ACB के खिलाफ सड़क पर विरोध: GTP से रिश्तों का भी खुले हिसाब—कोयले के रिकॉर्ड की जांच कब?

भारतीय जन अधिकार पार्टी ने उठाई CBI–SIT जांच की मांग; उत्पादन, स्टॉक, परिवहन और रेलवे डिस्पैच के मिलान की मांग ने बढ़ाए सवाल
कोरबा | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क नाम ACB हो या GTP—कोयले के कारोबार का हिसाब संबंधित इकाई, उसके वास्तविक नियंत्रण और लेन-देन तक पहुंचना चाहिए। कोरबा में ACB कंपनी के खिलाफ धरना-प्रदर्शन के बाद अब सवाल है कि आरोपों की जांच किन अभिलेखों के आधार पर होगी और जिम्मेदारी किस स्तर तक तय की जाएगी। ग्राम यात्रा को दिए गए विवरण में ACB और GTP को एक ही कारोबारी समूह से जुड़ा बताया गया है। इस दावे की दस्तावेजी पुष्टि शेष है। लेकिन संबंधित इकाइयों का पूरा नाम, स्वामित्व और संचालन संबंध सार्वजनिक होने से यह स्पष्ट हो सकेगा कि किस कारोबार और किस लेन-देन की जिम्मेदारी किसकी है।
धरने से प्रशासन के दरवाजे तक पहुंची जांच की मांग
धरने संबंधी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, भारतीय जन अधिकार पार्टी छत्तीसगढ़ के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं ने 30 अक्टूबर को कोरबा के सुभाष चौक पर ACB कंपनी के खिलाफ प्रदर्शन किया। पार्टी ने कोयले के उत्पादन, भंडारण और परिवहन में कथित अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए CBI और SIT से जांच कराने की मांग की। प्रदर्शनकारियों ने तहसीलदार मुकेश साहू को ज्ञापन सौंपा। इसमें कोयले के उत्पादन से रेलवे डिस्पैच तक रिकॉर्ड का मिलान और डिजिटल दस्तावेजों की फॉरेंसिक जांच की मांग रखी गई।
अब सवाल शिकायत लेने का नहीं, उसकी तथ्यपरक जांच का है।
कोयला आया कितना, गया कितना—बाकी हिसाब कहां है?
किसी भी गंभीर पड़ताल की शुरुआत स्पष्ट अवधि और संबंधित इकाई के रिकॉर्ड से होनी चाहिए। खदान अथवा अन्य स्रोत से आवक, स्टॉक में दर्ज मात्रा, प्रसंस्करण, बिक्री और निकासी का पूरा क्रम जांचा जाए। तौल कांटे का मूल डेटा, वाहन नंबर, गेट एंट्री, बिल और रेलवे प्रेषण—इन सबका आपस में मिलान हो। अंतर मिले तो उसका कारण मांगा जाए। स्पष्टीकरण सही हो तो दर्ज किया जाए; गड़बड़ी का प्रमाण मिले तो जिम्मेदार व्यक्ति और संस्था तक जांच पहुंचे। कारोबार कितना बड़ा है, यह जांच से बचने का आधार नहीं हो सकता। और आरोप कितना तीखा है, यह उसे सच मान लेने का आधार भी नहीं है। कसौटी दस्तावेज होंगे।
ACB–GTP: नामों से आगे वास्तविक नियंत्रण की पड़ताल जरूरी
दोनों को एक बताने वाले दावे की जांच केवल नाम देखकर नहीं होगी। संबंधित कंपनियों के पंजीयन, निदेशकों, शेयरधारिता और संचालन समझौतों से वास्तविक स्थिति निकलेगी। क्या साझा प्रबंधन है? क्या एक इकाई दूसरी के लिए परिवहन, आपूर्ति अथवा संचालन करती है? संबंधित लेन-देन किसके खाते में दर्ज हैं? यदि संबंध है तो उसका स्वरूप सामने आए। अलग इकाइयां हैं तो उनकी जिम्मेदारियां स्पष्ट हों। अस्पष्ट कारोबारी पहचान के बीच गंभीर शिकायतों की जांच अधूरी नहीं रहनी चाहिए।
लक्ष्मण नाला के पास निर्माण—कंपनी का नाम कौन स्पष्ट करेगा?
कुचेना के लक्ष्मण नाला के आसपास सड़क और स्टॉक यार्ड संबंधी गतिविधियों पर भी संरक्षण की मांग उठी है। ऊर्जाधानी भू-विस्थापित किसान कल्याण समिति ने नाले की संरचना और बहाव को संभावित नुकसान की आशंका जताकर जांच मांगी है। उस मामले की उपलब्ध सामग्री में निर्माणकर्ता कंपनी की पहचान स्पष्ट नहीं है। इसीलिए प्रशासन जमीन के अभिलेख, निर्माणकर्ता का नाम, नक्शा और स्वीकृतियां सामने रखे। यदि इन मामलों में संबंध है तो दस्तावेज बताएंगे; संबंध नहीं है तो वह भी स्पष्ट होगा।
ग्राम यात्रा की पड़ताल: प्रभाव के दावों से आगे, अभिलेखों तक
कोयला क्षेत्र में लंबे समय तक प्रभावशाली मौजूदगी के दावे उठ रहे हैं। ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क की पड़ताल में ऐसे दावों की परख संबंधित अभिलेखों और पक्षकारों के जवाब से की जाएगी। अभी CBI या SIT जांच गठित होने, अनियमितता सिद्ध होने अथवा कंपनी के विरुद्ध अंतिम निष्कर्ष की पुष्टि नहीं है। उपलब्ध सामग्री में कंपनी का विस्तृत पक्ष भी शामिल नहीं है।
धरना हो चुका, ज्ञापन पहुंच चुका—अब प्रशासन बताए कि शिकायत पर अगला कदम क्या है। कोयले का हिसाब साफ है तो रिकॉर्ड उसका जवाब दें। गड़बड़ी है तो जांच उसकी जिम्मेदारी तय करे। कोरबा को नामों का शोर नहीं, पूरे कारोबार का सत्यापित हिसाब चाहिए।
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