आयुक्त महोदय, नोटिस के साथ करोड़ों का हिसाब भी चाहिए! बरबसपुर राखड़ भराव में निगम की जवाबदेही पर सवाल

₹50–₹60 प्रति टन कथित प्रतिफल किसे मिला? जमीन किसकी, सहमति किसकी और भुगतान का अधिकार किसका—नगर निगम कोरबा खोले पूरा रिकॉर्ड
कोरबा। ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क। बरबसपुर में राखड़ भराव का विवाद अब केवल पर्यावरण विभाग और प्लांटों से जवाब मांगने तक सीमित नहीं रह सकता। जब नगर निगम की सहमति का उल्लेख सामने है, तब निगम के अपने निर्णय, निगरानी और संबंधित भूमि पर अधिकार का हिसाब भी जांचना होगा।
आयुक्त आशुतोष पांडेय से सीधा सवाल है—राख भराव के लिए निगम ने क्या सहमति दी थी? किन शर्तों पर दी थी? और कथित प्रति टन प्रतिफल की व्यवस्था थी तो उसकी रकम किसके हिस्से गई?
नोटिस जारी करना जांच की शुरुआत हो सकता है। उसकी परिणति क्या होगी—यह अभिलेखों के परीक्षण, जिम्मेदारी तय करने और आवश्यक कार्रवाई से स्पष्ट होगा। नोटिस की घोषणा को पूरे मामले का जवाब नहीं माना जा सकता।
₹50–₹60 प्रति टन: प्रतिफल का रिकॉर्ड किसके पास है?
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क को दी गई सूचना में दावा किया गया है कि राखड़ भराव के एवज में प्लांटों की ओर से भू-स्वामियों को ₹50 से ₹60 प्रति टन तक प्रतिफल दिया जाता है। बरबसपुर के संबंधित स्थल पर ऐसी व्यवस्था लागू थी या नहीं, इसकी स्वतंत्र पुष्टि शेष है। यही प्रश्न नगर निगम की जवाबदेही को महत्वपूर्ण बनाता है। संबंधित भूमि का स्वामी कौन है? क्या निगम उसका स्वामी है, प्रबंधक है अथवा किसी अन्य अधिकार से उसका उपयोग कर रहा है? यदि भराव के लिए भुगतान का प्रावधान था, तो उसे पाने का अधिकार किसके पास था?
यदि प्रतिफल देय था, तो भुगतान कहां है? यदि देय नहीं था, तो संबंधित अनुबंध और शर्तें क्या कहती हैं? निगम प्रशासन दोनों स्थितियों को दस्तावेजों से स्पष्ट करे।
पांच लाख टन के दावे पर ₹2.50–₹3 करोड़ का गणित
प्राप्त सूचना में संबंधित स्थान पर पांच लाख टन से अधिक राखड़ भराव का दावा किया गया है। इस मात्रा का स्वतंत्र सर्वे और तौल अभिलेखों से सत्यापन आवश्यक है। यदि पांच लाख टन पर ₹50–₹60 प्रति टन की दर वास्तव में लागू होती हो, तो संभावित प्रतिफल ₹2.50 करोड़ से ₹3 करोड़ बैठता है। यह दो अपुष्ट दावों पर आधारित सशर्त गणना है; प्रमाणित भुगतान, निगम की देय आय या घोटाले की स्थापित राशि नहीं।
लेकिन इतने बड़े संभावित आर्थिक प्रश्न को अनुत्तरित भी नहीं छोड़ा जा सकता। क्या कोई भुगतान समझौता था? किसने हस्ताक्षर किए? रकम किस खाते में गई? क्या निगम के लेखों में उससे संबंधित कोई प्रविष्टि है?
अपनी सहमति की फाइल भी सामने रखिए, आयुक्त महोदय
साझा की गई प्रकाशित रिपोर्ट में CSEB अधिकारी ने नगर निगम के पत्र को राख भराव की अनुमति का आधार बताया है। उसी रिपोर्ट में आयुक्त द्वारा संबंधित विभागों से जवाब मांगने की बात कही गई है। अब निगम को अपने पत्र की तारीख, हस्ताक्षरकर्ता, स्वीकृत मात्रा और शर्तें स्पष्ट करनी चाहिए। किस प्रस्ताव पर सहमति दी गई? स्थल की उपयुक्तता किसने जांची? भराव की मात्रा की निगरानी किसके जिम्मे थी? अतिरिक्त भराव की सूचना निगम को मिली थी या नहीं?
दूसरे विभागों को भेजे गए सवालों के साथ निगम अपने कार्यालय से भी यही सवाल पूछे। जवाबदेही का दायरा पत्र भेजने वाले कार्यालय की चौखट पर रुकना नहीं चाहिए।
राख जमीन पर पहुंची—निगरानी का रिकॉर्ड कहां पहुंचा?
यदि बड़े पैमाने पर भराव हुआ, तो उसकी अवधि, वाहन आवागमन और स्थल की स्थिति की जांच संभव होनी चाहिए। संबंधित प्लांटों के राख निर्गमन, तौल पर्चियों, परिवहन बिलों और स्थल पर प्राप्ति के उपलब्ध रिकॉर्ड का मिलान जरूरी है। रिकॉर्ड नहीं रखा गया तो उसका कारण पूछा जाए। रखा गया तो उससे वास्तविक मात्रा निकाली जाए। अनुमति से अधिक भराव मिला तो निर्णय लिया जाए कि किसकी चूक थी और किस स्तर पर कार्रवाई आवश्यक है। फाइल में अनुमति और जमीन पर भराव—इन दोनों का अंतर ही जांच का केंद्रीय विषय होना चाहिए।
नोटिस से आगे बढ़े प्रशासन, स्वतंत्र जांच हो
पर्यावरण विभाग के प्रसन्ना सोनकर की भूमिका संबंधी आरोपों के साथ नगर निगम के संबंधित अधिकारियों और अनुमति देने वाली अन्य संस्थाओं की भूमिका भी निष्पक्ष रूप से जांची जानी चाहिए। किसी एक विभाग का स्पष्टीकरण दूसरे की जिम्मेदारी स्वतः समाप्त नहीं करता। कलेक्टर की निगरानी में स्वतंत्र तकनीकी सर्वे और वित्तीय अभिलेखों की जांच से स्थिति स्पष्ट की जा सकती है। जांच में निगम की अपनी भूमिका शामिल होने के कारण प्रक्रिया ऐसी हो जिसमें संबंधित निर्णयकर्ताओं से स्वतंत्र परीक्षण का भरोसा मिले।
फिलहाल उपलब्ध सामग्री से आयुक्त की व्यक्तिगत मिलीभगत अथवा नोटिस के जरिए मामला दबाने का निष्कर्ष स्थापित नहीं होता। लेकिन जांच की गंभीरता इस बात से जरूर परखी जाएगी कि निगम अपने निर्णयों और संभावित आर्थिक हितों का परीक्षण कितनी पारदर्शिता से कराता है।
जनहित का सवाल—कार्रवाई का परिणाम कब सामने आएगा?
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क की मांग स्पष्ट है: संबंधित अभिलेख सुरक्षित हों, वास्तविक भराव की माप हो, भुगतान व्यवस्था की पुष्टि हो और जांच में अनियमितता मिलने पर जिम्मेदारी तय की जाए। आयुक्त महोदय, सवाल केवल यह नहीं कि नोटिस किसे जाएगा। सवाल यह है कि निगम की सहमति किस आधार पर गई थी और कथित प्रतिफल का हिसाब किसके पास है। राख भराव का मामला केवल पत्राचार में समाप्त नहीं होना चाहिए। जनता के सामने जांच का तथ्यात्मक परिणाम और उसके आधार पर की गई कार्रवाई आनी चाहिए। करोड़ों का सवाल उठा है—जवाब भी पूरा चाहिए।
संपादकीय स्पष्टता: पांच लाख टन से अधिक भराव और ₹50–₹60 प्रति टन प्रतिफल संबंधी दावों की स्वतंत्र पुष्टि शेष है। भूमि स्वामित्व, मूल अनुमति, अनुबंध तथा भुगतान अभिलेख उपलब्ध नहीं हैं। किसी रकम को निगम की प्रमाणित देय आय अथवा किसी अधिकारी की अवैध कमाई नहीं माना गया है। संबंधित पक्षों का इन नए आरोपों पर प्रत्यक्ष जवाब अपेक्षित है।
संपादक – अब्दुल सुल्तान
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क
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