गेवरा–दीपका में एक ही “काला सिंडिकेट” का राज?

क्या एन. खुर्शीद हैं कोयला आवंटन, लोडिंग और कथित वसूली के पूरे खेल के मास्टरमाइंड?
सात वर्ष गेवरा रोड सेल की कमान, दीपका तबादले के बाद भी पुराने नेटवर्क पर कथित पकड़; “एलाओ” के नाम पर ₹10 से ₹50 प्रति टन अवैध वसूली का आरोप
मारुति शंकर पर वर्तमान रोड सेल व्यवस्था, पार्थ मुखर्जी पर प्रोडक्शन कोयले के कथित डायवर्जन और संतोष राठौर पर पुराने लोडिंग नेटवर्क की “नाड़ी” होने के गंभीर आरोप
रुंगटा कंपनी का कोयला निर्धारित साइडिंग पहुंचा या ₹120 प्रति टन में निजी कारोबार की भट्ठी में झोंक दिया गया? GPS, कांटा और बैंक ट्रेल खोलेंगे राज
कोरबा | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क खदानें दो—गेवरा और दीपका। लेकिन सूत्रों का आरोप है कि कोयला आवंटन, रोड सेल, लोडिंग, कथित वसूली और कारोबारी प्रभाव की डोर एक ही शक्तिशाली नेटवर्क के हाथों में हो सकती है।
एक खदान में वर्षों तक संवेदनशील कुर्सी। फिर दूसरी खदान में प्रभावशाली पदस्थापना। लेकिन पहली खदान के पुराने कर्मचारियों, लिफ्टरों और रोड सेल व्यवस्था पर कथित पकड़ बरकरार!
क्या यह महज प्रशासनिक संयोग है?
या गेवरा से दीपका तक फैला एक ऐसा कथित “काला गलियारा” है, जिसमें कुर्सियां बदलती हैं, अधिकारी बदलते हैं, मगर कोयले पर नियंत्रण रखने वाला सिंडिकेट जस का तस बना रहता है?
सूत्रों ने वर्तमान दीपका एरिया सेल्स मैनेजर और गेवरा के पूर्व रोड सेल प्रभारी बताए जा रहे एन. खुर्शीद को इस कथित नेटवर्क का सबसे प्रभावशाली केंद्रीय चेहरा बताया है। आरोप है कि गेवरा रोड सेल में करीब सात वर्षों की पदस्थापना के दौरान विकसित हुआ कथित तंत्र उनके दीपका स्थानांतरण के बाद समाप्त होने के बजाय दोनों खदानों के बीच और अधिक प्रभावशाली हो गया।
क्या खुर्शीद केवल एक अनुभवी सेल्स अधिकारी हैं?
या गेवरा–दीपका की कथित समानांतर कोयला व्यवस्था के असली सूत्रधार?
क्या उनके लंबे कार्यकाल, पुराने लोडिंग नेटवर्क, लिफ्टरों से कथित संपर्क, संतोष राठौर को बचाने की कथित पैरवी और संपत्ति संबंधी आरोपों को एक साथ जोड़कर देखने की आवश्यकता है?
इसका निर्णय खबर नहीं करेगी।
निर्णय होगा—पदस्थापना फाइल, कॉल रिकॉर्ड, GPS, कांटा पर्ची, संपत्ति विवरण और बैंक खातों से। खदानें अलग, कथित नेटवर्क एक—गेवरा से दीपका तक किसकी चलती है? एसईसीएल की गेवरा और दीपका परियोजनाएं देश की विशाल कोयला संपदा का हिस्सा हैं। यहां प्रत्येक टन कोयले का उत्पादन, ग्रेड, आवंटन, लोडिंग और गंतव्य सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज होना चाहिए। फिर भी सूत्र आरोप लगा रहे हैं कि दोनों खदानों में कोयले की उपलब्धता और लोडिंग प्राथमिकता के ऊपर कथित रूप से एक समानांतर व्यवस्था काम कर रही है।
आरोप है कि इस कथित नेटवर्क में अलग-अलग स्तरों पर:
– कोयले की उपलब्धता तय की जाती है;
– चुनिंदा खरीदारों को प्राथमिकता मिलती है;
– भुगतान से इनकार करने वालों को “स्टॉक नहीं” बताया जाता है;
– लोडिंग और वाहन निकासी में कथित सुविधा बेची जाती है;
– प्रोडक्शन कोयले को निर्धारित गंतव्य से मोड़ने की गुंजाइश बनाई जाती है;
– और नीचे से ऊपर तक कथित हिस्सेदारी के जरिए व्यवस्था को “मैनेज” किया जाता है।
यदि यह आरोप सही है तो गेवरा और दीपका में कोयले का नियंत्रण सरकारी सॉफ्टवेयर नहीं, कथित निजी सिंडिकेट के इशारे पर चल रहा है। और यदि आरोप गलत हैं तो एसईसीएल को स्वतंत्र फोरेंसिक ऑडिट कराकर पूरे रिकॉर्ड सार्वजनिक करने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए।
एन. खुर्शीद—सात साल की कुर्सी या कथित सिंडिकेट की जड़?
सूत्रों के अनुसार एन. खुर्शीद लगभग सात वर्षों तक गेवरा रोड सेल जैसे आर्थिक रूप से संवेदनशील पद पर तैनात रहे। शिकायत उठी कि किसी अधिकारी को इतने लंबे समय तक एक ही संवेदनशील व्यवस्था में क्यों रखा गया। लेकिन आरोप है कि शिकायत के बाद जांच और जवाबदेही तय करने के बजाय उन्हें पदोन्नति अथवा अधिक प्रभावशाली जिम्मेदारी के साथ दीपका भेज दिया गया।
यहां सवाल तीखा है—
शिकायत मिली तो नेटवर्क की जांच हुई या अधिकारी को दूसरी बड़ी कुर्सी देकर कथित प्रभाव का क्षेत्र बढ़ा दिया गया?
एसईसीएल को स्पष्ट करना चाहिए:
– एन. खुर्शीद गेवरा रोड सेल में किस तारीख से किस तारीख तक रहे?
– उनके पास कोयला आवंटन, स्टॉक और लोडिंग संबंधी कौन-से अधिकार थे?
– संवेदनशील पद के लिए निर्धारित कार्यकाल कितना है?
– उन्हें निर्धारित अवधि से अधिक समय तक किसके आदेश से रखा गया?
– उनके विरुद्ध कितनी शिकायतें प्राप्त हुईं?
– शिकायतों की विजिलेंस जांच हुई या नहीं?
– दीपका स्थानांतरण सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया थी या शिकायतों के बाद लिया गया निर्णय?
– क्या स्थानांतरण के साथ पदोन्नति दी गई?
– दीपका जाने के बाद भी उन्होंने गेवरा रोड सेल के मामलों में कोई प्रत्यक्ष या परोक्ष हस्तक्षेप किया?
यदि शिकायत के बाद केवल कार्यालय बदला, लेकिन कथित नेटवर्क की डोर उन्हीं हाथों में रही तो यह तबादला नहीं—सिंडिकेट का कथित विस्तार होगा।
दीपका की कुर्सी, गेवरा में कथित दखल—आखिर रिश्ता कितना गहरा?
सूत्रों का दावा है कि दीपका स्थानांतरण के बाद भी एन. खुर्शीद का गेवरा रोड सेल की गतिविधियों में प्रभाव बना रहा। आरोप है कि गेवरा में उनके पुराने कथित नेटवर्क की प्रमुख कड़ी लोडिंग व्यवस्था से जुड़े संतोष राठौर थे। यह भी दावा किया गया है कि संतोष राठौर के विरुद्ध शिकायत उठने पर खुर्शीद कथित रूप से पांच से सात कोयला लिफ्टरों के साथ तत्कालीन एरिया जीएम संजय मिश्रा के पास पहुंचे और राठौर को पद से नहीं हटाने की पैरवी कराई। हालांकि बताया गया है कि लगभग एक महीने के भीतर संतोष राठौर को उस जिम्मेदारी से हटा दिया गया।
यदि यह घटनाक्रम सही है तो कई प्रश्न एक साथ उठते हैं:
– दीपका में पदस्थ अधिकारी को गेवरा के लोडिंग कर्मचारी की कुर्सी बचाने में रुचि क्यों थी?
– वे लिफ्टर कौन थे जो संतोष राठौर को हटाए जाने से कथित रूप से चिंतित थे?
– उस कर्मचारी की पदस्थापना से किन कारोबारियों का आर्थिक हित जुड़ा था?
– शिकायत के बावजूद उसे बनाए रखने की पैरवी किस आधार पर हुई?
– संतोष राठौर को बाद में हटाया गया तो कार्रवाई का आधिकारिक कारण क्या था?
सरकारी कर्मचारी की कुर्सी बचाने के लिए निजी कारोबारियों का समूह सक्रिय हो जाए तो मामला केवल पदस्थापना का नहीं रहता। तब उस कुर्सी और कारोबारी लाभ के बीच कथित रिश्ते की जांच अनिवार्य हो जाती है।
सच्चाई इन रिकॉर्डों से सामने आ सकती है:
– एरिया जीएम कार्यालय का आगंतुक रजिस्टर;
– संबंधित अवधि के CCTV फुटेज;
– बैठक और फाइल नोटिंग;
– संतोष राठौर की पदस्थापना तथा स्थानांतरण फाइल;
– शिकायत रजिस्टर और कार्रवाई प्रतिवेदन;
– वैधानिक प्रक्रिया से प्राप्त कॉल रिकॉर्ड;
– खुर्शीद, राठौर, लिफ्टरों और संबंधित अधिकारियों के डिजिटल संपर्क।
“एलाओ” के नाम पर ₹10 से ₹50 प्रति टन—यह शुल्क है या कथित काला टैक्स?
गेवरा रोड सेल की वर्तमान व्यवस्था से जुड़े अधिकारी बताए जा रहे मारुति शंकर को लेकर सूत्रों ने बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं। आरोप है कि रोड सेल में “एलाओ” के नाम पर ₹10 से ₹50 प्रति टन तक की कथित अवैध वसूली की जाती है। कथित रकम कोयले की श्रेणी, उपलब्धता, वाहन, लोडिंग प्राथमिकता और खरीदार की “व्यवस्था” के आधार पर बदल सकती है। सूत्रों का दावा है कि इसी रकम से पूरे कथित तंत्र को “मैनेज” किया जाता है। आरोप यह भी है कि वसूली किसी लोडिंग इंस्पेक्टर के माध्यम से नहीं, बल्कि सीधे नियंत्रित की जाती है।
सबसे बड़ा प्रश्न है—
“एलाओ” आखिर कौन-सी अधिकृत मद है?
क्या एसईसीएल ने इसकी लिखित दर-सूची जारी की है?
क्या भुगतान की वैधानिक रसीद मिलती है?
क्या पैसा एसईसीएल के खाते में जमा होता है?
यदि नहीं, तो राष्ट्रीय कोयले की हर टन पर ₹10 से ₹50 का कथित निजी टैक्स किसकी अनुमति से लगाया गया?
और इसकी रकम किन-किन जेबों तक पहुंचती है?
मारुति शंकर और एसईसीएल प्रबंधन को स्पष्ट करना चाहिए कि रोड सेल की प्राथमिकता कौन तय करता है, “स्टॉक नहीं” बताने का आधार क्या है और प्रत्येक अनुमति का डिजिटल audit trail उपलब्ध है या नहीं।
“स्टॉक नहीं” से “लोडिंग शुरू”—कथित भुगतान के बाद कोयला पैदा करने वाला कौन-सा जादू?
सूत्रों का आरोप है कि कथित भुगतान से इनकार करने वाले खरीदारों को कई बार स्टॉक की कमी, तकनीकी बाधा अथवा लोडिंग समस्या बताई जाती है। वहीं प्रभावशाली अथवा कथित व्यवस्था में शामिल खरीदारों को उसी अवधि में कोयला उपलब्ध हो जाता है। कोयला धरती के भीतर बनने में लाखों वर्ष लगाता है।
लेकिन आरोप है कि गेवरा–दीपका की फाइलों में “व्यवस्था” होते ही वह कुछ घंटों में अनुपलब्ध से उपलब्ध हो जाता है!
इस कथित चमत्कार की जांच भूवैज्ञानिक नहीं करेंगे।
इसका सच निकलेगा:
– खरीदारवार प्रतीक्षा अवधि;
– स्टॉक रजिस्टर;
– कंप्यूटर लॉग;
– लोडिंग आदेश;
– DO modification history;
– अधिकारियों के login records;
– कॉल रिकॉर्ड;
– और संदिग्ध बैंक लेन-देन से।
जांच एजेंसी प्रत्येक खरीदार के लिए मिलान करे:
– DO कब जारी हुआ?
– वाहन कब पहुंचा?
– लोडिंग कितनी देर में हुई?
– किसे प्राथमिकता मिली?
– किसे स्टॉक नहीं बताया गया?
– उसी समय किन खरीदारों को कोयला मिला?
– अनुमति किस अधिकारी के लॉगिन से जारी हुई?
– संबंधित अवधि में किसी अधिकारी या मध्यस्थ के खाते में संदिग्ध रकम आई?
यदि ₹10–₹50 प्रति टन वैधानिक शुल्क है तो रसीद सामने आए।
यदि वैधानिक नहीं है तो “एलाओ” के नाम पर काटी जा रही कथित रकम किसकी जेब का अलाउंस है?
पार्थ मुखर्जी की निगरानी में प्रोडक्शन कोयला रास्ता कैसे भूल गया?
गेवरा परियोजना के प्रोजेक्ट जीएम बताए जा रहे पार्थ मुखर्जी की प्रशासनिक जवाबदेही भी गंभीर सवालों के घेरे में है। सूत्रों ने आरोप लगाया है कि प्रोडक्शन लाइन से निकला कोयला निर्धारित जीरो पॉइंट, रेलवे साइडिंग अथवा कॉमन फेस तक पहुंचने के बजाय कथित रूप से दूसरे स्थान पर मोड़ा जा सकता है। किसी अधिकारी की प्रत्यक्ष संलिप्तता केवल आरोप के आधार पर घोषित नहीं की जा सकती। लेकिन परियोजना प्रमुख की निगरानी में यदि कोयला निर्धारित गंतव्य तक नहीं पहुंचता तो जवाबदेही का प्रश्न स्वतः उठता है।
हर वाहन के लिए पूरी शृंखला का मिलान हो:
लोडिंग स्थल → जीरो पॉइंट → खदान कांटा → रेलवे साइडिंग/कॉमन फेस → गेट → अंतिम गंतव्य
साथ ही सुरक्षित किए जाएं:
– GPS history;
– RFID और FASTag;
– mine weighbridge का raw data;
– गेट प्रवेश एवं निकासी;
– CCTV फुटेज;
– ट्रांसपोर्ट चालान;
– destination weighment;
– buyer inward register;
– dispatch software audit trail;
– अधिकारियों के login एवं approval records।
यदि वाहन अनुमोदित मार्ग पर गए और कोयला निर्धारित स्थान पर पहुंचा तो आरोप समाप्त हो जाएगा। यदि GPS, कांटा और destination record अलग-अलग कहानी सुनाते हैं तो कोयले की काली सड़क सीधे जिम्मेदार कुर्सियों तक पहुंचेगी।
रुंगटा का कोयला—साइडिंग पहुंचा या ₹120 प्रति टन में बिक गया?
गेवरा परियोजना में कार्यरत रुंगटा कंपनी से संबंधित एक हालिया आरोप ने पूरे कथित सिंडिकेट को लेकर नया प्रश्न खड़ा किया है। सूत्रों का दावा है कि प्रोडक्शन लाइन का कोयला जीरो पॉइंट से रेलवे साइडिंग अथवा रोड सेल के निर्धारित कॉमन फेस तक पहुंचना था, लेकिन उसे बीच रास्ते में कथित रूप से डायवर्ट कर निजी कारोबार में खपाया गया। कथित रूप से करीब ₹120 प्रति टन में कोयले के आगे सौदे की बात कही गई है। संबंधित अंतिम खरीदार, ट्रांसपोर्टर और भुगतान की स्वतंत्र पुष्टि अभी शेष है।
इसलिए जांच में स्पष्ट किया जाए:
– रुंगटा कंपनी का मूल कार्यादेश क्या था?
– परिवहन का काम किस अधिकृत एजेंसी को दिया गया?
– क्या कार्य आगे किसी उप-ठेके में दिया गया?
– प्रत्येक वाहन कहां से लोड हुआ?
– उसे किस स्थान पर जाना था?
– GPS के अनुसार वाहन वास्तव में कहां गया?
– कोयला किस कांटे पर तौला गया?
– अंतिम स्टॉक किसके खाते में दर्ज हुआ?
– ₹120 प्रति टन से संबंधित कोई भुगतान अथवा लेखा रिकॉर्ड उपलब्ध है?
– अंतिम आर्थिक लाभार्थी कौन था?
– एसईसीएल के किस अधिकारी ने destination verification किया?
स्पष्ट वाहन-आधारित आरोप सामने आने के बाद एसईसीएल केवल मौखिक खंडन देकर मामले पर कोयले की राख नहीं डाल सकता।
रांची की कथित व्यावसायिक संपत्ति—आय से बनी या आरोप की धुंध?
सूत्रों ने एन. खुर्शीद अथवा उनसे जुड़े व्यक्तियों का झारखंड के रांची क्षेत्र में किसी बड़े व्यावसायिक परिसर अथवा “बिग बाजार मॉल” जैसे निवेश से संबंध होने का दावा किया है। ग्राम यात्रा इस कथित संपत्ति के स्वामित्व, मूल्य अथवा खुर्शीद से संबंध की स्वतंत्र पुष्टि नहीं करता। दस्तावेज के बिना इसे उनकी संपत्ति, बेनामी निवेश अथवा अवैध कमाई घोषित नहीं किया जा सकता।
लेकिन जांच होनी चाहिए:
– खुर्शीद, उनके पति/पत्नी और आश्रितों के नाम कितनी भूमि एवं व्यावसायिक संपत्ति है?
– संबंधित संपत्ति किस वर्ष और कितनी कीमत पर खरीदी गई?
– निर्माण तथा निवेश की स्वीकृत लागत क्या थी?
– भुगतान का बैंक स्रोत क्या था?
– वार्षिक संपत्ति विवरण में उसका उल्लेख है?
– किसी रिश्तेदार, साझेदार, कंपनी या मुखौटा इकाई के नाम निवेश हुआ?
– घोषित आय और संभावित निवेश में कोई असामान्य अंतर है?
संपत्ति रखना अपराध नहीं। लेकिन सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति की घोषित आय और वास्तविक निवेश में बड़ा अंतर मिले तो वह केवल निजी मामला भी नहीं रह जाता। इस आरोप का फैसला विशेषणों से नहीं—रजिस्ट्री, कंपनी रिकॉर्ड, बैंक खाते, आयकर विवरण और वार्षिक संपत्ति घोषणा से होगा।जांच के केंद्र में खुर्शीद क्यों?
सूत्रों द्वारा एन. खुर्शीद को कथित सिंडिकेट का केंद्रीय चेहरा बताए जाने के पीछे पांच प्रमुख आधार रखे गए हैं:
1. करीब सात वर्ष तक गेवरा रोड सेल जैसे संवेदनशील पद पर तैनाती।
2. शिकायत के बाद कार्रवाई के बजाय कथित पदोन्नति।
3. दीपका स्थानांतरण के बावजूद गेवरा रोड सेल में कथित हस्तक्षेप।
4. संतोष राठौर को पद पर बनाए रखने के लिए कथित पैरवी।
5. पुराने लिफ्टर नेटवर्क और कथित संपत्ति से जुड़े गंभीर आरोप।
ये परिस्थितियां अपने आप अपराध सिद्ध नहीं करतीं। लेकिन इतनी परिस्थितियां एक साथ हों तो स्वतंत्र जांच से इनकार भी नहीं किया जा सकता। खदानें दो, कथित सिंडिकेट एक—जांच भी संयुक्त हो गेवरा और दीपका की जांच अलग-अलग फाइलों में बांटने से कथित नेटवर्क की पूरी तस्वीर सामने नहीं आएगी।
जांच एजेंसी को दोनों खदानों का संयुक्त परीक्षण करना चाहिए:
– गेवरा और दीपका के रोड सेल रिकॉर्ड;
– खरीदारवार DO;
– कोयले की उपलब्धता एवं प्राथमिकता;
– लोडिंग की प्रतीक्षा अवधि;
– अधिकारीवार login trail;
– समान लिफ्टरों और ट्रांसपोर्टरों की मौजूदगी;
– कॉल एवं संपर्क नेटवर्क;
– संवेदनशील पदों की पदस्थापना;
– शिकायत के बाद हुए स्थानांतरण;
– अधिकारियों की वार्षिक संपत्ति घोषणा;
– संदिग्ध वित्तीय लेन-देन।
यदि दोनों खदानों में समान कारोबारी, समान कर्मचारी, समान कथित वसूली-पद्धति और समान प्रभावशाली अधिकारी दिखाई देते हैं तो “दो परियोजनाएं” कहकर मामले को अलग नहीं किया जा सकता।
तब यह जांचना होगा कि कहीं सरकारी सीमाएं अलग और कथित सिंडिकेट की सल्तनत एक तो नहीं?
तत्काल सुरक्षित हों डिजिटल प्रमाण
एसईसीएल मुख्यालय, सतर्कता विभाग और सक्षम जांच एजेंसी तत्काल सुरक्षित करें:
– एन. खुर्शीद की गेवरा एवं दीपका पदस्थापना फाइल;
– संतोष राठौर की शिकायत और स्थानांतरण रिकॉर्ड;
– मारुति शंकर के अधिकार तथा approval logs;
– पार्थ मुखर्जी के कार्यकाल का production-dispatch record;
– रुंगटा कंपनी और संबंधित परिवहन एजेंसियों के कार्यादेश;
– वाहनवार GPS, RFID और FASTag history;
– weighbridge का मूल raw data;
– गेट पास और CCTV archive;
– रेलवे साइडिंग एवं कॉमन फेस की दैनिक प्राप्ति;
– DO modification और login trail;
– “एलाओ” नामक कथित शुल्क की वैधानिकता;
– संबंधित अधिकारियों की annual property returns;
– संदिग्ध कारोबारियों और मध्यस्थों से जुड़े वैधानिक वित्तीय रिकॉर्ड।
जांच की घोषणा के बाद रिकॉर्ड सुरक्षित करना पर्याप्त नहीं होगा। पहले रिकॉर्ड सुरक्षित हों, फिर जांच सार्वजनिक की जाए—वरना डिजिटल पदचिह्न धोने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
भ्रष्टाचार पर प्रहार—व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं इस खबर का उद्देश्य किसी व्यक्ति को बिना जांच अपराधी घोषित करना नहीं है। पत्रकारिता का निशाना किसी की जाति, धर्म, निजी जीवन अथवा पद नहीं—बल्कि कथित भ्रष्टाचार, अवैध वसूली और राष्ट्रीय संपत्ति की संभावित हेराफेरी है। यदि आरोप गलत हैं तो नामित अधिकारी अपने पदस्थापना आदेश, संपत्ति विवरण, कॉल रिकॉर्ड से संबंधित वैधानिक स्पष्टीकरण और डिस्पैच रिकॉर्ड सामने रखें। दस्तावेज उन्हें आरोपों से मुक्त कर देंगे।
लेकिन यदि रेलवे साइडिंग का कोयला निजी स्टॉक में गिराया गया, “एलाओ” के नाम पर ₹10–₹50 प्रति टन लिया गया और गेवरा–दीपका में एक ही नेटवर्क ने कोयले की उपलब्धता को निजी कारोबार बना दिया—तो चुप्पी भी प्रशासनिक जवाब बन जाएगी।
एसईसीएल मुख्यालय से सीधा सवाल
क्या एसईसीएल मुख्यालय गेवरा–दीपका में कथित रूप से सक्रिय साझा सिंडिकेट की संयुक्त स्वतंत्र जांच कराएगा?
क्या एन. खुर्शीद के सात वर्षीय गेवरा कार्यकाल, दीपका पदस्थापना, संतोष राठौर प्रकरण और संपत्ति संबंधी आरोपों की जांच होगी?
क्या मारुति शंकर से जुड़ी ₹10–₹50 प्रति टन कथित “एलाओ” वसूली का वित्तीय ट्रेल खोजा जाएगा?
क्या पार्थ मुखर्जी की निगरानी अवधि में प्रोडक्शन कोयले के source-to-destination records मिलाए जाएंगे?
क्या रुंगटा कंपनी से जुड़े प्रत्येक वाहन का GPS और कांटा रिकॉर्ड सुरक्षित किया जाएगा?
या गेवरा–दीपका की काली धरती पर उठे ये आरोप भी विभागीय फाइलों की कोयला-धूल में दफन कर दिए जाएंगे?
कोयला काला है—लेकिन हिसाब उससे भी काला नहीं रह सकता गेवरा और दीपका देश की ऊर्जा व्यवस्था की धमनियां हैं। यहां से निकला प्रत्येक टन कोयला राष्ट्रीय संपत्ति है—किसी अधिकारी, लिफ्टर, ठेकेदार या ट्रांसपोर्टर की निजी जागीर नहीं। यदि राष्ट्रीय कोयले पर कथित निजी टैक्स लगाया गया, स्टॉक की उपलब्धता बेची गई, प्रोडक्शन लाइन मोड़ी गई और संवेदनशील कुर्सियों को नेटवर्क की चौकी बना दिया गया तो यह साधारण अनियमितता नहीं—राष्ट्रीय संपत्ति की छाती पर खड़ा कथित संगठित लूट-तंत्र होगा।
अब छोटी मछलियों पर जाल डालकर तस्वीर खिंचवाने से काम नहीं चलेगा।
हर नाम की भूमिका जांची जाए।
हर संपत्ति का स्रोत खुले।
हर DO का इतिहास निकले।
हर कांटे का raw data सुरक्षित हो।
हर वाहन की GPS यात्रा पढ़ी जाए।
हर संदिग्ध भुगतान का बैंक ट्रेल खोजा जाए।
और हर उस कुर्सी से जवाब लिया जाए जिसकी निगरानी में कोयला रास्ता भूलता रहा।
क्या गेवरा–दीपका की दो खदानों पर एक ही कथित सिंडिकेट का राज है?
क्या एन. खुर्शीद इस पूरे कथित खेल के मास्टरमाइंड हैं?
उत्तर प्रेस विज्ञप्ति से नहीं मिलेगा। उत्तर आएगा—कॉल रिकॉर्ड, संपत्ति विवरण, GPS, कांटा पर्ची, CCTV और बैंक खातों से।
जल्द बड़ा खुलासा
गेवरा से दीपका तक संवेदनशील कुर्सियों की पूरी शृंखला—किसे हटाया गया, किसे पदोन्नति मिली और किसने किसकी कुर्सी बचाई?
रुंगटा कंपनी का कथित कोयला खेल—वाहन कहां से चले, कहां पहुंचने थे और वास्तव में कहां खाली हुए?
रांची की कथित व्यावसायिक संपत्ति—दावे में कितना दम और वास्तविक लाभार्थी कौन?
पड़ताल जारी है…
संपादक – अब्दुल सुल्तान
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क
संक्षिप्त संपादकीय नोट
इस समाचार में उल्लिखित वसूली, प्रभाव, डायवर्जन, नेटवर्क और संपत्ति संबंधी विवरण सूत्रों से प्राप्त जांच योग्य आरोप हैं; इन्हें प्रमाणित तथ्य या दोष-सिद्धि नहीं माना गया है। सभी नामित पक्षों का दस्तावेजी जवाब प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
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