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जिंदल प्लांट में खौलता पानी बना काल—ठेका श्रमिक गंभीर रूप से झुलसा!

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SMS-2 के Slag Pot Carrier क्षेत्र में हादसा; सोहन साहू को एयरलिफ्ट करना पड़ा—सुरक्षा इंतजाम थे तो मजदूर खौलते खतरे की चपेट में कैसे आया?

 

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घटना की परिस्थितियों पर प्रबंधन की सार्वजनिक चुप्पी; तापमान, सुरक्षा उपकरण, कार्य-अनुमति और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की हो स्वतंत्र जांच

 

रायगढ़ | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क रायगढ़ जिले के पतरापाली स्थित जिंदल स्टील एंड पावर लिमिटेड के संयंत्र में कथित रूप से गर्म पानी की चपेट में आकर एक ठेका श्रमिक गंभीर रूप से झुलस गया। घायल श्रमिक की हालत इतनी गंभीर बताई गई कि प्राथमिक उपचार के बाद उसे एयरलिफ्ट करना पड़ा।  उपलब्ध समाचार रिपोर्टों के अनुसार घटना 9 सितंबर 2026 की शाम लगभग 6:30 बजे संयंत्र के SMS-2 स्थित Slag Pot Carrier क्षेत्र में हुई। घायल श्रमिक की पहचान सोहन साहू, उम्र लगभग 45 वर्ष, निवासी जांजगीर जिला के रूप में बताई गई है। हादसे के बाद उन्हें जिंदल फोर्टिस अस्पताल ले जाया गया और बाद में उच्च उपचार के लिए एयरलिफ्ट किया गया। दो स्रोत उन्हें भिलाई भेजे जाने की जानकारी देते हैं। “Hamar Bani की रिपोर्ट”

प्लांट में सुरक्षा का कवच था या श्रमिक सीधे खौलते खतरे के सामने था?

यह केवल गर्म पानी से झुलसने की सामान्य घटना नहीं मानी जा सकती। औद्योगिक संयंत्र के SMS-2 जैसे अत्यधिक जोखिम वाले क्षेत्र में गर्म द्रव आखिर किस उपकरण, पाइपलाइन अथवा प्रक्रिया से बाहर आया? उसका तापमान और दबाव कितना था? रिसाव अचानक हुआ या पहले से कोई तकनीकी संकेत मिल रहा था?

सबसे बड़ा सवाल

श्रमिक उस समय किस काम पर लगाया गया था और उसके पास कौन-कौन से सुरक्षा उपकरण थे?

क्या सोहन साहू को heat-resistant PPE, face shield, gloves, gumboots और protective suit उपलब्ध कराया गया था? क्या क्षेत्र को काम से पहले isolate किया गया? क्या Lockout-Tagout अथवा work permit जारी हुआ? क्या supervisor मौके पर उपस्थित था?

यदि सुरक्षा की पूरी व्यवस्था मौजूद थी तो एक श्रमिक इतनी बुरी तरह कैसे झुलसा कि उसे एयरलिफ्ट करना पड़ा?  ठेका श्रमिक की जान सस्ती और उत्पादन सबसे जरूरी?

औद्योगिक हादसों में अक्सर घायल व्यक्ति ठेका श्रमिक निकलता है। दुर्घटना के बाद अस्पताल पहुंचाना आवश्यक मानवीय और कानूनी जिम्मेदारी है, लेकिन असली प्रश्न दुर्घटना से पहले की सुरक्षा का है। एयरलिफ्ट उपचार का प्रबंध सराहनीय हो सकता है, पर वह सुरक्षा व्यवस्था की संभावित विफलता का उत्तर नहीं है।

सवाल यह नहीं कि हादसे के बाद हेलिकॉप्टर कितनी जल्दी उड़ा—सवाल यह है कि हादसे से पहले सुरक्षा तंत्र कहां खड़ा था?

क्या संबंधित ठेका एजेंसी ने श्रमिक को विधिवत प्रशिक्षण दिया था? क्या उसकी मेडिकल फिटनेस, safety induction और जोखिमपूर्ण कार्य की अनुमति रिकॉर्ड में मौजूद है? क्या वह उसी कार्य के लिए प्रशिक्षित था जिस दौरान हादसा हुआ?

Slag Pot Carrier क्षेत्र में ‘गर्म पानी’ कहां से आया?

प्रारंभिक रिपोर्टों में हादसे का कारण गर्म पानी बताया गया है, लेकिन तकनीकी स्रोत स्पष्ट नहीं किया गया। प्रबंधन को बताना चाहिए—

गर्म द्रव किस लाइन, टैंक अथवा उपकरण से निकला?
– क्या पाइप या वाल्व फटा था?
– क्या maintenance अथवा cleaning operation चल रहा था?
– तापमान और दबाव का रिकॉर्ड क्या है?
– घटना से पहले alarm अथवा leakage complaint दर्ज हुई थी?
– CCTV में घटना कैद है या नहीं?
– मशीन/लाइन को तत्काल सील कर जांच के लिए सुरक्षित किया गया या उत्पादन फिर शुरू कर दिया गया?

जब तक तकनीकी जांच सामने नहीं आती, “गर्म पानी से झुलसना” केवल घटना का सतही वर्णन है—कारण नहीं। अस्पताल पर स्पष्टता जरूरी—भिलाई या रायपुर? Hamar Bani और Fatafat News की रिपोर्टों में घायल को भिलाई भेजे जाने की जानकारी है, जबकि एक अन्य स्थानीय समाचार शीर्षक में रायपुर एयरलिफ्ट किए जाने की बात कही गई है। यह विरोधाभास बताता है कि प्रबंधन अथवा प्रशासन की ओर से स्पष्ट आधिकारिक मेडिकल बुलेटिन जारी होना चाहिए।

परिवार की निजता का सम्मान रखते हुए इतना सार्वजनिक किया जाना आवश्यक है—

– घायल का उपचार किस अस्पताल में चल रहा है?
– उसकी वर्तमान स्थिति क्या है?
– शरीर का कितना हिस्सा प्रभावित हुआ?
– उपचार का पूरा खर्च कौन उठा रहा है?
– परिवार को मुआवजा और आय-सहायता क्या दी गई?

प्लांट प्रबंधन सार्वजनिक करे जांच और जवाबदेही

सार्वजनिक खोज में घटना पर JSPL प्रबंधन, पुलिस तथा औद्योगिक स्वास्थ्य एवं सुरक्षा विभाग का विस्तृत आधिकारिक बयान नहीं मिला। यह भी स्पष्ट नहीं हुआ कि दुर्घटना की वैधानिक सूचना संबंधित विभाग को कब भेजी गई और किसी निरीक्षक ने घटनास्थल की जांच की या नहीं।

ग्राम यात्रा मांग करता है कि—

1. घटनास्थल का स्वतंत्र तकनीकी निरीक्षण कराया जाए।
2. CCTV, control-room log और work permit सुरक्षित किए जाएं।
3. पाइपलाइन/वाल्व की maintenance history जब्त की जाए।
4. घायल तथा प्रत्यक्षदर्शी श्रमिकों के बयान दर्ज हों।
5. ठेका कंपनी का नाम और अनुबंध सार्वजनिक किया जाए।
6. PPE issue register तथा safety-training record की जांच हो।
7. जिम्मेदार supervisor और अधिकारियों की भूमिका तय की जाए।
8. घायल श्रमिक के उपचार, वेतन और मुआवजे की लिखित व्यवस्था सामने आए।

धुआं चिमनियों से निकला—सवाल सुरक्षा व्यवस्था पर जल रहा है!

किसी संयंत्र की सुरक्षा का मूल्यांकन उसके चमकदार हेलमेट, बड़े नारों और पुरस्कारों से नहीं, बल्कि इस बात से होता है कि सबसे निचले स्तर पर काम करने वाला ठेका श्रमिक कितनी सुरक्षा के साथ घर लौटता है।

सोहन साहू जिंदगी की लड़ाई लड़ रहे हैं। अब कंपनी, ठेका एजेंसी और जिम्मेदार विभाग को बताना होगा

यह अपरिहार्य दुर्घटना थी या रोकी जा सकने वाली सुरक्षा चूक?

यदि उपकरण में खराबी थी तो समय पर मरम्मत क्यों नहीं हुई? यदि प्रक्रिया गलत थी तो अनुमति किसने दी? यदि PPE नहीं था तो काम किसने शुरू कराया? और यदि सब कुछ नियमानुसार था तो श्रमिक इतनी गंभीर रूप से कैसे झुलसा?

मजदूर अस्पताल में—जिम्मेदारी किसकी फाइल में?

हादसे के बाद घायल को एयरलिफ्ट कर देना खबर का अंत नहीं है। असली खबर तब पूरी होगी जब कारण सामने आएगा, जिम्मेदारी तय होगी और यह सुनिश्चित किया जाएगा कि किसी दूसरे श्रमिक को अगली पाली में उसी खौलते खतरे के सामने न भेजा जाए। ग्राम यात्रा इस मामले में प्रबंधन, ठेका एजेंसी और औद्योगिक सुरक्षा विभाग का पक्ष प्राप्त होने पर प्रमुखता से प्रकाशित करेगा।

संपादक – अब्दुल सुल्तान

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