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कोयले की कालिख, कुर्सियों की जवाबदेही: कार्रवाई की सिफारिश के बाद सरकार ने क्या किया?

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कोरबा में खुर्शीद, राजेश सिंह, संतोष सिन्हा और संतोष राठौर की भूमिका पर उठे सवालों का दस्तावेजी परीक्षण जरूरी; अशोक तीवरता समूह और इंद्रमणि समूह से जुड़े विवादित लेनदेन का हिसाब सामने आए

 

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ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क
संपादक – अब्दुल सुल्तान

 

कोरबा/रायपुर। कोयला लेवी प्रकरण में सवाल केवल उन लोगों का नहीं है जिन्होंने कथित तौर पर पैसा वसूला। सवाल उन सरकारी निर्णयों का भी है जिन्होंने वसूली का रास्ता बनाया। जब परिवहन अनुमति की व्यवस्था बदलने से लेकर अधिकारियों की भूमिका तक जांच के घेरे में हो, तब जवाबदेही कुछ गिरफ्तारियों और कुर्कियों की सुर्खियों तक सीमित कैसे रह सकती है?

देश की खनिज संपदा पर सरकारी अधिकार जनता के हित की रक्षा के लिए है। उसे किसी कथित वसूली व्यवस्था का प्रवेशद्वार बनने देना प्रशासनिक जवाबदेही का गंभीर विषय है।

सरकारी प्रक्रिया बदली—जिम्मेदारी किसकी थी?

प्रवर्तन निदेशालय की 10 दिसंबर 2022 की आधिकारिक विज्ञप्ति के अनुसार, 15 जुलाई 2020 के सरकारी आदेश से ऑनलाइन परिवहन अनुमति व्यवस्था में मैनुअल प्रक्रिया जोड़ी गई। एजेंसी का आरोप है कि कोयला उपयोगकर्ताओं को राज्य के खनिज अधिकारियों से अनापत्ति लेने की प्रक्रिया से गुजरना पड़ा और इस बदलाव का इस्तेमाल कथित अवैध वसूली के लिए हुआ। ED ने कोरबा और रायगढ़ के खनिज कार्यालयों सहित 75 से अधिक स्थानों पर तलाशी का उल्लेख किया था।

यदि सरकारी प्रक्रिया को कथित वसूली का औजार बनाया गया, तो उस प्रक्रिया को बनाने, लागू करने और उसकी निगरानी करने वालों की जिम्मेदारी कहां तय हुई?

व्यवस्था बदलने का प्रशासनिक औचित्य क्या था? किस स्तर पर अनुमोदन हुआ?

उसके परिणामों की समीक्षा किसने की?

इन सवालों का उत्तर अधिकारियों के पदनाम नहीं, आदेश और फाइल की टिप्पणियां देंगी।

दस वरिष्ठ अधिकारियों पर कार्रवाई की सिफारिश—फिर क्या हुआ?

 

आजतक की 28 सितंबर 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, कथित ₹570 करोड़ कोयला लेवी प्रकरण में ED ने राज्य सरकार से 10 वरिष्ठ IAS–IPS अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की थी। संबंधित मूल पत्र और उसके बाद की सरकारी कार्रवाई का स्वतंत्र सत्यापन अभी आवश्यक है।

सरकार स्पष्ट करे: सिफारिश प्राप्त हुई थी तो उस पर क्या निर्णय लिया गया?

किन मामलों का परीक्षण हुआ?

किसी अनुमति या निर्णय का प्रस्ताव लंबित है तो उसका कारण क्या है?

 

 

“विचाराधीन” शब्द जवाबदेही का स्थायी विश्रामगृह नहीं बन सकता। कार्रवाई हुई है तो उसका विवरण सामने आए। पर्याप्त आधार नहीं मिला है तो उस निष्कर्ष की जानकारी दी जाए। अस्पष्टता न जनता का भरोसा बचाती है, न संबंधित अधिकारियों को निष्पक्ष स्थिति देती है।

कुर्की हुई, अभियोजन हुआ—व्यवस्था में क्या सुधार हुआ?

 

12 जनवरी 2026 की ANI/Economic Times रिपोर्ट में ED के हवाले से सौम्या चौरसिया और निखिल चंद्राकर से संबंधित ₹2.66 करोड़ की आठ अचल संपत्तियों की अनंतिम कुर्की की जानकारी दी गई। एजेंसी ने जुलाई 2020 से जून 2022 के बीच ₹25 प्रति टन की दर से लगभग ₹540 करोड़ कथित अवैध संग्रह का आरोप बताया। उस तारीख तक 11 गिरफ्तारियां और 35 आरोपियों के विरुद्ध पांच अभियोजन शिकायतें दाखिल होने की जानकारी भी रिपोर्ट में थी। ये आंकड़े जनवरी 2026 की स्थिति दर्शाते हैं।

लेकिन सवाल केवल कार्रवाई की गिनती का नहीं है। जिन प्रशासनिक कमजोरियों के कथित इस्तेमाल का आरोप है, उन्हें दूर करने के लिए क्या बदला गया? अनुमति प्रक्रिया कितनी पारदर्शी हुई? आवेदन रोकने या अतिरिक्त भुगतान मांगने की शिकायत का परीक्षण कौन करता है? कुर्की की रकम सुर्खियां बन सकती है; जनता का भरोसा निष्पक्ष जांच और सुधरी व्यवस्था से बनेगा।

कोरबा के वर्तमान सवालों का अलग परीक्षण जरूरी

पुराने कोयला लेवी प्रकरण की गंभीरता अपनी जगह है। कोरबा की खदानों में वर्तमान कथित अतिरिक्त भुगतान, लोडिंग में पक्षपात और कोयले के वास्तविक गंतव्य से संबंधित आरोपों की जांच उनके अपने प्रमाणों पर होनी चाहिए।  एन. खुर्शीद, राजेश सिंह, संतोष सिन्हा और संतोष राठौर के संबंध में उठे सवालों पर संबंधित अवधि में उनकी वास्तविक जिम्मेदारी और निर्णयों का परीक्षण जरूरी है। अशोक तीवरता समूह तथा सुनील कुमार अग्रवाल के इंद्रमणि समूह से जुड़े जिन लेनदेन पर सवाल हैं, उनमें संबंधित कंपनी, खरीदार, वाहन और वास्तविक प्राप्तकर्ता की पहचान स्पष्ट की जानी चाहिए।

‘एलाओ’ से चुनिंदा कोयले तक—प्रति टन भुगतान के आरोपों का हिसाब कौन देगा?

कोरबा की खदानों से जुड़े आरोप केवल सामान्य अनियमितताओं तक सीमित नहीं हैं। आरोप है कि निकासी की अनुमति अथवा सुविधा के लिए ‘एलाओ’ के नाम पर प्रति टन अतिरिक्त रकम मांगी जाती है। वहीं चुनिंदा अच्छे कोयले की लोडिंग के लिए ₹120 से ₹450 प्रति टन तक भुगतान के दावे भी सामने रखे गए हैं। इन दरों, उनकी अवधि, संबंधित खदान और रकम लेने वाले व्यक्तियों की स्वतंत्र पुष्टि अभी आवश्यक है।

यदि ऐसा भुगतान मांगा जाता है, तो SECL स्पष्ट करे—यह किस अधिकृत शुल्क सूची में दर्ज है? इसकी रसीद कौन देता है? रकम किस खाते में जाती है? जिस भुगतान का कोई वैध आदेश या लेखा नहीं हो, उसकी जांच जरूरी है।

यह अंतर बनाए रखते हुए SECL से स्पष्ट जवाब मांगा जाना चाहिए:

 

संबंधित शिकायतों का परीक्षण हुआ या नहीं? हुआ तो किसने किया और क्या निष्कर्ष निकला?

खुर्शीद और संबंधित अधिकारियों से सवाल—प्राथमिकता का नियम क्या था?

डिलीवरी ऑर्डर के निष्पादन, वाहन प्रवेश और लोडिंग की प्राथमिकता का आधार लिखित और जांच योग्य होना चाहिए। किसी खरीदार या वाहन को विशेष सुविधा दी गई हो तो उसके पीछे वैध कारण दर्ज होना चाहिए।

SECL संबंधित अधिकारियों की भूमिका स्पष्ट करते हुए बताए:

 

अधिकृत शुल्क और भुगतान की व्यवस्था क्या थी?
डिलीवरी ऑर्डर तथा वाहनों की प्राथमिकता किस नियम से तय हुई?
कथित अतिरिक्त वसूली की शिकायत पर क्या कार्रवाई हुई?
संबंधित निर्णयों में हितों के टकराव की जांच हुई या नहीं?

कुर्सी अधिकार देती है, सवालों से छूट नहीं। आरोप गलत हैं तो रिकॉर्ड से खारिज कीजिए; सही पाए जाएं तो जिम्मेदारी तय कीजिए। कारोबारियों से सवाल—कोयला निकला कितना, पहुंचा कहां?

अशोक तीवरता समूह और इंद्रमणि समूह से संबंधित विवादित लेनदेन का परीक्षण केवल बिक्री के कागज देखकर पूरा नहीं होगा। डिलीवरी ऑर्डर, खदान की तौल, वाहन यात्रा, वास्तविक गंतव्य और वहां प्राप्त मात्रा का मिलान जरूरी है।कागज पर दर्ज गंतव्य और वाहन का वास्तविक रास्ता अलग मिले तो उसका कारण क्या था? मात्रा या ग्रेड में अंतर हो तो जिम्मेदारी किसकी होगी? किसी मध्यस्थ को भुगतान हुआ हो तो वह किस सेवा के बदले और किस दस्तावेज के आधार पर हुआ? कोयले की कहानी दफ्तर में बने बिल से शुरू होकर वास्तविक प्राप्तकर्ता तक पहुंचनी चाहिए। बीच की कड़ियां छोड़ी गईं तो जांच अधूरी रहेगी।

SECL मुख्यालय भी निगरानी का हिसाब दे

स्थानीय कर्मचारियों से स्पष्टीकरण लेकर उच्च प्रबंधन की जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती। शिकायतों का स्वतंत्र परीक्षण, बिक्री और निकासी की निगरानी तथा रिकॉर्ड सुरक्षित रखने की व्यवस्था का जवाब मुख्यालय को भी देना होगा।

क्या जांच में उन्हीं व्यक्तियों की रिपोर्ट पर निर्भर किया गया जिनकी भूमिका पर सवाल थे?
क्या खरीदार के दस्तावेज और वास्तविक प्राप्तकर्ता का मिलान हुआ?
किन आरोपों को गलत पाया गया, किनकी पुष्टि हुई और कौन-से प्रश्न अभी अनुत्तरित हैं?

 

“सब नियमानुसार है” कहना आसान है। किस नियम के अनुसार, किस रिकॉर्ड के आधार पर और किस अधिकारी के सत्यापन से—असली जवाब यहां से शुरू होता है।

सुशासन का दावा है तो निर्णय सामने आएं

सरकार पुराने कोयला लेवी प्रकरण में कार्रवाई संबंधी सिफारिश की स्थिति स्पष्ट करे। SECL वर्तमान शिकायतों पर स्वतंत्र परीक्षण कराए और संबंधित डिलीवरी ऑर्डर, तौल रिकॉर्ड, गेट लॉग, उपलब्ध CCTV तथा भुगतान दस्तावेज सुरक्षित करे। आरोपों का सामना कर रहे अधिकारियों और कारोबारियों को अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर मिले। देश की खदानें किसी की निजी जागीर नहीं हैं। जनता को प्रमाण सहित हिसाब चाहिए—कितना कोयला निकला, कहां पहुंचा, किसने निर्णय लिया और शिकायत पर क्या कार्रवाई हुई। कोयले की कालिख के बीच जवाबदेही भी गायब हो जाए, तो नुकसान केवल राजस्व का नहीं, शासन की विश्वसनीयता का होता है। अब संबंधित पक्ष दस्तावेज सहित जवाब दें।

संपादकीय स्पष्टता: पुराने ED प्रकरण और वर्तमान स्थानीय आरोप अलग विषय हैं; इनके बीच संबंध स्वतंत्र रूप से प्रमाणित नहीं हुआ है। जांच, सिफारिश अथवा अनंतिम कुर्की दोषसिद्धि नहीं है। वर्तमान स्थानीय आरोपों पर स्वतंत्र सत्यापन और संबंधित पक्षों के जवाब आवश्यक हैं। प्राप्त स्पष्टीकरण को उचित प्रमुखता दी जाएगी।

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