.73 करोड़ योजना से बाहर—DMF का पैसा किसकी प्राथमिकता पर बहा? शिकायत में CAG के आधार पर लगभग ₹30.73 करोड़ का व्यय PMKKKY के निर्धारित उद्देश्यों से बाहर होने की बात कही गई है। जांच में प्रत्येक कार्य की मद, स्वीकृति, उपयोगिता और वास्तविक लाभार्थी सामने आने चाहिए। यह बताया जाना चाहिए कि खनन प्रभावितों के नाम पर जमा धन गैर-निर्धारित कार्यों में लगाने की अनुमति किसने दी और उससे किस क्षेत्र, संस्था या एजेंसी को लाभ पहुंचा। DMF का पैसा यदि खदान प्रभावित जनता के बजाय सामान्य निर्माण अथवा प्रभावशाली लोगों की पसंदीदा परियोजनाओं में लगाया गया, तो यह नीति की मामूली चूक नहीं—न्यास के मूल उद्देश्य पर सीधा प्रहार है।
राष्ट्रीय स्तर पर भी बज रही चेतावनी—DMF की बीमारी किसी एक जिले तक सीमित नहीं देश के अन्य राज्यों के CAG ऑडिट में भी DMF के उपयोग को लेकर इसी तरह की संरचनात्मक कमियां सामने आई हैं। कर्नाटक के प्रदर्शन ऑडिट में धन निष्क्रिय रहने, निर्धारित कल्याणकारी उद्देश्य से बाहर खर्च और ग्रामसभाओं की कमजोर भागीदारी जैसे मुद्दे दर्ज हुए। कर्नाटक की PMKKKY-DMFT प्रदर्शन ऑडिट रिपोर्ट
यह राष्ट्रीय चेतावनी है— खनन प्रभावितों के लिए बनाया गया कोष कहीं राज्यों में अफसरशाही, मनमानी परियोजनाओं और अपारदर्शी ठेकों का समानांतर खजाना तो नहीं बनता जा रहा? छत्तीसगढ़ का मामला इसलिए अधिक गंभीर है क्योंकि यह देश के प्रमुख खनिज उत्पादक राज्यों में है। यहां DMF की हर गड़बड़ी केवल लेखा आपत्ति नहीं, उन समुदायों के साथ अन्याय है जिनकी जमीन और पर्यावरण ने देश के औद्योगिक विकास की कीमत चुकाई है।
शासन की चौखट पर पहुंची शिकायत—अब खनिज विभाग की परीक्षा छत्तीसगढ़ शासन के वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग ने 4 अगस्त 2026 को पत्र क्रमांक GENS-11/8802/2026-FOREST-2 जारी कर शिकायत खनिज साधन विभाग के सचिव को नियमानुसार कार्रवाई के लिए भेजी है। पत्र पर उप सचिव दुर्गेश राम सोनतापेर के डिजिटल हस्ताक्षर हैं। इसमें भारतीय जनाधिकार पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष दीपक दुबे के आवेदन और उसके साथ प्रस्तुत दस्तावेजों का उल्लेख है। यह पत्र किसी को दोषी घोषित नहीं करता और न ही अपने आप FIR का आदेश है। लेकिन शिकायत संबंधित विभाग तक औपचारिक रूप से पहुंच चुकी है। अब खनिज साधन विभाग यह कहकर नहीं बच सकता कि उसे मामले की जानकारी नहीं थी।
अब उसकी चुप्पी भी दर्ज होगी और कार्रवाई भी। EOW-ACB के सामने रखी गई ‘जांच की पूरी शस्त्र-सूची’ 25 पन्नों की शिकायत में मांग की गई है कि CAG Report No. 5 of 2026 तथा Annexure-A से Annexure-L तक को वर्तमान DMFT संबंधी विवेचना का हिस्सा बनाया जाए।
जांच एजेंसियों से निम्न रिकॉर्ड तत्काल सुरक्षित करने की मांग है—
DMFT की मूल फाइलें और बैंक खाते
वार्षिक एवं मास्टर प्लान
DPR और प्रशासनिक, तकनीकी व वित्तीय स्वीकृतियां
निविदा फाइलें और Bid Evaluation
GeM तथा ई-टेंडर Audit Logs
Work Order और Purchase Order
Measurement Book, रनिंग बिल और फाइनल बिल
Completion Certificate और Utilisation Certificate
ई-ऑफिस फाइल, ई-मेल और Digital Signature Logs
फाइलों की Version History और हटाए गए डिजिटल रिकॉर्ड
GPS, Geo-tagging, फोटो और Drone Survey
RTGS, NEFT, UTR और बैंक खातों की मनी ट्रेल
मांग स्पष्ट है—कागजी उत्तर नहीं, वित्तीय, तकनीकी और डिजिटल फॉरेंसिक जांच हो। ठेकेदार के GST से अफसर के कनेक्शन तक खुले पूरी कुंडली शिकायत में ठेकेदारों, आपूर्तिकर्ताओं और क्रियान्वयन एजेंसियों के GST, PAN, आयकर रिटर्न, कंपनी निदेशक, शेयरधारिता और वास्तविक लाभकारी स्वामित्व—Beneficial Ownership की जांच मांगी गई है। एक ही पते, समान निदेशकों अथवा आपस में जुड़ी कंपनियों को बार-बार काम मिलने, निविदाओं को छोटे टुकड़ों में बांटने, सीमित प्रतिस्पर्धा कराने और फर्जी अथवा बढ़े हुए बिलों की संभावना का परीक्षण करने की मांग भी शामिल है। भुगतान के बाद धन कहां गया, किन खातों में घूमा, क्या तत्काल बड़ी निकासी हुई और क्या किसी लोकसेवक अथवा उससे जुड़े व्यक्ति को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष लाभ मिला—यह सब मनी ट्रेल से सामने आ सकता है।
यदि जांच केवल निर्माण स्थल पर फोटो खिंचवाकर बंद कर दी गई, तो सच फिर फाइलों के मलबे में दब जाएगा।
कलेक्टर की कलम से ठेकेदार के खाते तक—हर हस्ताक्षर का हिसाब हो इतने बड़े वित्तीय और प्रशासनिक तंत्र में जवाबदेही किसी एक इंजीनियर या लिपिक पर पटककर मामला बंद नहीं किया जा सकता। जांच में कलेक्टर, DMFT अध्यक्ष, सदस्य सचिव, मुख्य कार्यपालन अधिकारी, वित्त अधिकारी, कार्यपालन अभियंता, क्रय समिति, निविदा समिति, Governing Council, Managing Committee, परियोजना एजेंसी, ठेकेदार और आपूर्तिकर्ता—सभी की भूमिका देखी जानी चाहिए। जिसने प्रस्ताव बनाया, जिसने स्वीकृति दी, जिसने माप दर्ज किया, जिसने गुणवत्ता प्रमाणित की और जिसने भुगतान छोड़ा—हर हस्ताक्षर को जमीन की वास्तविकता से मिलाना होगा।
अपराध अभी सिद्ध नहीं—लेकिन प्रश्न इतने जहरीले हैं कि चुप्पी भी संदिग्ध लगेगी
कानूनी स्थिति स्पष्ट है: CAG की आपत्ति अथवा शिकायत अपने आप किसी व्यक्ति को अपराधी सिद्ध नहीं करती। आपराधिक जवाबदेही तभी बनेगी जब स्वतंत्र जांच में बेईमानी, अनुचित लाभ, फर्जी रिकॉर्ड, मिलीभगत, पद का दुरुपयोग अथवा लोकधन के गबन के प्रमाण मिलें। लेकिन ऑडिट में सामने आए आंकड़े इतने गंभीर हैं कि उन्हें “प्रक्रियागत कमी” का मुलायम लेबल लगाकर दफन करना भी जनता के साथ धोखा होगा। यदि मामला केवल लापरवाही का है तो विभागीय जिम्मेदारी तय हो। यदि फाइल, ठेका, भुगतान और मनी ट्रेल में षड्यंत्र मिलता है तो संबंधित लोगों पर FIR, संपत्ति की जांच और विधिसम्मत वसूली हो।
देश जानना चाहता है—छत्तीसगढ़ के DMF में जनकल्याण हुआ या ‘ठेका-कल्याण’?
सरकार को अब सार्वजनिक रूप से बताना चाहिए—
1. ₹4,536.58 करोड़ किन जिलों, कार्यों और एजेंसियों पर खर्च हुए?
2. 754 प्रत्यक्ष प्रभावित गांव योजनाओं से बाहर क्यों रहे?
3. ₹1,060.70 करोड़ के काम प्रभावित क्षेत्र की औपचारिक पहचान से पहले किसने स्वीकृत किए?
4. ₹709.47 करोड़ के लाभार्थियों की सत्यापित सूची कहां है?
5. तकनीकी विनिर्देशों के बिना बताई गई ₹38.82 करोड़ की खरीद किन फर्मों से हुई?
6. ₹41.80 करोड़ की अनुपयोगी परिसंपत्तियां कहां और किस हालत में हैं?
7. PMKKKY के उद्देश्य से बाहर बताए गए ₹30.73 करोड़ का व्यय किसने मंजूर किया?
8. शिकायत खनिज साधन विभाग को मिलने के बाद कौन-सी कार्रवाई हुई?
9. क्या CAG रिपोर्ट को EOW-ACB की वर्तमान जांच में शामिल किया गया?
10. क्या मूल और डिजिटल अभिलेख सुरक्षित रखने का आदेश जारी हुआ?
DMF की तिजोरी पर पड़े हर पंजे का निशान सामने आना चाहिए खनन प्रभावित जनता ने यह पैसा दान में नहीं पाया। यह उसकी उजड़ी जमीन, प्रदूषित हवा, जहरीले पानी, बीमार शरीर और बर्बाद आजीविका की कीमत से निकला वैधानिक अधिकार है। यदि उस अधिकार की रकम को बिना योजना बहाया गया, अपात्र कार्यों पर खर्च किया गया, अनुपयोगी परिसंपत्तियों में गाड़ा गया अथवा कागजी लाभार्थियों और पसंदीदा ठेकेदारों की झोली में डाला गया—तो यह केवल सरकारी धन की अनियमितता नहीं, खदानों की आग में झुलस रहे समाज के साथ संस्थागत विश्वासघात होगा।
अब खनिज साधन विभाग और जांच एजेंसियों को तय करना है—वे DMF के इस संदिग्ध अंधेरे में जांच की रोशनी डालेंगे या अरबों रुपये के सवालों पर सरकारी चुप्पी की मोटी राख बिछा देंगे।
फाइलें खोलिए। गांव गिनिए। परिसंपत्तियां नापिए। लाभार्थी खोजिए। बैंक खाते खंगालिए। हर भुगतान की मनी ट्रेल निकालिए—क्योंकि इस बार सवाल किसी एक ठेके का नहीं, छत्तीसगढ़ के खनन प्रभावित समाज के हजारों करोड़ रुपये और टूटे हुए भरोसे का है।
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