सरकारी काम के लिए निजी खाते में ₹2,000: कोरबा मेडिकल कॉलेज में भुगतान के रिकॉर्ड, जांचकर्ताओं पर बयान बदलवाने का आरोप

व्हाट्सऐप ग्रुप में “प्रति व्यक्ति 2000 रुपये मांगे” का संदेश; नर्सों को अनुशासनात्मक कार्रवाई का भय दिखाने की शिकायत—कलेक्टर से स्वतंत्र जांच और बैंक रिकॉर्ड सुरक्षित कराने की मांग
कोरबा | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क
संपादक—अब्दुल सुल्तान
कोरबा- कोरबा के शासकीय चिकित्सा महाविद्यालय संबद्ध अस्पताल में स्टाफ नर्सों की सर्विस बुक संबंधी सरकारी कार्य के नाम पर कथित रूप से ₹2,000 प्रति कर्मचारी निजी UPI खाते में जमा कराने का मामला अब अस्पताल की आंतरिक जांच की निष्पक्षता पर भी सवाल खड़ा कर रहा है। उपलब्ध भुगतान स्क्रीनशॉट और व्हाट्सऐप ग्रुप संदेशों के साथ तैयार जनहित शिकायत में आरोप लगाया गया है कि रकम मांगने की जांच करने के बजाय महिला कर्मचारियों पर भुगतान को “अपनी खुशी से दिया गया सहयोग” बताने का दबाव बनाया गया।
सरकारी काम, निजी खाते में भुगतान और फिर कथन बदलवाने का आरोप—इन तीनों कड़ियों का जवाब अब स्वतंत्र जांच से मांगा जा रहा है।
भुगतान की तारीख, रकम और पहचान संख्या उपलब्ध
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क को उपलब्ध कराई गई सामग्री में 21 सितंबर 2026 को ₹2,000 का सफल डिजिटल भुगतान दिखाई देता है। एक विस्तृत रसीद में प्राप्तकर्ता का नाम “Mithlesh Bhaiya”, आंशिक UPI आईडी, भुगतान का समय तथा लेन-देन की पहचान संख्या दर्ज है। एक अन्य व्यक्तिगत व्हाट्सऐप चैट में “Mithlesh Kumar Mar…” नाम से प्रदर्शित प्राप्तकर्ता को ₹2,000 भुगतान की रसीद भेजी गई है। उसके बाद सामने से “Thank you” का संदेश दिखाई देता है। ये स्क्रीनशॉट भुगतान के प्रथमदृष्टया दस्तावेजी संकेत हैं। हालांकि खाते का वास्तविक धारक, भुगतान का उद्देश्य और अलग-अलग वास्तविक लेन-देन की संख्या बैंक तथा मूल डिजिटल रिकॉर्ड के सत्यापन से ही निर्धारित होगी।
ग्रुप चैट में सवाल की जड़: “प्रति व्यक्ति 2000 रुपये मांगे”
स्टाफ नर्सों के व्हाट्सऐप ग्रुप के उपलब्ध चित्र में मिथलेश के बिलासपुर जाने और सात कर्मचारियों का काम कराने संबंधी संदेश दिखाई देते हैं। उसी क्रम में एक सदस्य ने लिखा है— “Mithlesh bhaiya call kiye the per head 2000rs mange hai…” प्रभावित कर्मचारियों से प्राप्त जानकारी के अनुसार रकम सर्विस बुक का कार्य बिलासपुर ट्रेजरी से कराकर लाने के नाम पर मांगी गई थी।
यहीं अस्पताल प्रशासन से सबसे सीधा सवाल उठता है:
यदि यह अधिकृत शुल्क था, तो आदेश और सरकारी रसीद कहां हैं?
यदि खर्च था, तो उसका स्वीकृत आधार क्या था?
और भुगतान निजी खाते में क्यों कराया गया?
इन सवालों का जवाब “सहयोग” शब्द से नहीं मिलेगा। इसके लिए सर्विस बुक का मूवमेंट रिकॉर्ड, स्थापना शाखा की नोटशीट, ट्रेजरी से पत्राचार और बैंकिंग लेन-देन सामने रखने होंगे।
जांच समिति बनी, फिर उसी पर दबाव बनाने का आरोप
मामला सामने आने पर डीन डॉ. के.के. सहारे द्वारा संज्ञान लेकर जांच समिति गठित करना सकारात्मक कदम था। लेकिन शिकायत में अब समिति के सदस्य बताए गए डॉ. राम सिद्धार्थ और डॉ. अनमोल मिंज की भूमिका पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। प्रभावित नर्सों से प्राप्त जानकारी के आधार पर शिकायत में कहा गया है कि उनसे कथित रूप से पूछा गया कि अस्पताल की बातें मीडिया तक कैसे पहुंचीं और अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है। आरोप है कि उनसे अपने कथन में यह लिखने को कहा गया—
“हमने शिकायत नहीं की है”, “हम कोई कार्रवाई नहीं चाहते” और “पैसे अपनी खुशी से सहयोग के रूप में दिए थे।” इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी आवश्यक है। लेकिन यदि जांच के दौरान ऐसा दबाव बनाया गया, तो मामला केवल रकम लेने तक सीमित नहीं रहेगा; जांच को प्रभावित करने और महिला कर्मचारियों को भयभीत करने की भूमिका भी जवाबदेही के दायरे में आएगी।
नर्सों से सवाल, बैंक रिकॉर्ड से परहेज क्यों?
शिकायत का केंद्रीय आग्रह है कि जांच का आधार कर्मचारियों से लिखवाए गए कथन तक सीमित न रहे। भुगतान करने वाले खाते का डेबिट, प्राप्तकर्ता खाते का क्रेडिट, UTR, मूल चैट और सरकारी कार्य का रिकॉर्ड आपस में मिलाया जाए। किसी नर्स का “कार्रवाई नहीं चाहती” कहना यह नहीं बताता कि रकम किस अधिकार से मांगी गई थी। और “खुशी से दिया” लिखवा लेने से ग्रुप में दर्ज कथित मांग का संदर्भ मिट नहीं जाता। स्वैच्छिक सहयोग का दावा है तो उसकी भी जांच हो।
रकम किसने तय की?
किसने फोन किया?
भुगतान तत्काल करने को क्यों कहा गया?
क्या बिना भुगतान काम होता? क्या कोई अधिकृत शुल्क या खर्च निर्धारित था?
अस्पताल प्रशासन के लिए विश्वसनीय उत्तर अभिलेखों में होगा। जिस समिति पर आरोप, उसी के निष्कर्ष पर मामला बंद कैसे होगा?
कलेक्टर के लिए तैयार शिकायत-सह-अभ्यावेदन में मांग की गई है कि अस्पताल प्रशासन से पृथक स्वतंत्र दल जांच करे। जिन सदस्यों पर नर्सों को प्रभावित करने के आरोप हैं, उन्हें इस प्रकरण में दोबारा उनके बयान लेने की भूमिका से अलग रखा जाए यह मांग किसी को पहले से दोषी घोषित करने की नहीं है। इसका उद्देश्य है कि जांचकर्ताओं की भूमिका की जांच उनके अपने निष्कर्षों पर निर्भर न रहे। साथ ही कथित भुगतान प्राप्तकर्ता मिथलेश मरकाम, संबंधित स्थापना शाखा और भूमिका सामने आने पर वरिष्ठ अधिकारियों से अलग-अलग लिखित स्पष्टीकरण लेने की मांग की गई है।
पहले रिकॉर्ड बचाइए, फिर पूरी जवाबदेही तय कीजिए
अभ्यावेदन में संबंधित बैंक और UPI रिकॉर्ड, मूल व्हाट्सऐप चैट, सर्विस बुक रजिस्टर, नोटशीट तथा आंतरिक जांच के सभी बयान तत्काल सुरक्षित कराने की मांग है। प्रभावित महिला कर्मचारियों के बयान आरोपित अधिकारियों की अनुपस्थिति में, महिला अधिकारी की मौजूदगी में और भयमुक्त वातावरण में लिए जाने का आग्रह किया गया है। यदि पहले कोई कथन दबाव में दिया गया हो, तो कर्मचारी को उसका स्पष्टीकरण देने का अवसर मिले। शिकायत में नर्सों को धमकी, अनुचित ड्यूटी परिवर्तन, प्रतिकूल टिप्पणी और अन्य प्रतिशोध से लिखित संरक्षण देने की मांग भी रखी गई है। भय के वातावरण में लिया गया बयान जांच का भरोसा नहीं बढ़ाता। जांच तभी विश्वसनीय होगी, जब कर्मचारी सच बोलने के बाद अपनी नौकरी और सम्मान को लेकर सुरक्षित महसूस करें।
कलेक्टर से स्वतंत्र जांच की मांग
अब्दुल सुल्तान, प्रदेश सचिव—भारतीय श्रमजीवी पत्रकार संघ, छत्तीसगढ़ एवं संपादक—ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क की ओर से तैयार अभ्यावेदन में सात दिन के भीतर स्वतंत्र जांच दल गठित करने और 30 दिन की प्रस्तावित समय-सीमा में जांच कराने की मांग की गई है। प्रमाण मिलने पर संबंधित कर्मचारी के साथ रकम मांगने के निर्देशदाता, वास्तविक लाभार्थी और कथित दबाव बनाने वाले व्यक्तियों की भूमिका के अनुसार विभागीय एवं वैधानिक कार्रवाई का आग्रह है।
कोरबा मेडिकल कॉलेज के सामने प्रश्न स्पष्ट है—सरकारी काम के नाम पर निजी खाते में पैसा क्यों पहुंचा? और इसकी जांच में नर्सों से “स्वैच्छिक सहयोग” का कथन लिखवाने की जरूरत क्यों पड़ी?
अब अपेक्षा ऐसे उत्तर की है जिसे बैंक रिकॉर्ड, मूल संदेश और सरकारी अभिलेख समर्थन दें। अस्पताल के भीतर तैयार स्पष्टीकरण से आगे बढ़कर स्वतंत्र जांच ही इस प्रकरण की सच्चाई और जिम्मेदारी तय कर सकती है।
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