बॉक्साइट के नीचे दब गई आदिवासियों की दुनिया?

BALCO–VEDANTA की बोदई-दलदली खदान पर अंतरराष्ट्रीय दस्तावेज़ के विस्फोटक आरोप!
तीन आदिवासी गांव नष्ट होने का दावा, 112 लोगों की जमीन गई—रिपोर्ट में सिर्फ 50 को मुआवजा मिलने का उल्लेख!
बैगा परिवारों की जमीन, फसल और पशुधन छूटने तक का आरोप—करीब दो दशक बाद सवाल: आखिर पुनर्वास की पूरी फाइल कहां है?
विशेष खोजी रिपोर्ट | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज़ नेटवर्क
कोरबा/कबीरधाम। छत्तीसगढ़ की धरती से निकला बॉक्साइट BALCO के उद्योग तक पहुंचा, लेकिन जिन पहाड़ियों और जमीनों के नीचे यह खनिज था, वहां रहने वाले आदिवासी परिवारों के हिस्से में आखिर क्या आया?
विकास… या विस्थापन?
मुआवजा… या अपनी पुश्तैनी जमीन छोड़ने की मजबूरी?
पुनर्वास… या उजड़े गांवों की कहानी?
करीब दो दशक पुराना एक अंतरराष्ट्रीय दस्तावेज़ आज भी ऐसे सवाल छोड़ता है, जिनका जवाब वर्तमान सरकारी और कंपनी रिकॉर्ड से खोजा जाना चाहिए।
Norway के Government Pension Fund–Global से जुड़े Council on Ethics की 2007 की रिपोर्ट में Vedanta/BALCO की छत्तीसगढ़ स्थित Bodai-Daldali bauxite mining operation को लेकर गंभीर आरोप दर्ज किए गए थे। Council ने अपने आकलन में विशेष रूप से आदिवासियों के कथित जबरन विस्थापन के मुद्दे को केंद्र में रखा था।
2005 में ड्रिल… 2006 में खदान—फिर गांवों का क्या हुआ?
रिपोर्ट के अनुसार 2005 में Bodai-Daldali में बॉक्साइट के लिए परीक्षण ड्रिलिंग हुई और 2006 के मध्य तक नई खदान संचालन में आ गई। दस्तावेज़ लगभग 20 वर्ग किलोमीटर के लीज क्षेत्र का उल्लेख करता है और कहता है कि उस पठारी क्षेत्र में चार आदिवासी गांव मौजूद थे।
इसके बाद रिपोर्ट में जो आरोप दर्ज हैं, वे बेहद गंभीर हैं।
बैगा परिवारों को घर मिला… लेकिन जमीन, फसल और पशुधन?
Council की रिपोर्ट के अनुसार बैगा परिवारों को BALCO द्वारा बनाए गए मकान दिए गए, लेकिन आरोप है कि विस्थापन के दौरान उन्हें कृषि भूमि, फसल और पशुधन पीछे छोड़ना पड़ा। रिपोर्ट में यह भी दर्ज है कि अप्रैल से जुलाई 2005 के बीच 20 परिवारों को Bodai-Daldali से हटाए जाने की सूचना मिली थी।
यानी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि—
“मकान दिया या नहीं?”
असली सवाल है—
जिस आदिवासी परिवार की जिंदगी ही जमीन, खेती, जंगल और पशुधन पर निर्भर थी, उसकी आजीविका का विकल्प क्या दिया गया?
तीन गांव ‘नष्ट’—चौथे से भी विस्थापन?
रिपोर्ट का सबसे सनसनीखेज हिस्सा इसके बाद आता है।
Council को उपलब्ध कराई गई जानकारी के मुताबिक फरवरी 2007 तक चार में से तीन गांव— केसरा (Kesra), सपनादर (Sapnadar) और बरीमा (Bareema) के नष्ट हो जाने की बात कही गई, जबकि कुदरीडीह (Kudaridih) में आदिवासियों को हटाए जाने अथवा हटाने की प्रक्रिया का उल्लेख है।
अगर यह रिकॉर्ड सही है तो प्रश्न बहुत बड़ा है—
खदान बची… उत्पादन बढ़ा… लेकिन गांव कहां गए?
और यदि बाद में इन गांवों का विधिवत पुनर्वास किया गया, तो उसकी पूरी जानकारी आज सार्वजनिक क्यों न की जाए?
112 ने जमीन गंवाई—मुआवजा सिर्फ 50 को?
Council की रिपोर्ट में दावा किया गया कि 112 व्यक्तियों ने अपनी जमीन गंवाई, जबकि उस समय उपलब्ध जानकारी में केवल 50 लोगों को कंपनी से मुआवजा मिला प्रतीत होता था। यहां सावधानी जरूरी है—इस पुराने आंकड़े का अर्थ यह नहीं कि बाकी लोगों को बाद में कभी भुगतान नहीं हुआ। लेकिन यही तो आज की जांच का सबसे बड़ा विषय है।
112 में आखिर कितनों को अंतिम रूप से मुआवजा मिला?
कितनों को कृषि भूमि मिली?
कितनों का पुनर्वास हुआ?
और कितने परिवार सरकारी रिकॉर्ड में ही नहीं आए?
तत्कालीन मुख्यमंत्री की टिप्पणी भी रिपोर्ट में दर्ज
Council के दस्तावेज़ में तत्कालीन छत्तीसगढ़ मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के हवाले से भी प्रभावित परिवारों की परिस्थितियों को लेकर गंभीर चिंता का उल्लेख है। रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने शीघ्र एवं उचित पुनर्वास तथा पर्याप्त और सुरक्षित कृषि एवं आवासीय भूमि उपलब्ध कराने की आवश्यकता जताई थी।
अब करीब दो दशक बाद सवाल है—
उस चिंता के बाद जमीन पर हुआ क्या?
पुनर्वास पूरा हुआ?
कृषि भूमि मिली?
मुआवजा पूरा मिला?
या फाइलें आगे बढ़ीं और आदिवासी परिवार पीछे छूट गए?
कहानी 2007 में खत्म नहीं होती!
इस प्रकरण को और गंभीर बनाने वाला तथ्य यह है कि बाद की सामग्री में भी Bodai-Daldali के राहत एवं पुनर्वास पर सवाल दिखाई देते हैं।
एक बाद के अध्ययन में उल्लेख है कि भारत सरकार के पर्यावरण मंत्रालय की Expert Appraisal Committee के संदर्भ में Bodai-Daldali के प्रभावित परिवारों के पुनर्वास का मुद्दा आगे भी बना रहा। एक स्वतंत्र अध्ययन ने Council on Ethics की 2007 और बाद की समीक्षा का उल्लेख करते हुए कहा कि इस खदान का R&R विवाद लंबे समय तक बना रहा।
वहीं Vedanta ने Council के निष्कर्षों से असहमति जताते हुए कहा था कि विस्थापन स्वैच्छिक था और मुआवजा दर Council के आकलन से अधिक थी। इसलिए इस कहानी में कंपनी का पक्ष भी रिकॉर्ड पर मौजूद है और उसे भी सामने रखा जाना जरूरी है।
अब ग्राम यात्रा पूछता है—फाइल खोलिए सरकार!
लगभग 20 साल पुराने आरोपों को आज केवल सनसनी बनाकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं होगा।
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज़ नेटवर्क की मांग है कि संबंधित विभागों और BALCO/Vedanta के उपलब्ध अभिलेखों से स्पष्ट किया जाए कि Bodai-Daldali में कुल कितने परिवार प्रभावित हुए, कितने बैगा परिवारों का विस्थापन हुआ, किसे कितनी जमीन और राशि मिली, पुनर्वास कहां हुआ और आज उन परिवारों की स्थिति क्या है।
क्योंकि कंपनी का पक्ष और Council का निष्कर्ष अलग-अलग तस्वीर पेश करते हैं। इसलिए फैसला आरोपों से नहीं—रिकॉर्ड से होना चाहिए।
पहाड़ से बॉक्साइट निकल गया…
लेकिन आदिवासी के हिस्से का न्याय निकला या नहीं?
यही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा सवाल है।
बोदई-दलदली की फाइलें यदि आज पूरी तरह खुलती हैं तो शायद पता चले कि छत्तीसगढ़ के औद्योगिक विकास की चमक के पीछे जिन आदिवासी परिवारों ने अपनी जमीन छोड़ी—उनसे किए गए पुनर्वास और मुआवजे के वादे आखिर कितने पूरे हुए।
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज़ नेटवर्क इस मामले में BALCO–Vedanta, जिला प्रशासन तथा संबंधित राज्य एवं केंद्रीय विभागों का पक्ष आमंत्रित करता है। पुराने आरोपों के बाद हुए पुनर्वास, मुआवजे और वर्तमान स्थिति से संबंधित दस्तावेज़ उपलब्ध कराए जाने पर उन्हें भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
ग्राम यात्रा की अगली पड़ताल
“112 से 261 परिवार तक आंकड़े क्यों बदले? Bodai-Daldali के विस्थापन और पुनर्वास की पूरी फाइल में आखिर क्या है?”
विशेष खोजी रिपोर्ट | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज़ नेटवर्क
Live Cricket Info



