कोरबा DMF फाइल्स – भाग 1

₹हजारो करोड़ खर्च… फिर भी 44% खदान प्रभावित गांव विकास से बाहर! CAG रिपोर्ट ने खोली देश के सबसे बड़े DMF मॉडल की परतें
खनिज निकला… खजाना भरा… लेकिन खदान प्रभावित गांव क्यों रह गए बदहाल?
EXCLUSIVE INVESTIGATION | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज़ नेटवर्क
कोरबा/रायपुर। भारत की ऊर्जा राजधानी कोरबा से हर दिन लाखों टन कोयला निकलता है। इसी कोयले से देश के बिजलीघर रोशन होते हैं और हजारों करोड़ रुपये का राजस्व सरकारों को प्राप्त होता है। इसी उद्देश्य से जिला खनिज न्यास (District Mineral Foundation – DMF) का गठन किया गया था कि खनन से प्रभावित गांवों को शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, सड़क और आजीविका जैसी बुनियादी सुविधाओं में प्राथमिकता मिले।
लेकिन अब भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की Performance Audit Report No. 05 of 2026 ने ऐसी तस्वीर सामने रखी है, जिसने केवल कोरबा ही नहीं बल्कि पूरे देश के DMF मॉडल पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
देश का सबसे बड़ा सवाल
₹13,101.65 करोड़ जमा हुए…
₹10,253.22 करोड़ खर्च भी हो गए…
लेकिन 1,734 खनन प्रभावित गांवों में से 754 गांव (44%) विकास से बाहर रह गए।
यानी—
करोड़ों रुपये खर्च हुए… योजनाएं बनीं… बैठकें हुईं… फाइलें चलीं…
लेकिन हजारों परिवारों की जिंदगी नहीं बदली।
CAG ने जो लिखा, वही सबसे बड़ा सवाल बन गया
ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार—
✔ प्रभावित गांवों की अंतिम सूची तक निर्धारित नहीं की गई।
✔ कई जिलों में DMF का मास्टर प्लान ही नहीं था।
✔ वार्षिक कार्ययोजना का अभाव रहा।
✔ प्राथमिकता तय किए बिना परियोजनाएं स्वीकृत होती रहीं।
फिर भी हजारों करोड़ रुपये खर्च होते रहे। यही तथ्य अब प्रशासनिक जवाबदेही के केंद्र में हैं।
सवाल केवल अधिकारियों पर नहीं… पूरे निर्णय तंत्र पर
DMF कोई निजी संस्था नहीं है। यह एक वैधानिक ट्रस्ट है। जिसका अध्यक्ष जिला कलेक्टर होता है। ट्रस्ट में संबंधित क्षेत्र के जनप्रतिनिधि भी शामिल होते हैं।
योजनाओं की स्वीकृति… प्राथमिकता निर्धारण… व्यय की निगरानी… और समीक्षा…
सब इसी ट्रस्ट के माध्यम से होती है।
ऐसे में यदि CAG स्वयं कह रहा है कि—
44 प्रतिशत गांव विकास से बाहर रह गए, तो जनता स्वाभाविक रूप से पूछ रही है—
निर्णय प्रक्रिया में आखिर चूक कहां हुई?
CAG रिपोर्ट के सबसे गंभीर निष्कर्ष
₹1,060 करोड़। प्रभावित क्षेत्रों की स्पष्ट पहचान के बिना स्वीकृत।
₹709 करोड़। लाभार्थी चयन का स्पष्ट आधार नहीं मिला।
₹30.73 करोड़ गैर-प्राथमिकता अथवा सरकारी कार्यालयों जैसे कार्यों पर व्यय।
₹41.80 करोड़ अधूरी अथवा अनुपयोगी परियोजनाओं पर खर्च।
₹17.49 करोड़ बिना खुली निविदा खरीद।
₹38.82 करोड़ तकनीकी मानकों के अनुरूप प्रक्रिया का अभाव।
अब जनता जवाब मांग रही है
यदि सब कुछ नियमों के अनुसार हुआ— तो CAG ने इतनी गंभीर टिप्पणियां क्यों दर्ज कीं?
यदि निगरानी प्रभावी थी—। तो 44 प्रतिशत गांव आज भी विकास से बाहर क्यों हैं?
यदि DMF वास्तव में खनन प्रभावितों के लिए बना— तो सबसे अधिक प्रभावित परिवारों तक लाभ पहले क्यों नहीं पहुंचा?
कोरबा से उठे सवाल, पूरे देश तक यह मामला केवल कोरबा का नहीं है।
यह उन सभी राज्यों का प्रश्न है जहां DMF के माध्यम से हजारों करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं।
यदि देश की सर्वोच्च लेखा परीक्षण संस्था इतनी गंभीर कमियां दर्ज कर रही है, तो पूरे देश के DMF मॉडल की पारदर्शिता और जवाबदेही पर व्यापक चर्चा स्वाभाविक है।
अब किसे देना होगा जवाब?
जिला प्रशासन से—
क्या प्रत्येक परियोजना की स्वतंत्र समीक्षा होगी?
क्या जिम्मेदारी तय की जाएगी?
DMF ट्रस्ट से—क्या बैठकों के कार्यवृत्त और स्वीकृत परियोजनाओं का पूरा विवरण सार्वजनिक किया जाएगा?
राज्य सरकार से— क्या CAG की सभी सिफारिशों पर समयबद्ध कार्रवाई होगी?
केंद्र सरकार से— क्या देशभर के DMF ट्रस्टों की स्वतंत्र समीक्षा कराई जाएगी?
ग्राम यात्रा का संपादकीय प्रश्न
खनिज जनता का है।
जंगल जनता का है।
जमीन जनता की है।
तो फिर— DMF का हर रुपया भी जनता के प्रति जवाबदेह होना चाहिए।
जब हजारों करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद बड़ी संख्या में खनन प्रभावित गांव बुनियादी सुविधाओं से वंचित रह जाएं, तो यह केवल वित्तीय प्रबंधन का नहीं, बल्कि सार्वजनिक जवाबदेही का विषय बन जाता है।
अब समय है—
DMF की हर फाइल खुले।
हर परियोजना का सामाजिक अंकेक्षण हो।
CAG की हर आपत्ति पर सार्वजनिक जवाब दिया जाए।
अगले अंक में…
कोरबा DMF फाइल्स – भाग 2
“करोड़ों रुपये किन परियोजनाओं में गए? किन स्वीकृतियों पर CAG ने सबसे गंभीर सवाल उठाए? क्या खनन प्रभावित गांवों को उनका वैधानिक अधिकार मिला?
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