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पूर्व राजस्व मंत्री जयसिंह अग्रवाल की फिर बिगड़े बोल अधिकारी को कथित गाली-गलौज और धमकी का वीडियो खुब चर्चा में, कार्रवाई अब तक क्यों नहीं?

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बरबसपुर शराब दुकान विवाद में पूर्व मंत्री जयसिंह अग्रवाल के तीखे तेवर; सरकारी अधिकारी से कथित अभद्र भाषा और चेतावनी पर उठे गंभीर सवाल..

 

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क्या जनप्रतिनिधि को सरकारी अधिकारी से सार्वजनिक रूप से अपमानजनक भाषा में बात करने का अधिकार है? प्रशासन की चुप्पी पर सवाल

 

पूर्व मंत्री के कथित तीखे व्यवहार पर प्रशासन मौन, क्या कानून का तराजू सबके लिए बराबर नहीं?

विशेष रिपोर्ट | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज़ नेटवर्क

कोरबा।   ग्राम बरबसपुर में प्रस्तावित शराब दुकान के विरोध ने अब केवल जनआंदोलन का स्वरूप ही नहीं लिया, बल्कि लोकतांत्रिक मर्यादा, प्रशासनिक गरिमा और कानून के समान अनुपालन पर भी गंभीर बहस खड़ी कर दी है।

 

 

सोशल मीडिया और समाचार माध्यमों में प्रसारित वीडियो में पूर्व राजस्व मंत्री एवं पूर्व विधायक जयसिंह अग्रवाल आबकारी अधिकारी राकेश राठौर से फोन पर अत्यंत तीखे शब्दों में बात करते दिखाई और सुनाई देते हैं। वीडियो में अधिकारी के प्रति कथित रूप से अपमानजनक भाषा और कड़ी चेतावनी दिए जाने के दावे किए जा रहे हैं।

 

 

ग्रामीणों के विरोध के बीच जयसिंह अग्रवाल ने शराब दुकान का विरोध करते हुए कहा कि बरबसपुर में शराब दुकान नहीं खुलने दी जाएगी। उपलब्ध वीडियो और प्रकाशित समाचारों के अनुसार, बातचीत के दौरान अधिकारी को कठोर शब्दों में संबोधित किया गया और दुकान खोलने की स्थिति में गंभीर परिणामों की चेतावनी भी दी गई।

 

आबकारी मंत्री लखन लाल देवांगन का सार्वजनिक बयान

 

आबकारी मंत्री का आश्वासन, कहा- बहनों की भावना का सम्मान होगा, नहीं खुलेगी शराब दुकान

 

रविवार को आबकारी मंत्री लखनलाल देवांगन कोरबा में आयोजित नशामुक्ति के कार्यक्रम में शामिल होने पहुंचे थे।  कार्यक्रम के दौरान मीडिया से चर्चा करते हुए मंत्री देवांगन ने कहा कि बरबसपुर में शराब दुकान खोलने के लिए अधिकारी जगह देखने गए थे, अभी दुकान खोलने को लेकर कोई निर्णय नहीं हुआ है। इस बीच बहनें जबरदस्ती धरना प्रदर्शन में बैठ गईं।

मेरे को फोन करके बोल देते तो शराब दुकान वहां नहीं खोलवाता, मैं  आबकारी का मंत्री हूं, बहनों की इच्छा बरबसपुर में शराब दुकान खोलने की नहीं है तो वहां शराब दुकान नहीं खुलेगी।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल अब यह है...

 

यदि किसी सरकारी अधिकारी के साथ सार्वजनिक रूप से कथित गाली-गलौज, अपमानजनक भाषा या धमकीपूर्ण व्यवहार हुआ है, तो—

क्या इस मामले में कोई आधिकारिक शिकायत दर्ज हुई?

क्या जिला प्रशासन ने स्वतः संज्ञान लिया?

क्या किसी जनप्रतिनिधि के लिए सरकारी अधिकारी से इस प्रकार बात करना सेवा व्यवस्था और प्रशासनिक मर्यादा के अनुरूप माना जा सकता है?

यदि यही भाषा कोई सामान्य नागरिक किसी अधिकारी से प्रयोग करता, तो क्या उसके विरुद्ध तत्काल कानूनी कार्रवाई होती?

क्या कानून सभी पर समान रूप से लागू होगा, या सार्वजनिक पद के आधार पर अलग-अलग मापदंड अपनाए जाएंगे?

लोकतंत्र में विरोध का अधिकार है, लेकिन मर्यादा भी आवश्यक

लोकतांत्रिक व्यवस्था  में जनप्रतिनिधियों को जनता के पक्ष में आवाज़ उठाने और प्रशासन से जवाब मांगने का पूरा अधिकार है। साथ ही, सरकारी अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों—दोनों से सार्वजनिक संवाद में शिष्टाचार और कानूनसम्मत आचरण की अपेक्षा भी की जाती है।

 

यदि वीडियो में सुनाई दे रही बातें प्रामाणिक हैं, तो यह विषय केवल एक शराब दुकान के विरोध तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि यह प्रश्न भी उठाता है कि सार्वजनिक जीवन में संवाद की मर्यादा और कानून का समान अनुपालन  कैसे सुनिश्चित किया जाए।

चुप्पी जितनी लंबी होगी, सवाल उतने बड़े होंगे

यह मामला केवल एक फोन कॉल का नहीं है।  यह उस व्यवस्था की परीक्षा है  जहाँ संविधान कहता है कि कानून की नज़र में सभी समान हैं।

यदि कोई कार्रवाई नहीं होती, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है  कि क्या प्रभावशाली पदों पर बैठे लोगों के लिए कानून की गति बदल जाती है, या फिर प्रशासन किसी आधिकारिक शिकायत की प्रतीक्षा कर रहा है?

अब निगाहें शासन, जिला प्रशासन और आबकारी विभाग पर हैं— वे इस प्रकरण पर क्या रुख अपनाते हैं और क्या आधिकारिक रूप से स्थिति स्पष्ट करते हैं।

अब प्रशासन से अपेक्षित स्पष्टता

ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज़ नेटवर्क का मानना है कि इस मामले में संबंधित प्रशासन और आबकारी विभाग को स्पष्ट करना चाहिए—

क्या पूरे घटनाक्रम का संज्ञान लिया गया है?

क्या वीडियो की आधिकारिक जांच होगी?

यदि कोई शिकायत प्राप्त हुई है तो उस पर क्या कार्रवाई हुई?

यदि कोई शिकायत प्राप्त नहीं हुई, तो क्या प्रशासन स्वतः संज्ञान लेने पर विचार करेगा?

बरबसपुर का विवाद अब केवल शराब दुकान का मुद्दा नहीं रह गया है। यह प्रशासनिक गरिमा, जनप्रतिनिधियों के आचरण और कानून के समान अनुपालन की कसौटी भी बनता जा रहा है।

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