बिल्ली को दूध की रखवाली? कोरबा निगम की शिकायतें फिर निगम के दरवाजे—स्वतंत्र जांच कब?

पौधा खरीदी, भवन-अनुज्ञा और FD/FDR पर गंभीर सवाल; शासन के उपलब्ध पत्र में निगम आयुक्त को कार्रवाई के निर्देश, लेकिन बाहरी जांच दल का उल्लेख नहीं
कोरबा | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क
संपादक—अब्दुल सुल्तान
कोरबा – कोरबा नगर निगम के फैसलों पर शिकायत, निगम के अभिलेखों पर सवाल और कार्रवाई का पत्र भी निगम को! ऐसे में स्वतंत्र जांच की मांग करने वाला नागरिक आखिर किससे उम्मीद लगाए? क्या जिन निर्णयों की जांच मांगी गई है, उन्हीं निर्णयों को लेने वाली व्यवस्था का जवाब अंतिम सच मान लिया जाएगा? यही वह स्थिति है जिस पर सवाल उठता है—कहीं यह “बिल्ली को दूध की रखवाली” सौंपने जैसा तो नहीं?
यह सवाल किसी अधिकारी को पहले से दोषी घोषित करने का नहीं है। सवाल उस जांच की विश्वसनीयता का है, जिसमें आरोपित निर्णय प्रक्रिया से जुड़े अधिकारियों का स्पष्टीकरण तो लिया जाए, लेकिन उसका स्वतंत्र परीक्षण भी हो। नगर निगम कोरबा की पौधा खरीदी, HIG-30 की भवन-अनुज्ञा और FD/FDR संबंधी अभ्यावेदनों में सार्वजनिक धन, तकनीकी स्वीकृति और रिकॉर्ड की निष्पक्ष जांच मांगी गई है। अब शासन का कार्रवाई पत्र सामने है। लेकिन शिकायत आगे बढ़ने और स्वतंत्र जांच शुरू होने के बीच का अंतर अब भी बाकी है।
शिकायत पहुंची, पत्र निकला—जांच कहां है?
नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग के उपलब्ध पत्र क्रमांक GENS/59351/2026-UAD में अब्दुल सुल्तान के 8 और 11 सितंबर 2026 के पत्र सहपत्रों सहित नगर निगम आयुक्त को आवश्यक कार्रवाई के लिए भेजे गए हैं। पत्र पर अवर सचिव आनंद कुमार पटेल का 22 सितंबर 2026 का डिजिटल हस्ताक्षर विवरण है। निगम से कार्रवाई कर संबंधित को अवगत कराने और विभाग को सूचित करने को कहा गया है। पर इस पत्र में न स्वतंत्र जांच दल का उल्लेख दिखाई देता है, न बाहरी जांच अधिकारी का नाम, न जांच पूरी करने की समय-सीमा। यह प्रशासनिक संज्ञान है। इसे जांच का निष्कर्ष बताना गलत होगा। उपलब्ध पृष्ठ में मूल शिकायतों के विषय अलग-अलग दर्ज नहीं हैं; इसलिए केवल इसके आधार पर यह भी तय नहीं किया जा सकता कि किन विशिष्ट प्रकरणों पर क्या जांच निर्देश दिए गए।
फिर भी प्रश्न सीधा है—गंभीर शिकायतों का उपचार केवल “संबंधित कार्यालय को भेज दिया गया” होगा, या रिकॉर्ड की तह तक जाने का आदेश भी निकलेगा?
हरियाली का हिसाब दीजिए—कागज पर जवाब उगाना बंद कीजिए
पौधा खरीदी की शिकायत में 3,070 और 220 पौधों की दो GeM Bids, पूर्व पौधरोपण तथा निविदा प्रक्रिया पूरी होने से पहले सभागार परिसर में कथित रूप से पहुंची 650 पौधों की खेप का उल्लेख है। यदि पुराना पौधरोपण और नई खरीद अलग हैं, तो स्थलवार जरूरत का रिकॉर्ड दिखाईए। यदि सभागार पहुंची खेप इन निविदाओं से अलग थी, तो उसका खरीद आदेश दिखाईए। यदि निजी माल था, तो सरकारी परिसर के इस्तेमाल की अनुमति दिखाईए।
हर प्रश्न का जवाब होना चाहिए—और जवाब अभिलेख में होना चाहिए।
“सब नियमानुसार है” कह देना जांच नहीं है। नियम का नाम, स्वीकृति की तारीख, वास्तविक आपूर्ति और भुगतान का आधार सामने रखना होगा। शिकायत में पर्ची पर “Umesh Sir” लिखे होने का उल्लेख भी है। इससे किसी व्यक्ति की पहचान या मिलीभगत सिद्ध नहीं होती। लेकिन नर्सरी को आदेश किसने दिया और भाड़ा किसने चुकाया, इसकी जांच किए बिना उस संबोधन को सुविधानुसार नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता। नाम के पीछे अनुमान नहीं, बैंक और आपूर्ति रिकॉर्ड के पीछे सच खोजिए।
आपत्तियों वाला नक्शा स्वीकृत कैसे हुआ?
HIG-30 की भवन-अनुज्ञा संबंधी शिकायत में प्रस्ताव क्रमांक 2863 पर FAR और ग्राउंड कवरेज अधिक होने की तकनीकी टिप्पणियों का उल्लेख किया गया है। यदि आपत्तियां दूर हुईं, तो संशोधित नक्शा और गणना सामने आए। यदि नियमितीकरण के आधार पर अनुमति दी गई, तो सक्षम प्राधिकारी का आदेश सामने आए। यदि अलग वैधानिक प्रक्रिया अपनाई गई, तो उसका आधार बताया जाए। फाइल में आपत्ति और अंत में स्वीकृति—बीच में नियम कैसे पूरे हुए, जनता यही पूछ रही है। जिस अधिकारी ने आपत्ति दर्ज की, जिसने उसे दूर माना और जिसने अंतिम अनुमति जारी की—तीनों स्तरों का रिकॉर्ड जांचा जाए। केवल अंतिम अनुमोदन दिखाकर पूरी निर्णय प्रक्रिया को सवालों से मुक्त नहीं किया जा सकता।
FD/FDR का हिसाब: नगर निधि किसी की निजी तिजोरी नहीं FD/FDR संबंधी शिकायत में संचित राशि की वास्तविक स्थिति, संभावित समयपूर्व नकदीकरण और उसके आगे उपयोग का बैंक आधारित परीक्षण मांगा गया है। FD का नकदीकरण अपने आप अपराध नहीं है। लेकिन सक्षम स्वीकृति, रकम का उपयोग और खातेवार मिलान मांगे जाने पर स्पष्ट रिकॉर्ड उपलब्ध होना चाहिए। नगर निधि का हिसाब नागरिक का अधिकार है; अधिकारी की कृपा नहीं। बैंक से स्वतंत्र पुष्टि हो। निगम के खाते उससे मिलाए जाएं। बड़े भुगतान का आधार जांचा जाए। सही व्यय है तो रिकॉर्ड उसकी पुष्टि करेगा; गलत है तो वही रिकॉर्ड जवाबदेही तय करेगा।
अपनी फाइल, अपना स्पष्टीकरण—फैसला भी अपना?
निगम से पक्ष लेना जरूरी है। लेकिन संबंधित शाखा का उत्तर स्वतंत्र जांच का विकल्प नहीं है। जिस निर्णय पर सवाल हो, उसकी सफाई उसी निर्णय में शामिल अधिकारी दे सकता है; उसकी निष्पक्षता का अंतिम प्रमाण स्वतंत्र परीक्षण से आएगा। यदि शिकायत सिर्फ संबंधित शाखा तक लौटकर उसके जवाब से बंद हो जाए, तो गंभीर आशंका बनी रहेगी कि जांच के नाम पर जवाब तैयार हुआ, तथ्य नहीं परखे गए। इसीलिए मांग है कि निगम से बाहर के सक्षम अधिकारी मूल रिकॉर्ड, डिजिटल लॉग, तकनीकी गणना और बैंकिंग विवरण जांचें। संबंधित अधिकारियों को सुनवाई मिले, लेकिन जांच के निष्कर्ष पर उनका नियंत्रण न हो।
सुशासन का दावा है तो स्वतंत्र जांच से संकोच क्यों?
छत्तीसगढ़ सरकार के सामने यह अवसर है कि शिकायतों को पत्राचार के चक्र से निकालकर प्रमाण आधारित जांच तक पहुंचाए। सुशासन की विश्वसनीयता भाषण से नहीं, अपने अधिकारियों के निर्णयों की निष्पक्ष जांच कराने से बनेगी।
सरकार बताए—
– स्वतंत्र जांच कौन करेगा?
– रिकॉर्ड सुरक्षित करने का आदेश कब निकलेगा?
– तकनीकी और वित्तीय परीक्षण की समय-सीमा क्या होगी?
– शिकायतकर्ता को कारणयुक्त निष्कर्ष कब मिलेगा?
– प्रमाणित अनियमितता मिलने पर जिम्मेदारी किस स्तर तक तय होगी?
इन सवालों का जवाब किसी को दोषी मानकर नहीं, जांच का स्पष्ट आदेश देकर दिया जा सकता है।
कागजी कार्रवाई से आगे बढ़िए
कोरबा के नागरिकों को मुहर लगे पत्र के साथ उसका परिणाम भी चाहिए। सार्वजनिक पैसा खर्च करने वाली व्यवस्था को सार्वजनिक सवालों का दस्तावेजी उत्तर देना होगा। यदि सब सही है, तो स्वतंत्र जांच अधिकारियों की स्थिति स्पष्ट करेगी। यदि गड़बड़ी है, तो जवाबदेही तय करेगी। दोनों स्थितियों में जांच टालने का लाभ जनता को नहीं मिलता।
अब शासन तय करे—इन शिकायतों पर बाहरी, समयबद्ध और अभिलेख आधारित जांच होगी, या फाइल उसी व्यवस्था के भीतर घूमती रहेगी जिसके फैसलों पर सवाल उठे हैं? दूध का हिसाब रखवाले के कथन से नहीं, स्वतंत्र पड़ताल से होगा। कोरबा निगम के इन प्रकरणों में अब यही कसौटी लागू होनी चाहिए।
संपादकीय स्पष्टता: अनियमितता संबंधी आरोप अभ्यावेदनों पर आधारित हैं और स्वतंत्र पुष्टि शेष है। उपलब्ध शासन पत्र शिकायतें निगम आयुक्त को कार्रवाई हेतु भेजने की पुष्टि करता है; उससे दोष, जांच पूरी होने या शिकायत दबाने का निष्कर्ष नहीं निकलता। संबंधित अधिकारियों और अन्य पक्षों का उत्तर प्राप्त होने पर प्रकाशित किया जाएगा।
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