जांच में एक महत्वपूर्ण अंतर सामने आया है: नईदुनिया की 4 जुलाई 2026 की रिपोर्ट के अनुसार!!

सहायक अभियंता रुचि साहू को प्रभारी कार्यपालन अभियंता बनाते हुए कोरबा जोन का जोन कमिश्नर बनाया गया था। रिपोर्ट इस प्रभार को आयुक्त आशुतोष पांडेय के आदेश से जोड़ती है। लेकिन मूल आदेश, उनकी प्रमाणित शैक्षणिक योग्यता और लागू पात्रता नियम उपलब्ध नहीं मिले। इसलिए अभी उन्हें “अयोग्य अधिकारी” कहना प्रमाणित निष्कर्ष नहीं होगा।
इस नए तथ्य के साथ खबर का धारदार मसौदा:
सहायक अभियंता को दोहरा प्रभार, अब शिकायतों की बौछार—आयुक्त साहब, आदेश के साथ आधार भी दिखाइए! रुचि साहू की पात्रता पर सूत्रों के सवाल; ठेकेदारों ने दुर्व्यवहार और फाइलें रोकने की शिकायत की—कोरबा निगम में सेवा का संकल्प या जवाबदेही से परहेज?
कोरबा। प्रशासनिक कसावट के नाम पर अधिकारी को बड़ा दायित्व देना आसान है। उस दायित्व की पात्रता, चयन का आधार और कामकाज पर उठी शिकायतों का जवाब देना असली परीक्षा है। नगर निगम कोरबा में रुचि साहू के प्रभार और उनके विरुद्ध ठेकेदारों की शिकायतों ने यही परीक्षा निगम आयुक्त आशुतोष पाण्डेय के सामने रख दी है।
नईदुनिया की 4 जुलाई 2026 की रिपोर्ट में रुचि साहू को सहायक अभियंता बताते हुए उल्लेख किया गया है कि उन्हें प्रभारी कार्यपालन अभियंता और कोरबा जोन के जोन कमिश्नर का दायित्व दिया गया। रिपोर्ट के अनुसार प्रभार परिवर्तन का आदेश आयुक्त आशुतोष पांडेय ने जारी किया था। अब सूत्र इस दायित्व के लिए उनकी पात्रता पर सवाल उठा रहे हैं। इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। लेकिन निगम प्रशासन मूल प्रभार आदेश, लागू नियम और पात्रता परीक्षण का रिकॉर्ड सामने रखकर इसका स्पष्ट उत्तर दे सकता है।
कुर्सी सौंपने वाले आदेश पर हस्ताक्षर हैं, तो चयन के आधार पर जवाब भी होना चाहिए। “प्रशासनिक व्यवस्था” लिख देने से हर सवाल का दरवाजा बंद नहीं हो जाता।
पात्रता का सवाल—डिग्री, मूल पद और प्रभार का आधार स्पष्ट हो
इस मामले में शैक्षणिक योग्यता, नियमित पद और अतिरिक्त प्रभार को अलग-अलग जांचना जरूरी है। केवल सहायक अभियंता होने से किसी अतिरिक्त दायित्व के लिए अयोग्यता साबित नहीं होती। उसी तरह प्रभार मिल जाना उसके नियमसम्मत होने की जांच का विकल्प भी नहीं है।
आयुक्त स्पष्ट करें:
– रुचि साहू का प्रमाणित मूल पद और शैक्षणिक योग्यता क्या है?
– प्रभारी कार्यपालन अभियंता तथा जोन कमिश्नर का दायित्व किस आदेश और नियम के आधार पर दिया गया?
– संबंधित दायित्व के लिए अनुभव, वरिष्ठता और अन्य पात्रता का क्या परीक्षण हुआ?
– प्रभार की अवधि, अधिकार और सीमाएं क्या निर्धारित की गईं?
सवाल का जवाब रिकॉर्ड से दीजिए। पदनाम की चमक से पात्रता का परीक्षण नहीं होता। ठेकेदारों की शिकायत ने प्रभार की समीक्षा का सवाल उठाया। नगर निगम कांट्रेक्टर एसोसिएशन के 09 अक्टूबर 2026 के पत्र क्रमांक 041 में रुचि साहू पर ठेकेदारों से दुर्व्यवहार और भुगतान संबंधी फाइलों को बेवजह रोकने के आरोप लगाए गए हैं। अध्यक्ष असलम खान के हस्ताक्षर वाले पत्र में कहा गया है कि पूर्ण किए गए कार्यों अथवा चलित भुगतान की फाइलें कई दिनों तक रोकी जाती हैं। जानकारी मांगने पर अमर्यादित व्यवहार होने की शिकायत भी की गई है।
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय, उपमुख्यमंत्री अरुण साव, मंत्री लखनलाल देवांगन, मुख्य सचिव, कलेक्टर, आयुक्त और महापौर को संबोधित पत्र में कार्रवाई नहीं होने पर आंदोलन तथा निर्माण कार्य बंद करने की चेतावनी है। जिस प्रभार को प्रशासनिक कसावट बताया गया था, उसके कामकाज पर संगठन शिकायत कर रहा है। अब निगम बताए—शिकायत का परीक्षण हुआ या उसे भी किसी फाइल में रख दिया गया?
दो प्रतिशत मांगने का आरोप—निष्पक्ष जांच जरूरी
ठेकेदार अंकुश मिश्रा की पोर्टल शिकायत में फाइल रोकने और दुर्व्यवहार का आरोप है। उनके हस्तलिखित आवेदन में परफॉर्मेंस गारंटी संबंधी फाइल और दो प्रतिशत पैसे मांगने का आरोप भी दर्ज है। यह आरोप अभी प्रमाणित नहीं है। संबंधित फाइल का आवागमन, भुगतान की स्थिति और उपलब्ध साक्ष्य जांचे जाने चाहिए। रुचि साहू का पक्ष भी लिया जाए। आरोप गंभीर है तो जांच भी गंभीर हो। न शिकायत को बिना जांच सच घोषित किया जाए, न शिकायतकर्ता की बात को बिना परीक्षण हवा में उड़ाया जाए।
पुराने सवाल भी रिकॉर्ड मांग रहे हैं
ग्राम यात्रा की पूर्व कवरेज में पौधा खरीदी, HIG-30 भवन-अनुज्ञा, FD/FDR और डिवाइडर में मिट्टी–खाद की मात्रा पर प्रश्न उठाए गए हैं। इन विषयों की फाइलें अलग हैं, लेकिन प्रशासन से अपेक्षा एक है—स्पष्ट, अभिलेख आधारित उत्तर। पौधा खरीदी में निविदा और आपूर्ति का क्रम; HIG-30 में आपत्तियों का निस्तारण और स्वीकृति का आधार; FD/FDR में बैंक तथा लेखा रिकॉर्ड का मिलान; और मिट्टी–खाद में मात्रा की इकाई तथा गणना सार्वजनिक की जाए।
हर सवाल पर नई सफाई देने से बेहतर है मूल रिकॉर्ड खोलना। जनता का पैसा और सार्वजनिक अधिकार किसी कार्यालय की निजी संपत्ति नहीं हैं।
आयुक्त की जवाबदेही आदेश से शुरू होती है
उपलब्ध सामग्री से आयुक्त के अनुचित संरक्षण या किसी साजिश का प्रमाण स्थापित नहीं होता। लेकिन प्रभार देने के आधार और शिकायतों पर कार्रवाई का उत्तर आयुक्त को देना होगा।
क्या शिकायतों के बाद संबंधित दायित्व की समीक्षा हुई?
क्या जांच किसी ऐसे अधिकारी से कराई जाएगी जिसकी निष्पक्षता पर भरोसा हो?
क्या पात्रता के सवाल का उत्तर प्रमाणित रिकॉर्ड से दिया जाएगा?
निगम की छवि सवाल पूछने से नहीं बचती या बिगड़ती। उसकी छवि इस बात से बनती है कि सवाल आने पर प्रशासन तथ्य देता है, कार्रवाई करता है या जवाब टालता है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की सरकार के सेवा संकल्प की कसौटी भी यही है। शिकायतकर्ता को सम्मान, आवेदन पर निर्णय और निर्णय का स्पष्ट कारण मिलना चाहिए। आयुक्त साहब, जनता भाषण का सार नहीं—आदेश का आधार और कार्रवाई का हिसाब मांग रही है। सेवा का संकल्प फाइल पर फैसले में दिखाई दे, तभी उसका अर्थ है।
संपादकीय स्पष्टता: प्रभार संबंधी विवरण प्रकाशित समाचार रिपोर्ट पर आधारित है; मूल आदेश का सत्यापन शेष है। अयोग्यता का सूत्र-दावा और शिकायतों के आरोप स्वतंत्र रूप से प्रमाणित नहीं हैं। संबंधित अधिकारी तथा निगम प्रशासन का पक्ष मिलने पर प्रमुखता से प्रकाशित किया जाए।
संपादक – अब्दुल सुल्तान
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क
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