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झीरम घाटी हमले की गवाही में सामने आए कई अहम घटनाक्रम, लखमा के फोन और गोंडी बातचीत का भी जिक्र

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जगदलपुर।  झीरम घाटी हमले के 13 साल पुराने मामले में जगदलपुर की विशेष NIA अदालत ने 16 सितंबर 2026 को 10 दोषियों को मृत्युदंड की सजा सुनाई। राष्ट्रीय जांच एजेंसी के अनुसार अदालत ने CPI (माओवादी) से जुड़े 10 आरोपी कैडरों को मामले में दोषी ठहराने के बाद यह सजा सुनाई है।

फैसले के दौरान दर्ज गवाहियों में 25 मई 2013 को हुए हमले से पहले और घटना के दौरान के कई घटनाक्रम का उल्लेख है। गवाहों के बयानों में तत्कालीन कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश पटेल, महेंद्र कर्मा और कवासी लखमा से जुड़े घटनाक्रम भी सामने आए।

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ड्राइवर दशाराम की गवाही में फोन कॉल का जिक्र

नंदकुमार पटेल के ड्राइवर दशाराम सिदार की गवाही में कवासी लखमा के मोबाइल पर बार-बार फोन आने और गोंडी में बातचीत किए जाने का उल्लेख है।

दशाराम के बयान के अनुसार, बातचीत के दौरान लखमा ’10-15′ कह रहे थे। इस पर नंदकुमार पटेल ने उनसे हिंदी में बात करने को कहा और पूछा कि 10-15 क्या है। गवाही के मुताबिक, लखमा ने इसे ‘डीजल-डीजल’ बताया था।

हालांकि, अदालत के आदेश में इस फोन कॉल या गोंडी में हुई बातचीत को कवासी लखमा की किसी साजिश में भूमिका साबित करने वाला अलग निष्कर्ष नहीं बताया गया है। लखमा इस मामले में घायल गवाह के तौर पर अदालत के सामने पेश हुए थे।

हमले के दौरान नंदकुमार और दिनेश को बनाया गया था बंधक

दशाराम सिदार की गवाही के मुताबिक, हमले के दौरान नक्सलियों ने नंदकुमार पटेल, दिनेश पटेल और कवासी लखमा को सड़क किनारे बैठाया और चारों ओर से घेर लिया।

गवाही में बताया गया कि इसके बाद लखमा और विनोद नाम के नक्सली के बीच गोंडी में बातचीत हुई। करीब एक घंटे बाद नंदकुमार पटेल और दिनेश पटेल के हाथ बांधकर उन्हें गोली मार दी गई।

लखमा ने अदालत में घटना को लेकर क्या बताया?

कवासी लखमा ने अपनी गवाही में बताया कि घटना वाले दिन सुकमा में कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा की रैली हुई थी। इसमें नंदकुमार पटेल, अजीत जोगी, विद्याचरण शुक्ल, महेंद्र कर्मा समेत कई कांग्रेस नेता और कार्यकर्ता मौजूद थे।

रैली के बाद काफिले को केशलूर में सभा में शामिल होना था। लखमा के अनुसार, खाना खाने के बाद करीब 3:25 बजे काफिला केशलूर के लिए रवाना हुआ। झीरम घाटी के पास पहुंचने पर ऊपर की ओर से विस्फोट की आवाज सुनाई दी। काफिले के आगे फॉलो गार्ड की गाड़ी और उसके आगे एक ट्रक फंसा हुआ था, जिसके कारण वाहन आगे नहीं बढ़ पा रहे थे।

लखमा ने बताया कि गोली या विस्फोट के छर्रे से उनकी गाड़ी का शीशा टूट गया और कांच का टुकड़ा उनके दाहिने कान में लगा। इसके बाद वह, नंदकुमार पटेल, उनके बेटे और ड्राइवर गाड़ी से उतरकर घाटी की तरफ छिपने चले गए। इसी दौरान नक्सलियों ने उन्हें घेर लिया।

नक्सलियों ने गोंडी में पूछताछ की

लखमा के मुताबिक, नक्सली गोंडी में चिल्लाकर पूछ रहे थे कि वे वहां क्यों छिपे हैं और पुलिस वाले हथियार छोड़ दें। लखमा ने गोंडी में जवाब दिया कि वहां कोई पुलिस वाला नहीं है तो बंदूक कौन छोड़ेगा।

इसके बाद नक्सलियों ने चारों को पकड़कर ऊपर की तरफ ले जाने की बात भी लखमा ने अपनी गवाही में कही।

उन्होंने बताया कि मौके पर मौजूद एक महिला नक्सली कह रही थी कि ऊपर से आदेश आने और विनोद दादा के कहने के बाद ही उन्हें छोड़ा जाएगा।

विनोद ने खुद का परिचय दिया

लखमा की गवाही के अनुसार, करीब 15-20 मिनट बाद एक नक्सली वहां पहुंचा और उसने सबसे पहले नंदकुमार पटेल का परिचय पूछा। पटेल ने बताया कि वह प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष हैं। इसके बाद उनके बेटे, लखमा और ड्राइवर से भी परिचय पूछा गया।

लखमा के अनुसार, नीचे सड़क पर काफिले की ओर लगातार गोलियां चल रही थीं। करीब 15 मिनट बाद विनोद नाम का नक्सली वहां आया। उसने पूछा कि क्या वे उसे जानते हैं। सभी के मना करने पर उसने अपना नाम विनोद बताया और उन्हें वहां से भागने की कोशिश नहीं करने की चेतावनी दी।

महेंद्र कर्मा की हत्या का भी गवाह ने किया जिक्र

मौके पर मौजूद एक ट्रक ड्राइवर की गवाही में तत्कालीन नेता महेंद्र कर्मा के साथ हुई हिंसा का भी उल्लेख किया गया। गवाह के अनुसार, नक्सलियों ने कर्मा को हाथ ऊपर करवाकर सड़क पर खड़ा किया और बाद में जंगल की तरफ ले गए।

गवाह ने दावा किया कि उसने कुछ नक्सलियों को कर्मा पर पत्थर, बंदूक और लात-घूंसों से हमला करते देखा।

101 गवाहों के बयान हुए दर्ज

झीरम घाटी मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने 101 गवाहों के बयान दर्ज कराए। 5 सितंबर 2026 को विशेष NIA अदालत ने मामले में 10 आरोपियों को दोषी ठहराया था और 16 सितंबर को उन्हें मृत्युदंड सुनाया गया। NIA ने भी 16 सितंबर को अपनी आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति में 10 CPI (माओवादी) कैडरों को मृत्युदंड दिए जाने की पुष्टि की है।

अदालत के फैसले के बाद दोषियों को हाईकोर्ट में अपील का अधिकार भी है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, मृत्युदंड की पुष्टि के लिए हाईकोर्ट की प्रक्रिया भी आवश्यक होगी।

 

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