गरीब की दुकान हटे, बालको की दीवार क्यों नहीं? फोरलेन के सवाल पर प्रबंधन को दिखाया आईना

परसाभाठा के घर–रोजगार बचाने की आवाज उठी; जयसिंह अग्रवाल ने बालको की बाउंड्री पीछे करने का विकल्प जाँचने की मांग रखी
कोरबा। विकास की सड़क आखिर किस कीमत पर बनेगी? गरीब की छत, छोटे दुकानदार की रोजी और वर्षों से बसे परिवारों की जिंदगी दाँव पर लगाकर—या ऐसे विकल्प तलाशकर, जिनसे सड़क भी बने और लोग भी सुरक्षित रहें? बजरंग चौक–परसाभाठा के प्रस्तावित फोरलेन को लेकर यही सवाल अब बालको–वेदांता प्रबंधन और प्रशासन के सामने खड़ा है।
स्थानीय निवासियों ने पूर्व मंत्री जयसिंह अग्रवाल को अपनी चिंताओं से अवगत कराया है। प्रभावित होने की आशंका वाले परिवारों का कहना है कि घर और छोटी दुकानें हटने पर उनकी आजीविका संकट में पड़ सकती है। अग्रवाल ने प्रशासन से सड़क की डिजाइन और भूमि सीमा की समीक्षा तथा बालको प्रबंधन से समन्वय करके बाउंड्रीवाल पीछे करने की संभावनाओं का परीक्षण करने का आग्रह किया है।
यह मांग प्रबंधन के सामने सीधा आईना रखती है—क्या रास्ता निकालने की पूरी जिम्मेदारी हमेशा कमजोर परिवारों के हिस्से ही आएगी?
गरीब की दुकान नक्शे पर छोटी दिख सकती है, लेकिन उसी दुकान से उसका पूरा घर चलता है। किसी परिवार की छत इंजीनियरिंग ड्राइंग में एक संरचना हो सकती है, मगर उसके नीचे बच्चों का बचपन और बुजुर्गों का सहारा बसता है। विकास का हिसाब लगाते समय इनकी कीमत शून्य नहीं मानी जा सकती।
बालको–वेदांता प्रबंधन को स्पष्ट करना चाहिए कि स्थानीय परिवारों के हित बचाने के लिए वह क्या सहयोग देगा। प्रशासन को भी बताना चाहिए कि बाउंड्री पीछे करने का विकल्प तकनीकी और सुरक्षा की दृष्टि से संभव है या नहीं। यदि संभव नहीं है, तो कारण और दूसरे विकल्प जनता के सामने रखे जाएँ।
गरीब का घर हटाने से पहले हर विकल्प पर मेहनत होनी चाहिए। बड़ी कंपनी की सुविधा के सामने जनता की जिंदगी छोटी नहीं पड़ सकती। प्रस्तावित सड़क के लिए प्रभावित परिसंपत्तियों का स्पष्ट सर्वे, निवासियों से संवाद और जहाँ आवश्यक हो, उचित राहत तथा पुनर्वास की व्यवस्था सामने आनी चाहिए। आशंका में जी रहे परिवारों को अस्पष्ट जवाब देकर उनकी चिंता नहीं मिटाई जा सकती।
जनहित की आवाज के साथ ग्राम यात्रा
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क का संकल्प स्पष्ट है—जहाँ जनहित, गरीबों के आशियाने और रोजी-रोटी की बात होगी, हम उनकी आवाज के साथ खड़े होंगे। जो भी व्यक्ति या संगठन इन सवालों को तथ्य और जिम्मेदारी के साथ उठाएगा, उसकी बात को प्रमुखता मिलेगी।
बालको–वेदांता प्रबंधन से सवाल पूछना जनता का अधिकार है। सड़क बने, यातायात सुधरे और विकास आगे बढ़े—लेकिन उसकी सफलता का प्रमाण उजड़े हुए परिवार नहीं होने चाहिए।
विकास की असली परीक्षा सड़क की चौड़ाई से होगी या जनता के लिए बची जगह से? अब जवाब प्रबंधन और प्रशासन को देना है।
संपादक – अब्दुल सुल्तान
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क
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