SECL की जमीन, लीज से इनकार, किराया वापसी—फिर किस ‘अदृश्य लाइसेंस’ पर धधक रहा कुसमुंडा का पेट्रोल पंप?

हाईकोर्ट ने केवल बेदखली मेमो पर अंतरिम रोक लगाई, पंप को वैधता का प्रमाणपत्र नहीं; कलेक्टर से संयुक्त जांच, ईंधन आपूर्ति रोकने और दस्तावेज न मिलने पर सुरक्षित सीलिंग की मांग
कथित ₹2.5 करोड़ के सौदे, डीलरशिप पुनर्गठन और “तीन वर्ष बनाम 99 वर्ष” की लीज का फॉरेंसिक सच खोलने की चुनौती
कोरबा | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क जमीन SECL की बताई जा रही है। मूल अनुबंध तीन वर्ष का बताया गया। मूल प्रोपराइटर की मृत्यु दर्ज है। नए अनुबंध से SECL ने इनकार किया। भूमि और भवन खाली करने का लिखित निर्देश दिया गया। जमा किराया तक वापस करने के लिए बैंक खाता मांगा गया—लेकिन पेट्रोल पंप आज भी चल रहा है! कुसमुंडा स्थित मेसर्स कोरबा सर्विस स्टेशन का मामला अब केवल लीज विवाद नहीं रह गया है। यह सरकारी कंपनी की भूमि पर पेट्रोलियम जैसे अत्यंत ज्वलनशील पदार्थ के भंडारण और बिक्री की वैधानिकता, जिला प्रशासन की जवाबदेही तथा नागरिकों की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर सवाल बन चुका है।
भारतीय श्रमजीवी पत्रकार संघ छत्तीसगढ़ के प्रदेश सचिव अब्दुल सुल्तान ने कलेक्टर एवं जिला दंडाधिकारी को प्रस्तुत शिकायत-सह-अभ्यावेदन में राजस्व, पुलिस, अग्निशमन, SECL, IOCL और PESO की संयुक्त जांच की मांग की है। शिकायत में स्पष्ट कहा गया है कि यदि वर्तमान संचालक वैध भूमि-अधिकार, जिला प्राधिकारी की NOC और प्रभावी PESO लाइसेंस प्रस्तुत नहीं कर सके तो ईंधन आपूर्ति, भंडारण और बिक्री तत्काल रोककर तकनीकी सुरक्षा प्रोटोकॉल के अनुसार परिसर सील किया जाए।
SECL के अपने पत्रों ने खड़े किए विस्फोटक सवाल
SECL कुसमुंडा क्षेत्र के 3 सितंबर 2024 के पत्र में दर्ज है कि पेट्रोल पंप के लिए भूमि और भवन का अनुबंध 27 मार्च 1991 को किया गया था तथा इसकी प्रारंभिक अवधि भवन पूर्ण होने से तीन वर्ष बताई गई। पत्र में यह भी दर्ज है कि पंप के प्रोपराइटर का निधन 21 अगस्त 2021 को हो चुका था और नई परिस्थितियों में उस भूमि का नया अनुबंध अथवा लीज प्रदान नहीं किया जा सकता। इसके बाद संबंधित भूमि और भवन को 30 दिनों के भीतर खाली कर SECL को सौंपने का निर्देश दिया गया। 27 जनवरी 2025 के दूसरे पत्र में SECL ने फिर दोहराया कि नया अनुबंध नहीं दिया जा सकता। इसमें यह भी दर्ज है कि भूमि खाली करने के निर्देश के बावजूद कब्जा नहीं सौंपा गया और जमा किराया वापस करने के लिए बैंक खाता मांगा गया।
यानी कागजों में SECL कह रहा है—नई लीज नहीं, जमीन खाली करो और किराया वापस लो। दूसरी ओर जमीन के ऊपर हजारों लीटर ज्वलनशील पदार्थ का कारोबार चलता बताया जा रहा है। सवाल है कि जब जमीन देने वाला संस्थान ही अपना हाथ खींच चुका था, तब पंप को वैधानिक आधार देने वाला नया दस्तावेज आखिर किस दफ्तर की तिजोरी में बंद है?
हाईकोर्ट की अंतरिम रोक को बना लिया गया ‘अमर लाइसेंस’?
WPC No.1559/2025 में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 25 मार्च 2025 को अंतरिम आवेदन पर सुनवाई करते हुए उत्तरदाताओं को नोटिस जारी किया और उपलब्ध आदेश के अनुसार 3 सितंबर 2024 के विवादित मेमो के प्रभाव एवं संचालन पर अगली सुनवाई तक रोक लगाई थी। लेकिन इस सीमित अंतरिम संरक्षण के नाम पर कई जरूरी सवालों को कालीन के नीचे नहीं दबाया जा सकता।
उपलब्ध आदेश में—
नई भूमि लीज स्वीकृत नहीं की गई;
पेट्रोल पंप को स्थायी रूप से वैध घोषित नहीं किया गया;
PESO के Form XIV लाइसेंस की पुष्टि नहीं की गई;
जिला प्राधिकारी की NOC को वर्तमान परिस्थितियों के लिए मान्य घोषित नहीं किया गया;
IOCL के किसी कथित नामांतरण को स्वीकृति नहीं दी गई;
जिला प्रशासन को अग्नि एवं जनसुरक्षा जांच से स्पष्ट रूप से नहीं रोका गया।
बेदखली पर अंतरिम रोक और पेट्रोलियम बेचने का वैधानिक अधिकार दो अलग प्रश्न हैं। एक मेमो पर रोक को सुरक्षा कानूनों से सर्वकालिक मुक्ति-पत्र समझ लेना कानून की व्याख्या नहीं, बल्कि जिम्मेदारी से बचने का सुविधाजनक पर्दा होगा। हालांकि अंतिम निष्कर्ष से पहले हाईकोर्ट की संपूर्ण और नवीनतम आदेश-पत्रिका प्राप्त करना आवश्यक है। प्रशासन को यह सत्यापित करना होगा कि अंतरिम आदेश आज भी प्रभावी है, संशोधित हुआ है अथवा समाप्त हो चुका है।
Rule 152 का सवाल—क्या आज भी मौजूद है “Right to Site”?
पेट्रोलियम नियम, 2002 के Rule 152(1)(i) के अनुसार यदि लाइसेंसधारी पेट्रोलियम भंडारण वाले स्थल पर अपना अधिकार खो देता है तो लाइसेंस के जारी रहने पर गंभीर वैधानिक प्रश्न खड़ा होता है। नियम में ऐसी स्थिति में लाइसेंस के निरस्त माने जाने का प्रावधान है। आधिकारिक Petroleum Rules, 2002। सर्वोच्च न्यायालय ने C. Albert Morris बनाम K. Chandrasekaran, (2006) 1 SCC 228 में माना कि लीज समाप्त होने के बाद केवल कब्जे में बने रहना अपने आप नया वैधानिक किरायेदारी अधिकार पैदा नहीं करता; बेदखली हालांकि विधि-सम्मत प्रक्रिया से ही हो सकती है। सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय
इसीलिए इस मामले का केंद्रीय प्रश्न पंप चालू है या बंद नहीं, बल्कि यह है—
वर्तमान PESO लाइसेंसधारी के पास आज की तारीख में उसी स्थल पर पेट्रोलियम भंडारण का वैध, स्वतंत्र और प्रभावी अधिकार किस दस्तावेज से पैदा होता है?
यदि इसका उत्तर केवल “हाईकोर्ट का स्टे” बताया जाता है तो प्रशासन को आदेश का वास्तविक दायरा पढ़ना होगा। बेदखली से अंतरिम संरक्षण अपने आप PESO लाइसेंस, Fire NOC, भूमि-अधिकार और डीलरशिप पुनर्गठन की सभी कमियों को धो नहीं देता।
IOCL की डीलरशिप जमीन का मालिकाना हक नहीं
किसी व्यक्ति या संस्था का नाम IOCL रिकॉर्ड, GST पंजीयन, Vendor Code अथवा कंपनी की वेबसाइट पर मौजूद होना अपने आप SECL की जमीन पर वैध लीज सिद्ध नहीं करता। यदि देबजानी मजूमदार के बाद किसी अन्य व्यक्ति के पक्ष में डीलरशिप का पुनर्गठन अथवा संचालन परिवर्तन किया गया है तो IOCL को बताना होगा—
पुनर्गठन किस आदेश से हुआ?
भूमि-अधिकार के रूप में कौन-सा दस्तावेज लिया गया?
क्या SECL से ताजा सहमति अथवा NOC प्राप्त की गई?
क्या 2024 और 2025 के SECL पत्रों की जानकारी IOCL को थी?
विवादित भूमि-अधिकार के बावजूद ईंधन आपूर्ति किस आधार पर जारी रही?
तेल कंपनी की सप्लाई लीज नहीं बनाती और बिक्री की मशीनें जमीन पर कानूनी अधिकार पैदा नहीं करतीं।
₹2.5 करोड़ में आखिर बेचा क्या गया?
शिकायत में सूत्रों से प्राप्त लगभग ₹2.5 करोड़ के कथित सौदे की उच्चस्तरीय जांच मांगी गई है। शिकायतकर्ता ने इस सूचना को प्रमाणित तथ्य घोषित नहीं किया है, लेकिन सवाल बेहद गंभीर है।
यदि कोई सौदा हुआ तो उसमें बेचा क्या गया—
IOCL डीलरशिप?
मशीनरी और टैंक?
कारोबार की गुडविल?
संचालन अधिकार?
भवन?
या SECL की जमीन पर ऐसा अधिकार, जिसे हस्तांतरित करने का अधिकार विक्रेता के पास था ही नहीं?
जांच में बिक्री समझौता, भुगतान का बैंकिंग रास्ता, आयकर और GST रिकॉर्ड तथा वास्तविक लाभार्थी स्वामित्व सामने आना चाहिए। सरकारी कंपनी की जमीन पर खड़े कारोबार को निजी संपत्ति की तरह सौदे की मेज पर रखा गया हो तो मामला साधारण व्यावसायिक लेन-देन नहीं रह जाता।
“तीन वर्ष” के दस्तावेज पर “99 वर्ष” की परछाईं!
मामले का सबसे सनसनीखेज विरोधाभास कथित “99 वर्ष की लीज” और SECL द्वारा आधिकारिक पत्रों में बताए गए प्रारंभिक तीन वर्षीय अनुबंध के बीच है। कलेक्टर से मांग की गई है कि वर्ष 1991 का मूल अनुबंध SECL रिकॉर्ड से सुरक्षित कराया जाए और उसकी तुलना संचालक, IOCL तथा PESO कार्यालयों में प्रस्तुत प्रतियों से की जाए। यदि किसी प्रति में “99 years” जोड़ा गया है तो स्याही, टाइपिंग, ओवरराइटिंग और दस्तावेज की आयु की फॉरेंसिक जांच हो। जाली अथवा परिवर्तित दस्तावेज का इस्तेमाल सामने आने पर जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध लागू आपराधिक कानूनों के अंतर्गत कार्रवाई की जाए। जांच से पहले किसी व्यक्ति को दोषी नहीं कहा जा सकता, लेकिन इतने बड़े विरोधाभास पर प्रशासन की चुप्पी भी स्वीकार्य उत्तर नहीं हो सकती।
क्या प्रशासन दुर्घटना के बाद जागने का इंतजार कर रहा है?
पेट्रोल पंप किराना दुकान नहीं है। यहां भूमिगत टैंकों में हजारों लीटर पेट्रोल और डीजल रखा जाता है। भूमि-अधिकार, PESO लाइसेंस, Fire NOC, विद्युत सुरक्षा, टैंक परीक्षण अथवा Public Liability Insurance में कोई गंभीर कमी मिली तो उसका मूल्य फाइलों को नहीं, आसपास की आबादी को चुकाना पड़ सकता है।
शिकायत में 24 घंटे के भीतर संयुक्त निरीक्षण तथा निम्न मूल दस्तावेज तलब करने की मांग की गई है—
वर्तमान भूमि लीज और SECL की नवीनतम सहमति;
जिला प्राधिकारी की NOC;
प्रभावी PESO Form XIV लाइसेंस;
IOCL डीलरशिप एवं पुनर्गठन आदेश;
Fire NOC और विद्युत सुरक्षा प्रमाणपत्र;
भूमिगत टैंकों की परीक्षण रिपोर्ट;
Public Liability Insurance;
हाईकोर्ट की नवीनतम प्रमाणित आदेश-पत्रिका।
दस्तावेज वैध हैं तो उन्हें सामने रखकर विवाद समाप्त किया जाए। यदि वैध दस्तावेज नहीं हैं तो पेट्रोलियम आपूर्ति और बिक्री रोकने में एक दिन की देरी भी जनता की सुरक्षा के साथ खतरनाक जुआ होगी।
अब जवाब फाइल नहीं, दस्तावेज देंगे
कलेक्टर से सात दिनों में प्रारंभिक जांच रिपोर्ट देने, CCTV फुटेज, स्टॉक रजिस्टर, IOCL आपूर्ति रिकॉर्ड, बैंक लेन-देन तथा डिजिटल दस्तावेज सुरक्षित कराने की मांग की गई है।
यह मामला अब तीन वाक्यों में प्रशासन के सामने खड़ा है—
हाईकोर्ट ने नई लीज नहीं दी।
हाईकोर्ट ने PESO लाइसेंस प्रमाणित नहीं किया।
हाईकोर्ट ने जनसुरक्षा जांच पर रोक नहीं लगाई।
इसलिए यदि जमीन का अधिकार, NOC और लाइसेंस वैध हैं तो उनकी मूल प्रतियां जनता के सामने रखी जाएं। यदि नहीं हैं तो किसी हादसे और जनहानि की प्रतीक्षा क्यों? SECL की फाइल पर लगी अंतरिम रोक को कोरबा की जनता की सुरक्षा पर लगी रोक नहीं बनाया जा सकता!
संपादक – अब्दुल सुल्तान
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क
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