खदान से निकला ‘स्टीम’, डिपो में हुआ गायब—प्लांट पहुंचा चूरा!

कोरबा के काले हीरे पर ‘काली मंडी’ का कथित खूनी पंजा—₹150 प्रति टन में कोयले की किस्म बदलने का खेल?
Gevra–Dipka सहित विभिन्न खदानों से रोज करीब 40 गाड़ियां बंगाल–बनारस की ओर रवाना होने का दावा; रास्ते में डिपो पर अच्छा कोयला उतारकर मिश्रित चूरा भरने की सनसनीखेज सूचना
अब कारोबारियों के बाद SECL अधिकारियों की बारी!
जल्द महाखुलासा—नाम और ओहदे से हटेगा पर्दा; काली कुर्सियों पर बैठे कथित किरदारों के चेहरे से उतरने वाला है नकाब!
कोरबा | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क खदान से गाड़ी निकली तो उसमें चमकता हुआ बेहतर ‘स्टीम कोयला’ था। कागज पर खरीदार तय था, रास्ता तय था और प्लांट भी तय था। लेकिन सूत्रों का आरोप है कि वाहन प्लांट पहुंचने से पहले तथाकथित कोल डिपो में घुसा—वहां अच्छा कोयला उतर गया और उसकी जगह मिश्रित चूरा कोयला भर दिया गया!
वाहन वही।
नंबर वही।
कागज वही।
गंतव्य वही। लेकिन रास्ते में कोयला बदल गया!
यदि यह सूचना सही निकली तो यह साधारण कोयला चोरी नहीं, बल्कि खदान से डिपो और डिपो से उद्योग की भट्ठी तक बिछाया गया कथित “काला कन्वेयर बेल्ट” है—जिसमें सरकारी खदान का अच्छा कोयला निजी बाजार की तिजोरी में और घटिया मिश्रण प्लांट की आग में झोंका जा रहा है।
सवाल है—इतने बड़े पैमाने पर कोयले की कथित अदला-बदली किसकी शह पर हो रही है? खदान का पहरा, डिजिटल कांटा, GPS, RFID, गेटपास और अधिकारियों की लंबी फौज आखिर किस काम की है? ₹150 प्रति टन—कोयले की कीमत या सिस्टम की बोली?
सूत्रों ने दावा किया है कि Gevra–Dipka सहित कोरबा क्षेत्र की विभिन्न खदानों से बेहतर गुणवत्ता का कथित ‘स्टीम कोयला’ लोड कराने के लिए ₹150 प्रति टन तक की अवैध रकम ली जा रही है। आरोप है कि प्रतिदिन करीब 40 गाड़ियां बंगाल और बनारस की दिशा में भेजी जा रही हैं। यदि एक वाहन में औसतन 25–30 टन कोयला माना जाए तो प्रतिदिन लगभग 1,000–1,200 टन परिवहन बैठता है।
कथित ₹150 प्रति टन के हिसाब से रकम लगभग—
– ₹1.50 लाख से ₹1.80 लाख प्रतिदिन;
– ₹45 लाख से ₹54 लाख प्रतिमाह;
– ₹5.47 करोड़ से ₹6.57 करोड़ प्रतिवर्ष तक पहुंच सकती है।
यह गणना सूत्रों के आरोप और अनुमानित वाहन क्षमता पर आधारित है—इसे प्रमाणित घोटाले की राशि नहीं माना जा सकता। लेकिन यदि आरोप सही हैं तो खदान में कोयला नहीं, हर टन के साथ सिस्टम की नीयत तौली जा रही है। खदान को चूना, प्लांट को चूरा—बीच वालों ने निगल लिया ‘स्टीम’?
सूत्रों द्वारा बताई गई कथित प्रक्रिया किसी संगठित अपराध की पटकथा जैसी है—
1. उद्योग अथवा खरीदार के दस्तावेज पर खदान से बेहतर स्टीम कोयला लोड कराया जाता है।
2. वाहन घोषित प्लांट की ओर जाने के बजाय पहले चुनिंदा कोल डिपो पहुंचता है।
3. डिपो में महंगा और बेहतर कोयला उतारकर अलग कर लिया जाता है।
4. उसी वाहन में सस्ता, निम्न गुणवत्ता वाला अथवा अलग-अलग स्रोतों का मिश्रित चूरा भरा जाता है।
5. बदला हुआ माल मूल दस्तावेज के सहारे संबंधित प्लांट तक पहुंचा दिया जाता है।
6. डिपो में उतारा गया अच्छा कोयला कथित रूप से अधिक कीमत पर दूसरे बाजार में खपा दिया जाता है।
अर्थात एक खेप—लेकिन कथित कमाई कई बार!
पहली कमाई बेहतर कोयला लोड कराने के कथित ₹150 प्रति टन से।
दूसरी कमाई स्टीम कोयले को डिपो में उतारकर ऊंची कीमत पर बेचने से।
तीसरी कमाई उसकी जगह सस्ता मिश्रित चूरा प्लांट भेजने से।
यह कोयले की अदला-बदली है या राष्ट्रीय संपत्ति का कथित चीरहरण?
लिंकेज प्लांटों के नाम—माल की पहचान रास्ते में बदल गई?
सूत्रों ने दावा किया है कि रायपुर के कुछ बड़े उद्योग घराने अपने लिंकेज अथवा आवंटन-पत्रों का कथित रूप से व्यापार करवा रहे हैं और बदले में मिश्रित चूरा कोयला खरीद रहे हैं। प्राप्त सूचना में हीरा ग्रुप, वंदना समूह तथा चार अन्य प्रभावशाली प्लांटों का उल्लेख किया गया है। ग्राम यात्रा स्पष्ट करता है कि इन उद्योगों की संलिप्तता अभी स्वतंत्र दस्तावेजों से प्रमाणित नहीं हुई है। लेकिन आरोप इतने गंभीर हैं कि संबंधित प्लांटों को चुप्पी की दीवार के पीछे छिपने के बजाय रिकॉर्ड सामने रखना चाहिए।
अगर उन्हें बेहतर स्टीम कोयले के बदले घटिया मिश्रित माल मिला तो उन्होंने खेप अस्वीकार क्यों नहीं की?
यदि वाहन रास्ता बदलकर डिपो पहुंचा तो GPS deviation पर आपत्ति क्यों नहीं हुई?
यदि खदान की GCV और प्लांट में प्राप्त कोयले की GCV अलग थी तो शिकायत कहां है?
यदि लगातार चूरा पहुंचता रहा तो plant laboratory, purchase department और gate management ने आंखें क्यों बंद रखीं?
हीरा–वंदना और चार अन्य प्लांटों की ‘मौन सहमति’ का आरोप
सूत्रों ने दावा किया है कि रायपुर के कुछ बड़े उद्योग घराने अपने लिंकेज अथवा आवंटन-पत्रों का कथित रूप से व्यापार करवा रहे हैं और बदले में मिश्रित चूरा कोयला खरीद रहे हैं। सूचना में हीरा ग्रुप, वंदना समूह और चार अन्य प्रभावशाली प्लांटों का नाम लिया गया है।
इन उद्योगों की संलिप्तता अभी स्वतंत्र रूप से प्रमाणित नहीं है। लेकिन यदि बेहतर स्टीम कोयले के दस्तावेज पर लगातार मिश्रित चूरा प्लांट पहुंचता रहा और उसे बिना आपत्ति स्वीकार किया गया, तो प्लांट प्रबंधन की भूमिका तथा कथित ‘मौन सहमति’ की जांच अनिवार्य हो जाती है।
क्या ‘मौन सहमति’ के बिना चल सकता है इतना बड़ा खेल?
एक-दो वाहन किसी व्यवस्था को धोखा दे सकते हैं, लेकिन लंबे समय तक हजारों टन कोयले की कथित अदला-बदली बिना कई दरवाजों की मौन सहमति के कैसे चल सकती है?
प्लांट में वाहन प्रवेश करता है। वजन होता है। नमूना लिया जाता है। गुणवत्ता जांच होती है। स्टॉक दर्ज होता है। उत्पादन और ईंधन खपत का हिसाब बनता है। फिर बेहतर स्टीम कोयले के दस्तावेज पर मिश्रित चूरा पहुंचा तो—
प्लांट अनजान था या जानकर अनजान बना रहा?
सूत्रों का आरोप है कि संबंधित प्लांटों की कथित मौन सहमति इस नेटवर्क की सबसे मजबूत ढाल है। इसकी पुष्टि तभी हो सकती है जब पिछले तीन वर्षों की gate-entry, sampling report, GCV, rejected consignments, stock register और coal-consumption ratio का स्वतंत्र फोरेंसिक ऑडिट कराया जाए।
चार नाम—कथित कोयला नेटवर्क के चार पड़ाव?
सूत्रों ने जांच के लिए निम्न नामों अथवा उनसे संबद्ध बताए जा रहे प्रतिष्ठानों का उल्लेख किया है—
– अरशद अली से संबद्ध बताया गया कोल डिपो;
– अमित अग्रवाल से संबद्ध बताया गया कोल डिपो;
– वीरेंद्र से संबद्ध बताया गया कोल बेनीफिकेशन प्रतिष्ठान;
– मोहन अग्रवाल से संबद्ध बताया गया कोल डिपो।
सूत्रों ने अमित अग्रवाल और मोहन अग्रवाल से जुड़े कथित कारोबार में सम्मिलित रूप से करीब 10,000 MT प्रतिदिन संचालन का अलग दावा भी किया है। यह आंकड़ा प्रतिदिन 40 वाहनों के दावे से मेल नहीं खाता। 25–30 टन क्षमता के हिसाब से 10,000 MT के लिए लगभग 333–400 ट्रकों की जरूरत होगी। इसलिए यह जांच आवश्यक है कि 10,000 MT में कई खदानों, पुराने स्टॉक, रेल परिवहन, अलग खरीदारों अथवा दूसरे कारोबार की मात्रा शामिल है या नहीं। इस भारी अंतर को छिपाना नहीं, उजागर करना जरूरी है। क्योंकि झूठा आंकड़ा असली घोटाले को भी कमजोर कर सकता है। इन नामों की सटीक कानूनी इकाई, GSTIN, स्वामित्व, खनिज अनुमति, भंडारण क्षमता और स्थान की स्वतंत्र पुष्टि अभी शेष है। समान नाम वाले किसी निर्दोष व्यक्ति या प्रतिष्ठान को आरोपों से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। संबंधित पक्षों का जवाब प्राप्त होने पर प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
अब डिपो की धूल से निकलेगा दस्तावेजों का तूफान!
जांच एजेंसियां कथित डिपो के केवल सात दिन के रिकॉर्ड जब्त कर लें—
– प्रवेश और निकासी रजिस्टर;
– दोनों समय की कांटा पर्चियां;
– वाहनवार CCTV फुटेज;
– खरीद-बिक्री के GST चालान;
– स्टॉक रजिस्टर;
– खनिज परिवहन अनुमति;
– बिजली की खपत;
– लोडर/JCB परिचालन रिकॉर्ड;
– मोबाइल लोकेशन और FASTag डेटा।
यदि खदान से निकला वही वाहन डिपो में घुसा, वजन बदला और बाद में प्लांट पहुंचा तो कथित खेल की पूरी नस पकड़ में आ सकती है। अब SECL अधिकारियों की कुर्सियों पर पड़ेगी दस्तावेजों की बिजली! यह खेल यदि वास्तव में चल रहा है तो सवाल केवल डिपो और ट्रांसपोर्टर का नहीं है। खदान से एक वाहन तभी निकल सकता है जब लोडिंग, ग्रेड, वजन, DO और गेटपास की श्रृंखला पूरी हो।
अब ग्राम यात्रा की पड़ताल पहुंचेगी—
– रोड-सेल्स प्रभारी तक;
– सेल्स अधिकारी तक;
– स्टॉक और लोडिंग प्रभारी तक;
– तकनीकी निरीक्षक तक;
– कांटा और गेट प्रभारी तक;
– कोलियरी प्रबंधन तक;
– उप-महाप्रबंधक तक;
– महाप्रबंधक एवं खनन प्रबंधन तक;
– नोडल और क्षेत्रीय कार्यालय तक।
किसने बेहतर कोयले की लोडिंग कराई?
किसने ग्रेड प्रमाणित किया?
किसके डिजिटल हस्ताक्षर से DO आगे बढ़ा?
किसने वाहन को गेट से छोड़ा?
किसके कार्यकाल में चुनिंदा खरीदारों का उठाव बढ़ा?
और किस ऊंची कुर्सी की कथित छाया में नीचे का पूरा तंत्र बेखौफ चलता रहा?
अब नाम भी आएंगे—ओहदे भी बताए जाएंगे!
ग्राम यात्रा किसी निर्दोष अधिकारी का मीडिया ट्रायल नहीं करेगा। लेकिन सरकारी कुर्सी पर बैठकर लिए गए फैसलों को गोपनीयता की चादर में नहीं छिपने दिया जाएगा। पदस्थापना आदेश, ड्यूटी रोस्टर, DO, गेटपास, कांटा पर्ची, डिजिटल हस्ताक्षर और वाहन रिकॉर्ड मिलने के बाद संबंधित अधिकारियों के—
नाम
ओहदे
कार्यकाल
आदेश
हस्ताक्षर
और कथित भूमिका
जनता के सामने रखी जाएगी।
हर संबंधित अधिकारी, कारोबारी और प्लांट से जवाब मांगा जाएगा। जवाब प्रकाशित होगा—लेकिन चुप्पी को क्लीन चिट नहीं माना जाएगा। SECL के अधिकारियों के चेहरे से हटने वाला है नकाब! जिन कुर्सियों ने फाइलों की आड़ में खुद को अदृश्य समझ लिया है, उनके सामने अब दस्तावेजों का आईना रखा जाएगा।
DO बोलेगा।
कांटा बोलेगा।
GPS बोलेगा।
CCTV बोलेगा।
डिपो का स्टॉक बोलेगा।
प्लांट की प्रयोगशाला रिपोर्ट बोलेगी।
और जब ये रिकॉर्ड एक साथ बोलेंगे तो बड़े से बड़ा पद और चमकदार से चमकदार चेहरा कोयले की कालिख के पीछे छिप नहीं पाएगा। काला हीरा देश का—कथित मलाई किसकी?
SECL बताए—
– Gevra–Dipka सहित खदानों से प्रतिदिन कितने रोड-सेल वाहन निकल रहे हैं?
– बेहतर ग्रेड के कोयले की लोडिंग किन खरीदारों को हुई?
– वाहन निर्धारित गंतव्य तक पहुंचे या डिपो में रुके?
– खदान और प्लांट की GCV रिपोर्ट में कितना अंतर है?
– किन अधिकारियों ने इन खेपों को सत्यापित किया?
– कथित ₹150 प्रति टन की शिकायत पर क्या जांच हुई?
– बताए गए डिपो और प्लांटों के रिकॉर्ड का मिलान कब होगा?
यदि सब कुछ पाक-साफ है तो रिकॉर्ड सार्वजनिक करने में डर कैसा?
और यदि रिकॉर्ड खुलते ही कुर्सियों के नीचे कंपन शुरू हो जाए तो समझ लेना चाहिए—खदानों के ऊपर उड़ता काला धुआं केवल कोयले का नहीं था।
जल्द महाखुलासा!
कारोबारियों के बाद अब SECL अधिकारियों की बारी!
नाम और ओहदे से हटेगा पर्दा!
खदान की निचली चौकी से ऊंची कुर्सी तक—किसके आदेश से खुलता था रास्ता और किसके संरक्षण में बदलता था कोयला?
उतरने वाला है चेहरों से नकाब! खदान से निकला स्टीम कहां गया? डिपो में किसने उतारा? प्लांट ने चूरा क्यों स्वीकार किया। और कथित ₹150 की सीढ़ी किस कुर्सी तक पहुंची?
दस्तावेजों का धमाका अभी बाकी है…
नामों का खुलासा अभी बाकी है…
काली मंडी का पूरा हिसाब अभी बाकी है!
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क्रमशः—नाम, ओहदे और दस्तावेजों के साथ जल्द महाखुलासा
संपादक – अब्दुल सुल्तान
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