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गेवरा रोड सेल के ‘काले सिंडिकेट’ का कथित सरगना कौन—एन. खुर्शीद जांच के सबसे बड़े घेरे में!

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सात साल संवेदनशील कुर्सी, दीपका तबादले के बाद भी गेवरा में कथित पकड़—खुर्शीद, मारुति शंकर, संतोष राठौर और पार्थ मुखर्जी की भूमिका पर उठे विस्फोटक सवाल

 

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एलाओ” के नाम पर ₹10–₹50 प्रति टन कथित वसूली; रुंगटा का कोयला सोनू राठौर–मनजीत यादव के रास्ते अशोक तीव्रता/तिवरता को ₹120 प्रति टन में सौंपे जाने का आरोप—GPS, कांटा, कॉल और बैंक ट्रेल पर टिकी सच्चाई

 

 

रांची से पुरी–जयपुर तक कथित संपत्ति साम्राज्य की शिकायत तैयार—क्या SECL विजिलेंस के बाद CVC, CBI, आयकर, बेनामी इकाई और ED तक पहुंचेगी आंच?

 

कोरबा | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क गेवरा की धरती से कोयला निकलता है—लेकिन आरोप है कि इसी काले कोयले के बीच एक ऐसा कथित सिंडिकेट भी फलता रहा, जिसने सरकारी व्यवस्था की छाती पर अपना निजी वसूली-काउंटर खोल दिया।

कथित खेल का नियम बेहद सीधा बताया जा रहा है

रकम दो तो कोयला उपलब्ध।
रकम नहीं तो “स्टॉक खत्म”।
व्यवस्था बनाओ तो लोडिंग शुरू।
और सवाल उठाओ तो फाइल, वाहन और अनुमति रोक दो!

सूत्रों ने इस कथित काले तंत्र के केंद्र में वर्तमान दीपका एरिया सेल्स मैनेजर तथा गेवरा के पूर्व रोड सेल प्रभारी बताए जा रहे एन. खुर्शीद का नाम रखा है। आरोप है कि करीब सात वर्षों तक गेवरा रोड सेल की संवेदनशील कुर्सी पर रहते हुए जो कथित नेटवर्क तैयार हुआ, वह खुर्शीद के दीपका स्थानांतरण के बाद समाप्त नहीं हुआ। कुर्सी बदल गई, परियोजना बदल गई—मगर गेवरा के पुराने लिफ्टरों, लोडिंग व्यवस्था और कथित वसूली-तंत्र पर प्रभाव बना रहा।

क्या एन. खुर्शीद केवल अधिकारी—या गेवरा–दीपका के कथित कोयला साम्राज्य के “रिमोट कंट्रोल”?

सात वर्ष तक संवेदनशील रोड सेल व्यवस्था की कमान कोई मामूली प्रशासनिक तथ्य नहीं। सूत्रों का आरोप है कि खुर्शीद के कार्यकाल में लिफ्टरों, लोडिंग व्यवस्था और कोयला कारोबारियों का ऐसा कथित गठजोड़ विकसित हुआ, जिसकी पकड़ स्थानांतरण के बाद भी ढीली नहीं पड़ी। तीन वर्ष से अधिक समय तक संवेदनशील पद पर बने रहने की शिकायत उठी तो अपेक्षा थी कि पुराने आवंटन, लोडिंग, प्राथमिकता और कारोबारी संपर्कों की सतर्कता जांच होगी।

लेकिन आरोप है कि कठोर कार्रवाई के बजाय खुर्शीद को पदोन्नति अथवा अधिक प्रभावशाली जिम्मेदारी के साथ दीपका भेज दिया गया।

अब एसईसीएल बताए

शिकायत के बाद जांच हुई या कुर्सी का पता बदल दिया गया?
– सात वर्ष के कार्यकाल का विशेष ऑडिट क्यों नहीं हुआ?
– दीपका स्थानांतरण के बाद खुर्शीद का गेवरा के मामलों से क्या संबंध रहा?
– उनके पुराने कार्यकाल में किन लिफ्टरों को सर्वाधिक लाभ मिला?
– शिकायतों के बावजूद पदोन्नति किस आधार पर दी गई?
– क्या वार्षिक संपत्ति विवरण और वास्तविक निवेश का कभी मिलान हुआ?

 

यदि शिकायतों के बाद अधिकारी का स्थान बदला, लेकिन कथित नेटवर्क उन्हीं संकेतों पर चलता रहा, तो इसे तबादला नहीं—सिंडिकेट का विस्तार कहा जाएगा।

खुर्शीद–संतोष राठौर की कथित जुगलबंदी—लोडिंग की नाड़ी पर किसका हाथ था?

सूत्रों के अनुसार गेवरा में खुर्शीद के पुराने कथित नेटवर्क की महत्वपूर्ण कड़ी संतोष राठौर थे, जो लोडिंग व्यवस्था से जुड़े बताए गए हैं। आरोप है कि संतोष राठौर के विरुद्ध शिकायत उठने पर खुर्शीद कथित रूप से पांच से सात कोयला लिफ्टरों को लेकर तत्कालीन एरिया जीएम संजय मिश्रा के पास पहुंचे और राठौर को पद से नहीं हटाने की पैरवी की। हालांकि बताया जाता है कि लगभग एक महीने के भीतर राठौर को संबंधित जिम्मेदारी से हटा दिया गया।

यहां प्रश्न किसी निजी संबंध का नहीं—करोड़ों के कोयला कारोबार से जुड़ी संवेदनशील कुर्सी का है।

दीपका में पदस्थ अधिकारी को गेवरा के लोडिंग कर्मचारी की कुर्सी बचाने में इतनी दिलचस्पी क्यों थी?

 

वे लिफ्टर कौन थे जो राठौर को हटाए जाने से कथित रूप से बेचैन थे?

 

राठौर के उस पद पर बने रहने से किन कारोबारियों को आर्थिक सुविधा मिलती थी?

 

यदि यह केवल सामान्य प्रशासनिक आग्रह था तो बैठक, फाइल नोटिंग और आगंतुक रजिस्टर सामने रखा जाए। और यदि वहां निजी कारोबारी हित मौजूद था, तो कॉल रिकॉर्ड और वित्तीय संबंध कथित सिंडिकेट की नसें खोल सकते हैं।

मारुति शंकर की रोड सेल व्यवस्था में कथित “एलाओ टैक्स”—₹10 से ₹50 प्रति टन किसकी जेब में?

वर्तमान गेवरा रोड सेल प्रभारी बताए जा रहे मारुति शंकर को लेकर आरोप और भी विस्फोटक हैं। सूत्रों का दावा है कि रोड सेल में “एलाओ” के नाम पर ₹10 से ₹50 प्रति टन तक कथित अवैध वसूली की जाती है। कोयले की श्रेणी, खरीदार, वाहन, प्राथमिकता और लोडिंग सुविधा के अनुसार कथित दर बदलने की बात कही जा रही है।

यदि एक दिन में हजारों टन कोयला निकलता है, तो प्रति टन काटी जा रही कथित रकम का कुल आकार कितना होगा?
लाखों?
करोड़ों?
या वर्षों में ऐसा अघोषित कोष, जिसकी काली धार ऊपर तक बहती रही?

 

मारुति शंकर और एसईसीएल प्रबंधन स्पष्ट करें—

– “एलाओ” कौन-सा वैधानिक शुल्क है?
– इसका लिखित आदेश और निर्धारित दर कहां है?
– भुगतान पर एसईसीएल की रसीद मिलती है या नहीं?
– रकम कंपनी के खाते में जाती है अथवा किसी निजी माध्यम से?
– खरीदारों को “स्टॉक नहीं” बताने का निर्णय किस लॉगिन से होता है?
– कथित भुगतान के बाद अचानक कोयला उपलब्ध कैसे हो जाता है?
यदि “एलाओ” वैधानिक है तो रसीद दिखाइए।
यदि वैधानिक नहीं है तो राष्ट्रीय कोयले पर यह कथित निजी टैक्स किसका है?

रुंगटा का कोयला बीच रास्ते किसने निगला? सोनू राठौर–मनजीत यादव और अशोक तीव्रता/तिवरता की भूमिका पर सवालमामला केवल कथित वसूली का नहीं—कोयले की संभावित अफरातफरी का भी है।

सूत्रों का आरोप है कि गेवरा परियोजना में कार्यरत रुंगटा कंपनी से संबंधित प्रोडक्शन कोयला जीरो पॉइंट से रेलवे साइडिंग अथवा निर्धारित कॉमन फेस तक पहुंचना था, लेकिन बीच रास्ते उसका कथित डायवर्जन किया गया। आरोपों में रुंगटा का काम पेटी में लेने वाले बताए जा रहे सोनू राठौर और मनजीत यादव का नाम सामने आया है। दावा है कि उनके माध्यम से लिफ्टिंग कराया गया कोयला कथित रूप से अशोक तीव्रता/तिवरता ट्रांसपोर्ट को करीब ₹120 प्रति टन की दर से दिया गया। यह आरोप अभी प्रमाणित नहीं है। लेकिन वाहनवार जांच हुई तो सच अधिक देर छिप नहीं सकता।

जांच एजेंसी पूछे

– मूल कार्यादेश किस कंपनी को मिला?
– पेटी ठेका किस लिखित अनुमति से दिया गया?
– सोनू राठौर और मनजीत यादव की वास्तविक भूमिका क्या थी?
– वाहन किस स्थान से लोड हुए?
– निर्धारित गंतव्य क्या था?
– GPS के अनुसार वाहन कहां गए?
– किस कांटे पर वजन हुआ?
– किस स्टॉक में कोयला दर्ज किया गया?
– ₹120 प्रति टन की कथित रकम किसने दी और किसने प्राप्त की?
– अंतिम आर्थिक लाभार्थी कौन था?

एक तरफ कांटा पर्ची और दूसरी तरफ GPS—दोनों का सच मिल गया तो कोयला कहां गया, किसने बेचा और किसने आंखें बंद रखीं, सब सामने आ जाएगा।

पार्थ मुखर्जी की निगरानी में कोयला रास्ता भूला—तो जवाबदेही किसकी?

गेवरा परियोजना के प्रोजेक्ट जीएम बताए जा रहे पार्थ मुखर्जी की प्रत्यक्ष संलिप्तता अभी प्रमाणित नहीं है। लेकिन परियोजना प्रमुख होने के नाते प्रशासनिक जवाबदेही से उन्हें अलग भी नहीं किया जा सकता।

यदि प्रोडक्शन लाइन का कोयला निर्धारित साइडिंग तक नहीं पहुंचा तो दैनिक source-to-destination reconciliation किसने किया?
यदि कांटा मात्रा और साइडिंग प्राप्ति में अंतर था तो अलार्म क्यों नहीं बजा?
यदि GPS मार्ग से वाहन भटके तो उन्हें किसने नहीं रोका?
यदि पेटी ठेकेदार को कोयला बेचने की कथित खुली छूट मिली तो प्रबंधन की निगरानी कहां सो रही थी?

 

परियोजना प्रमुख की जिम्मेदारी केवल उत्पादन का आंकड़ा बढ़ाना नहीं—हर टन राष्ट्रीय संपत्ति को निर्धारित गंतव्य तक पहुंचाना भी है।

रांची, पुरी और जयपुर में कथित संपत्ति—कोयले की कालिख से खड़ा हुआ साम्राज्य या वैध आय?

 

सूत्रों ने एन. खुर्शीद तथा कथित रूप से उनसे जुड़े व्यक्तियों के संबंध में छत्तीसगढ़ से बाहर बड़े निवेश के दावे किए हैं।

शिकायतकर्ता पक्ष द्वारा:

– रांची में कथित व्यावसायिक परिसर अथवा मॉल;
– पुरी में करीब ₹300 करोड़ मूल्य के कथित होटल निवेश;
– जयपुर में लगभग ₹150 करोड़ मूल्य की कथित होटल अथवा व्यावसायिक संपत्ति;
– और कुछ संपत्तियां पत्नी, बच्चों, रिश्तेदारों अथवा करीबियों के नाम रखे जाने की आशंका जताई गई है।

इन दावों का स्वामित्व और मूल्य अभी स्वतंत्र रूप से प्रमाणित नहीं है। ग्राम यात्रा किसी संपत्ति को खुर्शीद की अथवा अवैध संपत्ति घोषित नहीं करता।

लेकिन सवाल जहरीला है

सरकारी वेतन से इतना कथित साम्राज्य संभव है तो दस्तावेज सामने क्यों न आएं?

जांच एजेंसी वर्षवार मिलान करे:

संपत्ति कब खरीदी गई?
– रजिस्ट्री किसके नाम है?
– भुगतान किस बैंक खाते से हुआ?
– ऋण किसने लिया और किसने चुकाया?
– विभाग को सूचना अथवा अनुमति दी गई या नहीं?
– Annual Property Return में संपत्ति दिखाई गई या नहीं?
– परिवार की घोषित आय कितनी थी?
– किसी लिफ्टर, ट्रांसपोर्टर या ठेकेदार ने भुगतान तो नहीं किया?
– संपत्ति का वास्तविक नियंत्रण और लाभ किसके पास है?
– निवेश की अवधि और रोड सेल के कथित वसूली काल में क्या संबंध है?

संपत्ति वैध निकली तो आरोप समाप्त।

लेकिन आय और निवेश के बीच गहरी खाई मिली तो कोयले की काली सड़क रांची, पुरी और जयपुर तक जाती दिखाई दे सकती है। अब केवल विभागीय लीपापोती नहीं—CVC, CBI, आयकर और बेनामी इकाई तक जाएगी शिकायत. सूत्रों से मिली जानकारी और उपलब्ध सामग्री को समेटकर इस कथित नेटवर्क की विस्तृत शिकायत तैयार किए जाने की बात सामने आ रही है। शिकायत में पदस्थापना, कोयला आवंटन, कथित वसूली, वाहन डायवर्जन और संपत्ति संबंधी आरोपों को एक साथ रखने की तैयारी है।

मामले में मांग की जाएगी कि:

SECL और Coal India Vigilance संयुक्त जांच करें;
– CVC को संवेदनशील पदों एवं कथित भ्रष्टाचार का विवरण भेजा जाए;
– प्रथमदृष्टया साक्ष्य मिलने पर CBI की भ्रष्टाचार निरोधक शाखा जांच करे;
– आयकर विभाग कथित संपत्तियों और घोषित आय का मिलान करे;
– भुगतानकर्ता और वास्तविक लाभार्थी अलग मिलने पर बेनामी निषेध इकाई परीक्षण करे;
– और किसी अनुसूचित अपराध से उत्पन्न अपराध की आय का आधार मिलने पर ED धनशोधन के पहलू की जांच करे।

यह कहना अभी उचित नहीं होगा कि नामित अधिकारी ED अथवा CBI की औपचारिक रडार पर हैं। लेकिन दस्तावेजी शिकायत, बैंक ट्रेल और कोयला डायवर्जन के प्रमाण सामने आए तो केंद्रीय एजेंसियों की जांच की आंच संबंधित कुर्सियों तक पहुंचने से इनकार नहीं किया जा सकता। बड़ी शिकायत से पहले मिटने न पाए डिजिटल पदचिह्न

जांच की घोषणा से पहले सुरक्षित किए जाएं:

1. एन. खुर्शीद के सात वर्षीय गेवरा कार्यकाल की पदस्थापना एवं शिकायत फाइल।
2. दीपका स्थानांतरण और कथित पदोन्नति का पूरा रिकॉर्ड।
3. खुर्शीद, संतोष राठौर, मारुति शंकर, संबंधित लिफ्टरों और कारोबारियों के कानूनन प्राप्त संपर्क रिकॉर्ड।
4. संतोष राठौर की पदस्थापना बचाने की कथित बैठक का आगंतुक रजिस्टर और फाइल नोटिंग।
5. रुंगटा तथा पेटी ठेकेदारों के कार्यादेश एवं भुगतान।
6. सोनू राठौर, मनजीत यादव और अशोक तीव्रता/तिवरता से संबंधित कारोबारी रिकॉर्ड।
7. वाहनवार GPS, RFID, FASTag और गेट लॉग।
8. खदान कांटे का मूल raw data और संशोधन इतिहास।
9. रेलवे साइडिंग एवं कॉमन फेस की प्राप्ति मात्रा।
10. “एलाओ” वसूली से जुड़े बैंक, नकद और मध्यस्थों के वित्तीय निशान।
11. अधिकारियों की वार्षिक संपत्ति विवरणियां और विभागीय अनुमति।
12. परिवारजनों अथवा संबंधित कंपनियों के निवेश का वास्तविक स्रोत।

खुर्शीद जांच के केंद्र में—लेकिन पूरा कथित गिरोह दायरे में आए जांच किसी एक नाम पर शुरू होकर उसी नाम पर समाप्त नहीं होनी चाहिए।
एन. खुर्शीद के पुराने और वर्तमान प्रभाव की जांच हो।
संतोष राठौर की लोडिंग व्यवस्था एवं कथित लिफ्टर संबंध जांचे जाएं।
मारुति शंकर के कार्यकाल में “एलाओ” के नाम पर कथित वसूली का वित्तीय ट्रेल निकाला जाए।

 

पार्थ मुखर्जी की निगरानी अवधि में प्रत्येक टन का source-to-destination मिलान हो।

 

सोनू राठौर और मनजीत यादव से जुड़े पेटी ठेके तथा लिफ्टिंग रिकॉर्ड खोले जाएं।

 

अशोक तीव्रता/तिवरता ट्रांसपोर्ट और कथित ₹120 प्रति टन सौदे का बैंक एवं परिवहन रिकॉर्ड जांचा जाए।

 

रुंगटा तथा एसएस अर्थमूवर्स सहित प्रत्येक संबंधित कंपनी से मूल कार्यादेश, उप-ठेका, वाहन और भुगतान विवरण लिया जाए।

 

यदि सभी आरोप गलत हैं तो यही जांच प्रत्येक नाम को बेदाग करेगी। लेकिन यदि सभी कड़ियां एक ही नियंत्रण-कक्ष तक पहुंचीं, तो यह कुछ कर्मचारियों की मनमानी नहीं—राष्ट्रीय संपत्ति पर बैठा कथित संगठित कोयला सिंडिकेट होगा।

एसईसीएल मुख्यालय से ग्राम यात्रा के सीधे सवाल

क्या एन. खुर्शीद के सात वर्षीय गेवरा रोड सेल कार्यकाल का विशेष सतर्कता ऑडिट होगा?
क्या दीपका स्थानांतरण के बाद गेवरा में उनके कथित हस्तक्षेप की जांच होगी?
क्या संतोष राठौर को बचाने के लिए हुई कथित पैरवी का रिकॉर्ड खोला जाएगा?
क्या मारुति शंकर के कार्यकाल में “एलाओ” नामक ₹10–₹50 प्रति टन कथित काले टैक्स का हिसाब निकलेगा?
क्या पार्थ मुखर्जी की निगरानी में निकले प्रत्येक वाहन का GPS और कांटा मिलाया जाएगा?
क्या रुंगटा का कथित डायवर्ट कोयला ₹120 प्रति टन में बेचने वाले अंतिम लाभार्थी तक जांच पहुंचेगी?
क्या रांची, पुरी और जयपुर की आरोपित संपत्तियों को वार्षिक संपत्ति विवरण और वैध आय से मिलाया जाएगा?
या फिर छोटी मछलियों पर कार्रवाई दिखाकर कथित मगरमच्छों को कोयले की कालिख में छिपा दिया जाएगा?
कोयले की काली कमाई से कथित संपत्ति का सफेद साम्राज्य? अब हिसाब होगा

गेवरा का प्रत्येक टन कोयला राष्ट्रीय संपत्ति है—किसी अधिकारी, लिफ्टर, पेटी ठेकेदार अथवा ट्रांसपोर्टर की निजी जागीर नहीं।

यदि “एलाओ” के नाम पर कथित टैक्स काटा गया—
यदि निर्धारित साइडिंग का कोयला निजी स्टॉक में गिराया गया—
यदि ₹120 प्रति टन में राष्ट्रीय संपत्ति का कथित सौदा हुआ—
यदि संवेदनशील कुर्सियों ने नेटवर्क को संरक्षण दिया—
और यदि उसी कमाई से दूसरे राज्यों में संपत्ति खड़ी की गई
तो यह साधारण अनियमितता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संपत्ति की छाती पर बैठा कथित संगठित लूट-तंत्र होगा।
अब फाइलों की धूल नहीं—डिजिटल फॉरेंसिक जांच चाहिए।
अब मौखिक सफाई नहीं—रजिस्ट्री, GPS, कांटा और बैंक ट्रेल चाहिए।
अब छोटे कर्मचारियों की बलि नहीं—पूरी कमांड चेन की जवाबदेही चाहिए।

जल्द बड़ी शिकायत—संभावित कार्रवाई की आंच किस-किस कुर्सी तक पहुंचेगी?

खुर्शीद से कथित लिफ्टर नेटवर्क तक, “एलाओ” वसूली से कथित संपत्ति साम्राज्य तक और रुंगटा के कोयले से ₹120 प्रति टन सौदे तक—नाम, भूमिका एवं उपलब्ध दस्तावेजों के साथ सक्षम केंद्रीय एजेंसियों के समक्ष शिकायत की तैयारी।

जल्द बड़ा खुलासा

गेवरा–दीपका की संवेदनशील कुर्सियों का पूरा नक्शा: किसे संरक्षण मिला, किसने किसकी कुर्सी बचाई, कौन-सा वाहन रास्ता भूला और कथित काली कमाई आखिर किस संपत्ति में लगी? पड़ताल जारी है…

संपादक—अब्दुल सुल्तान
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क

«संपादकीय स्पष्टीकरण: समाचार में उल्लिखित वसूली, कोयला डायवर्जन, नेटवर्क, कारोबारी संबंध और संपत्ति संबंधी विवरण सूत्रों एवं शिकायतकर्ता पक्ष से प्राप्त जांच योग्य आरोप हैं। इनकी स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि शेष है। किसी व्यक्ति को दोषी, किसी संपत्ति को अवैध अथवा किसी संस्था को आपराधिक नेटवर्क का हिस्सा घोषित नहीं किया गया है। नामित अधिकारियों, कंपनियों और व्यक्तियों का दस्तावेजी पक्ष आमंत्रित है तथा उसे प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।»

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