नए टेंडरों में रफ्तार, पुराने कामों की सुध नहीं—कोरबा निगम में ‘आगे पाठ, पीछे सपाट’?

बुधवारी बाजार की LED लाइटें 15 दिन में बंद होने का आरोप; गुणवत्ता, भुगतान और रखरखाव पर आयुक्त से जवाब की मांग—क्या अधिकारियों की कार्यशैली सरकार के सुशासन के दावे पर भारी पड़ रही है?
कोरबा। शहर सजाने का दावा, नए टेंडरों की तैयारी और पुराने कामों की बदहाली पर चुप्पी—कोरबा नगर निगम की कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवालों का जवाब अब प्रचार से नहीं, दस्तावेजों से देना होगा। जनता का पैसा खर्च करके चमक दिखाना आसान है; उस चमक को टिकाए रखना प्रशासन की असली परीक्षा है।
बुधवारी बाजार में सौंदर्यीकरण के नाम पर लाखों रुपये खर्च कर लगाई गई LED लाइटों के मात्र 15 दिन में बंद हो जाने का आरोप सामने आया है। उपलब्ध तस्वीर बाजार की प्रकाशित सजावट दिखाती है; वर्तमान स्थिति, खर्च की रकम और लाइटें खराब होने की अवधि की स्वतंत्र पुष्टि अभी आवश्यक है। लेकिन शिकायत ने निगम प्रशासन के सामने सीधा सवाल रख दिया है—यदि इतनी जल्दी लाइटें बंद हुईं, तो गुणवत्ता किसने जांची और जिम्मेदारी किसकी तय हुई?
जनता का खजाना है, किसी अफसर की जागीर नहीं
आयुक्त और संबंधित अधिकारियों को समझना होगा कि सार्वजनिक धन खर्च करने का अधिकार उसके परिणामों का हिसाब देने की जिम्मेदारी के साथ आता है। पदस्थापना बदल सकती है, लेकिन घटिया काम का बोझ शहर और उसके नागरिकों को उठाना पड़ता है। नए कामों के उद्घाटन की चमक पुराने कामों की खराब गुणवत्ता को नहीं ढक सकती। यदि रखरखाव की व्यवस्था ही नहीं है, तो सौंदर्यीकरण के नाम पर बार-बार खर्च का औचित्य क्या है? और यदि व्यवस्था है, तो खराबी दूर कराने में देरी क्यों?
निगम प्रशासन पर राजनीतिक प्रभाव और ठेकेदारों को तरजीह देने के आरोप
निगम प्रशासन पर कांग्रेसी नेताओं के प्रभाव में काम करने और कांग्रेस से जुड़े चहेते ठेकेदारों को करोड़ों रुपये के कार्यों में तरजीह देने के आरोप भी उठाए जा रहे हैं। इन आरोपों की पुष्टि के लिए निविदाओं, पात्रता शर्तों, प्रतिस्पर्धी दरों, कार्यादेशों और भुगतान अभिलेखों की जांच जरूरी है। सरकारी ठेका राजनीतिक नजदीकी का पुरस्कार नहीं हो सकता। यदि चयन पारदर्शी है, तो निगम बताए कि किन एजेंसियों को कितने काम मिले, उनकी गुणवत्ता कैसी रही और खराब प्रदर्शन पर क्या कार्रवाई हुई।
अधिकारियों और ठेकेदारों की कथित घूमने-फिरने तथा हवाई यात्राओं की बात भी उठाई गई है। ऐसी यात्राएं अपने आप में अनियमितता का प्रमाण नहीं हैं। लेकिन किसी विशिष्ट यात्रा के दस्तावेज सामने आते हैं, तो उसका उद्देश्य, खर्च वहन करने वाला पक्ष और संबंधित ठेकों से संभावित संबंध जांच का विषय होना चाहिए।
क्या यही है विष्णु सरकार का सुशासन?
सुशासन का दावा तभी विश्वसनीय बनेगा, जब सरकारी धन से हुए काम टिकेंगे और खराब काम पर जवाबदेही तय होगी। अधिकारियों की लापरवाही या पक्षपात सामने आता है, तो उसकी कीमत जनता के साथ सरकार की साख भी चुकाती है।
राज्य शासन को स्पष्ट करना चाहिए—क्या कोरबा निगम में पुराने कामों की गुणवत्ता और रखरखाव की समीक्षा होगी? क्या राजनीतिक प्रभाव और चुनिंदा ठेकेदारों को लाभ पहुंचाने के आरोपों की स्वतंत्र जांच कराई जाएगी?
बुधवारी बाजार के मामले में निगम प्रशासन को सार्वजनिक करना चाहिए:
– स्वीकृत लागत, कार्यादेश और ठेकेदार का नाम।
– लगाई गई लाइटों का विवरण, वारंटी और रखरखाव की शर्तें।
– गुणवत्ता परीक्षण, कार्य पूर्णता प्रमाणपत्र और भुगतान की स्थिति।
– खराबी की शिकायत कब मिली और उस पर क्या कार्रवाई हुई।
– दोषपूर्ण काम मिलने पर मरम्मत, राशि वसूली या अनुबंध के अनुसार कार्रवाई का विवरण।
कोरबा की जनता को सजावट के नाम पर खर्च का प्रदर्शन नहीं, अपने पैसे का टिकाऊ परिणाम चाहिए। आयुक्त जवाब दें—नए टेंडरों की इतनी चिंता है, तो पुराने कामों की जिम्मेदारी कौन निभाएगा? सरकार संज्ञान कब लेगी?
संपादक – अब्दुल सुल्तान
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क
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