जांच रिश्वत की थी या खबर बाहर आने की? नर्सों से पूछा—“मीडिया तक बात कैसे पहुंची”; बयान तक कलमबद्ध नहीं करने का आरोप!

डीन डॉ. के.के. सहारे ने तत्काल संज्ञान लेकर दिखाई संवेदनशीलता, जांच टीम गठित कर शुरू कराई कार्रवाई—लेकिन जांच अधिकारियों डॉ. राम और अनमोल मिंज की कथित पूछताछ के तरीके पर उठे गंभीर सवाल
₹2,000 की कथित ऑनलाइन वसूली की बैंकिंग जांच कब? आरोपी बताए जा रहे बाबू मिथलेश मरकाम के डिजिटल लेन-देन खंगालने के बजाय क्या पीड़ित महिला कर्मचारियों को ही विभागीय कार्रवाई का भय दिखाया गया?
कोरबा | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क कोरबा मेडिकल कॉलेज अस्पताल में स्टाफ नर्सों से कथित रूप से ₹2,000-₹2,000 ऑनलाइन वसूली के मामले का खुलासा होने के बाद मेडिकल कॉलेज के डीन डॉ. के.के. सहारे ने तत्काल संज्ञान लेकर जिस संवेदनशीलता और प्रशासनिक तत्परता का परिचय दिया, वह सराहनीय है। उन्होंने नोटिस जारी किया, जांच टीम गठित की और मामले की सच्चाई सामने लाने के लिए जांच प्रारंभ कराई। लेकिन अब उसी जांच की दिशा और पूछताछ की कथित कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े हो रहे हैं।
जानकारी के अनुसार, आज प्रभावित स्टाफ नर्सों को जांच अधिकारी डॉ. राम और अनमोल मिंज के समक्ष तलब किया गया तथा एक-एक कर उनसे पूछताछ की गई। नर्सों की ओर से सामने आई जानकारी यदि सही है, तो जांच में कथित अवैध ऑनलाइन लेन-देन की तह तक पहुंचने से अधिक जोर इस बात पर रहा कि—
“शिकायत पहले अधिकारियों से क्यों नहीं की गई?”
“अस्पताल की बात बाहर कैसे गई?”
“मामला मीडिया तक कैसे पहुंचा?”
इतना ही नहीं, नर्सों को कथित रूप से यह भी कहा गया कि अस्पताल की बातें बाहर जाना सेवा आचरण के विरुद्ध है और उन पर भी कार्रवाई हो सकती है।
यदि वास्तव में ऐसी भाषा का प्रयोग हुआ है, तो सवाल बेहद गंभीर है—भ्रष्टाचार या अवैध वसूली की जानकारी सामने आने पर जांच कथित वसूली की होगी या पीड़ितों की आवाज दबाने की?
बयान लिए या सिर्फ चेतावनी देकर छोड़ दिया?
प्रभावित नर्सों का आरोप है कि पैसे के लेन-देन के संबंध में उनसे जानकारी तो ली गई, लेकिन उनकी बातों को विधिवत कलमबद्ध नहीं किया गया। यदि यह तथ्य सही है, तो जांच की पारदर्शिता पर स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठता है।
जांच अधिकारियों को स्पष्ट करना चाहिए—
– क्या प्रत्येक प्रभावित नर्स का लिखित एवं हस्ताक्षरित बयान लिया गया?
– क्या बयान की प्रति संबंधित नर्स को उपलब्ध कराई गई?
– क्या पूरी जांच और पूछताछ की वीडियोग्राफी कराई गई?
– क्या ऑनलाइन भुगतान के स्क्रीनशॉट, बैंक विवरण अथवा ट्रांजैक्शन रसीद साक्ष्य के रूप में जब्त की गई?
– क्या कथित बाबू मिथलेश मरकाम से पूछताछ की गई?
– क्या उनके संबंधित बैंक खाते, यूपीआई आईडी और डिजिटल लेन-देन का परीक्षण कराया गया?
– जिन खातों में रकम भेजे जाने की बात कही जा रही है, क्या उनके लाभार्थी का सत्यापन हुआ?
– क्या जांच का उद्देश्य कथित वसूली की सच्चाई पता करना है या यह खोजना कि खबर मीडिया तक कैसे पहुंची?
पीड़ितों को ही कठघरे में खड़ा करना न्याय नहीं
जांच अधिकारी द्वारा कथित रूप से यह पूछा जाना कि “जब ऐसा हुआ तो अधिकारियों से शिकायत क्यों नहीं की”, अपने आप में अधूरा प्रश्न है। जांच टीम को यह भी जानना चाहिए कि क्या कर्मचारियों में प्रताड़ना, स्थानांतरण, गोपनीय चरित्रावली बिगाड़ने अथवा विभागीय कार्रवाई का भय था।सरकारी व्यवस्था में अधीनस्थ महिला कर्मचारियों से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वे संभावित दबाव और प्रतिशोध की आशंका के बावजूद निर्भय होकर तत्काल लिखित शिकायत करें। शिकायत में देरी किसी कथित अवैध लेन-देन को वैध नहीं बना देती।
और सबसे बड़ा प्रश्न—क्या भ्रष्टाचार की जानकारी मीडिया तक पहुंचाना, भ्रष्टाचार करने से बड़ा अपराध बना दिया जाएगा?
यदि पीड़ित कर्मचारियों को सेवा आचरण नियमों का भय दिखाकर चुप कराने की कोशिश हुई है, तो यह निष्पक्ष जांच नहीं, बल्कि जांच की दिशा बदलने का गंभीर आरोप बन सकता है।
डीन की मंशा स्पष्ट, अब जांच टीम की जवाबदेही तय हो डीन डॉ. के.के. सहारे ने खबर सामने आते ही मामले को दबाने के बजाय नोटिस जारी कर जांच बैठाई। यह कदम बताता है कि संस्थान के मुखिया ने शिकायत को गंभीरता से लिया और जवाबदेही की प्रक्रिया शुरू की।
अब आवश्यकता है कि उनकी इस सकारात्मक पहल को जांच की संदिग्ध प्रक्रिया कमजोर न करे। डीन को स्वयं जांच की निगरानी करते हुए यह सुनिश्चित करना चाहिए कि—
1. सभी नर्सों के बयान लिखित, हस्ताक्षरित और सीलबंद रूप में लिए जाएं।
2. शिकायतकर्ताओं और गवाहों के विरुद्ध किसी प्रकार की प्रताड़ना या विभागीय कार्रवाई न हो।
3. जांच समिति में एक महिला अधिकारी, वित्त/लेखा विशेषज्ञ तथा स्वतंत्र प्रशासनिक प्रतिनिधि को शामिल किया जाए।
4. सभी संबंधित बैंक खातों, यूपीआई ट्रांजैक्शन और डिजिटल भुगतान का विधिवत परीक्षण हो।
5. कथित आरोपी कर्मचारी का पक्ष भी लिखित रूप में लेकर डिजिटल साक्ष्यों से उसका मिलान किया जाए।
6. जांच की कार्यवाही की वीडियोग्राफी कराई जाए।
7. जांच प्रतिवेदन निर्धारित समय-सीमा में सार्वजनिक किया जाए।
“अपनी मर्जी से पैसे दिए”—कथित व्हाट्सऐप कॉल की भी जांच हो
पूर्व में यह गंभीर आरोप सामने आया था कि जांच टीम गठित होने के बाद लगभग 10 स्टाफ नर्सों को कथित व्हाट्सऐप कॉल कर यह कहने के लिए प्रभावित किया गया कि उन्होंने पैसे “अपनी मर्जी से” दिए थे। यह आरोप सत्य है या असत्य—इसका फैसला अनुमान से नहीं, डिजिटल फोरेंसिक जांच से होना चाहिए। संबंधित मोबाइल नंबरों, कॉल लॉग, व्हाट्सऐप कॉल विवरण, बैंक भुगतान और लाभार्थी खातों का आपसी मिलान कराया जाए। यदि किसी ने गवाहों को प्रभावित करने, बयान बदलवाने अथवा जांच की दिशा मोड़ने की कोशिश की है, तो उसके विरुद्ध अलग से कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।
ग्राम यात्रा की स्पष्ट मांग
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क डीन डॉ. के.के. सहारे की त्वरित पहल का स्वागत करते हुए मांग करता है कि इस मामले की जांच केवल मौखिक पूछताछ तक सीमित न रहे। सभी कथित ऑनलाइन लेन-देन की बैंकिंग एवं डिजिटल जांच कराई जाए और प्रमाण मिलने पर जिम्मेदार व्यक्ति के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई के साथ सक्षम प्राधिकारी के माध्यम से एफआईआर दर्ज कराई जाए। साथ ही, जांच अधिकारियों की कथित टिप्पणियों और पूछताछ की प्रक्रिया की भी स्वतंत्र समीक्षा की जाए। पीड़ित नर्सों को लिखित रूप से संरक्षण दिया जाए कि भ्रष्टाचार संबंधी जानकारी देने अथवा जांच में बयान दर्ज कराने के कारण उनके विरुद्ध कोई प्रतिशोधात्मक कार्रवाई नहीं होगी।
यदि जांच को कथित वसूली से भटकाकर “खबर मीडिया तक कैसे पहुंची” की खोज में बदलने, पीड़ितों को डराने अथवा जिम्मेदार व्यक्ति को संरक्षण देने का प्रयास हुआ, तो ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क जनहित में उपलब्ध दस्तावेजों और डिजिटल साक्ष्यों के साथ सक्षम उच्च अधिकारियों, सतर्कता एजेंसियों तथा आवश्यक होने पर माननीय उच्च न्यायालय की शरण लेने के लिए बाध्य होगा। जांच की कुर्सी पर बैठकर सवालों का गला नहीं दबाया जा सकता। अब जवाब बैंक स्टेटमेंट देगा, डिजिटल ट्रांजैक्शन देगा और कलमबद्ध बयान देंगे—क्योंकि भ्रष्टाचार की जांच फुसफुसाहट से नहीं, प्रमाण से होती है।
—संपादक: अब्दुल सुल्तान
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क
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