खदान सरकारी, ‘अलाउ’ किसकी बपौती? गेवरा–दीपका में कथित वसूली पर खुर्शीद समेत संबंधित अधिकारियों से हिसाब मांगने का वक्त!

DO के नाम पर पैसा, लोडिंग के नाम पर पैसा—अक्टूबर से स्टीम कोल पर ₹450 प्रति टन मांग की तैयारी का आरोप; अशोक–तीवरता समूह के आर्थिक रिश्तों और पूरी निकासी व्यवस्था की स्वतंत्र जांच हो
कोरबा/बिलासपुर। कोयले की कीमत चुकाइए, फिर निकासी की अनुमति के नाम पर कथित रकम दीजिए, फिर लोडिंग का अलग पैसा निकालिए—क्या सरकारी खदान से खरीदा हुआ कोयला उठाने के लिए खरीदार को ऐसी अतिरिक्त मांगों से गुजरना पड़ रहा है? गेवरा–दीपका की व्यवस्था पर आई नई सूत्रीय सूचना इसी गंभीर सवाल की जांच मांगती है।
खदान सरकारी है। कोयला राष्ट्रीय संपदा है। उसकी निकासी पर किसी व्यक्ति को अपनी दर बैठाने का अधिकार नहीं। ग्राम यात्रा को प्राप्त सूचना में “DO अलाउ” के नाम पर ₹15–₹18 और लोडिंग के नाम पर ₹20 प्रति टन की अतिरिक्त मांग का आरोप लगाया गया है।
रकम किसे दी जाती है, किस माध्यम से और किन खरीदारों से मांगी गई—इनकी स्वतंत्र पुष्टि अभी बाकी है। लेकिन संबंधित प्रबंधन से सवाल आज ही पूछा जा सकता है: यह अधिकृत शुल्क है तो आदेश और बिल दिखाइए। अनधिकृत मांग है तो शिकायत की जांच कराइए। खरीदार को दोनों के बीच भटकने के लिए क्यों छोड़ा जाए?
करोड़ों का आरोप—गणना भी साफ, जांच भी साफ हो
सूत्र ने मानिकपुर, सराईपाली, कुसमुंडा, गेवरा और दीपका में संयुक्त रूप से लगभग 16 लाख टन मासिक डिस्पैच का अनुमान दिया है। यदि इस पूरी मात्रा पर दोनों कथित मांगें लागू हों, तो ₹35–₹38 प्रति टन के हिसाब से राशि ₹5.60–₹6.08 करोड़ प्रतिमाह बनती है। यह प्रमाणित वसूली का आंकड़ा नहीं, सूत्र के अपुष्ट आंकड़ों पर आधारित गणना है। इतने बड़े आरोप का उत्तर “सब ठीक है” कह देने से नहीं मिलेगा। खदानवार वास्तविक रोड-सेल मात्रा और अधिकृत शुल्क सामने रखने होंगे। खुर्शीद समेत संबंधित अधिकारियों की भूमिका—कुर्सी का नाम नहीं, फैसलों की फाइल खोलिए
सूत्रीय सूचनाओं में सामने आए एन. खुर्शीद, राजेश सिंह, संतोष सिन्हा और संतोष राठौर की संबंधित अवधि की पदस्थापना, अधिकार और वास्तविक भूमिका की आधिकारिक पुष्टि जरूरी है। नई सूचना अपने आप इनमें से किसी व्यक्ति की संलिप्तता सिद्ध नहीं करती।
“ऊपर तक पैसा जाता है, हमारा कुछ नहीं होगा”—क्या बड़े नामों की आड़ में दबाव बनाने का आरोप?
सूत्र का दावा है कि कथित अतिरिक्त वसूली से जुड़े कुछ लोग स्वयं को अधिकारियों से संबद्ध बताते हुए कहते हैं—“पैसा ऊपर तक जाता है; अधिकारी, नेता, मंत्री—सबको बंटता है। हमारा कुछ नहीं होने वाला।” इस कथन, इसे कहने वालों की पहचान और रकम के कथित बंटवारे की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है।
यदि ऐसा कहा गया है, तो यह जवाबदेही को खुली चुनौती देने वाला कथन है। जांच बताए कि वास्तव में कोई आर्थिक संपर्क है या प्रभावशाली पदों के नाम लेकर खरीदारों और ट्रांसपोर्टरों को डराया जा रहा है। किसी पद का हवाला देना उस पदाधिकारी को पैसा पहुंचने का प्रमाण नहीं है; कथन और कथित भुगतान—दोनों की अलग जांच जरूरी है।
सूर्यकांत तिवारी, सुनील कुमार अग्रवाल और रानू साहू से जुड़े कोयला-लेवी प्रकरण में हुई कार्रवाइयों के बाद भी यदि “हमारा कुछ नहीं होगा” जैसी डींग सुनाई दे रही है, तो निगरानी व्यवस्था से कठोर सवाल बनता है—
पुराने मामले से क्या सबक लिया गया?
कार्रवाई का इतिहास मौजूद है; किसी कथित वसूलीकर्ता को दंड से बचने का भरोसा किस आधार पर है?
“ऊपर तक” कहकर बात समाप्त नहीं होगी। किसने कहा, किससे कहा, रकम किसने मांगी और किसे मिली—जांच हर कड़ी का प्रमाण सामने रखे।
जांच पूछे—किसने डिलीवरी ऑर्डर मंजूर किया?
किसने निकासी क्रम बदला?
किसने खरीदार को रोका?
किसके आदेश पर निजी लोडर अंदर आया?
भुगतान मांगने की शिकायत मिली हो तो उस पर क्या किया गया?
सरकारी पद जवाबदेही की ढाल नहीं बन सकता। अधिकार मिला है तो उसके इस्तेमाल का रिकॉर्ड भी देना होगा। GM/CGM बताएं—लोडिंग का ठेका किसका, पैसा किसका? यदि संबंधित बिक्री में लोडिंग की जिम्मेदारी SECL की है, तो खरीदार से अलग रकम मांगने का आधार क्या है? यदि बिक्री की शर्तें कुछ और कहती हैं, तो वे सामने रखी जाएं। निजी लोडर अधिकृत ठेकेदार का भी हो सकता है। इसलिए जांच मशीन की मौजूदगी पर नहीं, उसकी अनुमति, अनुबंध, भुगतान और खरीदार से कथित अतिरिक्त मांग पर केंद्रित हो।
एक ही सेवा के लिए दो जगह से भुगतान हुआ है या नहीं—अनुबंध और खातों को साथ रखकर जांचिए। मौखिक सफाई से यह हिसाब नहीं खुलेगा।
अक्टूबर से ₹450 प्रति टन? नई मांग से पहले आदेश सामने आए
सूत्र ने अक्टूबर 2026 से स्टीम कोल पर ₹450 प्रति टन मांग शुरू करने की तैयारी का आरोप लगाया है। यह अभी न लागू दर के रूप में सत्यापित है, न वास्तविक वसूली के रूप में।
SECL स्पष्ट करे—यह कथित राशि किस मद की है?
क्या कोई अधिकृत आदेश है?
कीमत या गुणवत्ता का अंतर है अथवा बिल से बाहर मांग का आरोप?
आदेश है तो प्रकाशित कीजिए। आदेश नहीं है तो उस नाम पर पैसा मांगने वाले की पहचान और शिकायत की जांच कीजिए। “अलाउ” शब्द के पीछे रकम की असली प्रकृति छिपनी नहीं चाहिए। अशोक–तीवरता समूह: कारोबार का लाभ किसे, आर्थिक रिश्ते किनसे?
तीवरता समूह से जुड़े कारोबार की पड़ताल में प्रत्येक कंपनी की अलग पहचान, घोषित शेयरधारिता, लाभकारी स्वामित्व और वित्तीय संबंध सामने आने चाहिए। क्या किसी संबंधित अधिकारी या उसके निकट संबंधी का ऐसा निवेश, साझेदारी, ऋण या आर्थिक हित है जो उसकी सरकारी जिम्मेदारी से टकराता हो? क्या कोई अघोषित लाभार्थी है?
सवाल गंभीर है; उत्तर भी प्रमाण से चाहिए। “अघोषित पार्टनर” का नाम अनुमान से नहीं छपेगा—कंपनी रिकॉर्ड और सक्षम वित्तीय जांच बताएगी कि रिश्ता है या नहीं। किसी अधिकारी की प्रतिशत हिस्सेदारी अथवा तीवरता समूह से अवैध लाभ अभी स्थापित नहीं है।
पुराने कोयला-लेवी प्रकरण के बाद निगरानी ने क्या सीखा?
ED के पुराने आधिकारिक रिकॉर्ड में सूर्यकांत तिवारी, इंद्रमणि समूह के सुनील कुमार अग्रवाल तथा अन्य व्यक्तियों की कथित भूमिका का उल्लेख है। बाद के रिकॉर्ड में रानू साहू सहित अन्य व्यक्तियों की संपत्तियों पर कार्रवाई दर्ज है। ये एजेंसी के आरोप और कार्रवाइयां हैं; अंतिम दोषनिर्धारण न्यायालय का विषय है। पुराना मामला नए आरोप की पुष्टि नहीं करता। लेकिन वह निगरानी की समीक्षा का गंभीर कारण अवश्य है।
इतनी बड़ी जांच के बाद खदान से खरीदार तक नियंत्रण में क्या सुधार हुआ?
कौन-से रास्ते बंद हुए?
नई अतिरिक्त मांग की शिकायत आए तो उसकी जांच कितनी जल्दी होती है?
मुख्यालय इसका दस्तावेजी उत्तर दे।
CMD हरीश दुहन और मुख्यालय—जांच की जिम्मेदारी तय करें संबंधित GM/CGM, बिक्री, रोड-सेल, डिस्पैच, गुणवत्ता और सुरक्षा अधिकारियों के निर्णयों का स्वतंत्र परीक्षण हो। DO, मूल कांटा डेटा, वाहन प्रवेश, लोडर अनुमति, ठेका भुगतान और उपलब्ध CCTV तत्काल सुरक्षित किए जाएं।
विशिष्ट शिकायतों पर खरीदारों और ट्रांसपोर्टरों के बयान लेकर भुगतान मांगने वाले की पहचान की जाए। प्रमाण के आधार पर वित्तीय संबंधों की जांच सक्षम एजेंसी करे। इन नए आरोपों पर केंद्रीय एजेंसी की सक्रिय निगरानी की आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है। मांग यह है कि आधार मिले तो मामला अधिकार क्षेत्र वाली एजेंसी को भेजा जाए—सिर्फ विभागीय पत्राचार में दबकर न रह जाए।
ग्राम यात्रा की दस्तावेजी पड़ताल जारी है। सत्यापित नाम, पद, निर्णय और संबंधित पक्षों के उत्तर अगली रिपोर्ट का आधार होंगे। कोयला उठाने का अधिकार डिलीवरी ऑर्डर देता है। उस अधिकार के रास्ते में कथित निजी कीमत कौन बैठा रहा है—अब जांच उसका उत्तर दे।
वसूली की दरें, डिस्पैच मात्रा, अक्टूबर की कथित मांग और आर्थिक संबंधों के आरोप स्वतंत्र पुष्टि के अधीन हैं। किसी उल्लिखित व्यक्ति या समूह की संलिप्तता सिद्ध नहीं है। संबंधित पक्षों का उत्तर प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
संपादक—अब्दुल सुल्तान
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क
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