बरबसपुर की राख में करोड़ों का सवाल: पर्यावरण विभाग खोले अनुमति और निगरानी का पूरा हिसाब

प्रसन्ना सोनकर की भूमिका की जांच का सवाल; नगर निगम की सहमति और भराव की वास्तविक मात्रा भी पड़ताल के दायरे में—किसने अनुमति दी, किसने निगरानी की और भुगतान किसे हुआ?
कोरबा। ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क। बरबसपुर डंपिंग यार्ड में राखड़ भराव को लेकर अब पर्यावरण विभाग की अनुमति और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। यदि संबंधित स्थल पर स्वीकृत मात्रा से अधिक राख डाली गई, तो विभागीय निरीक्षण में क्या दर्ज हुआ? भराव की सीमा कौन देख रहा था? और उल्लंघन हुआ तो उसे रोकने की कार्रवाई कहां है? पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी केवल अनुमति जारी करने तक सीमित कैसे हो सकती है? अनुमति की शर्तें जमीन पर लागू हुईं या कागज में रह गईं—इसका हिसाब भी विभाग को देना होगा।
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क को दी गई सूचना में पर्यावरण विभाग के प्रसन्ना सोनकर की महत्वपूर्ण भूमिका होने का आरोप लगाया गया है। इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि शेष है। संबंधित अवधि में उनकी पदस्थापना, अधिकार क्षेत्र, अनुमति प्रक्रिया और निरीक्षण से जुड़े अभिलेखों का परीक्षण होने पर ही उनकी वास्तविक भूमिका स्पष्ट होगी।
सोनकर की भूमिका पर सवाल—हस्ताक्षरित रिकॉर्ड सामने आए
इस मामले में व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय करने का रास्ता स्पष्ट है। अनुमति संबंधी प्रस्ताव किसके पास पहुंचा? उसका परीक्षण किसने किया? स्थल निरीक्षण किस अधिकारी ने किया? स्वीकृति किन शर्तों पर दी गई और अनुपालन की रिपोर्ट किसने तैयार की? यदि प्रसन्ना सोनकर इन प्रक्रियाओं से जुड़े थे, तो उनके स्तर पर हुई कार्रवाई का रिकॉर्ड जांचा जाए। यदि उनका संबंध नहीं था, तो वह स्थिति भी दस्तावेजों से स्पष्ट हो। जवाब आरोप खारिज करने भर से पूरा नहीं होगा; संबंधित निर्णय और निरीक्षण का रिकॉर्ड जांच के सामने रखना होगा।
पांच लाख टन से ज्यादा भराव का दावा—विभाग का आंकड़ा क्या है?
प्राप्त सूचना में संबंधित स्थान पर पांच लाख टन से अधिक राखड़ डालकर भराव करने का दावा किया गया है। वास्तविक मात्रा अभी स्वतंत्र सर्वे और परिवहन अभिलेखों से सत्यापित नहीं हुई है। दूसरी ओर, प्रकाशित समाचार में 1.65 लाख टन और अतिरिक्त 2.30 लाख टन की अनुमति का उल्लेख आया है। उसी रिपोर्ट में CSEB के अधिकारी ने निगम के पत्र को अनुमति का आधार बताया है तथा आयुक्त द्वारा जवाब मांगने की बात कही गई है। ये समाचार में दर्ज विवरण हैं; मूल अनुमति पत्रों का परीक्षण शेष है।
अब पर्यावरण विभाग बताए—उसके अभिलेख में अनुमत मात्रा कितनी है और वास्तविक भराव का सत्यापन कैसे किया गया? ट्रक आते रहे तो निगरानी का रिकॉर्ड भी होना चाहिए। निरीक्षण हुआ तो रिपोर्ट होनी चाहिए। शर्त टूटी तो कार्रवाई का दस्तावेज होना चाहिए।
प्रति टन रकम का दावा: करोड़ों के हिसाब की जांच जरूरी
सूचना में राख डालने के एवज में भू-स्वामियों को ₹50–₹60 प्रति टन तक भुगतान किए जाने का दावा भी किया गया है। संबंधित स्थल पर ऐसी व्यवस्था थी या नहीं, इसकी पुष्टि आवश्यक है। पांच लाख टन पर यही दर लागू होने की स्थिति में संभावित भुगतान ₹2.50 करोड़ से ₹3 करोड़ बैठता है। यह दावों पर आधारित गणना है, प्रमाणित घोटाले या अवैध लाभ की राशि नहीं। लेकिन इस गणना से जांच का महत्वपूर्ण प्रश्न जरूर उठता है—क्या भुगतान हुआ? किस प्लांट अथवा एजेंसी ने किया? भुगतान पाने वाला कौन था? जमीन का स्वामित्व और भुगतान का अधिकार किसके पास था? राख के वजन के साथ रकम का रास्ता भी जांचना होगा। तभी पता चलेगा कि मामला नियमों के अनुरूप भराव का था या अनियमित लाभ का।

नगर निगम की भूमिका भी जांच से बाहर नहीं
पर्यावरण विभाग पर उठे प्रश्नों के साथ नगर निगम की सहमति और निर्णयों का परीक्षण भी आवश्यक है। निगम के पत्र का हवाला सामने आने पर जांच को केवल दूसरे विभागों तक सीमित नहीं रखा जा सकता। सहमति किस अधिकारी ने दी? किस स्थल, क्षेत्रफल और मात्रा के लिए दी? क्या अतिरिक्त भराव के लिए अलग प्रस्ताव आया? क्या संबंधित भूमि के उपयोग और प्रस्तावित परियोजना पर उसके प्रभाव की समीक्षा हुई? आयुक्त का नोटिस तभी जवाबदेही की ठोस शुरुआत बनेगा, जब निगम के अपने कार्यालय की फाइलें भी उसी कठोरता से जांची जाएंगी। फिलहाल आयुक्त या अन्य अधिकारियों की मिलीभगत सिद्ध करने वाली सामग्री उपलब्ध नहीं है। जिम्मेदारी का निर्धारण पदनाम या संदेह से नहीं, निर्णयों और साक्ष्यों से होना चाहिए।
दस्तावेजी पड़ताल का अगला सवाल—कौन किस कड़ी में था?
इस मामले की निर्णायक पड़ताल अनुमति पत्रों, निरीक्षण रिपोर्ट, भूमि अभिलेख, प्लांटवार राख निर्गमन, वाहनवार तौल और भुगतान विवरण को आपस में जोड़कर होगी। इनमें अंतर मिला तो जिम्मेदार अधिकारियों, एजेंसियों और संभावित लाभार्थियों की भूमिका सामने आ सकेगी। ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क इस प्रकरण में दस्तावेजी खुलासे की आवश्यकता प्रमुखता से उठा रहा है। सत्यापित अभिलेख मिलने पर संबंधित निर्णयों और जिम्मेदारियों को सामने रखा जाएगा। पर्यावरण विभाग और नगर निगम के सामने सवाल साफ है—राख कितनी आई, अनुमति किसने दी, निगरानी किसने की और पैसा किसे मिला? बरबसपुर का सच नोटिस की सुर्खियों से आगे है। अब अनुमति की फाइल, निरीक्षण की रिपोर्ट और भुगतान का हिसाब सामने आना चाहिए। करोड़ों के सवाल का उत्तर कागजी आश्वासन नहीं, दस्तावेज देंगे।
नोट: भराव की मात्रा, प्रति टन भुगतान और प्रसन्ना सोनकर की भूमिका संबंधी आरोप प्राप्त सूचना पर आधारित हैं; स्वतंत्र पुष्टि शेष है। मूल अभिलेख और संबंधित पक्षों का इन आरोपों पर प्रत्यक्ष जवाब उपलब्ध नहीं है। किसी घोटाले अथवा व्यक्ति की संलिप्तता को सिद्ध तथ्य नहीं माना गया है।
संपादक – अब्दुल सुल्तान
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क
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