₹5,725 करोड़ का ‘कॉरपोरेट शंखनाद’, ₹1,225 करोड़ में ठंडी पड़ी खरीद—Vedanta की क्लीन चिट पर सुप्रीम कोर्ट का हथौड़ा!

17.09 करोड़ शेयर खरीदने का बाजार में बजा नगाड़ा, खरीदे सिर्फ 3.67 करोड़; 24 अनुकूल दिनों में NSE पर आदेश ‘शून्य’—इरादा बाजार से बड़ा था या घोषणा हकीकत से खोखली?
₹143 करोड़ की Escrow वापसी को बनाया जा रहा था बेदाग होने का कवच; सर्वोच्च अदालत ने उतार दिया आवरण—कहा, पैसा लौटना fraud से मुक्ति का प्रमाणपत्र नहीं!
SEBI की फाइल भी पाक-साफ नहीं—1.31 करोड़ बनाम 30 लाख शेयर का विस्फोटक अंतर; अब SAT में Vedanta की नीयत और बाजार प्रहरी की गणित, दोनों का होगा पोस्टमार्टम
नई दिल्ली/कोरबा | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क शेयर बाजार में ₹5,725 करोड़ के बायबैक का विराट झंडा गाड़ा गया। निवेशकों के सामने 17.09 करोड़ शेयर वापस खरीदने का चमकदार वादा परोसा गया। अधिकतम कीमत ₹335 प्रति शेयर बताई गई। लेकिन जब छह महीने बाद इस कॉरपोरेट घोषणा का हिसाब खुला तो वादे का पहाड़ लगभग 3.67 करोड़ शेयर और ₹1,225.45 करोड़ के खर्च पर सिकुड़ा पड़ा था!
घोषित शेयरों के मुकाबले उपलब्धि करीब 21.48 प्रतिशत!
अब प्रश्न यह नहीं कि बायबैक अधूरा क्यों रह गया। असली प्रश्न यह है कि क्या हजारों करोड़ की घोषणा से पहले उसे पूरा करने की बाजार क्षमता, liquidity और खरीद रणनीति का ईमानदार आकलन किया गया था—या निवेशकों के सामने ऐसा कॉरपोरेट महल खड़ा किया गया जिसकी नींव में ही पर्याप्त खरीद की तैयारी गायब थी?
Cairn India—जिसका बाद में Vedanta Limited में विलय हुआ—के इस बहुचर्चित बायबैक प्रकरण में “पूर्ण क्लीन चिट” का प्रचार अब कानूनी धुंध में फँस गया है। सुप्रीम कोर्ट ने Vedanta को fraud का दोषी घोषित नहीं किया, लेकिन SAT द्वारा मिली राहत पर अंतिम सत्य की मुहर लगाने से भी साफ इनकार कर दिया।
सर्वोच्च अदालत ने fraud की बंद होती फाइल फिर खुलवा दी है।
अब SAT को केवल बाजार भाव नहीं, बल्कि कंपनी के भीतर बैठे निर्णयकर्ताओं की नीयत, निर्देश, पत्राचार और आदेशों की असली कहानी जाँचनी होगी।
वादा ₹5,725 करोड़ का—न्यूनतम ₹2,862 करोड़ भी नहीं लगा पाए!
नियम के अनुसार घोषित बायबैक राशि का कम-से-कम 50 प्रतिशत—करीब ₹2,862.50 करोड़—खर्च किया जाना था। लेकिन Cairn India लगभग ₹1,225.45 करोड़ ही लगा सकी। कंपनी ने समय बढ़ाने की माँग की। SEBI ने कहा—नियम में विस्तार का रास्ता नहीं। कंपनी ने स्वयं स्वीकार किया कि न्यूनतम 50 प्रतिशत राशि उपयोग की बाध्यता पूरी नहीं हुई।
अब सीधा सवाल है—यदि लक्ष्य इतना विशाल था कि बाजार की परिस्थितियाँ उसे निगल सकती थीं, तो घोषणा से पहले बाजार की पुरानी मात्रा क्यों नहीं पढ़ी गई? यदि पढ़ी गई थी, तो 17.09 करोड़ शेयरों का पहाड़ निवेशकों के सामने किस भरोसे खड़ा किया गया?
क्या यह मजबूत कॉरपोरेट योजना थी, या अधिकतम आंकड़ों की चमकीली आतिशबाजी?
NSE पर शेयर उपलब्ध, लेकिन खरीद की मुट्ठी बंद क्यों?
SEBI के 19 मई 2021 के adjudication order ने कंपनी की खरीद रणनीति की नस पर हाथ रखा था।
SEBI के अनुसार:
– 123 कारोबारी दिनों में NSE पर केवल 82 दिन आदेश लगाए गए।
– भाव अनुकूल रहने वाले 54 दिनों में से 24 दिन एक भी NSE buy order नहीं था।
– अन्य 14 अनुकूल दिनों में आदेश केवल 5,000 शेयर या उससे कम के थे।
– केवल 13 अनुकूल दिनों में एक लाख से अधिक शेयरों के आदेश लगाए गए।
– अधिक liquidity वाले NSE के बजाय कम बिक्री उपलब्धता वाले BSE पर बड़े आदेश लगाने का पैटर्न दिखाई दिया।
यानी बाजार की बड़ी दुकान NSE में खुली थी, लेकिन खरीद की टोकरी BSE की पतली गली में घुमाई जाती रही!
यदि खरीद का वास्तविक संकल्प घोषित आकार जितना ही विराट था, तो अनुकूल दिनों में NSE पर सन्नाटा क्यों पसरा रहा? आदेशों पर किसकी उँगली थी? खरीद की रफ्तार किसने बाँधी? Brokers को किसने, कब और कितनी मात्रा का निर्देश दिया?
क्या यह केवल बाजार की सावधानी थी—या बायबैक की गाड़ी पर भीतर से खींचा गया अदृश्य ब्रेक?
कम liquidity वाले BSE में आदेशों का दिखावा, अधिक liquidity वाले NSE से परहेज?
SEBI ने अपने पुराने आदेश में पाया कि BSE की ऐतिहासिक दैनिक मात्रा विशाल लक्ष्य पूरा करने के लिए पर्याप्त ही नहीं थी। दूसरी ओर NSE पर अपेक्षाकृत कहीं अधिक कारोबार होता था। इसके बावजूद BSE पर आदेश जारी रहे और NSE के अनेक अनुकूल दिनों में खरीद या तो गायब रही या मुट्ठीभर। SEBI के अनुसार अनुकूल दिनों में NSE पर करीब 67.50 करोड़ शेयरों के sell orders उपलब्ध थे, जबकि कंपनी के buy orders कथित तौर पर उस उपलब्ध मात्रा का करीब पांच प्रतिशत रहे।
यदि ये आँकड़े सही हैं, तो यह मात्र कमजोर execution नहीं—कॉरपोरेट नीयत पर दस्तावेजी प्रश्नचिह्न है।
और यदि ये आँकड़े गलत हैं, तो SEBI ने करोड़ों शेयरों की संदिग्ध गणित पर ₹5.70 करोड़ का दंड कैसे खड़ा कर दिया?
दोनों में से जो भी सच निकले, पर्दा किसी न किसी का अवश्य फटेगा। SEBI ने कहा था—घोषणा में इरादा नहीं दिखा, लगाया ₹5.70 करोड़ दंड। SEBI के Adjudicating Officer ने 2021 में निष्कर्ष निकाला था कि पर्याप्त और समयानुकूल buy orders नहीं लगाए गए। उसने सार्वजनिक घोषणा को कथित रूप से भ्रामक तथा उसे पूरा करने के वास्तविक इरादे से रहित माना।
इसके बाद:
– Cairn India/Vedanta पर ₹5.25 करोड़ दंड;
– पी. एलांगो पर ₹15 लाख;
– अमन मेहता पर ₹15 लाख;
– नीरजा शर्मा पर ₹15 लाख। लगाए गए।
कुल दंड—₹5.70 करोड़।
तीनों अधिकारियों ने सार्वजनिक घोषणा पर हस्ताक्षर किए थे। उसी घोषणा में निदेशकों ने जिम्मेदारी स्वीकार की थी कि जानकारी सत्य, तथ्यात्मक और गैर-भ्रामक है। अब घोषणा पर हस्ताक्षर केवल स्याही के निशान नहीं हैं। SAT को देखना होगा कि हस्ताक्षरकर्ताओं के सामने खरीद की वास्तविक योजना क्या थी, लक्ष्य की समीक्षा कैसे हुई और लगातार पिछड़ती खरीद पर उन्होंने क्या कदम उठाए।
Vedanta का बचाव—₹1,225 करोड़ कोई नाटक नहीं
कंपनी का पक्ष भी रिकॉर्ड पर है। Vedanta/Cairn ने कहा:
– ₹1,225.45 करोड़ का वास्तविक खर्च दिखावा नहीं हो सकता।
– करीब 3.67 करोड़ शेयर खरीदे गए।
– ₹143.125 करोड़ Escrow में जमा किए गए।
– अवधि बढ़ाने की माँग की गई।– पंजीकृत Merchant Bankers नियुक्त किए गए।
– तेजी वाले बाजार में औसत भाव ₹335 से ऊपर रहा।
– बहुत बड़े आदेश लगाने से भाव और चढ़ सकता था।
– NSE या BSE चुनने का निर्णय brokers के विवेक पर था।
यह बचाव सतही नहीं है। लेकिन इससे एक और बड़ा सवाल जन्म लेता है—क्या हजारों करोड़ की सूचीबद्ध कंपनी अपने ₹5,725 करोड़ के बायबैक की दिशा brokers के विवेक पर छोड़कर बैठी थी?
क्या Board, CEO, Company Secretary और Merchant Bankers केवल आदेशों के दर्शक थे?
यदि कंपनी प्रतिदिन लक्ष्य से पिछड़ रही थी तो कौन-सी समीक्षा बैठक हुई? किसने चेतावनी दी? किसने रणनीति बदली? किस दस्तावेज में लिखा है कि बड़े आदेशों से भाव बिगड़ने का खतरा था?
अब मौखिक सफाई नहीं, फाइलों की लिखावट बोलेगी। Escrow वापसी का साबुन fraud का दाग स्वतः नहीं धोता—सुप्रीम कोर्ट
Vedanta का बड़ा बचाव था कि SEBI ने ₹143.125 करोड़ की Escrow राशि वापस कर दी थी। इसलिए उसी घटना पर बाद में fraud नहीं लगाया जाना चाहिए। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस कानूनी ढाल में छेद कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि Escrow राशि वापस होने का अर्थ केवल इतना है कि उसे जब्त करने की नियामकीय शर्त लागू नहीं हुई। इसका मतलब यह नहीं कि PFUTP Regulations के तहत कंपनी का पूरा आचरण स्वतः निष्कलंक हो गया।
सीधे शब्दों में—Escrow की वापसी कोई “ईमानदारी प्रमाणपत्र” नहीं।
यदि स्वतंत्र और ठोस प्रमाण उपलब्ध हों तो Escrow लौटने के बावजूद fraud की जाँच और निष्कर्ष संभव है। यहीं Vedanta की कथित अंतिम क्लीन चिट की चमक फीकी पड़ जाती है। SEBI की अपनी गणित में करोड़ों शेयरों का ‘भूत’! कहानी का दूसरा जहरीला सिरा SEBI की फाइल में है। सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे डेटा-विरोध दर्ज किए जो fraud के पुराने निष्कर्ष की बुनियाद तक पहुँचते हैं।
17 फरवरी 2014 SEBI की रिपोर्ट में ₹335 या उससे कम कीमत पर 1.31 करोड़ से ज्यादा शेयर बिक्री के लिए उपलब्ध बताए गए।
NSE के रिकॉर्ड में संख्या करीब 30 लाख! 14 फरवरी 2014
SEBI रिपोर्ट—1,24,82,361 शेयर।
NSE रिकॉर्ड—36,83,335 शेयर।
यह मामूली जोड़-घटाव नहीं। यह करोड़ों शेयरों का ऐसा फासला है जो किसी कंपनी को fraud के कटघरे में खड़ा करने या आरोप की रीढ़ तोड़ने की ताकत रखता है। BSE का विरोधाभास। 20 मई से 22 जुलाई 2014 की अवधि में एक जगह न्यूनतम भाव ₹335 से काफी ऊपर दिखाया गया, जबकि दूसरे रिकॉर्ड और Show Cause Notice में उसी अवधि के दौरान ₹335 या उससे नीचे sell orders उपलब्ध बताए गए।
अब सवाल SEBI से भी है—एक ही बाजार, एक ही अवधि और एक ही शेयर के आंकड़े अलग-अलग फाइलों में अलग चेहरा कैसे पहन गए?
क्या डेटा अलग methodology से निकाला गया? क्या orders दोहराए गए?
क्या intraday availability को बिना समय-मिलान के जोड़ दिया गया?
या जाँच रिपोर्ट में गंभीर तथ्यात्मक त्रुटि हुई?
बाजार प्रहरी यदि धुँधले आंकड़ों से fraud का चाबुक चलाएगा तो उसकी अपनी विश्वसनीयता भी कटघरे में खड़ी होगी। SEBI की पहली रिपोर्ट नरम, दूसरी में fraud—बीच में कौन-सा प्रमाण पैदा हुआ? 3 फरवरी 2016 की SEBI रिपोर्ट में कथित रूप से कहा गया कि बायबैक घोषणा से कीमत अथवा trading volume पर कोई महत्वपूर्ण प्रभाव नहीं पड़ा। लेकिन 17 मार्च 2017 की रिपोर्ट में लगभग उन्हीं घटनाओं से fraud का आरोप निकला।
एक रिपोर्ट कहती है—प्रभाव नहीं।
दूसरी कहती है—निवेशकों को प्रभावित करने वाली भ्रामक घोषणा।
तो बीच के तेरह महीनों में ऐसा कौन-सा दस्तावेज, ईमेल, आंतरिक निर्देश या गवाह सामने आया जिसने SEBI की सोच उलट दी?
यदि नया प्रमाण मिला था तो वह क्या था?
यदि नहीं मिला, तो निष्कर्ष क्यों बदला?
न AO ने इस पलटी का संतोषजनक उत्तर दिया और न SAT ने इसकी तह तक जाना। सुप्रीम कोर्ट ने अब इसी दबे हुए विरोध को मेज पर रख दिया है। SAT की पुरानी राहत अब अंतिम ढाल नहीं। SAT ने 5 अक्टूबर 2023 को SEBI का दंडादेश रद्द कर दिया था। उसने तेजी वाले बाजार, वास्तविक खर्च और निश्चित दैनिक खरीद नियम के अभाव को कंपनी के पक्ष में माना। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि SAT ने Escrow वापसी की सीमित जाँच को fraud के व्यापक प्रश्न से जोड़कर निष्कर्ष निकाल दिया।
अब SAT को नए सिरे से तय करना होगा:
– SEBI का डेटा सही था या NSE का?
– अनुकूल दिनों में वास्तविक sell orders कितने थे?
– वे कितनी देर उपलब्ध रहे?
– क्या Cairn के आदेश उनसे match हो सकते थे?
– NSE और BSE के बीच आदेशों का वितरण किसने तय किया?
– Merchant Bankers को वास्तविक mandate क्या था?
– कंपनी के आंतरिक पत्राचार में लक्ष्य पूरा करने की कैसी तैयारी दिखती है?
– क्या किसी promoter, director या related party को लाभ हुआ?
– घोषणा से निवेशक सचमुच प्रभावित हुए या नहीं?
– क्या fraud के अतिरिक्त इस व्यवहार का कोई तार्किक व्यावसायिक स्पष्टीकरण था?
अब शपथ पर खुल सकती है कॉरपोरेट फाइल सुप्रीम कोर्ट ने SAT को व्यक्तियों को बुलाने, शपथ पर बयान लेने और दस्तावेज तलब करने की शक्तियों का उपयोग करने की स्वतंत्रता दी है। इसका अर्थ है कि अब केवल चमकदार कानूनी दलीलों से काम नहीं चलेगा।
अब माँगे जा सकते हैं:
– Board और committee के minutes;
– दैनिक buyback monitoring reports;
– Broker instructions;
– Merchant Banker communications;
– ईमेल और आंतरिक संदेश;
– Exchange-wise order strategy;
– लक्ष्य से पिछड़ने पर तैयार risk notes;
– अधिकारियों की भूमिका और अनुमोदन;
– वास्तविक order तथा trade timestamps।
इन फाइलों में यदि खरीद पूरा करने की लगातार और ईमानदार कोशिश दिखाई दी तो Vedanta का बचाव मजबूत होगा। लेकिन यदि कागजों में केवल घोषणा की चमक और खरीद में योजनाबद्ध सुस्ती मिली, तो पुरानी क्लीन चिट का आवरण चिथड़ों में बदल सकता है। वर्तमान कानूनी सत्य—Vedanta निर्दोष घोषित नहीं, SEBI का दंड भी अभी बहाल नहीं। सर्वोच्च न्यायालय ने Vedanta को fraud का दोषी नहीं ठहराया है।
साथ ही:
– Vedanta की पुरानी पूर्ण राहत अंतिम नहीं रही।
– Fraud का प्रश्न फिर खुल गया है।
– ₹5.25 करोड़ का कंपनी-दंड स्वतः बहाल नहीं हुआ।
– तीनों अधिकारियों का ₹15-₹15 लाख दंड भी अभी प्रभावी घोषित नहीं हुआ।
– अंतिम निर्णय SAT की पुनः सुनवाई के बाद होगा।
इसलिए Vedanta यदि इसे पूर्ण विजय बताए तो वह आधी तस्वीर होगी। और कोई इसे सुप्रीम कोर्ट द्वारा सिद्ध “घोटाला” बताए तो वह भी कानूनी रूप से गलत होगा। सच इतना है—सुप्रीम कोर्ट ने फाइल बंद नहीं होने दी।
ग्राम यात्रा का सीधा प्रहार
₹5,725 करोड़ की घोषणा का नगाड़ा बजाकर ₹1,225 करोड़ पर खरीद की साँस क्यों फूल गई?
17.09 करोड़ शेयरों के सपने में 3.67 करोड़ पर पर्दा क्यों गिरा?
24 अनुकूल दिनों में NSE पर खरीद आदेश शून्य क्यों रहे?
कम liquidity वाले BSE में आदेशों की कतार किस रणनीति का हिस्सा थी?
यदि brokers ने सब तय किया तो Vedanta/Cairn का Board क्या केवल बालकनी में बैठकर बायबैक का तमाशा देख रहा था?
2016 में बाजार पर प्रभाव नहीं था तो 2017 में उसी घोषणा से fraud की गंध SEBI को कैसे आने लगी?
और SEBI की फाइल में 1.31 करोड़ शेयर NSE के रिकॉर्ड में सिकुड़कर 30 लाख कैसे रह गए?
अब जाँच की आँच केवल Vedanta तक सीमित नहीं है। एक तरफ कॉरपोरेट घोषणा की नीयत कटघरे में है, दूसरी तरफ SEBI की गणित स्वयं सवालों की सूली पर लटकी है। SAT की पुनः सुनवाई बताएगी कि यह तेजी वाले बाजार में ईमानदारी से अधूरा रह गया बायबैक था—या निवेशकों के सामने ₹5,725 करोड़ का ऐसा सुनहरा सपना सजाया गया जिसके पीछे वास्तविक खरीद की रीढ़ शुरू से कमजोर थी।
अभी फैसला बाकी है—लेकिन Vedanta की क्लीन चिट के जश्न पर सुप्रीम कोर्ट ने जाँच का काला पर्दा अवश्य डाल दिया है।
संपादक – अब्दुल सुल्तान
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