कोयला काला है, लेकिन SECL मुख्यालय की चुप्पी उससे भी ज्यादा काली क्यों

एरिया बदला, कुर्सी बदली—क्या एन. खुर्शीद का कथित पुराना खेल दीपका में नए मोहरों के सहारे जारी?
₹10–₹50 प्रति टन कथित ‘अलाउ’, खरीदारों की प्राथमिकता और संपत्ति के आरोप—सब दिखाई देने के बाद भी मुख्यालय मौन क्यों?
कोरबा | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क गेवरा से दीपका तक कोयले की कालिख अब केवल मजदूरों के कपड़ों पर नहीं, बल्कि SECL की प्रशासनिक विश्वसनीयता पर भी दिखाई देने लगी है।
आरोप लगातार सामने आ रहे हैं। नाम खुलकर लिए जा रहे हैं। कथित वसूली की दरें बताई जा रही हैं। खरीदारों और वाहनों को प्राथमिकता देने की शिकायतें उठ रही हैं। अधिकारी वर्षों तक संवेदनशील कुर्सियों पर जमे रहे। धरना SECL मुख्यालय के दरवाजे तक पहुंच गया—फिर भी मुख्यालय की जुबान पर ताला क्यों है?
क्या SECL को कुछ दिखाई नहीं दे रहा, या सब देखकर भी किसी कथित नेटवर्क के लिए आंखें बंद कर ली गई हैं?
गेवरा में सात वर्ष—अब दीपका में नया सिंहासन?
सूत्रों के अनुसार एन. खुर्शीद करीब सात वर्षों तक गेवरा रोड सेल से जुड़े संवेदनशील दायित्वों में रहे और अब दीपका में सेल्स संबंधी जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।
यदि लंबे कार्यकाल और कथित गतिविधियों को लेकर शिकायतें थीं तो जांच कहां हुई? रिकॉर्ड कब खंगाले गए? आय और संपत्ति का मिलान किसने किया?
क्या संवेदनशील पद से हटाकर दूसरे संवेदनशील पद पर बैठा देना ही SECL की जांच है?
एरिया नया है। पद नया है। लेकिन आरोप है कि खेल पुराना और मोहरे तैयार हैं।
दीपका में राजेश सिंह और संतोष सिन्हा—भूमिका पर जांच कब?
सूत्रों का आरोप है कि दीपका में कथित व्यवस्था राजेश सिंह, टीआई और संतोष सिन्हा, रोड सेल इंचार्ज जैसे पहले से मौजूद अधिकारियों के माध्यम से संचालित की जा रही है।
इन आरोपों की पुष्टि निष्पक्ष जांच से होनी है, लेकिन SECL को बताना चाहिए—
लोडिंग की प्राथमिकता कौन तय करता है?
किस वाहन को पहले और किसे घंटों इंतजार कराया जाता है?
किन खरीदारों के डीओ तेजी से संचालित होते हैं?
तौल-कांटा और गेट रिकॉर्ड में बदलाव का अधिकार किसके पास है?
₹10–₹50 प्रति टन कथित ‘अलाउ’ की शिकायतों की जांच क्यों नहीं हुई?
अधिकारियों, कारोबारियों और बिचौलियों के संपर्कों का परीक्षण कब होगा?
यदि सब कुछ नियमों से चल रहा है तो मूल सर्वर डेटा खोलने में डर कैसा?
कथित ‘अलाउ’ नहीं—कोयले पर लगाया गया अवैध टैक्स?
ग्राम यात्रा लगातार गेवरा–दीपका रोड सेल में ₹10 से ₹50 प्रति टन तक कथित वसूली की शिकायतें प्रकाशित करता रहा है। आरोप सही हैं तो यह मामूली लेन-देन नहीं, बल्कि कोयले की प्रत्येक गाड़ी पर बैठाया गया कथित संगठित टैक्स है।
एक ट्रक पर रकम छोटी दिखाई दे सकती है, लेकिन प्रतिदिन निकलने वाले सैकड़ों वाहनों और वर्षों के कारोबार का हिसाब जोड़ा जाए तो कथित वसूली का आकार कितना होगा?
क्या यही कारण है कि रिकॉर्ड की जड़ तक पहुंचने वाली स्वतंत्र जांच से बचा जा रहा है?
ट्रांसपोर्टरों के मुंह पर व्यापार का ताला! कोयला परिवहन से जुड़े कई लोग खुलकर बोलने से बच रहे हैं। सूत्र बताते हैं कि उन्हें लोडिंग रोकने, डीओ लटकाने, वाहन खड़े करवाने अथवा व्यापार से बाहर करने का डर है। यदि शिकायत करने का परिणाम कारोबार छिनना है तो ट्रांसपोर्टरों की चुप्पी सहमति नहीं—कथित प्रशासनिक भय का प्रमाण हो सकती है।
जिस व्यवस्था में एक अधिकारी की नाराजगी से दर्जनों ट्रक खड़े हो सकते हों, वहां कौन कारोबारी खुलकर गवाही देगा?
इसीलिए बयान से अधिक जरूरी सर्वर, बैंक और GPS रिकॉर्ड हैं। डिजिटल सबूत न डरता है, न अपना बयान बदलता है।
झारखंड में कथित आलीशान शॉपिंग मॉल—वेतन से बना या किसी और खेल से?
सूत्रों ने एन. खुर्शीद से संबंधित बताते हुए झारखंड में एक आलीशान शॉपिंग मॉल और उसमें बड़े खुदरा प्रतिष्ठान के संचालन का दावा किया है। ग्राम यात्रा इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं करता।
लेकिन आरोप सामने आने के बाद जांच जरूरी है।
किसके नाम पर जमीन खरीदी गई? निर्माण में कितनी राशि लगी? निवेश कहां से आया? वास्तविक लाभकारी मालिक कौन है? घोषित आय और संपत्ति के मूल्य में मेल है या नहीं?
यदि संपत्ति का दावा झूठा है तो जांच नाम साफ कर देगी। लेकिन यदि जांच से ही भागा गया तो संदेह और गहरा होगा। कोयले की कथित काली कमाई से कहीं संपत्ति का चमकता साम्राज्य तो नहीं खड़ा हुआ—यह सवाल अब फाइल में दफन नहीं किया जा सकता।
अशोक तीवरता का कथित कारोबारी जाल—एक नाम, कितने प्रतिष्ठान?
सूत्रों ने अशोक तीवरता से संबंधित बताते हुए अनेक पेट्रोल पंप, कोल वाशरी, कोल यार्ड और रेलवे कोल यार्ड के संचालन अथवा नियंत्रण का दावा किया है। क्या अलग-अलग कंपनियों, रिश्तेदारों, साझेदारों और वाहन मालिकों के पीछे वास्तविक नियंत्रण किसी एक हाथ में है? कंपनियों के निदेशक, बैंक खाते, वाहनों की EMI, डीजल भुगतान, GPS नियंत्रण, रेलवे रेक, वाशरी स्टॉक और अंतिम लाभार्थियों की जांच हो जाए तो दूध का दूध और कोयले का कोयला हो जाएगा।
फिर यह जांच अब तक क्यों नहीं हुई?
कोयले की कालिख किन राज्यों तक?
कोयला खदान से निकला, लेकिन कहां पहुंचा?
डीओ किसके नाम था? ट्रक किसका था? वजन कितना हुआ? GPS ने कौन-सा रास्ता दिखाया? माल किस डिपो में उतरा? आगे किस उद्योग या यार्ड तक गया? भुगतान किस खाते से निकला और किस खाते में पहुंचा? छत्तीसगढ़ से झारखंड और अन्य राज्यों तक फैली कारोबारी कड़ियों का वित्तीय एवं डिजिटल मिलान होना चाहिए।
जांच में तत्काल सुरक्षित किए जाएं—
डीओ और खरीदारवार लोडिंग रिकॉर्ड
मूल तौल-कांटा डेटा एवं एडिट लॉग
GPS, RFID, FASTag और ANPR डेटा
गेट लॉग और CCTV फुटेज
डीओ संशोधन एवं प्राथमिकता का ऑडिट ट्रेल
रेलवे रेक और साइडिंग रिकॉर्ड
बैंक खाते तथा संदिग्ध लेन-देन अधिकारियों और
कारोबारियों की घोषित-अघोषित संपत्तियां वैधानिक अनुमति के साथ संबंधित कॉल एवं डिजिटल संवाद
SECL मुख्यालय—नियंत्रक है या कथित संरक्षण की दीवार?
अब सबसे जहरीला सवाल SECL मुख्यालय से है। लगातार शिकायतें हुईं। खबरें प्रकाशित हुईं। नाम सामने आए। भारतीय जनाधिकार पार्टी ने मुख्यालय के सामने धरना देकर CBI–SIT जांच की मांग की। फिर भी स्वतंत्र जांच की घोषणा क्यों नहीं?
क्या मुख्यालय अपने अधिकारियों से जवाब मांगने की स्थिति में नहीं है?
क्या संवेदनशील डिजिटल रिकॉर्ड सुरक्षित किए गए?
क्या आरोपों से जुड़े अधिकारियों को जांच पूरी होने तक संबंधित काम से हटाया गया?
या मुख्यालय की चुप्पी के पीछे ऐसा संरक्षण खड़ा है, जिसके सामने नियमों की किताब भी बौनी पड़ गई है?
भ्रष्टाचार केवल पैसा लेने वाला हाथ नहीं चलाता; उसे ताकत उस कुर्सी से मिलती है जो सब जानकर भी आंखें बंद रखती है।
चेहरा नहीं—पूरा कथित नेटवर्क जांचें
किसी छोटे कर्मचारी को बलि का बकरा बनाकर फाइल बंद करने का खेल स्वीकार नहीं किया जाएगा। जांच उस व्यक्ति तक भी पहुंचे जो कथित रकम मांगता है, उस अधिकारी तक भी जो प्राथमिकता तय करता है और उस उच्च पदस्थ कुर्सी तक भी जो शिकायतों के बाद कार्रवाई रोकती है। ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क मांग करता है कि गेवरा–दीपका रोड सेल, लोडिंग, डीओ, तौल, परिवहन, बैंकिंग और संपत्ति संबंधी आरोपों की जांच विभागीय कमेटी के बजाय CBI अथवा स्वतंत्र बहु-विभागीय SIT से कराई जाए। तबादला जांच नहीं होता। पदोन्नति बेदाग होने का प्रमाण नहीं होती। और मुख्यालय की चुप्पी आरोपों को समाप्त नहीं करती—उन्हें और जहरीला बनाती है।
जल्द बड़ा दस्तावेजी खुलासा
अब सवाल खदान की मिट्टी तक सीमित नहीं है। जांच की अगली कड़ी में डीओ, प्राथमिकता, तौल-कांटा, GPS, कारोबारी संबंध और कथित संपत्ति नेटवर्क से जुड़े दस्तावेजों की परतें खोली जाएंगी। कोयले की कालिख कितनी दूर तक फैली है—यह कागज, बैंक और सर्वर बताएंगे। देश की सक्षम जांच एजेंसियों की नजर पड़ी तो पद, पैसा और संरक्षण की कोई दीवार डिजिटल निशान नहीं मिटा पाएगी।
विशेष टिप्पणी: समाचार में उल्लिखित वसूली, संपत्ति, कारोबारी संबंध और संरक्षण संबंधी बातें शिकायतों तथा सूत्र-सूचनाओं पर आधारित आरोप हैं। ग्राम यात्रा इनकी अंतिम सत्यता का दावा नहीं करता। निष्पक्ष जांच आवश्यक है। संबंधित अधिकारी, व्यक्ति और SECL प्रबंधन अपना दस्तावेजी पक्ष देना चाहें तो उसे प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
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