कटघोरा में EOW की दस्तक—कोरबा निगम के ठेकों का हिसाब कब?

दिलीप केंवट को टीम साथ ले जाने की खबर; अब पौधा खरीदी, सभागार और भुगतान की फाइलों पर उठे आरोपों का भी हो परीक्षण—आयुक्त आशुतोष पांडेय से दस्तावेजी जवाब की मांग
कोरबा | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क छोटे कर्मचारी तक जांच पहुंच सकती है, तो बड़े बजट की फाइलें भी सवालों से ऊपर नहीं हो सकतीं। कटघोरा में आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो की कार्रवाई की खबर के बीच ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क का सीधा सवाल है—नगर निगम कोरबा के ठेकों और भुगतान पर उठे गंभीर आरोपों का हिसाब कब सामने आएगा? उपलब्ध समाचार के मुताबिक, 30 अक्टूबर की कार्रवाई में नगर सैनिक दिलीप केंवट के यहां दस्तावेजों की पड़ताल हुई और EOW की टीम उन्हें साथ ले गई। उनकी औपचारिक गिरफ्तारी, संबंधित प्रकरण में भूमिका और पूछताछ की स्थिति पर स्पष्ट आधिकारिक जानकारी अपेक्षित है। किसी को पूछताछ के लिए साथ ले जाना दोष सिद्ध होना नहीं है। लेकिन आर्थिक लेन-देन की जांच मूल अभिलेखों तक पहुंच रही है, तो यह स्वागतयोग्य कदम है।
एजेंसियों की सक्रियता सराहनीय—अब हर शिकायत का परीक्षण समान कसौटी पर हो
आर्थिक अपराधों के मामलों में दस्तावेज, डिजिटल रिकॉर्ड और पैसों की आवाजाही की पड़ताल जरूरी है। जांच एजेंसियों की इस दिशा में सक्रियता सराहनीय है। राज्य सरकार से अपेक्षा है कि उन्हें निष्पक्ष जांच के लिए पूरा सहयोग और स्वतंत्र वातावरण मिले। पद छोटा हो या बड़ा, जांच की कसौटी प्रमाण ही होना चाहिए। न आरोप लगने मात्र से कोई दोषी है, न ऊंचे पद पर बैठने से किसी को सवालों से छूट मिल सकती है।
आयुक्त आशुतोष पांडेय जवाब दें—निगम की संबंधित शिकायतों पर क्या हुआ?
ग्राम यात्रा की पूर्व रिपोर्टों और शिकायतों में पौधा खरीदी, सभागार से जुड़े निर्माण, सौंदर्यीकरण तथा भुगतान प्रक्रियाओं पर प्रश्न उठाए गए हैं। आयुक्त आशुतोष पांडेय के विरुद्ध पद के दुरुपयोग और चुनिंदा पक्षों को अनुचित लाभ पहुंचाने के आरोप भी लगाए गए हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र जांच और संबंधित पक्षों के उत्तर जरूरी हैं। मगर शिकायतों का निस्तारण हुआ है तो उसका निष्कर्ष कहां है? जांच नहीं हुई है तो संबंधित अभिलेखों का परीक्षण कब होगा?
प्रशासनिक प्रमुख के रूप में आयुक्त से अपेक्षा है कि वे इन प्रश्नों पर तथ्यात्मक स्थिति स्पष्ट करें।
पौधे कहां से आए, किस खरीद के बदले भुगतान हुआ?
पूर्व रिपोर्टिंग में पौधरोपण और बाद की खरीद निविदाओं के घटनाक्रम पर सवाल उठे थे। इसका उत्तर रिकॉर्ड से निकल सकता है—पहले लगाए गए पौधों का स्रोत क्या था? बाद की खरीद किस आवश्यकता के लिए थी? आपूर्ति कब मिली और किस स्थल पर इस्तेमाल हुई? आपूर्ति आदेश, प्राप्ति रजिस्टर, स्थलवार विवरण, बिल और भुगतान का मिलान हो। तारीखों का अंतर अकेले गड़बड़ी का प्रमाण नहीं है, लेकिन उसी कारण पूरी दस्तावेजी श्रृंखला की जांच आवश्यक है।
सभागार और सौंदर्यीकरण—स्वीकृति से भुगतान तक खुलें फाइलें
एक ही परिसर से संबंधित अलग-अलग कार्यों की स्वीकृतियां, उनका वास्तविक दायरा और भुगतान स्पष्ट होना चाहिए। किस मद में क्या काम स्वीकृत हुआ? कितना काम हुआ? गुणवत्ता किसने जांची? भुगतान किस प्रमाण पर मंजूर किया गया? यदि अलग कार्य हैं तो रिकॉर्ड उन्हें स्पष्ट करेंगे। यदि दोहराव या बिना कार्य भुगतान का प्रमाण मिलता है तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। सार्वजनिक धन का हिसाब मांगना कोई असामान्य मांग नहीं है।
उमेश राठौर की निरीक्षणों में कथित मौजूदगी—हैसियत और अनुमति स्पष्ट हो
पूर्व शिकायतों में ठेकेदार उमेश राठौर को आधिकारिक निरीक्षणों में साथ रखने और कथित संरक्षण का मुद्दा उठाया गया है। किसी ठेकेदार का निरीक्षण में उपस्थित होना अपने आप अनियमितता नहीं है। लेकिन वह किस कार्य के लिए, किस भूमिका में और किस अनुमति से मौजूद था, इसका उत्तर दिया जा सकता है। संबंधित निरीक्षण अभिलेख और उपलब्ध फोटो-वीडियो का संदर्भ सहित परीक्षण हो।
‘भ्रामक’ कहने से पहले जांच का आधार सामने रखिए
ग्राम यात्रा की खबरों को लेकर निगम की पूर्व प्रतिक्रिया के संदर्भ में भी प्रश्न है—यदि आरोप तथ्यहीन हैं, तो उन्हें गलत साबित करने वाले अभिलेख सार्वजनिक क्यों न किए जाएं? किस बिल का मिलान किया गया? किस स्थल का निरीक्षण हुआ? किस आरोप पर क्या निष्कर्ष निकला? स्पष्ट जवाब से ही विवाद का समाधान होगा।
कटघोरा की कार्रवाई और निगम के आरोप अलग—जवाबदेही की मांग दोनों में जरूरी कटघोरा की मौजूदा कार्रवाई से निगम के इन मामलों का प्रत्यक्ष संबंध स्थापित नहीं हुआ है। नगर निगम के संबंधित ठेकों में EOW जांच शुरू होने की भी पुष्टि नहीं है। ग्राम यात्रा की मांग है कि सक्षम विभाग शिकायतों और प्रस्तुत साक्ष्यों की निष्पक्ष जांच करें। आर्थिक अपराध के ठोस संकेत मिलें तो मामला सक्षम एजेंसी तक पहुंचाया जाए।
अब आरोपों का जवाब आरोपों से नहीं, अभिलेखों से दीजिए। ठेका किसे मिला, काम कितना हुआ, भुगतान किस आधार पर हुआ और शिकायत की जांच में क्या निकला—कोरबा को इन सवालों का साफ हिसाब चाहिए।
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