दीपका–गेवरा: कोयले का कारोबार या ‘अलाउ’ का दरबार? ₹150–₹450 प्रति टन कथित वसूली पर जवाब कौन देगा?

एन. खुर्शीद सहित अधिकारियों और कारोबारी पक्षों की भूमिका की जाँच की मांग; शीर्ष कार्यालयों तक कथित हिस्सेदारी का अपुष्ट दावा—कोयला मंत्रालय से स्वतंत्र पड़ताल का आग्रह
कोरबा/दीपका/गेवरा। कोयला सार्वजनिक संपदा है। उसके उठाव के लिए निर्धारित भुगतान के ऊपर यदि ‘अलाउ’, लोडिंग और अच्छे कोयले के नाम पर अलग रकम माँगी जाती है, तो सवाल सीधा है—खदान में नियम चलते हैं या कथित वसूली की पर्ची?
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क की पूर्व कवरेज में उठे सवालों के बीच सूत्रों ने आरोप लगाया है कि दीपका–गेवरा में अच्छे कोयले के नाम पर ₹150 से ₹450 प्रति टन तक अतिरिक्त रकम माँगी जाती है। ‘अलाउ’ के नाम पर कथित भुगतान और कोयले की अफरातफरी के आरोप भी सामने रखे गए हैं। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। लेकिन इनकी जाँच का रास्ता स्पष्ट है—डीओ खोलिए, वेब्रिज का रिकॉर्ड मिलाइए, वाहनों का रास्ता देखिए और कथित भुगतान का अंतिम ठिकाना खोजिए।
‘अलाउ’ का आदेश कहाँ है—और उसका खजाना किसके पास?
पूर्व कवरेज में कथित ‘डीओ अलाउ’ के लिए ₹15–₹18 प्रति टन और लोडिंग के नाम पर लगभग ₹20 प्रति टन अतिरिक्त भुगतान के दावे उठाए गए थे। अच्छे कोयले के लिए ₹150–₹450 प्रति टन की नई सूचना की भी घटनावार पुष्टि जरूरी है। इन दरों को बिना सत्यापन जोड़कर कुल वसूली नहीं माना जा सकता। प्रबंधन बताए—क्या निर्धारित शुल्क के बाहर कोई रकम माँगी गई? यदि हाँ, तो किस अधिकार से? भुगतान लेने वाला कौन था और उसे रोकने की जिम्मेदारी किसकी थी? यदि ‘अलाउ’ अधिकृत है, तो आदेश दिखाइए। यदि अनधिकृत है, तो कार्रवाई दिखाइए। जनता को शब्दों की बाजीगरी नहीं, रकम का हिसाब चाहिए।
खुर्शीद सहित उठे नामों पर रिकॉर्ड बोले
पूर्व कवरेज में एन. खुर्शीद, मारुति शंकर, संतोष राठौर और पार्थ मुखर्जी के नाम संबंधित व्यवस्था की जवाबदेही और भूमिका की जाँच के संदर्भ में उठाए गए थे। उपलब्ध पूर्व सामग्री में राजेश सिंह और संतोष सिन्हा के नाम भी जाँच की मांग के संदर्भ में सामने हैं। कारोबारी एवं परिवहन पक्षों में रुंगटा, एस.एस. अर्थमूवर्स, तीवरता ट्रांसपोर्ट, सोनू राठौर और मनजीत यादव की संबंधित भूमिका की पड़ताल की मांग की गई है। प्रासंगिक अवधि में किसकी क्या जिम्मेदारी थी, किसने किस निर्णय पर हस्ताक्षर किए और किस निजी पक्ष को क्या सुविधा मिली—यह अभिलेखों से तय हो। किसी नाम को आरोपों के घेरे में रखना और उसका दोष सिद्ध होना अलग बातें हैं। प्रत्येक व्यक्ति और संस्था की भूमिका अलग साक्ष्यों से जाँची जाए।
अच्छे कोयले की गुणवत्ता तय है या कथित ‘चढ़ावे’ की दर?
सूत्रों का आरोप है कि अतिरिक्त रकम देकर बेहतर कोयला पाने की व्यवस्था चलती है। यदि यह आरोप सही है, तो निष्पक्ष आपूर्ति पर गंभीर प्रश्न खड़ा होता है। घोषित ग्रेड, गुणवत्ता परीक्षण, वास्तविक लोडिंग और गंतव्य पर प्राप्त कोयले का मिलान हो। चुनिंदा पक्षों को मिली आपूर्ति और शिकायत करने वाले खरीदारों के रिकॉर्ड की तुलना की जाए। अच्छा कोयला नियम से मिले तो कारोबार है; कथित गुप्त भुगतान से मिले तो जाँच का विषय है। इस अंतर को प्रबंधन स्पष्ट करे।
कथित हिस्सेदारी ऊपर तक—तो जाँच नीचे क्यों रुके?
सूत्र का एक अलग, अपुष्ट दावा है कि कथित वसूली में SECL मुख्यालय के कुछ उच्च अधिकारियों और कोल इंडिया चेयरमैन कार्यालय तक हिस्सेदारी पहुँचती है। ग्राम यात्रा इस दावे की पुष्टि नहीं करता। किसी कार्यालय का उल्लेख उसके प्रमुख या सभी कर्मचारियों की संलिप्तता का प्रमाण नहीं है। लेकिन आरोप की गंभीरता स्वतंत्र परीक्षण आवश्यक बनाती है। जाँच ऐसे सक्षम स्तर से हो, जो विवादित निर्णयों में शामिल न रहा हो। कथित रकम किसने दी, किसने प्राप्त की, किस दबाव या लाभ के बदले दी और आगे कहाँ पहुँची—इन सवालों का उत्तर खोजा जाए। दबाव में भुगतान करने वालों और अनुचित लाभ पाने के लिए भुगतान करने वालों की भूमिका भी अलग-अलग तय हो।
कोयला मंत्रालय: अब फाइलों की धूल नहीं, निर्णयों का हिसाब उठाइए
केंद्र सरकार, कोयला मंत्रालय और सक्षम सतर्कता प्राधिकारियों से मांग है कि संबंधित अभिलेख तत्काल सुरक्षित कराएँ और स्वतंत्र जाँच सुनिश्चित करें। डीओ, डिस्पैच, लोडिंग, वेब्रिज, उपलब्ध सीसीटीवी, जीपीएस, आरएफआईडी तथा गंतव्य पर वजन और गुणवत्ता का मिलान हो। कथित बिचौलियों की पहचान की जाए। आर्थिक लेन-देन के ठोस संकेत मिलने पर वित्तीय रिकॉर्ड और संभावित हित-संघर्ष की पड़ताल हो। अनियमितता प्रमाणित होने पर कार्रवाई संबंधित कर्मचारी, अधिकारी अथवा कारोबारी के प्रभाव के आधार पर कमजोर न पड़े। राज्य सरकार और जिला प्रशासन भी अपने अधिकारक्षेत्र में आने वाले परिवहन, वजन तथा अन्य संबंधित उल्लंघनों की शिकायतों पर कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट करें।
चुप्पी से दोष सिद्ध नहीं होता—चुप्पी से जिम्मेदारी खत्म भी नहीं होती
SECL और कोल इंडिया प्रबंधन आरोपों का दस्तावेजी उत्तर दें। शिकायतों पर क्या हुआ, कौन-सी जाँच हुई और उसका परिणाम क्या निकला—यह सामने आए। कोयले की कालिख प्रेस बयान से नहीं धुलेगी। रिकॉर्ड खुलेगा, स्वतंत्र जाँच होगी और प्रमाण पर कार्रवाई होगी—तभी व्यवस्था की विश्वसनीयता मजबूत होगी। दीपका–गेवरा देश की संपदा है। यदि वहाँ कथित ‘अलाउ’ का समानांतर दरबार चल रहा है, तो उसे रोकना शासन की परीक्षा है। खदान से मुख्यालय तक हिसाब माँगा जाना चाहिए—बिना पद देखकर, बिना प्रभाव देखकर। यह रिपोर्ट अपुष्ट सूचनाओं, पूर्व कवरेज में उठे आरोपों और जाँच की मांग पर आधारित है। कथित वसूली अथवा शीर्ष स्तर की हिस्सेदारी स्वतंत्र रूप से प्रमाणित नहीं है। उल्लिखित व्यक्तियों और संस्थाओं का दोष सिद्ध नहीं है। संबंधित पक्षों का उत्तर प्राप्त होने पर प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
संपादक – अब्दुल सुल्तान
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क
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