SECL के कोयले पर कथित ‘गब्बर टैक्स’ का काला साम्राज्य!

कोयला सरकार का—हर टन पर कथित टैक्स किसके गिरोह का?
गेवरा–कुसमुंडा–दीपका–मानिकपुर में ₹10 से ₹50 प्रति टन का कथित ‘गब्बर टैक्स’; समान उत्पादन पर तीन वर्षों का सांकेतिक काला गणित ₹443 करोड़ से ₹2,218 करोड़ तक!
नीचे कथित वसूली और ऊपर हिस्सेदारी? सेल्स विभाग से GM–CGM, SECL बिलासपुर मुख्यालय और कथित VIP–VVIP संरक्षण तक स्वतंत्र जांच कब?
कोरबा | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क कोरबा की धरती से केवल कोयला नहीं निकल रहा—सूत्रों के गंभीर आरोपों पर भरोसा करें तो उसके प्रत्येक टन के साथ कथित भ्रष्टाचार की एक काली नदी भी बह रही है। जमीन जनता की। खनिज देश का। खदान और मशीनें सरकारी कंपनी की। कर्मचारी का वेतन सरकारी। सुरक्षा और निगरानी पर करोड़ों रुपये खर्च। फिर कोयले के प्रत्येक टन पर कथित रूप से ₹10 से ₹50 तक का अलग “एलाव”, सुविधा शुल्क, गिरवाने का खर्च अथवा ‘गब्बर टैक्स’ किस कानून, किस आदेश और किस गिरोह के रेट कार्ड से वसूला जा रहा है?
यदि आरोप सही हैं तो यह रिश्वत की कोई छोटी-मोटी दुकान नहीं, बल्कि सरकारी खदानों की छाती पर बैठकर चलाया जा रहा कथित समानांतर वसूली विभाग है—जिसकी कोई रसीद नहीं, कोई सरकारी खाता नहीं, लेकिन हर टन का कथित हिसाब मौजूद है!
चार खदानें और 14.788 करोड़ टन कोयला
कोयला मंत्रालय की मार्च 2024 की सांख्यिकी के अनुसार वित्त वर्ष 2023-24 में:
गेवरा से लगभग 59.10 मिलियन टन
कुसमुंडा से लगभग 50.12 मिलियन टन
दीपका से लगभग 33.41 मिलियन टन
मानिकपुर से लगभग 5.25 मिलियन टन
कोयले का उत्पादन सामने आता है।
चारों खदानों का कुल उत्पादन 147.88 मिलियन टन, अर्थात 14.788 करोड़ टन बैठता है। कोयला मंत्रालय—मार्च 2024 सांख्यिकी। अब इसी उत्पादन पर सूत्रों द्वारा बताई जा रही ₹10 से ₹50 प्रति टन की कथित दर रखिए। गणित ऐसा निकलता है कि निगरानी व्यवस्था की नींद पर भी गंभीर सवाल खड़े हो जाते हैं।
खदानवार कथित ‘गब्बर टैक्स’ का सांकेतिक गणित
खदान 2023-24 उत्पादन ₹10/टन ₹20/टन ₹30/टन ₹40/टन ₹50/टन
गेवरा 5.910 करोड़ टन ₹59.10 करोड़ ₹118.20 करोड़ ₹177.30 करोड़ ₹236.40 करोड़ ₹295.50 करोड़
कुसमुंडा 5.012 करोड़ टन ₹50.12 करोड़ ₹100.24 करोड़ ₹150.36 करोड़ ₹200.48 करोड़ ₹250.60 करोड़
दीपका 3.341 करोड़ टन ₹33.41 करोड़ ₹66.82 करोड़ ₹100.23 करोड़ ₹133.64 करोड़ ₹167.05 करोड़
मानिकपुर 0.525 करोड़ टन ₹5.25 करोड़ ₹10.50 करोड़ ₹15.75 करोड़ ₹21.00 करोड़ ₹26.25 करोड़
कुल 14.788 करोड़ टन ₹147.88 करोड़ ₹295.76 करोड़ ₹443.64 करोड़ ₹591.52 करोड़ ₹739.40 करोड़
अर्थात कथित वसूली की दर यदि पूरे उत्पादन पर लागू हुई हो तो केवल 2023-24 का सैद्धांतिक दायरा:
₹10 प्रति टन पर ₹147.88 करोड़
₹20 प्रति टन पर ₹295.76 करोड़
₹30 प्रति टन पर ₹443.64 करोड़
₹40 प्रति टन पर ₹591.52 करोड़
₹50 प्रति टन पर ₹739.40 करोड़ तक पहुंचता है।
यह रकम किसी कर्मचारी की जेब में छिप जाने वाली रेजगारी नहीं है। यदि इतनी व्यापक वसूली वास्तव में हुई है, तो उसका संग्रहकर्ता, हिसाब रखने वाला, हिस्सा बांटने वाला, लाभार्थी और संरक्षणदाता—सबकी पहचान होनी चाहिए। तीन वर्षों का सांकेतिक हिसाब ₹2,218 करोड़ तक! 2024-25 और 2025-26 के अंतिम सत्यापित खदानवार वास्तविक डिस्पैच को जोड़े बिना “2023 से अब तक की प्रमाणित वसूली” घोषित करना उचित नहीं होगा। लेकिन जांच की गंभीरता समझने के लिए यदि 2023-24 का उत्पादन तीन वर्षों तक समान मान लिया जाए, तो चारों खदानों का सांकेतिक उत्पादन 44.364 करोड़ टन होता है।
कथित दर समान उत्पादन पर तीन वर्षों की संभावित रकम
₹10 प्रति टन ₹443.64 करोड़
₹20 प्रति टन ₹887.28 करोड़
₹30 प्रति टन ₹1,330.92 करोड़
₹40 प्रति टन ₹1,774.56 करोड़
₹50 प्रति टन ₹2,218.20 करोड़
इस प्रकार आरोपों का सांकेतिक दायरा लगभग ₹4.43 अरब से ₹22.18 अरब तक पहुंच सकता है। यह कोई प्रमाणित घोटाला-राशि नहीं, बल्कि समान उत्पादन और आरोपित दर पर आधारित परिदृश्य है। वास्तविक रकम प्रभावित DO, वास्तविक उठाव, अवधि और प्रमाणित भुगतान के आधार पर ही निर्धारित होगी। ₹10 में रास्ता, ₹20 में आपत्ति शांत और ₹50 में मनचाहा खेल? सूत्रों का आरोप है कि कथित रकम को सीधे रिश्वत नहीं कहा जाता। उसे “एलाव”, स्टॉक खर्च, व्यवस्था खर्च, कोयला गिरवाने का खर्च और सुविधा शुल्क जैसे नामों के मुखौटे पहनाए जाते हैं।
आरोपों के अनुसार अलग-अलग परिस्थितियों में कथित दर बदल सकती है:
सामान्य कथित सुविधा के नाम पर ₹10 प्रति टन
लोडिंग अथवा कोयला गिरवाने के नाम पर ₹10–₹20
स्टॉक, ग्रेड अथवा प्राथमिकता के कथित खेल में ₹20–₹40
विशेष अथवा “स्टीम कोयले” के कथित खेल में कुल बोझ ₹50 प्रति टन तक
इन आरोपों की अभी किसी सक्षम जांच एजेंसी ने पुष्टि नहीं की है। लेकिन यदि आरोप निराधार हैं तो SECL के लिए खरीदारवार DO, ग्रेड, कांटा और उठाव का रिकॉर्ड सार्वजनिक करना सबसे सीधा जवाब होगा।
नीचे कथित वसूली—ऊपर हिस्सेदारी की सीढ़ी?
सूत्रों द्वारा बताई जा रही कथित व्यवस्था का सिरा केवल खदान के गेट पर खड़े कर्मचारी तक सीमित नहीं बताया जा रहा। गंभीर आरोप हैं कि हर टन की कथित रकम में अलग-अलग स्तरों की हिस्सेदारी अथवा संरक्षण की भूमिका हो सकती है।
जांच का दायरा इन सभी स्तरों तक जाना चाहिए:
परियोजना और एरिया सेल्स विभाग
कोलियरी तथा परियोजना प्रबंधन
तकनीकी निरीक्षण एवं गुणवत्ता शाखा
स्टॉक, लोडिंग और डिस्पैच अधिकारी
कांटा, RFID और गेट-पास व्यवस्था
सब-एरिया तथा परियोजना अधिकारी
एरिया GM कार्यालय
CGM और क्षेत्रीय शीर्ष प्रबंधन
SECL बिलासपुर मुख्यालय का सेल्स एवं मार्केटिंग विभाग
आंतरिक ऑडिट और विजिलेंस
कथित बिचौलिए, ट्रांसपोर्टर और लाभार्थी खरीदार
किसी भी स्तर पर सामने आने वाला राजनीतिक अथवा VIP–VVIP हस्तक्षेप
यदि नीचे वसूली हुई तो ऊपर निगरानी क्यों नहीं हुई?
यदि शिकायतें पहुंचीं तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
यदि रिकॉर्ड उपलब्ध था तो विजिलेंस ने कथित रेट कार्ड क्यों नहीं पकड़ा?
और यदि किसी प्रभावशाली संरक्षण ने कार्रवाई रुकवाई, तो वह संरक्षण किस कुर्सी से निकला?
VIP–VVIP संरक्षण और अधिकारियों की हिस्सेदारी फिलहाल सूत्र-आधारित आरोप हैं। जांच से पहले किसी व्यक्ति को दोषी नहीं कहा जा सकता। लेकिन आरोपों की गंभीरता के कारण जांच को छोटे कर्मचारियों तक सीमित करना कथित मगरमच्छों को बचाकर छोटी मछलियों की बलि देने जैसा होगा। DO में नंबर दिखाई देते हैं—खरीदार का पूरा चेहरा क्यों नहीं? सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कुछ Delivery Order विवरणों में DO संख्या, अवधि और मात्रा दिखाई देती है, लेकिन खरीदार का नाम, GSTIN, नीलामी श्रेणी, बिक्री मूल्य, ग्रेड और वास्तविक उठाव एक स्थान पर स्पष्ट नहीं मिलता।
यदि व्यवस्था शीशे जैसी पारदर्शी है तो SECL बताए:
किस कंपनी को कितना कोयला आवंटित हुआ?
किस DO से कितने टन का वास्तविक उठाव हुआ?
किस ग्रेड का आदेश था और कौन-सा ग्रेड दिया गया?
कौन-सा कोयला FSA, लिंकज अथवा पावर सेक्टर में गया?
कितना कोयला ई-नीलामी और गैर-पावर खरीदारों को मिला?
किन खरीदारों को बार-बार प्राथमिकता मिली?
किन तकनीकी आपत्तियों को किस अधिकारी ने हटाया?
स्टॉक उपलब्ध नहीं होने पर विशेष आदेश किसने जारी किया?
वाहन किस कांटे पर और कितनी बार तौले गए?
RFID, GPS, CCTV और गेट-पास रिकॉर्ड आपस में मेल खाते हैं या नहीं?
प्रेस-विज्ञप्ति इन सवालों का जवाब नहीं होगी। इसका जवाब केवल मूल सर्वर, DO, बैंक खाते, कांटा लॉग और CCTV देंगे। उत्पादन नहीं—प्रभावित वास्तविक उठाव पर निकले अंतिम हिसाब यह स्पष्ट है कि पूरा उत्पादित कोयला खुले बाजार या निजी कंपनियों को नहीं बेचा जाता। उत्पादन, डिस्पैच, पावर सेक्टर सप्लाई, FSA, लिंकज और ई-नीलामी अलग-अलग श्रेणियां हैं।
इसलिए वास्तविक कथित वसूली की गणना का सही सूत्र होगा:
प्रभावित वास्तविक उठाव × जांच में प्रमाणित प्रति टन दर = संभावित अवैध वसूली इसके लिए 1 अप्रैल 2023 से अब तक चारों खदानों का पूरा डेटा एक मंच पर मिलाया जाना चाहिए:
उत्पादन → स्टॉक → बिक्री योजना → खरीदार → DO → ग्रेड → कांटा → गेट-पास → वास्तविक उठाव → भुगतान
इसी मिलान से पता चलेगा कि आरोप धुएं का गुबार हैं या भीतर वास्तव में भ्रष्टाचार की आग धधक रही है। सर्वर बचाइए—कहीं सबूतों पर डिजिटल बुलडोजर न चल जाए! कोयला मंत्रालय और Coal India को तत्काल डेटा संरक्षण आदेश जारी करना चाहिए। जांच की घोषणा से पहले अथवा साथ-साथ निम्न रिकॉर्ड सुरक्षित किए जाने चाहिए:
1 अप्रैल 2023 से अब तक के सभी DO
खरीदारवार आवंटन और वास्तविक उठाव
ई-नीलामी, FSA और लिंकज रिकॉर्ड
ग्रेडवार स्टॉक रजिस्टर
नमूना एवं प्रयोगशाला रिपोर्ट
कांटों का मूल डिजिटल डेटाबेस
RFID, GPS और गेट-पास
प्रवेश–निकासी द्वारों के CCTV
SAP लॉग और रिकॉर्ड में किए गए बदलाव
तकनीकी आपत्तियां और उन्हें हटाने के आदेश
अधिकारियों का ड्यूटी रोस्टर
शिकायतें और विजिलेंस की कार्रवाई
जिन अधिकारियों के पास रिकॉर्ड बदलने, मिटाने अथवा प्रभावित करने की क्षमता है, उन्हें निष्पक्ष जांच तक संबंधित संवेदनशील पदों से अलग किया जाना चाहिए। विभागीय लीपापोती नहीं—CBI और CVC की संयुक्त जांच हो
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क मांग करता है कि:
1. कोयला मंत्रालय और Coal India चारों खदानों की स्वतंत्र विशेष जांच कराएं।
2. CVC तथा CIL/SECL Vigilance तीन वर्षों के DO और वास्तविक उठाव का फॉरेंसिक ऑडिट करें।
3. प्रथमदृष्टया भ्रष्टाचार अथवा आपराधिक षड्यंत्र के प्रमाण मिलने पर CBI नियमित प्रकरण दर्ज करे।
4. सक्षम एजेंसी न्यायिक प्रक्रिया के अनुसार संदिग्ध कार्यालयों एवं परिसरों की तलाशी लेकर रिकॉर्ड सुरक्षित करे।
5. अपराध से प्राप्त धन को इधर-उधर लगाने के संकेत मिलने पर ED धन-शोधन के पहलू की जांच करे।
6. बेहिसाबी आय अथवा आय से अधिक संपत्ति के संकेत मिलने पर आयकर विभाग परीक्षण करे।
7. संबंधित अधिकारियों, कथित बिचौलियों तथा लाभार्थी कारोबारियों के बैंक खाते और चल-अचल संपत्तियों की वैधानिक जांच हो।
8. परिजनों अथवा संबंधित संस्थाओं के नाम पर संदिग्ध निवेश और बेनामी संपत्ति के संकेतों की जांच हो।
9. जांच की आंच सेल्स कार्यालय से GM–CGM और बिलासपुर मुख्यालय तक पहुंचे।
10. किसी VIP–VVIP हस्तक्षेप के प्रमाण मिलें तो उसके नाम और भूमिका भी कानून के अनुसार सार्वजनिक की जाए।
आखिर कब तक चलेगी कोयले पर यह कथित खुली डकैती?
करोड़ों टन कोयला निकला। हजारों Delivery Order जारी हुए। लाखों वाहन कांटों और गेटों से गुजरे। यदि इसी व्यवस्था के भीतर हर टन पर कथित निजी टैक्स वसूला जाता रहा, तो सवाल सिर्फ पैसे लेने वालों पर नहीं—उन्हें नहीं पकड़ने वालों पर भी उठेगा। कोयला काला है, इसलिए उसका हिसाब भी काला रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
हर DO खुले।
हर कांटा बोले।
हर संदिग्ध बैंक खाता जांचा जाए।
हर अनुपातहीन संपत्ति का स्रोत पूछा जाए।
हर डिजिटल रिकॉर्ड सुरक्षित किया जाए।
और कथित वसूली की हिस्सेदारी जिस भी कुर्सी तक पहुंची हो—खदान के गेट से लेकर एरिया कार्यालय, GM–CGM, बिलासपुर मुख्यालय अथवा किसी प्रभावशाली संरक्षणदाता के दरवाजे तक—जांच की आंच वहीं तक जानी चाहिए। देश का कोयला किसी कथित गिरोह की निजी जागीर नहीं। ₹10–₹50 प्रति टन के आरोप सही निकले तो चारों खदानों की कालिख केवल मजदूरों के कपड़ों पर नहीं, पूरे निगरानी तंत्र के चेहरे पर दिखाई देगी।
प्रकाशन के लिए आवश्यक स्पष्टीकरण
इस समाचार में उल्लिखित ₹10–₹50 प्रति टन की वसूली, हिस्सेदारी और संरक्षण संबंधी बातें सूत्र-आधारित आरोप हैं; अभी किसी सक्षम जांच एजेंसी द्वारा प्रमाणित निष्कर्ष नहीं। ₹443.64 करोड़ से ₹2,218.20 करोड़ की तीन-वर्षीय राशि 2023-24 के उत्पादन को तीन वर्षों तक समान मानकर निकाला गया सांकेतिक परिदृश्य है। संबंधित अधिकारी, SECL प्रबंधन अथवा अन्य पक्ष तथ्यात्मक जवाब और दस्तावेज प्रस्तुत करते हैं तो उन्हें प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
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