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जिनवाणी की वर्षा करते हुए जैन संत पहुंचे महावीर स्वामी जिनालय

रायपुर । राजधानी की पावन धरा पर जिनवाणी की वर्षा शुरू हो चुकी है। इसी क्रम में गुरूवार को दीर्घ तपस्वी विरागमुनिजी का न्यू राजेंद्र नगर स्थित महावीर स्वामी जिनालय में आगमन हुआ और 8.45 बजे से लोगों ने प्रवचन का लाभ लिया। प्रवचन के दौरान उन्होंने कहा कि राग का दायरा आप खत्म नहीं कर सकते तो उसे सीमित करने की कोशिश करो। हमें अपने राग को कमजोर करना है, जबकि हमें उसे ही मजबूत बना रहे है। दिन ब दिन हमारा राग बढ़ता जा रहा है। इतना बढ़ता जा रहा है, जिसे हम गिन नहीं पा रहे है और वह हमारी गणना से बाहर हो चुका है। आज जो भी हमारे साथ हो रहा है, वह हमारे भूतकाल के कर्मों के आधार पर हो रहा है।

आज हमें मनुष्य का जीवन मिला है तो हमें इसका पूरा उपयोग करना चाहिए और धर्म करके हमें मोक्ष को प्राप्त कर लेना चाहिए क्योंकि ऐसा मौका फिर ना जाने कब आएगा। मोक्ष पाना केवल और केवल मनुष्य के हाथ में होता है। यह भगवान के हाथ में नहीं है अगर वह उसके हाथ में होता तो वह सभी जीवों को मोक्ष प्रदान कर देता। मुनिजी ने कहा कि मोक्ष तो सभी को चाहिए ही चाहिए लेकिन कम कोई करना नहीं चाहता। अब हमें यह तय करना है कि हमें अपने जीवन में करना क्या है। हम ऐसा क्या करें की अपनी नजरों में तो कम से कम ना गिरे। दूसरों की नजरों में गिर जाए तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा लेकिन अपने नजरों में हमें नहीं गिरना है ऐसा हमें काम करना है।

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उन्होंने आगे कहा कि आज हमने जो चोला पहन रखा है वह बाहर से तो इंसान का है पर अंदर किसी शैतान का वास है। आज अच्छा कोई नहीं बनना चाहता सब अच्छा दिखना चाहते हैं। उसके लिए व्यक्ति धार्मिक और सामाजिक कार्य करता है उसी के बारे में सोचता है और वैसे ही बात करता है ताकि लोग उसे अच्छा बोले। प्रवचन सुनने भी लोग जब मंदिर तक आते हैं उससे पहले वह अपना सब काम पूरा करके आना चाहते हैं ताकि कोई काम न छूटे और उनका टारगेट भी पूरा हो जाए उसके बाद वह धर्म की ओर बढ़ते हैं। जबकि धर्म के लिए समय आपको प्राथमिकता से निकलना चाहिए क्योंकि दिन भर आपके पास काम करने के लिए तो समय ही समय है।

उन्होंने आगे कहा कि आपकी सारी चीज अच्छी और व्यवस्थित है लेकिन आप हमेशा परीक्षा में फेल हो जाते हो। ऐसा हमेशा चातुर्मास के समय देखने को मिलता है लोग तैयार तो रहते हैं लेकिन जैसे चातुर्मास शुरू होता है तो कुछ दिन बाद में फेल हो जाते हैं। आप अगर गाड़ी चला रहे हैं तो अगर सड़क पर चलते व्यक्ति को आप तोक दें और उसकी हड्डी टूट जाए तो उसके बाद सॉरी बोलने का क्या फायदा, उसकी हड्डियां तो टूट गई। सॉरी बोलने की नौबत कभी नहीं आनी चाहिए क्योंकि हमें पहले ही ब्रेक मार लेना चाहिए लेकिन ब्रेक करने के बजाय हम तो एक्सीलेटर बढ़ा रहे हैं।

जैसे आईने में हमें चेहरे के दाग धब्बे दिख जाते हैं वैसे ही शास्त्रों को देखने से हमें अपने अवगुणों को पहचानने का मौका मिलता है। इसीलिए समय रहते हैं हमें धर्म करना है। आप सोचिए कि अगर कोई पुजारी मंदिर में 10 घंटे पूजा करता है और आप दिन में केवल एक ही घंटा पूजा करते हैं तो किसका धर्म ज्यादा है आपका मुझे पुजारी का। अब आपको लगेगा कि पुजारी तो 10 घंटे पूजा करता है और मैं तो केवल 1 घंटे ही पूजा करता हूं तो पुजारी का धर्म ज्यादा होगा। जबकि ऐसा नहीं है, फर्क उससे नहीं पड़ता क्योंकि धर्म भाव की स्पर्शना पर आधारित है। घंटे धर्म करने के बाद भी आप मोक्ष के रास्ते में आगे नहीं बढ़ रहे हैं तो ऐसे धर्म का कोई मतलब नहीं होगा।

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