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बालको बाउंड्रीवाल पर कोर्ट सख्त… सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित, हाईकोर्ट के निर्देश… अब ग्राम यात्रा की शिकायत पर भी प्रशासन हरकत में, पूरे प्रकरण की जल्द होगी जांच

कोरबा। बालको क्षेत्र में बेलाकछार नदी किनारे खड़ी हो रही बाउंड्रीवाल अब सिर्फ एक निर्माण नहीं, बल्कि कानून, प्रशासन और जमीन के पूरे सिस्टम पर सवाल बन चुकी है। एक तरफ यह भूमि विवाद पहले से ही माननीय सुप्रीम कोर्ट में लंबित रहा है, वहीं दूसरी ओर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट (WPC No. 1091/2026) ने भी प्रशासन को स्पष्ट निर्देश दिए थे कि नगर निगम द्वारा जारी नोटिस के आधार पर कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। इसके बावजूद जमीन पर निर्माण कार्य लगातार जारी रहना अब सीधे-सीधे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करता है।

नगर पालिक निगम कोरबा द्वारा 02 और 03 फरवरी 2026 को जारी नोटिस में साफ कहा गया था कि बिना अनुमति बाउंड्रीवाल निर्माण नियमों का उल्लंघन है और इसे तत्काल रोका जाए। नोटिस में संबंधित प्रावधानों के तहत कार्रवाई और निर्माण को तोड़ने तक की चेतावनी भी दी गई थी। लेकिन हकीकत यह रही कि नोटिस कागजों में रह गए और जमीन पर दीवार खड़ी होती रही—मजदूर काम करते रहे, मशीनें चलती रहीं और निर्माण रुकने के बजाय आगे बढ़ता गया।

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जब मामला बढ़ा तो यह सीधे हाईकोर्ट पहुंचा, जहां से प्रशासन को स्पष्ट निर्देश दिए गए कि वह नोटिस के आधार पर कार्रवाई सुनिश्चित करे। लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यही खड़ा होता है—जब कोर्ट ने कहा, नोटिस पहले से था, फिर भी कार्रवाई क्यों नहीं हुई ? क्या आदेशों को सिर्फ फाइलों तक सीमित रख दिया गया ?

ग्राम यात्रा की शिकायत के बाद बढ़ा दबाव

इस पूरे मामले में अब नया मोड़ तब आया जब ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज़ नेटवर्क द्वारा इस प्रकरण को लेकर औपचारिक शिकायत दर्ज कराई गई। सूत्रों के अनुसार प्रशासन ने इस शिकायत का संज्ञान लिया है और अब पूरे मामले की विस्तृत जांच की तैयारी की जा रही है। इससे यह संकेत मिल रहा है कि अब मामला सिर्फ नोटिस और चेतावनी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसकी गहराई तक जांच हो सकती है।

2718 एकड़ जमीन का पूरा गणित—यहीं से उठते हैं बड़े सवाल

उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार बालको के पास कुल लगभग 2718 एकड़ भूमि है, जिसमें से 914 एकड़ फ्रीहोल्ड और 1804 एकड़ लीज होल्ड है। लेकिन असली विवाद इसी लीज होल्ड भूमि को लेकर खड़ा हो रहा है।

➡️ 1136 एकड़ पर अलॉटमेंट लेटर उपलब्ध
➡️ 668 एकड़ भूमि हाईकोर्ट के आदेश के दायरे में

यानि पूरी जमीन निर्विवाद नहीं है, फिर भी निर्माण जारी है।

1751 एकड़ रेवेन्यू फॉरेस्ट—फिर निर्माण कैसे ?

दस्तावेज बताते हैं कि लीज भूमि में से लगभग 1751 एकड़ रेवेन्यू फॉरेस्ट है, जबकि केवल 53 एकड़ नॉन-फॉरेस्ट है।

इतनी बड़ी मात्रा में वन और राजस्व भूमि पर बाउंड्रीवाल निर्माण किस आधार पर किया जा रहा है ?

803 एकड़ बिना मुआवजा—विवाद की जड़

➡️ 947.95 एकड़ भूमि का मुआवजा दिया गया
➡️ 803 एकड़ भूमि का मुआवजा लंबित

इसी में से 86.42 एकड़ भूमि विशेष रूप से चिन्हित है।

क्या इसी लंबित और विवादित भूमि पर बाउंड्रीवाल खड़ी की जा रही है ?

209 एकड़ का अंतर—रिकॉर्ड में बड़ा खेल ?

➡️ 2014 में 1751 एकड़ रेवेन्यू फॉरेस्ट
➡️ 2017 में 1542 एकड़

➡️ 209 एकड़ का अंतर

यह अंतर कैसे आया ? रिकॉर्ड बदला या जमीन का खेल हुआ ?

नोटिस, कोर्ट… फिर भी बेअसर कार्रवाई

➡️ निगम नोटिस जारी
➡️ हाईकोर्ट के निर्देश
➡️ सुप्रीम कोर्ट में पुराना मामला लंबित

इसके बावजूद जमीन पर निर्माण जारी रहना सबसे बड़ा सवाल है।

ग्राउंड पर असर—ग्रामीणों की जिंदगी प्रभावित

इस बाउंड्रीवाल का असर सीधे दोन्द्रो बेला और आसपास के गांवों पर पड़ा है।

➡️ वर्षों से उपयोग में आ रहे रास्ते बंद
➡️ लोगों को कई किलोमीटर घूमना पड़ रहा
➡️ रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित

प्रशासन अब जांच की बात कर रहा

सूत्रों के अनुसार अब प्रशासन पूरे मामले की निष्पक्ष और विस्तृत जांच करने की तैयारी में है, जिसमें अवैध निर्माण, भूमि की वैधता, मुआवजा, रिकॉर्ड में अंतर और संबंधित अधिकारियों की भूमिका तक सभी पहलुओं को शामिल किया जाएगा।

लेकिन सवाल अभी भी वही है—जब कोर्ट ने कहा, नोटिस जारी हुए, शिकायत हुई… तो कार्रवाई अब तक क्यों नहीं हुई ?

अंतिम सवाल

➡️ सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित
➡️ हाईकोर्ट के निर्देश मौजूद
➡️ निगम के नोटिस जारी
➡️ ग्राम यात्रा की शिकायत भी दर्ज

फिर भी बालको की दीवार खड़ी हो रही है… आखिर किसके भरोसे ?

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