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सेवा का संकल्प या फाइलों का संताप? कोरबा निगम में शिकायतों का ढेर—आयुक्त जवाब दें!

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ठेकेदारों ने लगाया दुर्व्यवहार और भुगतान की फाइलें रोकने का आरोप; पौधा खरीदी, HIG-30, FD/FDR के बाद अब मिट्टी–गोबर की मात्रा पर भी सवाल—क्या विष्णु सरकार की सेवा संकल्प यात्रा का यही चेहरा है?

 

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कोरबा। शहर की समस्याएं सुलझाने के लिए बने नगर निगम से जब शिकायतों का रास्ता मुख्यमंत्री कार्यालय तक जाने लगे, तो प्रशासन को अपनी कुर्सियों की ऊंचाई नहीं, कामकाज की गहराई देखनी चाहिए। कोरबा नगर निगम में भुगतान की फाइलों से लेकर खरीद, भवन-अनुज्ञा और वित्तीय रिकॉर्ड तक उठे सवाल अब स्पष्ट जवाब मांग रहे हैं।

ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क की पूर्व खबरों में उठे प्रश्नों के बीच अब नगर निगम कांट्रेक्टर एसोसिएशन ने कार्यपालन अभियंता रुचि साहू के विरुद्ध शिकायत की है। आरोप हैं—ठेकेदारों से दुर्व्यवहार, अमर्यादित बातचीत और भुगतान संबंधी फाइलों को बेवजह रोकना। एक व्यक्तिगत आवेदन में दो प्रतिशत पैसे मांगने का आरोप भी सामने आया है।

ये आरोप जांच से तय होंगे। लेकिन इन्हें सुनना और रिकॉर्ड के आधार पर उत्तर देना निगम प्रशासन का तत्काल दायित्व है। शिकायतों पर कार्रवाई का हिसाब मांगा जाए तो प्रशासन के पास तारीख, आदेश और निष्कर्ष होने चाहिए—आश्वासन की खाली थैली नहीं।

काम कराया, भुगतान पर चक्कर क्यों?

नगर निगम कांट्रेक्टर एसोसिएशन के 09 अक्टूबर 2026 के पत्र क्रमांक 041 में आरोप लगाया गया है कि कोरबा जोन की कार्यपालन अभियंता रुचि साहू पूर्ण किए गए कार्यों अथवा चलित भुगतान की फाइलों को कई दिनों तक बेवजह रोककर रखती हैं। ठेकेदार जानकारी लेने पहुंचते हैं तो उनके साथ अपमानजनक व्यवहार होता है।

एसोसिएशन के अध्यक्ष असलम खान के हस्ताक्षर वाले पत्र में पहले भी शिकायतें सामने आने और कार्रवाई नहीं होने का आरोप है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय, उपमुख्यमंत्री अरुण साव, मंत्री लखनलाल देवांगन, मुख्य सचिव, कलेक्टर, आयुक्त और महापौर को संबोधित पत्र में आंदोलन तथा निर्माण कार्य बंद करने की चेतावनी दी गई है।

फाइल में कमी है तो लिखित आपत्ति दीजिए। भुगतान रोकना जरूरी है तो कारण दर्ज कीजिए। ठेकेदार को नियम समझाना अधिकारी का काम है; उसे अपमानित करना किसी पद का अधिकार नहीं।

निर्माण कार्य बंद होने की नौबत आई तो परेशानी केवल ठेकेदार की नहीं होगी। सड़क, नाली और अन्य सुविधाओं की प्रतीक्षा कर रहे नागरिक भी प्रभावित हो सकते हैं।

दो प्रतिशत का आरोप: फाइल खोलिए, तथ्य सामने लाइए

ठेकेदार अंकुश मिश्रा की शिकायत पोर्टल प्रविष्टि में भुगतान की फाइल रोकने, खरी-खोटी सुनाने और फाइल छुपाने के आरोप हैं। आयुक्त तथा कलेक्टर को संबोधित हस्तलिखित आवेदन में परफॉर्मेंस गारंटी संबंधी फाइल, दुर्व्यवहार और कक्ष से बाहर निकाले जाने का उल्लेख है। इसी आवेदन में दो प्रतिशत पैसे मांगने का आरोप दर्ज है।

उपलब्ध सामग्री में इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि नहीं है। इसलिए इसे सिद्ध वसूली बताना उचित नहीं होगा। लेकिन इसकी जांच संबंधित फाइल के आवागमन, भुगतान रिकॉर्ड, उपलब्ध संवाद और अन्य साक्ष्यों से होनी चाहिए। आरोप सही मिले तो कार्रवाई हो। गलत मिले तो तथ्य स्पष्ट हों। शिकायत को धूल खिलाना जांच का विकल्प नहीं है।

मिट्टी–गोबर का हिसाब: 190 मीटर और 4,420 की मात्रा का आधार क्या?

ग्राम यात्रा की पूर्व कवरेज में एमपी चौक से जैन मंदिर तक डिवाइडर संबंधी कार्य की मात्रा पर सवाल उठाया गया था। भेजे गए विजुअल में डिवाइडर अथवा दीवार की गणना लगभग 190 मीटर, जबकि मिट्टी–खाद संबंधी मद में 4,420 मीटर का उल्लेख किया गया है।

इन दोनों संख्याओं का अंतर अपने आप में भ्रष्टाचार साबित नहीं करता। संबंधित मद की वास्तविक इकाई, चौड़ाई, गहराई, क्षेत्रफल या आयतन और गणना-पत्रक देखना आवश्यक है। निगम को स्पष्ट करना चाहिए कि 4,420 की मात्रा कैसे निकाली गई और उसका कार्यस्थल से क्या संबंध है।

यही वह जगह है जहां मूल अनुमान, BOQ, तकनीकी स्वीकृति और—यदि कार्य हुआ है—माप पुस्तिका तथा भुगतान विवरण निर्णायक होंगे।  मिट्टी और खाद की मात्रा कलम से लिखी गई है तो उसका गणित भी कागज पर होना चाहिए। जनता का पैसा है; हिसाब को खाद की तरह दबाकर नहीं रखा जा सकता।

पूर्व खबर का व्यंग्य था—“कौन खा रहा मिट्टी–गोबर के भी पैसे?” इस सवाल का तथ्यात्मक उत्तर जांच से ही मिलेगा। अभी षड्यंत्र, कमीशन अथवा अधिक भुगतान प्रमाणित नहीं है। इसलिए प्रशासन मूल रिकॉर्ड सामने रखे और बताए कि खबर के बाद क्या परीक्षण हुआ।

पौधा खरीदी: हरियाली का प्रचार, खरीद का क्रम स्पष्ट क्यों नहीं?

ग्राम यात्रा की पूर्व खबरों में 3,070 और 220 पौधों की बिड्स तथा 650 पौधों की खेप का उल्लेख करते हुए खरीद के घटनाक्रम पर प्रश्न उठाए गए थे। मुख्य सवाल था—“पौधे पहले… टेंडर बाद में क्यों?”

निगम खरीद आदेश, निविदा की तारीखें, आपूर्ति चालान, प्राप्ति और स्टॉक रिकॉर्ड सामने रखकर स्थिति स्पष्ट करे। किस सक्षम स्वीकृति पर पौधे आए और भुगतान का आधार क्या था?

शहर को हरियाली चाहिए, खरीद प्रक्रिया पर धुंध नहीं। पौधे लगाकर तस्वीर खिंचवाना आसान है; सार्वजनिक धन के खर्च का साफ हिसाब देना असली जिम्मेदारी है। पूर्व कवरेज में उठी आशंका का अंतिम परीक्षण मूल खरीद रिकॉर्ड से ही होगा।

HIG-30: मंजूरी की मुहर के पीछे का परीक्षण दिखाइए

HIG-30 भवन-अनुज्ञा, प्रस्ताव क्रमांक 2863 पर पूर्व खबरों में दर्ज आपत्तियों, FAR, कवरेज, तकनीकी परीक्षण और अनुमोदन के आधार को लेकर सवाल उठाए गए थे।

आपत्तियों का निस्तारण किसने किया?
अनुपालन किस रिकॉर्ड से सत्यापित हुआ?
सक्षम आदेश और स्वीकृत नक्शे में क्या दर्ज है?

 

“मंजूरी दे दी गई” कहना पर्याप्त जवाब नहीं। सवाल यह है कि मंजूरी तक पहुंचने वाली प्रक्रिया कितनी स्पष्ट और नियमसम्मत थी।  इस विषय पर भी निष्कर्ष मूल फाइल और तकनीकी परीक्षण से निकलेगा।

FD/FDR: जनता की जमा पूंजी का बैंक से मिलान कराइए

पूर्व वित्तीय कवरेज में FD/FDR की वास्तविक स्थिति, निवेश, परिपक्वता, नकदीकरण की स्वीकृति और राशि के उपयोग का हिसाब मांगा गया था।

 कौन-सी राशि जमा थी?
कब परिपक्व हुई?
किस आदेश से निकाली गई?
किस खाते में पहुंची और कहां खर्च हुई?

इन प्रश्नों का उत्तर बैंक की पुष्टि, निगम के लेखों और भुगतान रिकॉर्ड के मिलान से मिलना चाहिए।  जनता की जमा पूंजी का हिसाब कोई एहसान नहीं है। वित्तीय टिप्पणी तभी विश्वसनीय होगी जब उसके साथ बैंक और लेखा रिकॉर्ड भी खड़े हों।

“बिल्ली को दूध की रखवाली?”—स्वतंत्र जांच की मांग क्यों?

भेजे गए पूर्व विजुअल में शासन के पत्र GENS/59351/2026-UAD, डिजिटल हस्ताक्षर दिनांक 22 सितंबर 2026, का हवाला देते हुए शिकायतें निगम आयुक्त को भेजे जाने का उल्लेख है। उसी कवरेज में स्वतंत्र जांच दल के उल्लेख का अभाव बताते हुए बाहरी जांच की मांग की गई थी।  मूल शासन पत्र यहां उपलब्ध नहीं है, इसलिए उसके पूरे निर्देशों का निष्कर्ष केवल विजुअल से नहीं निकाला जा सकता। फिर भी सवाल बना रहता है—जहां निगम के निर्णयों पर ही प्रश्न हों, वहां जांच की निष्पक्षता कैसे सुनिश्चित और प्रदर्शित की जाएगी?  शिकायत आगे भेजना कार्रवाई की शुरुआत हो सकता है; उसे समाधान का प्रमाणपत्र नहीं बनाया जा सकता।

आयुक्त आशुतोष पांडेय: अब कार्रवाई का रिकॉर्ड दीजिए

इन मामलों में निगम आयुक्त आशुतोष पांडेय की प्रशासनिक जवाबदेही स्पष्ट है। उनसे पूछा जाना चाहिए कि नई शिकायतों और पूर्व विषयों पर क्या कार्रवाई हुई, किस अधिकारी ने परीक्षण किया और क्या निष्कर्ष निकला।  आयुक्त के संरक्षण या निगम की छवि बिगाड़ने की किसी साजिश का प्रमाण उपलब्ध सामग्री से स्थापित नहीं होता। लेकिन शिकायत मिलने के बाद कार्रवाई का रिकॉर्ड सार्वजनिक करना उनकी जिम्मेदारी है।

निगम की छवि बचाने के लिए सवालों से नाराज होने की जरूरत नहीं। गलत आरोप हों तो रिकॉर्ड से उनका उत्तर दीजिए; गड़बड़ी मिले तो जिम्मेदारी तय कीजिए। संस्था की प्रतिष्ठा जवाबदेही से बचती है। सवाल पूछने वाले को कटघरे में खड़ा कर देने से फाइलों का हिसाब साफ नहीं हो जाता।

विष्णु सरकार से सवाल: सेवा संकल्प दफ्तर में कब दिखाई देगा?

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की सरकार से अपेक्षा है कि शिकायतकर्ताओं को निष्पक्ष सुनवाई मिले। सेवा का संकल्प उसी दिन सार्थक होगा जब व्यक्ति को अपने आवेदन की स्थिति जानने के लिए चक्कर न काटने पड़ें और अधिकारी के व्यवहार की शिकायत मुख्यमंत्री तक पहुंचाने की नौबत न आए। जनता सुविधाओं का इंतजार करे, ठेकेदार भुगतान का और शिकायतकर्ता जांच का—तो सेवा संकल्प की मंजिल आखिर कहां है?

इस प्रकरण में समयबद्ध स्वतंत्र परीक्षण, जरूरी अभिलेखों का संरक्षण, संबंधित अधिकारियों का पक्ष और शिकायतकर्ताओं की सुनवाई सुनिश्चित होनी चाहिए। पात्र भुगतान और वैध कार्यवाही शिकायत करने की वजह से प्रभावित नहीं होनी चाहिए।  कोरबा निगम अब मूल फाइलें खोले। मिट्टी का माप, पौधों की खरीद, भवन की मंजूरी, बैंक की राशि और भुगतान की स्थिति—हर विषय का उत्तर उसके रिकॉर्ड से दे। शहर को नारों की चमक नहीं, कामकाज की सफाई चाहिए।

प्रकाशन स्पष्टता: ठेकेदारों संबंधी विवरण उपलब्ध शिकायत पत्रों और पोर्टल स्क्रीनशॉट पर आधारित हैं। स्वतंत्र जांच निष्कर्ष नहीं हैं। संबंधित अधिकारी, निगम प्रशासन और शासन का पक्ष उपलब्ध सामग्री में शामिल नहीं है। उनका उत्तर मिलने पर प्रमुखता से प्रकाशित किया जाए।

संपादक – अब्दुल सुल्तान
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क

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