₹99 लाख के “कागजी मजदूरों” का मायाजाल—कैंसिल की कहानी या भ्रष्टाचार पर पर्देदारी?

नगर निगम कह रहा “टेंडर कैंसिल”—लेकिन GeM पर पांच महीने बाद भी Bid “Active–Technical Evaluation” में जिंदा!
65 मजदूरों का ठेका न रद्द दिख रहा, न Award हुआ; फिर जलप्रदाय शाखा में काम कौन करा रहा और भुगतान किस आदेश से हो रहा?
जमीन पर कितने मजदूर, रजिस्टर में कितने नाम और बिल में कितनी हाजिरी? बायोमेट्रिक नहीं तो प्रतिमाह 1,950 मानव-दिवस का सत्यापन आखिर किसकी कलम से?
कोरबा | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क नगर निगम कोरबा में क्या अब टेंडर केवल निकाले नहीं जाते—बल्कि जरूरत के हिसाब से कभी “जिंदा”, कभी “मुर्दा” और कभी “गायब” भी घोषित कर दिए जाते हैं? जलप्रदाय शाखा में 65 अकुशल मजदूर उपलब्ध कराने के नाम पर निकाली गई करीब ₹99 लाख की GeM Bid को निगम से जुड़े लोगों द्वारा “कैंसिल” बताया जा रहा है। लेकिन 10 सितंबर 2026 को GeM के आधिकारिक सार्वजनिक रिकॉर्ड की जांच में Bid GEM/2026/B/7371944 न तो Cancelled मिली, न Inactive। इसके विपरीत पोर्टल पर Bid की स्थिति स्पष्ट रूप से: “Active–Technical Evaluation” दिखाई दे रही है।
अब सवाल सीधा है— «नगर निगम सच बोल रहा है या सरकारी पोर्टल झूठ?»
यदि टेंडर वास्तव में कैंसिल हो चुका है तो Cancellation Order कहां है? उसे किस अधिकारी ने अनुमोदित किया? किस तारीख को रद्द किया गया? GeM पर cancellation reference क्यों नहीं है? और पांच महीने बाद भी Bid “Active” क्यों पड़ी है?
यह तकनीकी भूल नहीं—₹99 लाख की सार्वजनिक खरीद प्रक्रिया पर पड़ा संदेह का काला पर्दा है। कैंसिल का ढोल, लेकिन GeM पर टेंडर जिंदा! नगर निगम की निविदा सूची में कार्य दर्ज है: फा.क्र. 1498/जल प्रदाय/2026—Selection Placement Agency for Supply of Unskilled Labours
इसी कार्य से जुड़ी GeM Bid GEM/2026/B/7371944:
– 18 मार्च 2026 को प्रारंभ हुई;
– 17 अप्रैल 2026 को बंद हुई;
– कुल मात्रा 65 मजदूर रही;
– लेकिन सितंबर 2026 तक Technical Evaluation में अटकी रही;
– न Financial Evaluation सार्वजनिक हुआ;
– न L1 एजेंसी सामने आई;
– न Contract Award;
– न Work Order;
– और न आधिकारिक Cancellation Order।
तो फिर निगम के गलियारों से “कैंसिल” होने की कहानी क्यों उड़ाई जा रही है?
क्या टेंडर की जांच से बचने के लिए उसे मौखिक रूप से मरा हुआ बताया जा रहा है?
क्या पुराने ठेकेदार को बिना नई प्रतिस्पर्धा के काम की मलाई चटाई जा रही है?
क्या नई Bid को तकनीकी मूल्यांकन की कब्र में रोककर पुरानी व्यवस्था से भुगतान जारी है?
या फिर किसी चहेती एजेंसी के लिए पर्दे के पीछे अगली पटकथा लिखी जा रही है?
टेंडर कैंसिल है तो मजदूर किसके? टेंडर जिंदा है तो फैसला क्यों नहीं?
जलप्रदाय कोई ऐसी शाखा नहीं जिसे पांच महीने तक मजदूरों के बिना छोड़ा जा सके। पंप हाउस, पानी टंकियां और वितरण व्यवस्था प्रतिदिन संचालित होती हैं। इसलिए निगम को बताना होगा:
«17 अप्रैल 2026 के बाद जलप्रदाय शाखा में मजदूर किस एजेंसी ने उपलब्ध कराए?
किस Work Order पर उनकी नियुक्ति हुई?
किस अधिकारी ने हाजिरी प्रमाणित की और भुगतान किस अनुबंध के अंतर्गत किया गया?»
यदि पुराने ठेके को extension दिया गया तो आदेश सार्वजनिक किया जाए। यदि विभागीय मजदूर लगाए गए तो नाम और तैनाती स्थल बताए जाएं। यदि किसी एजेंसी से बिना सार्वजनिक Work Order काम कराया गया तो यह किस नियम के तहत हुआ? और यदि किसी को भुगतान किया गया तो मासिक बिल, CRAC, बैंक भुगतान तथा PF–ESI रिकॉर्ड सामने रखे जाएं। 65 मजदूर या 65 अदृश्य नामों की सरकारी फौज?
इस ठेके का गणित बहुत सीधा है:
65 मजदूर × 30 दिन = 1,950 मानव-दिवस प्रतिमाह
1,950 × 12 महीने = 23,400 मानव-दिवस प्रतिवर्ष
अर्थात निगम को हर महीने प्रमाणित करना होगा कि पूरे 1,950 मानव-दिवस वास्तव में जमीन पर काम किए गए।
लेकिन Bid Document में मजदूरों की उपस्थिति के लिए स्पष्ट अनिवार्य व्यवस्था दिखाई नहीं देती:
– बायोमेट्रिक कहां है?
– Aadhaar आधारित सत्यापन कहां है?
– GPS अथवा geotagged attendance कहां है?
– पंप हाउसवार तैनाती सूची कहां है?
– दैनिक फोटो रिकॉर्ड कहां है?
– अनुपस्थिति कटौती का विवरण कहां है?
यदि सत्यापन केवल ठेकेदार के कागजी रजिस्टर और अधिकारी के हस्ताक्षर से होना है, तो यह व्यवस्था मजदूरों की निगरानी कम और “कागजी हाजिरी” की खेती अधिक बन सकती है। जमीन पर मजदूर कम हों, रजिस्टर में संख्या पूरी हो और बिल में सभी उपस्थित—तो जनता की गाढ़ी कमाई आखिर किसकी तिजोरी सींचेगी? अंगूठा मशीन पर नहीं तो क्या केवल बिल पर लगता है?
नगर निगम बताए कि प्रत्येक मजदूर की वास्तविक उपस्थिति किस तकनीक से दर्ज की गई।
किस अधिकारी ने हर दिन सभी 65 मजदूरों को देखा?
किसने प्रमाणित किया कि एक ही नाम दो स्थानों पर नहीं चल रहा?
किसने मजदूरवार बैंक वेतन, UAN और ESIC रिकॉर्ड का मिलान किया?
किस आधार पर अनुपस्थित मजदूर की रकम काटी गई?
यदि इसका कोई डिजिटल प्रमाण नहीं है तो आशंका स्वाभाविक है कि मजदूर सुबह रजिस्टर में जन्म लें, शाम को कागज पर ड्यूटी पूरी करें और महीने के अंत में ठेकेदार के बिल में रकम बनकर प्रकट हो जाएं! पंप हाउसवार सूची क्यों छिपी है? निगम तत्काल सार्वजनिक करे:
– किस पंप हाउस में कितने मजदूर तैनात थे?
– किस पानी टंकी पर किसकी ड्यूटी लगी?
– किस वार्ड में कौन मजदूर काम कर रहा था?
– साप्ताहिक अवकाश पर reliever कौन था?
– अनुपस्थित मजदूरों के बदले कितनी कटौती हुई?
– राष्ट्रीय अवकाश में काम कराया तो भुगतान कहां दर्ज है?
– निरीक्षण करने वाले अधिकारी का नाम क्या है?
यदि निगम के पास यह रिकॉर्ड नहीं है तो “65 मजदूर” केवल कागज पर खड़ा ₹99 लाख का खोखला महल हो सकता है। मजदूरी पुरानी—Bid बाद में खुली! Bid में अकुशल मजदूर की मजदूरी ₹364 प्रतिदिन दर्ज की गई, जबकि यह दर केवल 31 मार्च 2026 तक लागू थी। एक अप्रैल 2026 से कोरबा Zone-B में मजदूरी ₹371 प्रतिदिन हो चुकी थी। Bid 17 अप्रैल 2026 को बंद और खोली गई। यानी टेंडर का लिफाफा खुलने से पहले ही उसमें दर्ज मजदूरी पुरानी पड़ चुकी थी!
फिर निगम बताए:
– संशोधित मजदूरी का corrigendum कहां है?
– मजदूर को ₹364 मिला या ₹371?
– अतिरिक्त देनदारी किस मद से दी जानी थी?
– ₹99.01 लाख का estimate संशोधित क्यों नहीं हुआ?
– गलत दर पर अनुमान बनाने वाले अधिकारी की जिम्मेदारी क्या है? क्या मजदूर की मजदूरी भी किसी चहेते ठेकेदार की सुविधा के अनुसार घटती-बढ़ती है?
PF शून्य, EDLI शून्य, बोनस शून्य—फिर ₹47 का रहस्यमयी खेल! Bid में दर्ज मदें और भी गंभीर सवाल पैदा करती हैं:
– Provident Fund: ₹0
– EDLI: ₹0
– Bonus: ₹0
– EPF Admin Charge: ₹47 प्रतिदिन
– ESI: ₹12 प्रतिदिन
जब Provident Fund शून्य है तो ₹47 प्रतिदिन का कथित “EPF Admin Charge” किस PF पर लगाया गया?
क्या वास्तविक PF राशि को गलत नाम की चादर ओढ़ाकर estimate में घुसाया गया?
क्या मजदूरों के UAN खातों में पूरा अंश जमा होगा?
क्या EDLI शून्य रखकर उनकी बीमा सुरक्षा को कागज पर ही दफन कर दिया गया?
क्या बोनस की वैधानिक देनदारी भी ठेकेदार की संभावित कमाई में गलाने का हिसाब है?
इन सवालों का उत्तर भाषण नहीं देगा। सत्य मजदूरवार EPF ECR, ESIC contribution history और बैंक खातों की प्रविष्टियों से निकलेगा।
₹98.98 लाख का हिसाब—Estimate में केवल ₹3,510 की सांस!
Bid का गणित: ₹364 मजदूरी + ₹47 कथित EPF मद + ₹12 ESI = ₹423 प्रतिदिन
वार्षिक हिसाब: ₹423 × 65 × 30 × 12 = ₹98,98,200
Estimated Bid Value: ₹99,01,710
अंतर: केवल ₹3,510
लगभग ₹99 लाख के पूरे ठेके में मूल गणना से ऊपर केवल ₹3,510!
तो फिर service charge कहां है?
बोनस कहां है?
EDLI कहां है?
बढ़ी हुई मजदूरी कहां है?
साप्ताहिक अवकाश और reliever का खर्च कहां है?
क्या estimate बनाने वाले अधिकारी के हाथ में कैलकुलेटर था, या सामने किसी खास एजेंसी की सुविधा का पहले से तैयार पर्चा रखा था?
₹99 लाख का काम, लेकिन ₹2 करोड़ टर्नओवर की दीवार! ठेके की अनुमानित लागत ₹99.01 लाख है, लेकिन bidder से ₹2 करोड़ औसत वार्षिक टर्नओवर मांगा गया।
इसके साथ:
– तीन वर्ष का सरकारी अथवा PSU अनुभव;
– बड़े मूल्य के पुराने completed contracts;
– छत्तीसगढ़ में कार्यालय;
– MSE को अनुभव और टर्नओवर में छूट नहीं;
– Startup को राहत नहीं;
– नौ अनिवार्य दस्तावेज;
– manpower tender में OEM Authorization और OEM Annual Turnover जैसी अप्रासंगिक मांग।
मजदूर उपलब्ध कराने वाली एजेंसी किस उत्पाद की निर्माता है कि उससे OEM प्रमाणपत्र मांगा गया? क्या ठेकेदार मजदूरों का “Original Equipment Manufacturer” है? या अप्रासंगिक दस्तावेजों की जहरीली छलनी इसलिए लगाई गई कि सामान्य एजेंसियां तकनीकी मूल्यांकन में बाहर गिरें और पसंदीदा खिलाड़ी के लिए मैदान खाली हो जाए? एक Bid भी पर्याप्त—प्रतिस्पर्धा का गला घोंटने की तैयारी?
Auto Extension रोकने के लिए न्यूनतम Bid संख्या केवल एक रखी गई। अर्थात पात्रता की ऊंची दीवार खड़ी कीजिए, छोटी एजेंसियों का रास्ता बंद कीजिए और अंत में केवल एक bidder बचे तो भी प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है। Single Bid अपने-आप भ्रष्टाचार का प्रमाण नहीं है। लेकिन जब उसके साथ ₹2 करोड़ टर्नओवर, भारी अनुभव, OEM दस्तावेज, MSE–Startup को छूट से इनकार और महीनों लंबा Technical Evaluation जुड़ जाए, तो बदबू केवल संयोग की नहीं रह जाती।
सवाल उठता है:
«नगर निगम को खुली प्रतिस्पर्धा चाहिए थी या पहले से चुने खिलाड़ी के लिए खाली मैदान?» ग्राम यात्रा के 20 जलते सवाल नगर निगम आयुक्त, जलप्रदाय शाखा और संबंधित अभियंता सार्वजनिक करें:
1. टेंडर कैंसिल हुआ या नहीं?
2. हुआ तो Cancellation Order कहां है?
3. आदेश की तारीख, कारण और GeM reference number क्या है?
4. GeM पर Bid अभी भी Active क्यों है?
5. पांच महीने से Technical Evaluation लंबित क्यों है?
6. कितनी एजेंसियों ने Bid डाली?
7. कितनी तकनीकी रूप से बाहर की गईं?
8. उन्हें बाहर करने के कारण क्या थे?
9. क्या किसी एक एजेंसी को पात्र पाया गया?
10. 17 अप्रैल के बाद मजदूर किस एजेंसी से लिए गए?
11. पुराने ठेके का extension किस आदेश से हुआ?
12. वर्तमान में जमीन पर प्रतिदिन कितने मजदूर मिलते हैं?
13. क्या हाजिरी बायोमेट्रिक है?
14. नहीं तो कागजी रजिस्टर की सत्यता कौन प्रमाणित करता है?
15. मजदूर पंप हाउसवार कहां तैनात हैं?
16. अनुपस्थिति के बदले कितनी राशि काटी गई?
17. मजदूरवार UAN, ESIC और बैंक भुगतान का मिलान किसने किया?
18. ₹364 को ₹371 करने वाला corrigendum कहां है?
19. PF, EDLI और Bonus शून्य किस नियम से रखा गया?
20. अब तक किस एजेंसी को कितना भुगतान हुआ?
आयुक्त महोदय, टेंडर को जुबान से नहीं—दस्तावेज से कैंसिल कीजिए!
नगर निगम किसी टेंडर को गलियारे की फुसफुसाहट से रद्द घोषित नहीं कर सकता। यदि Bid कैंसिल है तो आदेश सार्वजनिक कीजिए। यदि Active है तो मूल्यांकन पूरा कीजिए। यदि पुराने ठेकेदार से काम कराया गया तो extension दिखाइए। यदि भुगतान हुआ तो मजदूरवार प्रमाण दीजिए। और यदि जमीन पर मजदूर कम लेकिन बिल में 65 पूरे मिले, तो अंतर के प्रत्येक मानव-दिवस की रकम ठेकेदार तथा बिल प्रमाणित करने वाले अधिकारियों से वसूल होनी चाहिए। क्योंकि जनता का पैसा किसी अधिकारी की निजी जागीर नहीं और मजदूरों की संख्या किसी ठेकेदार की मनमानी गणित की कॉपी नहीं है।
«कैंसिल की कहानी सुनाकर ₹99 लाख के हिसाब को दफन नहीं किया जा सकता। GeM पर टेंडर अभी जिंदा है—अब निगम बताए कि इस जिंदा टेंडर की छाया में किसका पेट और किसकी तिजोरी भर रही है?»
यह मामला अब केवल 65 मजदूरों का नहीं रहा। यह नगर निगम की खरीद प्रक्रिया, श्रमिक अधिकारों, वित्तीय ईमानदारी और कथित संरक्षण-तंत्र की अग्निपरीक्षा है। «कागज पर मजदूरों की फौज, मैदान में सन्नाटा और बिल में पूरा भुगतान मिला—तो इसे प्रशासनिक भूल नहीं, जनता के खजाने पर सुनियोजित हमला कहा जाएगा!»
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क की दस्तावेजी जांच जारी है। Cancellation Order, पुराने अनुबंध, भुगतान अभिलेख और मजदूरवार उपस्थिति सामने आने पर एजेंसी से लेकर बिल प्रमाणित करने वाली पूरी कथित संरक्षण-श्रृंखला का नामवार खुलासा किया जाएगा।
संपादक – अब्दुल सुल्तान
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