कोरबा DMF फाइल्स – भाग 2

करोड़ों की मंजूरी… किसे मिला लाभ? CAG ने DMF परियोजनाओं की स्वीकृति प्रक्रिया पर उठाए सबसे बड़े सवाल
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EXCLUSIVE | CAG REPORT EXPOSES – PART 2
क्या DMF का पैसा खदान प्रभावितों के बजाय फाइलों में बंटता रहा?
कोरबा/रायपुर। पहले भाग में हमने बताया था कि CAG की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2015-16 से 2023-24 तक DMF में ₹13,101.65 करोड़ जमा हुए, ₹10,253.22 करोड़ खर्च हुए, लेकिन 1,734 प्रत्यक्ष प्रभावित गांवों में से 754 गांव (44%) विकास से बाहर रह गए।
अब सवाल केवल इतना नहीं है कि पैसा कितना खर्च हुआ।
असल सवाल यह है—
करोड़ों रुपये किन परियोजनाओं पर स्वीकृत हुए?
क्या उनकी प्राथमिकता वास्तव में खदान प्रभावित गांव थे?
क्या प्रत्येक स्वीकृति नियमों और DMF के उद्देश्य के अनुरूप थी?
इन्हीं प्रश्नों पर CAG की रिपोर्ट गंभीर टिप्पणियां दर्ज करती है।
DMF ट्रस्ट की बैठकों में आखिर तय क्या हुआ?
DMF ट्रस्ट केवल धन रखने वाली संस्था नहीं है।
यही ट्रस्ट तय करता है—
✔ कौन-सी परियोजना स्वीकृत होगी।
✔ किस गांव को प्राथमिकता मिलेगी।
✔ कितनी राशि खर्च होगी।
✔ किस विभाग को काम मिलेगा।
✔ किस कार्य की निगरानी होगी।
यानी प्रत्येक करोड़ रुपये के पीछे एक प्रशासनिक निर्णय मौजूद होता है।
CAG का बड़ा सवाल
क्या योजनाएं वास्तव में खनन प्रभावित गांवों की जरूरत के आधार पर बनी थीं?
ऑडिट में पाया गया कि कई मामलों में—
प्रभावित क्षेत्रों की पहचान स्पष्ट नहीं थी।
वार्षिक योजना और मास्टर प्लान का अभाव था।
प्राथमिकता तय करने का दस्तावेजी आधार कमजोर था।
ऐसी स्थिति में करोड़ों रुपये की परियोजनाओं की स्वीकृति पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
₹1,060 करोड़ पर सबसे बड़ा प्रश्न
CAG के अनुसार लगभग ₹1,060 करोड़ की परियोजनाएं ऐसे मामलों में स्वीकृत हुईं, जहां प्रभावित क्षेत्रों की पहचान और प्राथमिकता का स्पष्ट आधार नहीं मिला।
यानी—
पहले योजना बनी या पहले पैसा स्वीकृत हुआ?
यही वह प्रश्न है जिसका उत्तर अब जनता चाहती है।
₹709 करोड़ के लाभार्थी कैसे चुने गए?
ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार लगभग ₹709 करोड़ की योजनाओं में लाभार्थियों के चयन का स्पष्ट आधार उपलब्ध नहीं था।
यदि लाभार्थी चयन की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं होगी—
तो सबसे अधिक प्रभावित परिवारों तक लाभ पहुंचा या नहीं यह सवाल हमेशा बना रहेगा।
क्या DMF का पैसा अपने मूल उद्देश्य से भटका?
CAG ने यह भी उल्लेख किया कि—
लगभग ₹30.73 करोड़ ऐसे कार्यों पर खर्च हुए जिन्हें प्राथमिकता वाले DMF उद्देश्यों से जोड़कर पर्याप्त रूप से न्यायोचित नहीं ठहराया गया।
यही कारण है कि अब खर्च की प्राथमिकताओं पर चर्चा तेज हो गई है।
अधूरी परियोजनाएं… अधूरा विकास
रिपोर्ट में लगभग ₹41.80 करोड़ ऐसी परियोजनाओं का उल्लेख है जो अधूरी रहीं या अपेक्षित परिणाम नहीं दे सकीं।
इसका अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक परियोजना में अनियमितता सिद्ध हो गई, लेकिन यह अवश्य दर्शाता है कि निगरानी और क्रियान्वयन पर गंभीर प्रश्न उठे हैं।खरीद प्रक्रिया पर भी आपत्तियां
CAG ने खरीद प्रक्रिया में भी कई कमियां दर्ज कीं—
₹17.49 करोड़ की खरीद में खुली निविदा संबंधी प्रश्न उठे।
₹38.82 करोड़ की खरीद में तकनीकी मानकों के अनुपालन पर टिप्पणियां दर्ज की गईं।
ऐसी टिप्पणियां सार्वजनिक वित्तीय प्रबंधन की पारदर्शिता पर प्रश्न खड़े करती हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल—जवाबदेही किसकी?
DMF ट्रस्ट के निर्णय सामूहिक प्रक्रिया से होते हैं।
ऐसे में जनता जानना चाहती है—
प्रत्येक बैठक में कौन-कौन उपस्थित था?
किन परियोजनाओं को किस आधार पर मंजूरी मिली?
क्या सामाजिक अंकेक्षण हुआ?
क्या परियोजनाओं का स्वतंत्र मूल्यांकन कराया गया?
क्या सभी कार्यों का परिणाम सार्वजनिक किया गया?
क्या अब सभी DMF परियोजनाओं का सोशल ऑडिट होगा?
CAG की रिपोर्ट के बाद अब मांग उठ रही है कि—
✔ सभी स्वीकृत परियोजनाओं की सूची सार्वजनिक हो।
✔ कार्यवार खर्च ऑनलाइन उपलब्ध कराया जाए।
✔ ग्रामवार लाभार्थियों का विवरण सार्वजनिक किया जाए।
✔ स्वतंत्र सामाजिक अंकेक्षण कराया जाए।
✔ जिम्मेदारी तय कर समयबद्ध सुधारात्मक कार्रवाई की जाए।
ग्राम यात्रा का संपादकीय प्रश्न
DMF कोई सरकारी दया नहीं— यह खनन प्रभावित जनता का वैधानिक अधिकार है।
जब हजारों करोड़ रुपये खर्च होने के बाद भी बड़ी संख्या में प्रभावित गांव बुनियादी सुविधाओं से वंचित रहें, तब केवल खर्च का आंकड़ा पर्याप्त नहीं होता।
जरूरी है कि यह भी बताया जाए—
किसे लाभ मिला?
किसे नहीं मिला?
क्यों नहीं मिला?
और— जिम्मेदारी किसकी है?
अगले अंक में..
कोरबा DMF फाइल्स – भाग 3
“क्या DMF की हर बैठक का कार्यवृत्त सार्वजनिक होगा? CAG की सिफारिशों के बाद अब कौन देगा जवाब—कलेक्टर, ट्रस्ट या राज्य सरकार?”
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संपादकीय टिप्पणी: यह रिपोर्ट CAG की ऑडिट टिप्पणियों और सार्वजनिक रिकॉर्ड के आधार पर तैयार की गई है।
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