नगर निगम कोरबा में ठेकेदार से ऐसा क्या ‘मोह’—एक नाम, दो पंजीयन और नियमों की छाती पर चलता ठेकों का खेल?

अकेले उमेश राठौर के नाम से भी पंजीयन, उमेश–देवेंद्र की साझेदारी में भी दूसरी फर्म; यदि एक ही निविदा में दोनों उतरे तो मुकाबला किससे था—दूसरे ठेकेदार से या अपने ही दूसरे चेहरे से?
धारा 73 मांगती है नियमसम्मत अनुबंध—नगर निगम बताए: तकनीकी समिति ने साझा हित देखा या संरक्षण की चाशनी में नियमों को डुबो दिया?
कोरबा | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क
संपादक – अब्दुल सुल्तान
नगर निगम कोरबा में ठेकों की फाइलें अब कागज नहीं—सवालों का बारूद बनती दिखाई दे रही हैं। एक तरफ विकास के नाम पर करोड़ों रुपये की निविदाएं, दूसरी तरफ बार-बार घूमकर सामने आता एक ही नाम और अब दस्तावेजों में उजागर हुए दो अलग पंजीयन!
सवाल सीधा है—नगर निगम कोरबा में एक ठेकेदार से आखिर ऐसा कौन-सा “मोह” है कि पात्रता, हित-संघर्ष और वास्तविक प्रतिस्पर्धा जैसे बुनियादी प्रश्न भी फाइलों की धूल में दबा दिए जाते हैं?
उपलब्ध पंजीयन प्रमाणपत्रों में एक संस्था “UMESH RATHORE” के नाम पर है, जबकि दूसरा पंजीयन “Ms UMESH RATHORE” के नाम से है, जिसमें देवेंद्र राठौर और उमेश राठौर साझेदार दर्ज हैं।
दो अलग GSTIN।
दो अलग पंजीयन नंबर।
लेकिन दोनों में मौजूद एक साझा नाम—उमेश राठौर।
दो अलग संस्थाएं बनाना अपने-आप में अपराध नहीं है। मगर यदि समान आर्थिक हित अथवा साझा नियंत्रण वाली इन दोनों संस्थाओं ने किसी एक ही निविदा में स्वयं को अलग-अलग स्वतंत्र प्रतिस्पर्धी बताकर बोली लगाई, तो निगम को बताना होगा—यह वास्तविक प्रतिस्पर्धा थी या ठेका हासिल करने के लिए सजाया गया कागजी अखाड़ा?
दस्तावेजों में दर्ज पहला चेहरा
लोक निर्माण विभाग के ई-पंजीयन प्रमाणपत्र के अनुसार:
– नाम—UMESH RATHORE
– पंजीयन संख्या—CGeR10709
– GSTIN—22BYCPR4342F1ZP
– श्रेणी—B
– अवधि—29 जून 2021 से 28 जून 2026
– निविदा क्षमता—₹10 करोड़ तक
दस्तावेजों में दर्ज दूसरा चेहरा
दूसरे प्रमाणपत्र के अनुसार:
– नाम—Ms UMESH RATHORE
– पंजीयन संख्या—CGeR25583
– GSTIN—22AAHFU8443Q1ZI
– श्रेणी—B
– अवधि—19 नवंबर 2024 से 18 नवंबर 2029
– निविदा क्षमता—₹10 करोड़ तक
– साझेदार—देवेंद्र राठौर एवं उमेश राठौर
इन प्रमाणपत्रों से अभी मिलीभगत सिद्ध नहीं होती, लेकिन दोनों संस्थाओं में साझा व्यक्ति का दस्तावेजी संबंध अवश्य स्थापित होता है। इसलिए नगर निगम की जिम्मेदारी बनती है कि वह बताए—इन संस्थाओं ने किन-किन निविदाओं में हिस्सा लिया और क्या कभी दोनों को एक ही काम में स्वतंत्र प्रतिस्पर्धी माना गया?
यदि उत्तर “हां” है, तो मामला साधारण नहीं रहेगा।
दो फर्मों में एक हित—तो कीमतों का मुकाबला किसके बीच हुआ?
निविदा प्रणाली का उद्देश्य है कि स्वतंत्र ठेकेदार आपस में मुकाबला करें और सार्वजनिक धन में निगम को सबसे उचित दर मिले। लेकिन यदि किसी एक व्यक्ति का दो बोलीदाताओं में प्रत्यक्ष आर्थिक हित हो, तो सबसे बड़ा प्रश्न यही उठता है कि दोनों बोलियां वास्तव में स्वतंत्र थीं या नहीं।
क्या दोनों दरें अलग-अलग कार्यालयों में तैयार हुईं?
क्या दोनों के निर्णय लेने वाले व्यक्ति अलग थे?
क्या दोनों के मोबाइल, ईमेल, DSC ऑपरेटर और IP एड्रेस अलग थे?
क्या EMD और बैंक गारंटी स्वतंत्र स्रोतों से आई?
क्या दोनों ने एक-दूसरे की दर जाने बिना बोली लगाई?
या फिर एक बोली विजेता बनने और दूसरी केवल “प्रतिस्पर्धा दिखाई देने” के लिए डाली गई?
यदि जांच में यह सामने आता है कि दोनों बोलियों की डोर एक ही हाथ में थी, तो यह प्रतिस्पर्धा नहीं—प्रतिस्पर्धा का मुखौटा होगा। नगर निगम अधिनियम की धारा 73—ठेका किसी की निजी जागीर नहीं छत्तीसगढ़ नगरपालिक निगम अधिनियम, 1956 की धारा 73 साफ करती है कि निगम की ओर से अनुबंध आयुक्त द्वारा निर्धारित प्रक्रिया, आवश्यक स्वीकृति और सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी के अनुसार किया जाएगा।
अर्थात निगम का ठेका किसी अधिकारी की निजी पसंद, किसी ठेकेदार से आत्मीयता या फाइल पर लिखे दो शब्दों से बांटी जाने वाली रेवड़ी नहीं है। ठेके की प्रत्येक सीढ़ी—तकनीकी पात्रता, वित्तीय प्रतिस्पर्धा, अनुमोदन, कार्यादेश और भुगतान—कानून तथा निर्धारित प्रक्रिया की चौखट के भीतर होनी चाहिए। यदि साझा हित वाली बोलियों को जानबूझकर स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा मान लिया गया, तो जवाब केवल ठेकेदार को नहीं—जांच समिति, तकनीकी परीक्षण करने वाले अधिकारी, अनुशंसा लिखने वाले अभियंता और कार्यादेश स्वीकृत करने वाले सक्षम अधिकारी को भी देना होगा।
आयुक्त के दरवाजे पर आकर रुकती है जिम्मेदारी
अधिनियम की धारा 69 नगर निगम की कार्यकारी शक्ति आयुक्त में निहित करती है। निगम अधिकारी और कर्मचारी आयुक्त के नियंत्रण तथा पर्यवेक्षण में काम करते हैं। इसलिए गंभीर निविदा अनियमितता सामने आने पर यह नहीं कहा जा सकता कि गलती किसी निचले कर्मचारी से हो गई और ऊपरी व्यवस्था को कुछ मालूम ही नहीं था। जब प्रमाणपत्रों पर साझा नाम खुली आंखों से दिखाई दे रहा हो, तब तकनीकी परीक्षण में उसे न देख पाना लापरवाही है—और देखकर भी चुप रहना कहीं अधिक गंभीर सवाल खड़ा करता है।
निगम फाइल खोले—धारा 71 रिकॉर्ड मांगने का अधिकार देती है
अधिनियम की धारा 71 के तहत निगम आयुक्त से रिकॉर्ड, पत्राचार, प्राक्कलन, लेखा, विवरण और प्रशासनिक रिपोर्ट मंगा सकता है। इसलिए तकनीकी बोली, तुलनात्मक पत्रक, स्वीकृति नोटशीट और कार्यादेश को फाइलों की कब्र में दफन नहीं किया जा सकता।
यदि सब कुछ पाक-साफ है, तो नगर निगम तत्काल सार्वजनिक करे:
1. दोनों संस्थाओं की निविदावार भागीदारी सूची।
2. तकनीकी और वित्तीय बोलियों की प्रतियां।
3. BOQ की मूल दरें और तुलनात्मक विवरण।
4. बोली जमा करने के IP तथा टाइम-स्टैम्प लॉग।
5. इस्तेमाल किए गए डिजिटल सिग्नेचर का विवरण।
6. पंजीकृत मोबाइल नंबर, ईमेल और अधिकृत प्रतिनिधि।
7. EMD, बैंक गारंटी और भुगतान खातों का विवरण।
8. साझेदारी विलेख और वास्तविक लाभकारी नियंत्रण की घोषणा।
9. हित-संघर्ष संबंधी शपथपत्र।
10. जांच समिति की नोटशीट और अनुमोदन क्रम।
इन दस रिकॉर्डों की जांच से साफ हो जाएगा कि बाजार में दो स्वतंत्र प्रतिस्पर्धी खड़े थे या एक ही नियंत्रण के दो कागजी चेहरे।
‘कवर बिड’ की आशंका—हारने वाली बोली केवल दिखावे के लिए तो नहीं?
भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग के अनुसार बोली में मिलीभगत कई रूपों में हो सकती है—पहले से विजेता तय करना, जानबूझकर ऊंची बोली लगाना, एक-दूसरे के विरुद्ध वास्तविक प्रतिस्पर्धा नहीं करना अथवा बाहरी बोलीदाताओं को बाहर रखने की व्यवस्था बनाना। प्रतिस्पर्धा अधिनियम की धारा 3(3)(d) ऐसी प्रत्यक्ष या परोक्ष मिलीभगत को प्रतिबंधित करती है, जो बोली की प्रतिस्पर्धा घटाए, समाप्त करे अथवा निविदा प्रक्रिया को प्रभावित करे।
यहां अभी “कार्टेल सिद्ध” नहीं हुआ है। लेकिन यदि समान हित वाली दोनों संस्थाओं ने एक ही काम में बोली लगाई, दरों में कृत्रिम अंतर रखा और एक को विजेता बनाने के लिए दूसरी बोली केवल संख्या पूरी करने हेतु इस्तेमाल हुई, तो मामला प्रतियोगिता-विरोधी बोली की जांच तक पहुंचेगा।
किस अधिकारी की कलम ने नियमों को कुर्सी के नीचे दबाया?
अब प्रश्न केवल उमेश राठौर अथवा उनकी साझेदारी फर्म का नहीं है। प्रश्न उस प्रशासनिक छतरी का है जिसके नीचे लगातार ठेकों की बारिश एक ही दिशा में होने के आरोप उठ रहे हैं।
तकनीकी पात्रता किसने जांची?
साझा नाम और साझा हित पर किसने आंख बंद की?
वित्तीय बोली किस समिति ने खोली?
तुलनात्मक पत्रक किसने बनाया?
कार्यादेश की अनुशंसा किसने लिखी?
भुगतान से पहले फाइल किस-किस अधिकारी की मेज से गुजरी?
यदि प्रक्रिया सही है तो नाम सहित जवाब दिया जाए। यदि प्रक्रिया गलत है तो जिम्मेदार अधिकारी को फाइल के पीछे छिपने का अवसर क्यों मिले?
नगर निगम कोरबा सार्वजनिक धन का संरक्षक है—किसी ठेकेदार का निजी सुविधा केंद्र नहीं। ब्लैकलिस्टिंग भी कानून से होगी, मनमर्जी से नहीं सिर्फ दो पंजीयन के आधार पर किसी फर्म को तत्काल दोषी या ब्लैकलिस्ट घोषित नहीं किया जा सकता। पहले निविदावार तथ्य परीक्षण, कारण बताओ नोटिस, जवाब का अवसर और कारणयुक्त आदेश आवश्यक है। सुप्रीम कोर्ट ने भी माना है कि ब्लैकलिस्टिंग से पहले स्पष्ट कारण बताओ नोटिस और प्राकृतिक न्याय का पालन जरूरी है।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि निगम हाथ पर हाथ रखकर बैठा रहे। प्रथमदृष्टया साझा हित सामने आने के बाद संबंधित निविदा रिकॉर्ड सुरक्षित करना, भुगतान की समीक्षा करना और स्वतंत्र जांच कराना निगम का दायित्व है।
ठेकेदार से कैसा ‘मोह’—कि सवाल उठते ही व्यवस्था बेचैन हो जाती है?
सबसे जहरीला सवाल यहीं जन्म लेता है।
यदि ठेके नियमानुसार दिए गए, तो जांच से डर क्यों?
यदि दोनों संस्थाएं स्वतंत्र थीं, तो IP और DSC लॉग छिपाने की जरूरत क्यों?
यदि प्रतिस्पर्धा वास्तविक थी, तो साझेदारी और वास्तविक नियंत्रण की घोषणा सामने क्यों नहीं रखी जाती?
यदि कोई संरक्षण नहीं है, तो एक ही नाम के इर्द-गिर्द घूमती फाइलों पर निगम मौन क्यों है?
और यदि दस्तावेजों की जांच से यह साबित हो गया कि दो नामों और दो GSTIN के पीछे निविदा की डोर एक ही हाथ में थी, तो यह केवल ठेकेदार का खेल नहीं होगा—यह उस पूरी प्रशासनिक मशीनरी की परीक्षा होगी जिसने सार्वजनिक प्रतिस्पर्धा को कागजी तमाशा बनने दिया।
ग्राम यात्रा का सीधा सवाल
उमेश राठौर की व्यक्तिगत संस्था और उमेश–देवेंद्र साझेदारी वाली संस्था ने नगर निगम कोरबा की किन-किन निविदाओं में भाग लिया?
क्या दोनों कभी एक ही काम में आमने-सामने बोलीदाता बने?
यदि हां, तो हित-संघर्ष की जांच क्यों नहीं हुई?
यदि नहीं, तो नगर निगम निविदावार रिकॉर्ड जारी कर संदेह समाप्त करे।
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क किसी व्यक्ति को बिना जांच दोषी घोषित नहीं कर रहा। उपलब्ध प्रमाणपत्र गंभीर और वैध प्रश्न खड़े करते हैं। अंतिम निष्कर्ष निविदावार दस्तावेजों, डिजिटल लॉग, बैंक रिकॉर्ड और संबंधित पक्षों के जवाब के आधार पर ही निकलेगा।
ठेकेदार, साझेदार और नगर निगम के सक्षम अधिकारियों को अपना दस्तावेजी पक्ष प्रस्तुत करने का पूरा अवसर है। उनका जवाब प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।लेकिन फाइलें दबाकर, सवालों को डराकर या पत्रकारिता पर दबाव बनाकर इस जांच को रोका नहीं जा सकता। क्योंकि जब दो फर्मों में एक ही हित दिखाई दे और सत्ता की मेज पर खामोशी पसरी हो—तब सवाल पूछना अपराध नहीं, जनता के धन के प्रति पत्रकारिता का कर्तव्य है।
अगली कड़ी
एक नाम—दो पंजीयन—किन निविदाओं में दोनों की एंट्री? IP, DSC, BOQ और भुगतान की कड़ियां खोलेंगी नगर निगम के ठेका-तंत्र का पूरा चेहरा।
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