हाँ। इसे जिला प्रशासन और राज्य सरकार की जवाबदेही पर सीधे प्रहार करते हुए, मगर तथ्यात्मक एवं कानूनी रूप से सुरक्षित भाषा में इस प्रकार प्रकाशित किया जा सकता है:

कोरबा में अस्पताल जाने की सड़क खुद ‘इलाज’ मांग रही—क्या किसी मरीज की जान जाने के बाद जागेगा प्रशासन?
सिविल लाइन–मंगलम विहार की बदहाली बनी शासन के विकास-दावों पर काला धब्बा; गर्भवती महिलाएं, गंभीर मरीज और एम्बुलेंस रोज झेल रहे गड्ढों की यातना
दिखावे, सजावट और गैर-जरूरी कार्यों पर करोड़ों लुटाने वाले नगर निगम के पास जीवन बचाने वाली सड़क के लिए न पैसा, न योजना और न संवेदना!
कोरबा। यह कोई दूरदराज का जंगल या पहुंचविहीन गांव नहीं, बल्कि कोरबा के सिविल लाइन क्षेत्र स्थित मंगलम विहार का मुख्य मार्ग है। इसी रास्ते के आसपास बड़े अस्पताल, ब्लड बैंक, नेत्र चिकित्सालय, मेडिकल स्टोर और घनी आबादी मौजूद है। प्रतिदिन सैकड़ों मरीज, गर्भवती महिलाएं, बुजुर्ग और उनके परिजन यहां से गुजरते हैं। इसके बावजूद सड़क की हालत ऐसी है, मानो नगर निगम और जिला प्रशासन ने पूरे क्षेत्र को अपनी जिम्मेदारी के नक्शे से ही मिटा दिया हो।
सड़क पर बड़े-बड़े गड्ढे, कीचड़, जलभराव और उखड़ी गिट्टियां प्रशासन की लापरवाही का वह खुला पंचनामा हैं, जिस पर किसी जांच समिति की नहीं—सिर्फ जिम्मेदार अधिकारियों की आंखें खोलने की जरूरत है।
तस्वीरें चीख-चीखकर सवाल कर रही हैं—क्या कोरबा का प्रशासन किसी एम्बुलेंस के फंसने, गर्भवती महिला की हालत बिगड़ने अथवा किसी मरीज की जान जाने की प्रतीक्षा कर रहा है?
यह सड़क नहीं, मरीजों के लिए सरकारी यातना-पथ है!
गंभीर मरीज को अस्पताल पहुंचाने में एक-एक मिनट जीवन और मृत्यु का अंतर तय कर सकता है। लेकिन मंगलम विहार के इस मार्ग पर एम्बुलेंस को गड्ढों और पानी से बचते हुए रेंगना पड़ता है। गर्भवती महिला, ऑपरेशन के बाद लौट रहा मरीज या रीढ़ और हड्डी की गंभीर बीमारी से पीड़ित व्यक्ति यहां प्रत्येक झटके के साथ प्रशासनिक उपेक्षा की सजा भुगतता है।
यदि ऐसे रास्ते के कारण किसी मरीज को समय पर उपचार नहीं मिल पाया या रास्ते में उसकी हालत बिगड़ गई, तो क्या नगर निगम आयुक्त, जिला प्रशासन और संबंधित अधिकारी उसकी जवाबदेही स्वीकार करेंगे?
या फिर हमेशा की तरह एक-दूसरे के विभाग की ओर उंगली दिखाकर जिम्मेदारी की लाश को फाइलों में दफना दिया जाएगा?
जनता 12 वर्षों से कर दे रही—निगम बदले में गड्ढे, गंदगी और अंधेरा दे रहा! कलेक्टर को सौंपे गए लिखित आवेदन में क्षेत्रवासियों ने कहा है कि वे लगभग 12 वर्षों से नियमित रूप से संपत्ति कर चुका रहे हैं।
सवाल यह है कि जब नगर निगम जनता से टैक्स वसूलने में एक दिन की देरी सहन नहीं करता, तो मूलभूत सुविधाएं देने में 12 वर्षों की देरी किस नियम के तहत स्वीकार्य है?
नगर निगम का कर-वसूली तंत्र जनता की जेब तक पहुंच जाता है, लेकिन विकास का पहिया मंगलम विहार पहुंचने से पहले ही क्यों टूट जाता है?
क्या यहां के निवासी नगर निगम के लिए केवल करदाता हैं—नागरिक नहीं?
बरसात में तालाब, गर्मी में धूल और रात में अंधेरा. बारिश होते ही सड़क पानी और कीचड़ से भर जाती है। क्षतिग्रस्त मार्ग पर वाहन फिसलने तथा दुर्घटना का खतरा बढ़ जाता है। आसपास जमा कचरा, झाड़ियां और गंदा पानी डेंगू-मलेरिया सहित संक्रामक बीमारियों को खुला निमंत्रण दे रहे हैं। स्ट्रीट लाइट का अभाव रात में दुर्घटना तथा जहरीले जीव-जंतुओं का खतरा और बढ़ा देता है। विडंबना देखिए—लोग इसी रास्ते से बीमारी का उपचार कराने अस्पताल जाते हैं, लेकिन नगर निगम की लापरवाही ने अस्पताल तक पहुंचने वाले मार्ग को ही बीमारी पैदा करने का केंद्र बना दिया है।
सौंदर्यीकरण के नाम पर खजाना खुला—मरीजों के रास्ते पर निगम कंगाल!
नगर निगम में सजावट, पौधरोपण, लाइटिंग, रंग-रोगन और दिखावटी परियोजनाओं के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं। लेकिन दो अस्पतालों और घनी आबादी को जोड़ने वाली अत्यावश्यक सड़क के लिए वर्षों से धन नहीं मिलना आर्थिक मजबूरी नहीं, बल्कि प्राथमिकताओं की क्रूर विकृति है। जहां फीता काटने, तस्वीरें खिंचवाने और उपलब्धियों का प्रचार करने का अवसर हो, वहां योजनाओं की बरसात हो जाती है।
लेकिन जहां गड्ढों के बीच मरीज की कराह सुनाई देती है, वहां पूरा तंत्र अचानक अंधा, बहरा और बेबस क्यों हो जाता है?
क्या नगर निगम का विकास केवल पोस्टर, मंच और सरकारी प्रेस-विज्ञप्तियों में जीवित है?
समाचार में बदहाली उजागर, कलेक्टर को आवेदन—फिर भी चुप्पी क्यों?
मंगलम विहार की सड़क की दुर्दशा समाचार-पत्र में भी प्रमुखता से प्रकाशित हो चुकी है। क्षेत्रवासियों ने कलेक्टर को आवेदन देकर सड़क निर्माण, जल निकासी और प्रकाश व्यवस्था की मांग की है। आवेदन की प्रतिलिपि महापौर और नगर निगम आयुक्त को भी भेजे जाने का उल्लेख है। अब शासन और प्रशासन यह नहीं कह सकते कि उन्हें जानकारी नहीं थी। जानकारी होने के बाद भी कार्रवाई नहीं करना केवल लापरवाही नहीं, बल्कि नागरिकों की सुरक्षा के प्रति गंभीर प्रशासनिक असंवेदनशीलता का प्रश्न है।
जिला प्रशासन और सरकार से पांच सीधे सवाल
1. अस्पतालों को जोड़ने वाली इस सड़क का वर्षों से निर्माण क्यों नहीं कराया गया?
2. क्षेत्रवासियों से लिए गए संपत्ति कर के बदले उन्हें कौन-सी मूलभूत सुविधाएं दी गईं?
3. सड़क, नाली और स्ट्रीट लाइट के प्रस्ताव किस अधिकारी अथवा किस स्तर पर लंबित हैं?
4. क्या प्रशासन किसी गंभीर दुर्घटना या मरीज की मृत्यु के बाद ही जिम्मेदारी तय करेगा?
5. नगर निगम के गैर-जरूरी और सौंदर्यीकरण कार्यों का बजट अस्पताल मार्ग की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण क्यों है?
सरकार तत्काल हस्तक्षेप करे—केवल निरीक्षण और आश्वासन नहीं
राज्य सरकार, नगरीय प्रशासन विभाग और कलेक्टर को इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप करते हुए:
सड़क का संयुक्त तकनीकी निरीक्षण कराना चाहिए।
आवागमन योग्य बनाने के लिए तत्काल गड्ढे भरवाए जाने चाहिए।
स्थायी सड़क निर्माण की प्रशासकीय स्वीकृति और समय-सीमा सार्वजनिक करनी चाहिए।
जल निकासी, कचरा सफाई और स्ट्रीट लाइट की व्यवस्था करनी चाहिए।
वर्षों तक समस्या लंबित रखने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय करनी चाहिए।
सड़क निर्माण के लिए प्राप्त प्रस्ताव, बजट मांग और फाइल की वर्तमान स्थिति जनता के सामने रखनी चाहिए।
अब मरीजों की सांसों पर प्रशासनिक प्रयोग बंद हो!
मंगलम विहार के लोग कोई कृपा या दान नहीं मांग रहे। वे टैक्स के बदले सड़क और सुरक्षित आवागमन का अधिकार मांग रहे हैं। अस्पताल पहुंचने का रास्ता कोई विलासिता नहीं, बल्कि जीवनरक्षक सार्वजनिक आवश्यकता है। यदि प्रचार, पौधों, सजावट और चमकदार आयोजनों के लिए पैसा है, लेकिन गंभीर मरीजों को अस्पताल पहुंचाने वाली सड़क के लिए नहीं—तो यह खजाने की गरीबी नहीं, बल्कि शासन की संवेदना का अकाल है।
कलेक्टर, नगर निगम और राज्य सरकार जवाब दें—मंगलम विहार की सड़क कब बनेगी?
गड्ढे कब भरेंगे?
जल निकासी कब होगी? स्ट्रीट लाइट कब लगेगी?
या फिर किसी अनहोनी के बाद अधिकारी मौके पर पहुंचकर संवेदना जताएंगे, जांच का आश्वासन देंगे और प्रशासन अपनी जिम्मेदारी को फिर किसी धूल भरी फाइल में दफना देगा?
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क की मांग
मंगलम विहार अस्पताल मार्ग का निर्माण तत्काल प्रारंभ किया जाए और कार्य की समय-सीमा सार्वजनिक की जाए। अन्यथा हर दुर्घटना और मरीज को होने वाली परेशानी के लिए जिम्मेदार तंत्र की जवाबदेही तय होनी चाहिए।
संपादक – अब्दुल सुल्तान
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क, कोरबा
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