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बच्चों की सांसों पर कोयले की धूल का पहरा? तिवरता वाशरी पर शिकायतें—जिला प्रशासन मौन क्यों वाशरी संचालक को कौन दे रहा संरक्षण ?..

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हरनमुड़ी के ग्रामीणों का आरोप: स्कूलों, घरों और *भोजन तक पहुंच रही काली डस्ट; दो कलेक्टरों से शिकायत के बाद भी राहत नहीं—* निरीक्षण रिपोर्ट और प्रदूषण जांच के आंकड़े सार्वजनिक करने की मांग

 

 

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कोरबा/पाली | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क कक्षाओं तक कोयले की धूल पहुंचने की शिकायत है। बच्चों के भोजन पर काले कण गिरने का आरोप है। ग्रामीण राहत मांग रहे हैं। ऐसे में प्रशासन का जवाब फाइलों में नहीं, जमीन पर दिखाई देना चाहिए।  नेशनल हाईवे-130 पर लिम्हा टोल प्लाजा के समीप संचालित मेसर्स तिवरता कोल बेनिफिकेशन लिमिटेड को लेकर सामने आए आरोपों ने प्रदूषण नियंत्रण और प्रशासनिक निगरानी को कठघरे में खड़ा किया है।

ग्रामीणों का कहना है कि संयंत्र और उससे जुड़े परिवहन से उठती धूल हरनमुड़ी की आबादी तथा शिक्षण परिसरों तक पहुंच रही है।  कोरबा और बिलासपुर कलेक्टर से शिकायतों के बावजूद समस्या का समाधान नहीं होने का दावा किया गया है।  यदि शिकायत सही है, तो यह महज धूल की समस्या नहीं—निगरानी व्यवस्था की गंभीर विफलता है। और यदि प्रशासन इससे असहमत है, तो निरीक्षण रिपोर्ट तथा वैज्ञानिक जांच के आंकड़े सामने रखे।

बच्चों की थाली तक डस्ट का आरोप—जांच में देरी क्यों?

 

उपलब्ध शिकायत-विवरण में आंगनबाड़ी, प्राथमिक, माध्यमिक और हाईस्कूल परिसरों तक कोयले की धूल पहुंचने की बात कही गई है। ग्रामीणों का आरोप है कि मध्यान्ह भोजन तक इससे अछूता नहीं है।  बच्चों की आंखों में जलन, सांस लेने में परेशानी और त्वचा संबंधी समस्याओं की शिकायत भी सामने आई है। इनके कारण का चिकित्सकीय निर्धारण अभी उपलब्ध नहीं है।

लेकिन जांच की जरूरत तय करने के लिए बीमारी गंभीर होने का इंतजार क्यों हो? शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण विभाग को मौके पर जाकर कक्षाओं, रसोई, पेयजल और आसपास की हवा की स्थिति जांचनी चाहिए।

शिकायतों का सफर लंबा, राहत का इंतजार कायम

 

सरपंच मथुरा जगत सहित ग्रामीणों द्वारा दोनों जिलों के कलेक्टरों को लिखित आवेदन देने का दावा किया गया है। शिकायत में लगभग तीन हजार की आबादी और करीब 800 एकड़ कृषि भूमि पर असर की आशंका जताई गई है।

यहां प्रशासन से सीधा प्रश्न है:

 

शिकायत कब मिली?

जांच किसे सौंपी गई?

मौके पर कौन गया?

क्या पाया गया?

और ग्रामीणों को लिखित जवाब क्या दिया गया?

 

केवल आवेदन आगे भेज देना समस्या का समाधान नहीं है। यदि कार्रवाई हुई है, तो उसका परिणाम प्रभावित लोगों को बताया जाए।

सड़क पर गुबार, घरों में डस्ट—जिम्मेदारी किसकी?

ग्रामीणों का आरोप है कि भारी वाहनों की आवाजाही से हाईवे और आसपास की बस्तियों में धूल फैलती है। सड़क पर कोयले की चूरी जमा होने तथा बारिश में फिसलन बढ़ने की शिकायत भी है। कोयला परिवहन की कीमत सड़क किनारे रहने वाले परिवार अपनी परेशानी से क्यों चुकाएं?

वाहनों को ढकने, ओवरलोडिंग की जांच, सड़क की सफाई, पहियों की धुलाई और धूल नियंत्रण की व्यवस्था का वास्तविक निरीक्षण होना चाहिए। केवल संयंत्र परिसर देखकर बाहरी परिवहन से उठते सवाल समाप्त नहीं होंगे।  अनुमति की फाइल के साथ अनुपालन का सच भी दिखाइए। किसी संयंत्र के पास अनुमति होना और संचालन के दौरान सभी पर्यावरणीय शर्तों का पालन होना अलग-अलग जांच के विषय हैं।

प्रबंधन को अपनी वर्तमान अनुमतियां, धूल नियंत्रण व्यवस्था और निगरानी संबंधी उपलब्ध रिकॉर्ड सामने रखने चाहिए। नियामक विभाग स्पष्ट करे कि इन व्यवस्थाओं को आखिरी बार कब और कैसे परखा गया।  स्वीकृति का कागज ग्रामीणों की शिकायत का अपने आप जवाब नहीं बन सकता। जवाब वास्तविक अनुपालन और वैज्ञानिक परीक्षण से आएगा।

दो जिलों की सीमा—जवाबदेही का खाली मैदान नहीं

संयंत्र के आसपास कोरबा–बिलासपुर सीमा होने के कारण समन्वित कार्रवाई की जरूरत है।  नागरिकों की समस्या को विभागों और जिलों के बीच घूमती फाइल बनने देना प्रशासनिक समाधान नहीं है। दोनों जिलों के जिम्मेदार अधिकारी संयुक्त निरीक्षण करें और कार्रवाई के लिए स्पष्ट जिम्मेदारी तय करें। स्कूलों में धूल मिलने पर उसका स्रोत निर्धारित हो। प्रदूषण सीमा से अधिक मिलने पर उसका रिकॉर्ड बने। नियंत्रण व्यवस्था में कमी मिलने पर सुधार और अनुपालन की समयसीमा दी जाए।

कार्रवाई कौन रोक रहा है? जवाब रिकॉर्ड से दीजिए

ग्रामीणों को राहत नहीं मिलने का दावा स्वाभाविक रूप से सवाल पैदा करता है। लेकिन उपलब्ध सामग्री से यह प्रमाणित नहीं है कि सरकार या किसी अधिकारी ने संचालक को संरक्षण दिया अथवा कार्रवाई रोकी है।  प्रशासन इस प्रश्न का उत्तर सार्वजनिक रिकॉर्ड से दे सकता है—शिकायतों पर कार्रवाई, निरीक्षण निष्कर्ष, प्रदूषण जांच, नोटिस और अनुपालन रिपोर्ट जारी करके।  जहां उल्लंघन है, वहां कार्रवाई हो। जहां आरोप गलत हैं, वहां प्रमाण सामने आएं। अनिश्चितता और अस्पष्ट जवाबों के बीच ग्रामीणों को छोड़ना उचित नहीं है।

ग्राम यात्रा का स्पष्ट आग्रह: जांच जमीन पर हो, जवाब सार्वजनिक हो

ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क इस वाशरी से जुड़े सवाल पहले भी उठा चुका है। अब प्रभावित क्षेत्र की शिकायतों पर ठोस जांच और परिणाम आवश्यक हैं।

हमारी मांग है कि:

– स्कूलों, आंगनबाड़ी और बस्तियों का संयुक्त निरीक्षण हो।
– सामान्य संचालन के दौरान वायु गुणवत्ता की वैज्ञानिक जांच हो।
– बच्चों की स्वास्थ्य शिकायतों का चिकित्सकीय परीक्षण कराया जाए।
– संयंत्र और परिवहन की धूल नियंत्रण व्यवस्था जांची जाए।
– उल्लंघन प्रमाणित होने पर सक्षम प्राधिकारी प्रभावी विधिसम्मत कार्रवाई करे।
– जांच और कार्रवाई का विवरण ग्रामीणों को उपलब्ध कराया जाए।

 

बच्चों की कक्षा, भोजन और सांसों की सुरक्षा पर अस्पष्ट जवाब स्वीकार्य नहीं हो सकते। प्रशासन बताए—समस्या दूर करने के लिए कौन जिम्मेदार है और परिणाम कब दिखाई देगा?

ग्रामीणों ने समाधान नहीं मिलने पर आंदोलन की चेतावनी दी है। प्रशासन के सामने अवसर है कि स्थिति टकराव तक पहुंचने से पहले शिकायतों का निष्पक्ष परीक्षण कर प्रभावी राहत सुनिश्चित करे।  तथ्यगत स्थिति: प्रदूषण, स्वास्थ्य प्रभाव और समाधान नहीं मिलने संबंधी विवरण ग्रामीणों के आरोप हैं। नवीनतम वैज्ञानिक जांच, पूर्ण कार्रवाई रिकॉर्ड तथा संयंत्र प्रबंधन का प्रत्यक्ष जवाब इस रिपोर्ट के लिए उपलब्ध नहीं है। संबंधित पक्षों का दस्तावेजी उत्तर मिलने पर प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।

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