बालको के कॉरपोरेट अफसर का स्वयंभू ‘मैं हूं DON’!

धनंजय मिश्रा के कथित स्वयंभू,, ‘DON’ वीडियो ने खड़ा किया बड़ा सवाल—यह महज पार्टी का गीत है या बालको में पैदा हो चुकी ‘कॉरपोरेट बेफिक्री’ पर जनता का कटाक्ष?
विशेष राजनीतिक-सामाजिक कटाक्ष | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज़ नेटवर्क
कोरबा। बालको में इन दिनों कहानी किसी फिल्मी ‘DON’ की नहीं, बल्कि रोजगार, जवाबदेही और Corporate Affairs की भूमिका की बनती जा रही है।
एक तरफ स्थानीय युवा रोजगार की मांग कर रहे हैं। सड़क, प्रदूषण और मूलभूत सुविधाओं को लेकर सवाल उठ रहे हैं। भाजपा से जुड़े कार्यकर्ता सवाल उठा चुके हैं, NSUI आंदोलन कर रही है और अधिवक्ता संघ भी मैदान में अपनी आवाज दर्ज करा चुका है।
दूसरी तरफ इसी माहौल के बीच बालको-वेदांता के Chief Corporate Affairs and Administration धनंजय मिश्रा का एक कथित वीडियो/दृश्य चर्चा में आया, जिसमें वे एक आयोजन के दौरान (स्वयंभू) “मैं हूं डॉन…” गीत गाते अथवा उसका आनंद लेते दिखाई देने का दावा किया जा रहा है।
और यहीं से जनता का कटाक्ष शुरू होता है—
युवा रोजगार मांगते रहो…
आंदोलनकारी आंदोलन करते रहो…
साहब का मूड तो अभी—‘ स्वयंभू ,मैं हूं DON’ है!”
लेकिन खबर का मुद्दा किसी अधिकारी का गाना गाना, नाचना, पार्टी करना या निजी जीवन नहीं है।
मुद्दा है—उस कुर्सी का नाम ‘Corporate Affairs’ है!
जब किसी अधिकारी की जिम्मेदारी ही कंपनी और बाहरी हितधारकों के बीच संवाद, समन्वय और प्रशासनिक मामलों से जुड़ी हो, तब उसी कंपनी को लेकर लगातार आंदोलन और स्थानीय असंतोष सामने आए तो सवाल अधिकारी के निजी कार्यक्रम पर नहीं, बल्कि संस्थागत संवाद की प्रभावशीलता पर उठता है।
आखिर स्थानीय युवाओं की आवाज कौन सुनेगा?
आंदोलनकारियों से कौन बात करेगा?
स्थानीय रोजगार का हिसाब कौन देगा?
और जनता तथा बालको प्रबंधन के बीच बढ़ती दूरी को कौन कम करेगा?
‘DON’ किसका—गीत का या अधिकारों का?
यही इस पूरे मामले का सबसे तीखा सवाल है।
यदि वीडियो किसी निजी समारोह का है और उसका आंदोलनों से कोई संबंध नहीं है, तो इसे उसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए और प्रबंधन चाहे तो स्थिति स्पष्ट कर सकता है।
लेकिन उससे स्थानीय रोजगार का सवाल खत्म नहीं होता।
इसलिए सवाल धनंजय मिश्रा से भी है और बालको-वेदांता के शीर्ष प्रबंधन से भी—
Corporate Affairs का मतलब जनता से संवाद है या केवल कॉरपोरेट गलियारों का प्रबंधन? यदि स्थानीय स्तर पर लगातार असंतोष पैदा हो रहा है, तो क्या उसकी सही रिपोर्ट कंपनी के शीर्ष नेतृत्व तक पहुंच रही है?
अनिल अग्रवाल तक पहुंच रही है कोरबा की असली तस्वीर?
अब सवाल वेदांता समूह के शीर्ष नेतृत्व तक भी जाता है।
क्या चेयरमैन अनिल अग्रवाल तक यह जानकारी पहुंच रही है कि बालको को लेकर स्थानीय रोजगार और अन्य मुद्दों पर अलग-अलग संगठन सवाल उठा रहे हैं?
यदि पहुंच रही है तो संवाद और समाधान की ठोस पहल जमीन पर कितनी दिखाई दे रही है?
और यदि पूरी तस्वीर ऊपर तक पहुंच ही नहीं रही, तो फिर Corporate Affairs की भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
यह कहना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा कि किसी अधिकारी ने अपने अधिकारों को वास्तव में ‘DON’ बना लिया है।
लेकिन जनता का कटाक्ष जरूर पूछा जा सकता है—
“कहीं पद का अधिकार ही ‘DON वाला अधिकार’ तो नहीं समझा जाने लगा?”
और इस सवाल का जवाब किसी गीत से नहीं, पारदर्शिता और आंकड़ों से मिलेगा। अब ‘DON’ छोड़िए साहब… रोजगार का DATA दीजिए!
बालको-वेदांता प्रबंधन सार्वजनिक करे—
बालको में कुल कितने कर्मचारी हैं?
ठेका कंपनियों में कुल कितनी मैनपावर है?
इनमें कोरबा जिले के कितने स्थानीय युवा हैं?
पिछले तीन वर्षों में कितने स्थानीय युवाओं को रोजगार दिया गया?
कितने कर्मचारी दूसरे जिलों से और कितने दूसरे राज्यों से हैं?
ठेका कंपनियों में स्थानीय रोजगार का प्रतिशत कितना है?
भर्ती की प्रक्रिया और स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता देने की नीति क्या है?
क्योंकि—
मैं हूं DON’ तीन मिनट का गाना हो सकता है…
लेकिन बेरोजगारी किसी परिवार की वर्षों की पीड़ा है। यही कारण है कि यह मामला अब केवल एक वायरल वीडियो अथवा सोशल मीडिया कटाक्ष तक सीमित नहीं रहना चाहिए।
अगली पड़ताल ठेका कंपनियों की होनी चाहिए
अब असली तस्वीर तब सामने आएगी जब बालको में काम कर रही ठेका कंपनियों का नाम-दर-नाम और काम-दर-काम हिसाब सामने आएगा।
कौन-सी कंपनी को कौन-सा काम मिला?
उस कंपनी में कुल कितनी मैनपावर है?
उसमें कोरबा के कितने स्थानीय युवा हैं?
कितने कर्मचारी छत्तीसगढ़ के दूसरे जिलों से हैं?
और कितने दूसरे राज्यों से लाए गए हैं?
यदि स्थानीय रोजगार पर्याप्त है तो आंकड़े बालको प्रबंधन के पक्ष को मजबूत करेंगे। और यदि आंकड़े दूसरी कहानी बताते हैं, तो फिर स्थानीय युवाओं द्वारा उठाया जा रहा सवाल और गंभीर हो जाएगा।
एक तरफ आंदोलन… दूसरी तरफ जश्न… बीच में खड़ा बेरोजगार युवा!
यही बालको की मौजूदा तस्वीर पर सबसे बड़ा कटाक्ष है।
जनता को Corporate Affairs से ‘DON’ नहीं—DIALOGUE चाहिए।
युवाओं को गीत नहीं—रोजगार का हिसाब चाहिए।
आंदोलनकारियों को चुप्पी नहीं—जवाब चाहिए।
और कोरबा को यह जानने का अधिकार है कि जिस औद्योगिक संस्थान के लिए यहां की जमीन, संसाधन और सामाजिक परिवेश उपलब्ध है, उसके रोजगार में स्थानीय हिस्सेदारी आखिर कितनी है?
अब बालको को तय करना है—पहचान ‘संवाद’ की बनेगी या ‘DON वाले कटाक्ष’ की?
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज़ नेटवर्क का सवाल साफ है—
साहब! गाना आपका निजी मामला हो सकता है… लेकिन स्थानीय रोजगार का हिसाब सार्वजनिक सवाल है। और अब इस सवाल का जवाब ‘मैं हूं DON’ से नहीं—DATA से देना होगा।
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज़ नेटवर्क संबंधित अधिकारी धनंजय मिश्रा एवं बालको-वेदांता प्रबंधन का पक्ष आमंत्रित करता है। कथित वीडियो के वास्तविक संदर्भ, स्थानीय रोजगार के आंकड़ों तथा उठाए गए जनहित के प्रश्नों पर उनका जवाब प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
अगली कड़ी—
“बालको की ठेका कंपनियों में आखिर किसका राज?”
नाम, काम, मैनपावर और स्थानीय रोजगार—आंकड़ों के साथ होगी पड़ताल!
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज़ नेटवर्क
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