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कोरबा DMF फाइल्स – भाग 2 : पहले करोड़ों की मंजूरी… बाद में पूछा गया—खनन प्रभावित क्षेत्र कौन-सा है?

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मास्टर प्लान नहीं, प्रभावित परिवारों की प्रमाणित सूची नहीं, फिर भी खुलती रहीं DMF की फाइलें—CAG के निष्कर्षों ने योजना स्वीकृति की पूरी व्यवस्था को कठघरे में खड़ा किया

 

 

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विशेष दस्तावेज आधारित खोजी रिपोर्ट-  ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज़ नेटवर्क

 

रायपुर/कोरबा।   जिला खनिज प्रतिष्ठान (DMF) का मूल उद्देश्य बिल्कुल स्पष्ट था—खनन से प्रभावित गांवों, विस्थापित परिवारों, आदिवासियों, श्रमिकों और प्रदूषण झेल रही आबादी के जीवन में वास्तविक सुधार लाना।

लेकिन छत्तीसगढ़ के DMF मॉडल पर सामने आई CAG की ऑडिट रिपोर्ट एक उलटी व्यवस्था की ओर संकेत करती है:
जहां पहले प्रभावित गांवों और परिवारों की पहचान होनी थी, वहां परियोजनाओं की फाइलें पहले स्वीकृत होती रहीं।

जहां पहले गांवों की जरूरतों का सर्वेक्षण होना था, वहां करोड़ों रुपये के कार्य तय किए गए।

जहां मास्टर प्लान और वार्षिक कार्ययोजना के आधार पर खर्च होना था, वहां  योजना निर्माण की बुनियादी प्रक्रिया ही अधूरी मिली।

और अब सबसे बड़ा प्रश्न है— क्या DMF जनहित की सुनियोजित व्यवस्था थी, या परियोजनाओं की मंजूरी देने वाला आसान वित्तीय माध्यम बन गया?

 

₹1,060.70 करोड़ के कार्य—लेकिन प्रभावित क्षेत्र की पहचान ही स्पष्ट नहीं
CAG के अनुसार ₹1,060.70 करोड़  के कार्य ऐसे समय स्वीकृत किए गए, जब संबंधित प्रभावित क्षेत्रों की पहचान निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार पूरी नहीं हुई थी।

 

यह निष्कर्ष बेहद गंभीर है, क्योंकि DMF का पैसा सामान्य विकास मद नहीं है। यह राशि खास तौर पर उन क्षेत्रों और लोगों के लिए है, जिन्होंने खनन की कीमत चुकाई है।

इसलिए हर परियोजना से पहले कम-से-कम यह स्पष्ट होना चाहिए था:

गांव प्रत्यक्ष प्रभावित है या अप्रत्यक्ष प्रभावित
वहां खनन का वास्तविक प्रभाव क्या है;
प्रभावित परिवार कितने हैं;

उनकी पहली आवश्यकता स्वास्थ्य, पानी, शिक्षा, रोजगार या पुनर्वास में से क्या है;

प्रस्तावित कार्य से

वास्तविक लाभार्थीकौन होंगे।

लेकिन जब प्रभावित क्षेत्र की पहचान ही स्पष्ट नहीं थी, तब करोड़ों रुपये की परियोजनाओं को किस आधार पर प्राथमिकता दी गई?

यही वह सवाल है, जिससे DMF की पूरी निर्णय प्रक्रिया हिलती है
क्या परियोजना गांव की जरूरत देखकर बनाई गई?

या उपलब्ध फंड देखकर परियोजना खोजी गई?

क्या ग्रामीणों से प्रस्ताव लिया गया?

क्या ग्रामसभा की अनुशंसा दर्ज हुई?

 

क्या खनन के प्रभाव का वैज्ञानिक अथवा सामाजिक सर्वेक्षण कराया गया?

क्या यह जांचा गया कि प्रस्तावित कार्य का सीधा लाभ प्रभावित समुदाय को मिलेगा?

इन सवालों के उत्तर सार्वजनिक दस्तावेजों में स्पष्ट दिखाई देने चाहिए। यदि उत्तर उपलब्ध नहीं हैं, तो केवल कार्य स्वीकृत कर देना पर्याप्त प्रशासनिक जवाब नहीं माना जा सकता।

मास्टर प्लान के बिना खर्च—क्या दिशा के बिना दौड़ता रहा DMF?

CAG ने मास्टर प्लान, विज़न डॉक्यूमेंट और वार्षिक योजना की कमियों की ओर ध्यान दिलाया है। मास्टर प्लान केवल औपचारिक कागज नहीं होता। उससे तय होता है कि अगले पांच या दस वर्षों में प्रभावित क्षेत्र को किस दिशा में विकसित किया जाएगा।

| प्राथमिकता क्षेत्र | मास्टर प्लान में ध्यान देने योग्य बिंदु |

 पेयजल | किन गांवों में पेयजल संकट सबसे गंभीर है

स्वास्थ्य. कहां प्रदूषण से स्वास्थ्य जोखिम ज्यादा है |

 

 पुनर्वास | किन परिवारों को विस्थापन और आजीविका का नुकसान हुआ |

बुनियादी ढांचा | कहां स्कूल, अस्पताल और सड़क की वास्तविक आवश्यकता है |

पारदर्शिता | किन गांवों में पहले से दूसरे विभागों की योजनाएं चल रही हैं (दोहराव रोकना) |

मास्टर प्लान के अभाव में परियोजनाएं अलग-अलग फाइलों में तो स्वीकृत हो सकती हैं, लेकिन उनसे प्रभावित क्षेत्र का समग्र विकास सुनिश्चित नहीं होता। यही कारण है कि हजारों करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद

 

754 प्रत्यक्ष प्रभावित गांव विकास कार्यों से वंचित रह गए।

44% गांव बाहर—तो प्राथमिकता सूची में कौन था?
यह आंकड़ा DMF व्यवस्था के सामने सबसे बड़ा प्रशासनिक प्रश्न है: 1,734 प्रत्यक्ष प्रभावित गांवों में से 754 गांवों (44%) में कोई विकास कार्य नहीं हुआ

प्रत्यक्ष प्रभावित गांव वे हैं, जिनके आसपास खदान, परिवहन, धूल, विस्फोट, जलस्रोतों पर प्रभाव, भूमि अधिग्रहण और पर्यावरणीय दबाव जैसी स्थितियां सबसे अधिक होती हैं। ऐसे गांव अगर प्राथमिकता से बाहर रह गए, तो यह जानना जरूरी है कि DMF की प्राथमिकता सूची में आखिर कौन-से क्षेत्र शामिल किए गए थे:

 

1. क्या अधिक प्रभावशाली प्रस्तावों को मंजूरी मिली?

2. क्या जिला मुख्यालय अथवा शहरी क्षेत्र के कार्य ग्रामीण खनन प्रभावित क्षेत्रों पर भारी पड़े?

3. क्या बराबर वितरण के नाम पर सबसे ज्यादा प्रभावित गांवों का अधिकार कमजोर कर दिया गया?

4. क्या राजनीतिक और प्रशासनिक सिफारिशों ने जरूरत आधारित योजना को पीछे धकेला?
इनका उत्तर केवल यह कहकर नहीं दिया जा सकता कि राशि खर्च हो गई।

संस्थागत जवाबदेही पर बड़े सवाल
“`
────────────────────────┐
│ जिला कलेक्टर (अध्यक्ष) │
└───────────┬────────────┘

┌────────────────┴────────────────┐
▼ ▼
┌─────────────────┐ ┌─────────────────┐
│ administrative │ │ elected Reps │
│ Mechanics │ │ (MPs / MLAs) │
└────────┬────────┘ └────────┬────────┘
│ │
▼ ▼

भौतिक समीक्षा, जिओ-टैगिंग ग्रामसभा की मांग, सदन में
और यूटिलिटी सत्यापन की कमी आपत्ति और जन-प्रतिनिधित्व

“`
1. DMF ट्रस्ट की बैठकों की भूमिका अब जांच के केंद्र में

जिला खनिज प्रतिष्ठान की परियोजनाएं किसी एक लिपिक या अधिकारी के स्तर पर तय नहीं होतीं। प्रस्ताव तैयार होते हैं, तकनीकी व प्रशासनिक स्वीकृतियां ली जाती हैं, और DMF ट्रस्ट के सामने योजनाएं रखी जाती हैं। ऐसे में जनता को यह जानने का अधिकार है:

प्रत्येक बैठक में कौन-कौन उपस्थित था?

 

किस परियोजना का प्रस्ताव किस विभाग ने दिया?

 

 किन सदस्यों ने समर्थन या आपत्ति दर्ज की?

 

क्या बैठक के कार्यवृत्त (Minutes of Meeting) सार्वजनिक पोर्टल पर अपलोड किए गए?

यदि निर्णय सामूहिक रूप से लिए गए, तो जवाबदेही भी केवल निचले अधिकारियों तक सीमित नहीं रह सकती।

 

2. कलेक्टर अध्यक्ष—तो निगरानी की जिम्मेदारी किसकी?

 

जिले में DMF ट्रस्ट का नेतृत्व जिला कलेक्टर के स्तर पर होता है। इसलिए यह सवाल स्वाभाविक है:

क्या स्वीकृत परियोजनाओं की भौतिक प्रगति की नियमित समीक्षा हुई?

 

क्या अधूरे और अनुपयोगी कार्यों पर जिम्मेदारी तय की गई?

 

क्या प्रत्यक्ष प्रभावित गांवों का अलग डैशबोर्ड बनाया गया?

 

क्या पुरानी अधूरी परियोजनाओं को पूरा किए बिना नई स्वीकृतियां जारी होती रहीं?

 

3. विधायक और सांसद सदस्य—तो जनता के सवाल बैठकों में क्यों नहीं गूंजे?

 

DMF ट्रस्ट में निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की भागीदारी का उद्देश्य यह था कि जनता की आवाज सीधे निर्णय प्रक्रिया तक पहुंचे। कोरबा जैसे खनन जिले में सांसद और चारों विधानसभा क्षेत्रों के विधायकों से जनता यह जानना चाहती है:

क्या उन्होंने प्रभावित गांवों की अधूरी सूची पर आपत्ति दर्ज की?

 

क्या उन्होंने पूछा कि 44% प्रत्यक्ष प्रभावित गांवों में कोई कार्य क्यों नहीं हुआ?

 

क्या उन्होंने अपने क्षेत्रों के गांववार स्वीकृत और पूर्ण कार्यों की समीक्षा की?

 

फंड बड़ा था—लेकिन क्या निगरानी तंत्र भी उतना ही मजबूत था?

 

वर्ष 2015-16 से 2023-24 तक राज्य के DMFT में ₹13,101.65 करोड़ जमा हुए और ₹10,253.22 करोड़ खर्च हुए।  इतनी बड़ी राशि किसी सामान्य जिला योजना से कई गुना अधिक है। लेकिन बड़े फंड के साथ निम्नलिखित मजबूत निगरानी तंत्र की जरूरत थी, जो CAG की रिपोर्ट के अनुसार प्रभावी नहीं दिखे:

स्वतंत्र तकनीकी जांच व वित्तीय ऑडिट
सामाजिक अंकेक्षण  (Social Audit) व ग्रामसभा सत्यापन

 

 तीसरे पक्ष (Third Party) से गुणवत्ता परीक्षण

 

ऑनलाइन पारदर्शिता और जियो-टैगिंग

 

दोषपूर्ण या अधूरे कार्यों पर राशि की वसूली

 

 

ग्राम यात्रा के 10 सीधे सवाल जिला प्रशासन से

1. कोरबा जिले के सभी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रभावित गांवों की वर्तमान प्रमाणित सूची सार्वजनिक क्यों नहीं की जाती?

2. प्रत्येक गांव में स्वीकृत, पूर्ण, अधूरे और निरस्त कार्यों का विवरण वेबसाइट पर कब डाला जाएगा?

3. मास्टर प्लान और विज़न डॉक्यूमेंट किस वर्ष तैयार किया गया? यदि नहीं बना, तो योजनाएं किस आधार पर स्वीकृत हुईं?

4. ₹41.80 करोड़ की अधूरी या अनुपयोगी परियोजनाओं के लिए जिम्मेदारी किस स्तर पर तय की गई?

DMF ट्रस्ट के सदस्यों से

5. बैठकों में अनुपस्थित रहने वाले सदस्यों और अधिकारियों का रिकॉर्ड सार्वजनिक किया जाएगा या नहीं?

6. क्या किसी सांसद या विधायक ने प्रत्यक्ष प्रभावित गांवों के विकास से वंचित रहने पर लिखित आपत्ति दर्ज की?

7. क्या प्रत्येक सदस्य अपने विधानसभा अथवा संसदीय क्षेत्र का गांववार DMF रिपोर्ट कार्ड सार्वजनिक करेगा?
राज्य एवं केंद्र सरकार से

 

8. क्या CAG निष्कर्षों के आधार पर जिलावार जिम्मेदारी तय करने के लिए उच्चस्तरीय जांच कराई जाएगी?

 

9. क्या अनियमित, अधूरे या अनुपयोगी कार्यों में राशि की वसूली और विभागीय कार्रवाई होगी?

 

10. क्या केंद्रीय खान मंत्रालय PMKKKY के उद्देश्यों के अनुरूप छत्तीसगढ़ DMF की अनुपालन समीक्षा कर सार्वजनिक रिपोर्ट जारी करेगा?

ग्राम यात्रा की विशेष टिप्पणी

 

DMF की सफलता इस बात से नहीं मापी जा सकती कि कितने करोड़ रुपये खर्च हुए। सफलता का वास्तविक पैमाना यह है कि कितने गांवों में पीने का साफ पानी पहुंचा, कितने प्रदूषण प्रभावित लोगों का उपचार हुआ, और खनन से प्रभावित लोगों के जीवन में कितना वास्तविक परिवर्तन आया।

 

जब 44 प्रतिशत प्रत्यक्ष प्रभावित गांव किसी विकास कार्य से वंचित मिलते हैं, तो खर्च के आंकड़े उपलब्धि नहीं, बल्कि जांच का प्रारंभिक बिंदु  बन जाते हैं।

अगले अंक में—कोरबा DMF फाइल्स, भाग 3

 

₹709.47 करोड़ का सामान वितरण—लाभार्थी कौन, चयन का आधार क्या और क्या खनन प्रभावित परिवारों को वास्तव में मिली प्राथमिकता?

DMF का पैसा स्थायी विकास पर खर्च हुआ या वितरण योजनाओं में बंट गया—ग्राम यात्रा खोलेगा अगली परत।

 

कानूनी स्पष्टीकरण:

यह रिपोर्ट उपलब्ध CAG ऑडिट निष्कर्षों और जिला खनिज प्रतिष्ठान की संस्थागत व्यवस्था से जुड़े सार्वजनिक तथ्यों पर आधारित है। इसमें उठाए गए प्रश्न जनहित, पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही से संबंधित हैं।

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