दीपका–गेवरा में कथित ‘अलाउ’ का दरबार: GM–CGM और CMD साहब, निगरानी कहाँ है?

‘अलाउ’ के नाम पर ₹12–₹50 और अच्छे कोयले के लिए ₹150–₹450 प्रति टन कथित वसूली का आरोप; संरक्षण, मिलीभगत अथवा निगरानी की विफलता की स्वतंत्र जाँच की मांग
कोरबा/दीपका/गेवरा। खदान का प्रवेश नियंत्रित है, कोयले का उठाव दर्ज होता है, वजन का रिकॉर्ड बनता है और अधिकारियों की निगरानी व्यवस्था मौजूद है। ऐसे में यदि ‘अलाउ’ और अच्छे कोयले के नाम पर कथित अतिरिक्त वसूली चल रही है, तो सवाल केवल रकम माँगने वाले पर नहीं—दीपका–गेवरा के जिम्मेदार GM–CGM और SECL के CMD स्तर की निगरानी पर भी उठता है। सूत्रों का आरोप है कि ‘अलाउ’ के नाम पर ₹12 से ₹50 प्रति टन, जबकि अच्छे कोयले के लिए ₹150 से ₹450 प्रति टन तक कथित अवैध रकम माँगी जाती है। इन दरों और कथित भुगतान की घटनाओं की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। लेकिन आरोपों की जाँच के साथ यह स्पष्ट होना चाहिए कि संबंधित अधिकारियों तक शिकायतें कब पहुँचीं और उन्होंने क्या कदम उठाए।
GM–CGM साहब: जानकारी नहीं थी, तो निगरानी कैसी थी? जानकारी थी, तो कार्रवाई क्या हुई?
यदि कथित वसूली अधिकारियों की जानकारी के बिना हुई, तो निगरानी व्यवस्था में कमी कहाँ रही? यदि शिकायतों से जानकारी मिली, तो जाँच, रोकथाम और कार्रवाई का रिकॉर्ड कहाँ है? और यदि किसी अधिकारी ने अनुचित संरक्षण दिया, तो उसका प्रमाण खोजकर जिम्मेदारी तय की जाए। पद बड़ा है तो जवाबदेही भी बड़ी है। निगरानी की जिम्मेदारी को केवल छोटे कर्मचारी या बिचौलिए पर डालकर प्रश्न समाप्त नहीं किया जा सकता।
CMD कार्यालय बताए—मैदानी शिकायतों पर मुख्यालय ने क्या किया?
SECL मुख्यालय से स्पष्ट उत्तर की मांग है: क्या कथित ‘अलाउ’ वसूली की शिकायतों की समीक्षा हुई? क्या संबंधित क्षेत्रीय प्रबंधन से रिपोर्ट माँगी गई? क्या भुगतान, लोडिंग और गुणवत्ता संबंधी आरोपों का स्वतंत्र परीक्षण हुआ? मुख्यालय की जिम्मेदारी केवल उत्पादन का आँकड़ा देखना नहीं; शिकायतों पर अपनी कार्रवाई का हिसाब देना भी है।
‘संरक्षण’ का आरोप—अनुमान नहीं, प्रमाण से फैसला हो
शिकायतकर्ता का सवाल है कि नियंत्रित खदान व्यवस्था में कथित वसूली लगातार कैसे चल सकती है। यह प्रश्न गंभीर है, लेकिन केवल कथित धंधा चलने से GM, CGM या CMD की मिलीभगत स्वतः सिद्ध नहीं होती। जाँच स्पष्ट करे कि मामला व्यक्तिगत कृत्य का है, संगठित वसूली का, अधिकारियों के संरक्षण का अथवा निगरानी की विफलता का। इनमें से जो भी स्थिति प्रमाणित हो, उसके अनुसार जवाबदेही तय हो। पूर्व कवरेज में उठे एन. खुर्शीद सहित अन्य अधिकारियों, कारोबारी पक्षों और कथित बिचौलियों की भूमिका भी घटनावार अभिलेखों से परखी जाए। किसी का पद या कारोबारी प्रभाव जाँच से छूट का आधार नहीं बनना चाहिए।
कोयला मंत्रालय से मांग—जिनकी निगरानी पर सवाल, उन्हीं तक जाँच सीमित न रहे
संबंधित डीओ, लोडिंग, वेब्रिज, गेट, उपलब्ध सीसीटीवी, वाहन मार्ग और गुणवत्ता रिकॉर्ड तत्काल सुरक्षित किए जाएँ। कथित भुगतानकर्ताओं के बयान लेकर रकम माँगने वाले, प्राप्तकर्ता और संभावित लाभार्थी की पहचान की जाए। साथ ही GM–CGM से CMD स्तर तक शिकायतों पर लिए गए निर्णय, फाइल टिप्पणियाँ और कार्रवाई में देरी के कारण जाँचे जाएँ। आर्थिक लाभ या अनुचित संरक्षण के ठोस संकेत मिलने पर सक्षम स्वतंत्र एजेंसी वित्तीय संबंधों का परीक्षण करे। दीपका–गेवरा में कोयला उठ रहा है—जवाबदेही भी उठनी चाहिए। ‘अलाउ’ की कथित दरों का जवाब अधिकृत आदेश से दीजिए, शिकायतों का जवाब जाँच से दीजिए और अनियमितता मिले तो कार्रवाई से दीजिए। ₹12–₹50 और ₹150–₹450 प्रति टन के दावे सूत्र आधारित हैं तथा स्वतंत्र रूप से पुष्ट नहीं हैं। किसी अधिकारी या निजी पक्ष का संरक्षण, मिलीभगत अथवा दोष सिद्ध नहीं है। संबंधित पक्षों का उत्तर प्राप्त होने पर प्रकाशित किया जाएगा।
संपादक – अब्दुल सुल्तान
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क
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