EXCLUSIVE | CAG REPORT EXPOSES : ₹13,101 करोड़ का DMF फंड… फिर भी 44% खनन प्रभावित गांव विकास से वंचित!

CAG की रिपोर्ट ने उठाए ऐसे सवाल, जिनका जवाब जिला प्रशासन, जनप्रतिनिधियों और सरकार—तीनों को देना होगा
विशेष खोजी रिपोर्ट | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज़ नेटवर्क
रायपुर/कोरबा। छत्तीसगढ़ की धरती ने देश को कोयला, बॉक्साइट, लौह अयस्क और अन्य खनिज दिए। इन खनिजों के बदले सबसे बड़ी कीमत चुकाई खदानों के आसपास रहने वाले आदिवासी, किसान और ग्रामीण परिवारों ने—जिनकी जमीन गई, जंगल प्रभावित हुए, जल स्रोत बदले और स्वास्थ्य पर असर पड़ा।
इन्हीं परिवारों के पुनर्वास और विकास के लिए जिला खनिज प्रतिष्ठान (DMFT) बनाया गया था। लेकिन भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की Performance Audit Report No. 05 of 2026 ने जो तस्वीर सामने रखी है, वह पूरे प्रशासनिक ढांचे और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा देती है।
रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2015-16 से 2023-24 तक DMFT में ₹13,101.65 करोड़ जमा हुए और ₹10,253.22 करोड़ खर्च भी किए गए। इसके बावजूद 1,734 प्रत्यक्ष प्रभावित गांवों में से 754 गांव (लगभग 44%) किसी भी विकास कार्य से वंचित रहे।
सबसे बड़ा सवाल — अगर पैसा खर्च हो गया, तो विकास पहुंचा कहां?
CAG के निष्कर्ष बताते हैं कि—
– 44% सीधे प्रभावित गांवों तक कोई विकास कार्य नहीं पहुंचा।
– मास्टर प्लान, विज़न डॉक्यूमेंट और वार्षिक योजना के बिना हजारों करोड़ रुपये खर्च कर दिए गए।
– प्रभावित क्षेत्रों की पहचान किए बिना ₹1,060.70 करोड़ की परियोजनियां स्वीकृत कर दी गईं।
अर्थात, कई मामलों में पहले पैसा खर्च हुआ और बाद में यह तय किया गया कि प्रभावित क्षेत्र कौन हैं।
खनन प्रभावितों का अधिकार या योजनाओं का विस्तार?
रिपोर्ट बताती है कि नियमों में बदलाव के कारण लाभ का दायरा इतना व्यापक कर दिया गया कि वास्तविक खनन प्रभावित परिवार प्राथमिकता से पीछे छूट गए।
₹709.47 करोड़ विभिन्न वस्तुओं के वितरण पर खर्च किए गए, जबकि अनेक मामलों में लाभार्थियों के चयन का स्पष्ट आधार दर्ज नहीं मिला।
यह सवाल केवल वित्तीय नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का भी है।
DMF का पैसा सरकारी कार्यालयों तक कैसे पहुंचा?
CAG के अनुसार ₹30.73 करोड़ ऐसे निर्माण, सौंदर्यीकरण और सरकारी कार्यालयों से जुड़े कार्यों पर खर्च किए गए जो प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना (PMKKKY) की प्राथमिकताओं से मेल नहीं खाते।
जब हजारों प्रभावित परिवार मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हों, तब इस प्रकार के खर्चों पर स्वाभाविक रूप से जवाब मांगा जाएगा।
₹41.80 करोड़ की परियोजनाएं अधूरी या बेकार
रिपोर्ट में आर्ट एंड कल्चर सेंटर, बायोगैस परियोजनाएं, पोल्ट्री एवं मशरूम केंद्र जैसे कार्यों का उल्लेख है, जिन पर ₹41.80 करोड़ खर्च होने के बावजूद अपेक्षित उपयोगिता सामने नहीं आई। टेंडर प्रक्रिया भी सवालों के घेरे में
CAG ने पाया—
– ₹17.49 करोड़ की खरीद खुली निविदा के बिना हुई।
– ₹38.82 करोड़ की खरीद तकनीकी मानकों के पर्याप्त पालन के बिना की गई।
ऐसी टिप्पणियां सार्वजनिक धन के उपयोग की पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्न खड़े करती हैं।
पारदर्शिता भी अधूरी
ऑडिट में यह भी सामने आया कि कई जिलों की वेबसाइटों पर—
– प्रभावित गांवों की सूची,
– ट्रस्ट की संरचना,
– वार्षिक योजना,
– बजट,
– बैठकों की कार्यवाही
जैसी महत्वपूर्ण जानकारियां उपलब्ध नहीं थीं। कई जिलों में महत्वपूर्ण पद भी रिक्त पाए गए।
अब जवाबदेही किसकी?
DMFT कोई निजी संस्था नहीं है।
जिला खनिज न्यास का संचालन एक ट्रस्ट के माध्यम से होता है, जिसकी अध्यक्षता संबंधित जिला कलेक्टर करते हैं। ट्रस्ट में संबंधित क्षेत्र के सांसद, विधायक तथा अन्य नामित सदस्य भी शामिल रहते हैं। ऐसे में यदि CAG की रिपोर्ट योजना निर्माण, प्राथमिकता निर्धारण, पारदर्शिता और व्यय प्रक्रिया पर गंभीर टिप्पणियां दर्ज करती है, तो स्वाभाविक रूप से इन संस्थागत व्यवस्थाओं की जवाबदेही पर भी प्रश्न उठते हैं।
यह कहना उचित नहीं होगा कि किसी एक व्यक्ति या पदाधिकारी की व्यक्तिगत जिम्मेदारी CAG ने तय कर दी है।
लेकिन यह अवश्य पूछा जाना चाहिए कि—
– जब ट्रस्ट के स्तर पर निर्णय लिए गए, तो निगरानी कितनी प्रभावी रही?
– क्या अध्यक्ष और सदस्य नियमित रूप से योजनाओं की समीक्षा कर रहे थे?
– क्या प्रत्यक्ष प्रभावित गांवों की सूची समय पर तैयार और अनुमोदित की गई?
– क्या प्रत्येक बैठक में प्राथमिकता वाले गांवों की प्रगति पर चर्चा हुई?
– यदि नहीं हुई, तो इसकी प्रशासनिक जिम्मेदारी कौन स्वीकार करेगा?
कोरबा से उठते सबसे बड़े सवाल
कोरबा जैसे खनन प्रधान जिले में अब जनता पूछ रही है—
– जिन गांवों से करोड़ों रुपये का खनिज निकला, वहां विकास क्यों नहीं पहुंचा?
– जिन परिवारों ने विस्थापन और प्रदूषण झेला, वे अब भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित क्यों हैं?
– हजारों करोड़ रुपये खर्च होने के बाद भी 44% प्रभावित गांव विकास से बाहर क्यों हैं?
– क्या DMFT की प्रत्येक परियोजना का स्वतंत्र सामाजिक अंकेक्षण कराया जाएगा?
– क्या जिम्मेदार अधिकारियों और निर्णय लेने वाली संस्थाओं की जवाबदेही तय होगी?
– क्या राज्य सरकार CAG की प्रत्येक सिफारिश पर समयबद्ध कार्ययोजना जारी करेगी?
– क्या केंद्र सरकार और भारत सरकार के खान मंत्रालय द्वारा इन निष्कर्षों की अनुपालन समीक्षा की जाएगी?
ग्राम यात्रा की संपादकीय टिप्पणी
DMF की यह रिपोर्ट केवल लेखा परीक्षण नहीं है, बल्कि खनिज संपदा से जुड़े विकास मॉडल की प्रभावशीलता पर एक गंभीर सार्वजनिक दस्तावेज है।
यदि ऑडिट में दर्ज कमियां सही पाई जाती हैं, तो यह केवल वित्तीय प्रबंधन का प्रश्न नहीं, बल्कि उन लाखों लोगों के अधिकारों का प्रश्न है जिनके नाम पर DMF बनाया गया था।
अब समय आ गया है कि—
– राज्य सरकार CAG की सभी सिफारिशों पर सार्वजनिक कार्ययोजना जारी करे।
– प्रत्येक जिले का DMFT सामाजिक अंकेक्षण कराए।
– प्रत्यक्ष प्रभावित गांवों की अंतिम सूची सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध कराई जाए।
– प्रत्येक खर्च का सार्वजनिक ऑडिट और प्रगति रिपोर्ट जारी की जाए।
– जहां भी नियमों के उल्लंघन या प्रक्रियागत त्रुटियां पाई जाएं, वहां सक्षम प्राधिकारी कानून के अनुसार जवाबदेही तय करे।
खनिज जनता का है। DMF जनता का अधिकार है। इसलिए हर रुपये का हिसाब भी जनता को मिलना चाहिए।
अस्वीकरण: यह रिपोर्ट भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की Performance Audit Report No. 05 of 2026 में दर्ज निष्कर्षों पर आधारित है।
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