हाईकोर्ट की रोक के बीच उसी मामले में तहसीलदार का निलंबन—शासन की जल्दबाजी पर फिर न्यायिक ब्रेक!

वरिष्ठ अधिवक्ता मतीन सिद्दीकी की धारदार दलील—“जिन आरोपों पर विभागीय जांच का निर्देश पहले ही स्थगित, उन्हीं तथ्यों पर निलंबन कैसे?
तहसीलदार माया अंचल लहरे के निलंबन आदेश पर हाईकोर्ट ने लगाई अंतरिम रोक; राजस्व सचिव सहित संबंधित अधिकारियों से जवाब तलब
बिलासपुर/कोरबा | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क
संपादक – अब्दुल सुल्तान
छत्तीसगढ़ शासन के राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग द्वारा तहसीलदार माया अंचल लहरे के खिलाफ जारी निलंबन आदेश पर हाईकोर्ट ने अंतरिम रोक लगा दी है। न्यायालय ने शासन और संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। मामले में याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मतीन सिद्दीकी द्वारा प्रस्तुत दलीलों ने शासन की कार्रवाई के समय, आधार और वैधानिक औचित्य पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
माया अंचल लहरे वर्तमान में कांकेर जिले में तहसीलदार के पद पर पदस्थ बताई गई हैं। छत्तीसगढ़ शासन के राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग के अवर सचिव ने 16 जुलाई 2026 को छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण तथा अपील) नियम, 1966 के नियम 9(1)(क) के अंतर्गत उन्हें तत्काल प्रभाव से निलंबित करने का आदेश जारी किया था।
निलंबन का आधार उनके पुसौर, जिला रायगढ़ में पदस्थ रहने के दौरान 28 अक्टूबर 2020 को पारित एक राजस्व आदेश से संबंधित बताया गया। आरोप है कि ग्राम पुसौर स्थित खसरा क्रमांक 16/2ख, जो राजस्व अभिलेख में “शासकीय छोटे झाड़ का जंगल” मद में दर्ज था, उसके अभिलेख में परिवर्तन करते हुए आनंद राम का नाम दर्ज करने का आदेश पारित किया गया था।
इस आदेश के विरुद्ध छत्तीसगढ़ राजस्व मंडल, बिलासपुर में पुनरीक्षण आवेदन प्रस्तुत हुआ। राजस्व मंडल के अध्यक्ष ने 21 अगस्त 2025 को पारित आदेश में कथित रूप से सक्षम अनुमति के बिना शासकीय मद की भूमि के अभिलेख में परिवर्तन को गंभीर माना और संबंधित तत्कालीन तहसीलदार एवं हल्का पटवारी के विरुद्ध प्रशासनिक तथा विभागीय कार्रवाई के लिए मुख्य सचिव को पत्र भेजने का निर्देश दिया।
लेकिन यहीं से शासन की कार्रवाई कानूनी सवालों के घेरे में आ गई।
पहले विभागीय जांच पर रोक, फिर उन्हीं तथ्यों पर निलंबन!
राजस्व मंडल के 21 अगस्त 2025 के आदेश को तहसीलदार माया अंचल लहरे ने हाईकोर्ट में WPS No.1785/2026 के माध्यम से चुनौती दी थी। उस याचिका में हाईकोर्ट ने 17 फरवरी 2026 को अंतरिम राहत देते हुए राजस्व मंडल के आदेश के उस हिस्से पर रोक लगा दी थी, जिसमें याचिकाकर्ता के विरुद्ध विभागीय जांच प्रारंभ करने का निर्देश दिया गया था।
बताया गया कि यह अंतरिम आदेश आज भी प्रभावशील है और मूल रिट याचिका न्यायालय में लंबित है। इसके बावजूद राजस्व विभाग ने 16 जुलाई 2026 को कथित रूप से उन्हीं आरोपों और तथ्यों के आधार पर तहसीलदार का निलंबन आदेश जारी कर दिया।
वरिष्ठ अधिवक्ता मतीन सिद्दीकी ने उठाया बड़ा कानूनी प्रश्न
10 सितंबर 2026 को न्यायमूर्ति बी.डी. गुरु की पीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मतीन सिद्दीकी, अधिवक्ता नरेंद्र मेहेर तथा अधिवक्ता अपूर्वा पांडे ने पक्ष रखा। वरिष्ठ अधिवक्ता मतीन सिद्दीकी ने न्यायालय के समक्ष प्रमुख रूप से यह आधार प्रस्तुत किया कि जब राजस्व मंडल द्वारा विभागीय जांच प्रारंभ करने के निर्देश पर हाईकोर्ट पहले ही अंतरिम रोक लगा चुका था और वह आदेश प्रभावशील था, तब उन्हीं तथ्यों को आधार बनाकर निलंबन आदेश जारी करना प्रथमदृष्टया पूर्व न्यायिक आदेश के विपरीत है।
याचिकाकर्ता की ओर से इसे हाईकोर्ट के प्रभावशील अंतरिम आदेश की अवहेलना और अवमानना की श्रेणी में आने वाली कार्रवाई बताया गया। हालांकि इस प्रश्न पर अंतिम निर्णय अभी होना शेष है।
शासन की फाइल में हाईकोर्ट की रोक दिखाई नहीं दी या देखकर भी अनदेखा किया गया?
मामले ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं—
– क्या निलंबन आदेश जारी करने से पहले लंबित न्यायालयीन प्रकरण की विधिवत जांच की गई थी?
– क्या विभाग को 17 फरवरी 2026 के अंतरिम आदेश की जानकारी थी?
– यदि जानकारी थी, तो विधि विभाग से अभिमत लिए बिना निलंबन आदेश किस आधार पर जारी किया गया?
– क्या विभागीय जांच पर लगी रोक को दरकिनार करने के लिए निलंबन का अलग प्रशासनिक रास्ता चुना गया?
– निलंबन प्रस्ताव तैयार करने, परीक्षण करने और अनुमोदित करने वाले अधिकारियों की जवाबदेही क्या होगी?
सरकारी फाइलों पर चलने वाली कलम इतनी उतावली कैसे हो गई कि उसके सामने हाईकोर्ट का प्रभावशील अंतरिम आदेश भी कथित रूप से धुंधला पड़ गया? यह अब शासन को अपने जवाब में स्पष्ट करना होगा।
न्यायालय ने इन अधिकारियों से मांगा जवाब
हाईकोर्ट ने निलंबन आदेश के क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक लगाते हुए राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग के सचिव एवं अवर सचिव, छत्तीसगढ़ राजस्व मंडल बिलासपुर, संबंधित संभागायुक्त, कलेक्टर रायगढ़, कलेक्टर कांकेर तथा संबंधित अनुविभागीय अधिकारी सहित उत्तरवादी अधिकारियों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।
न्यायालय की यह राहत अंतरिम है। इससे भूमि-अभिलेख परिवर्तन संबंधी मूल आरोपों पर अंतिम निर्णय अथवा याचिकाकर्ता की पूर्ण दोषमुक्ति नहीं मानी जाएगी। फिलहाल न्यायालय ने निलंबन आदेश के प्रभाव को रोका है और शासन का जवाब आने के बाद मामले की आगे सुनवाई होगी।
यह प्रकरण अब केवल एक तहसीलदार के निलंबन तक सीमित नहीं रहा। बड़ा प्रश्न यह है कि क्या शासन का प्रशासनिक तंत्र किसी प्रभावशील न्यायिक आदेश के रहते उन्हीं तथ्यों पर समानांतर दंडात्मक कार्रवाई कर सकता है—और यदि नहीं, तो 16 जुलाई 2026 का आदेश किन अधिकारियों की कानूनी सलाह और जवाबदेही पर जारी हुआ?
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क इस मामले में शासन के जवाब, मूल निलंबन फाइल और हाईकोर्ट की अगली कार्रवाई पर नजर बनाए रखेगा।
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