ग्राम यात्रा ने उठाया ‘गब्बर टैक्स’ का सवाल—अब SECL मुख्यालय के सामने गूंजी CBI जांच की मांग!

दीपका-गेवरा में कथित ₹10 से ₹50 प्रति टन ‘कोल अलाउ’ पर लगातार खबरों के बाद सड़क पर फूटा आक्रोश; ACB औद्योगिक समूह की वाशरियों, पावर प्लांट और कोयला लिंकेज की जांच को लेकर धरना
गेवरा रोड-सेल में वर्षों तक पदस्थ रहे और वर्तमान में दीपका सेल्स से जुड़े एन. खुर्शीद की भूमिका भी जांच के घेरे में लाने की मांग—DO, प्राथमिकता, गुणवत्ता और कथित वसूली का निकले डिजिटल हिसाब
जिस सवाल को ग्राम यात्रा ने खबरों में उठाया, वही अब SECL मुख्यालय के फाटक पर गूंजा—“कोयला देश का है, हर टन का हिसाब दो!”
बिलासपुर/कोरबा | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क दीपका और गेवरा की कोयला खदानों में कथित “गब्बर टैक्स”, रोड-सेल में ₹10 से ₹50 प्रति टन तक कथित अवैध “कोल अलाउ”, उच्च गुणवत्ता वाले कोयले की कथित अफरातफरी और भुगतान न करने वाले खरीदारों को परेशान किए जाने के जिन आरोपों को ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क लगातार प्रमुखता से प्रकाशित करता रहा है, वही सवाल अब एसईसीएल मुख्यालय बिलासपुर के सामने धरने और CBI जांच की मांग के रूप में फूट पड़ा है।
भारतीय जनाधिकार पार्टी, छत्तीसगढ़ ने एसईसीएल मुख्यालय के सामने धरना देकर ACB औद्योगिक समूह से संबंधित दीपका, गेवरा, कुसमुंडा, चाकाबुड़ा, रतिजा, रेंकी, बिंझारी तथा संबद्ध कोयला वाशरियों, ताप विद्युत परियोजनाओं, रेलवे साइडिंग और परिवहन व्यवस्था की वर्ष 1999 से वर्तमान तक जांच कराने की मांग की।
पार्टी ने CBI जांच, उच्चस्तरीय SIT, बहु-विभागीय तकनीकी जांच, वित्तीय एवं डिजिटल फोरेंसिक ऑडिट तथा कोयला भंडार के भौतिक सत्यापन की मांग करते हुए ज्ञापन सौंपा। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि जिन सवालों को अब तक फाइलों, स्क्रीनशॉट, डिलीवरी ऑर्डर और सूत्रों के हवाले से दबाने की कोशिश होती रही, वे अब एसईसीएल मुख्यालय के दरवाजे पर दस्तक दे रहे हैं।
ग्राम यात्रा की लगातार मुहिम—₹10 से ₹50 प्रति टन कथित ‘अलाउ’ का खेल
ग्राम यात्रा ने अपनी सिलसिलेवार खबरों में दीपका और गेवरा के रोड-सेल एवं लोडिंग सिस्टम में कथित रूप से चल रहे ₹10 से ₹50 प्रति टन के “कोल अलाउ” पर गंभीर सवाल उठाए थे। सूत्रों का आरोप रहा कि कथित वसूली की दर डिलीवरी ऑर्डर, कोयले की मात्रा, गुणवत्ता, तत्काल उठाव और संबंधित व्यापारी अथवा ट्रांसपोर्टर की मजबूरी देखकर निर्धारित की जाती है। भुगतान से इनकार करने पर कथित रूप से—
– कोयला उपलब्ध नहीं होने की बात कही जाती है;
– वाहन को अनावश्यक प्रतीक्षा कराई जाती है;
– लोडिंग में परिचालन संबंधी अड़चन पैदा होती है;
– निम्न गुणवत्ता अथवा मिश्रित कोयला दिए जाने की आशंका बनती है;
– प्राथमिकता वाले उठाव में संबंधित खरीदार को पीछे किया जाता है।
ग्राम यात्रा ने इस कथित व्यवस्था को “गब्बर टैक्स” कहा था—
ऐसा कथित टैक्स, जिसका कोई सरकारी आदेश नहीं, कोई रसीद नहीं और कोई अधिकृत दर नहीं; लेकिन सूत्रों के अनुसार भुगतान नहीं करने पर कोयला उठाव की राह कठिन हो जाती है। अब धरने में भी कथित कोल लेवी ₹25 से बढ़कर ₹50 प्रति टन तक पहुंचने का आरोप सामने आया है। इससे ग्राम यात्रा द्वारा पूर्व में उठाए गए सवाल और अधिक गंभीर हो गए हैं।
एन. खुर्शीद की भूमिका पर जांच क्यों नहीं?
ग्राम यात्रा की पूर्व रिपोर्टों में एन. खुर्शीद का नाम भी प्रमुखता से सामने आया था। प्राप्त सूचनाओं के अनुसार खुर्शीद लगभग सात वर्षों तक गेवरा के रोड-सेल से जुड़े संवेदनशील दायित्व में रहे और वर्तमान में दीपका क्षेत्र में सेल्स संबंधी भूमिका में बताए जाते हैं। यह जानकारी अंतिम दोष-सिद्धि नहीं है, लेकिन इतने लंबे समय तक रोड-सेल व्यवस्था से जुड़े रहने और बाद में दीपका सेल्स की जिम्मेदारी संभालने की स्थिति में निष्पक्ष जांच के लिए कई सवाल अनिवार्य हो जाते हैं—
– खुर्शीद के गेवरा रोड-सेल कार्यकाल में किन खरीदारों को कितनी प्राथमिकता मिली?
– किन डिलीवरी ऑर्डरों में बार-बार संशोधन अथवा समय विस्तार हुआ?
– किन खरीदारों के वाहन तत्काल लोड हुए और किन्हें प्रतीक्षा कराई गई?
– “स्टॉक उपलब्ध नहीं” बताए जाने के दौरान किन चुनिंदा खरीदारों को कोयला मिला?
– क्या किसी खरीदार अथवा ट्रांसपोर्टर ने कथित “अलाउ” या अनधिकृत भुगतान की शिकायत की?
– गेवरा से दीपका तक उनके कार्यकाल में जुड़े खरीदारों, ट्रांसपोर्टरों और बिचौलियों का कोई समान नेटवर्क दिखाई देता है?
– संतोष राठौर अथवा लोडिंग लाइन से जुड़े अन्य जिम्मेदार कर्मियों के साथ हुए आधिकारिक संपर्क और निर्णयों का रिकॉर्ड क्या बताता है?
– कथित वसूली की अवधि में संबंधित अधिकारियों और उनके निकट संबंधियों के बैंकिंग एवं संपत्ति अभिलेखों में असामान्य वृद्धि हुई या नहीं?
इन सवालों का उत्तर आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि DO-वार ऑडिट, ड्यूटी चार्ट, लॉगिन हिस्ट्री, कॉल-संपर्क के विधिसम्मत परीक्षण, बैंक रिकॉर्ड और संपत्ति जांच से मिल सकता है। यदि खुर्शीद अथवा अन्य अधिकारी निर्दोष हैं, तो स्वतंत्र जांच उन्हें संदेह से मुक्त करेगी। लेकिन जांच से बचते रहना आरोपों की छाया को और गहरा करता है।
रोड-सेल की कुर्सी बदली या कथित नेटवर्क ने केवल पता बदला?
सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि संवेदनशील पद पर वर्षों तक तैनात रहने के बाद अधिकारी का स्थानांतरण अथवा पद परिवर्तन हुआ भी तो क्या उससे कथित व्यवस्था समाप्त हुई?
या फिर गेवरा में बने संपर्क, व्यापारी, ट्रांसपोर्टर और लोडिंग चैनल दीपका में नए पद के साथ दोबारा सक्रिय हो गए?
ग्राम यात्रा ने पहले भी पूछा था कि संवेदनशील व्यावसायिक पदों पर लंबे समय तक तैनाती की समीक्षा क्यों नहीं की जाती?
शिकायत सामने आने पर अधिकारी को जांच के दायरे में लेने के बजाय दूसरी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देना कहीं कथित नेटवर्क को प्रशासनिक ऑक्सीजन देना तो नहीं?
इन सवालों की निष्पक्ष जांच आवश्यक है। केवल स्थानांतरण भ्रष्टाचार की जांच का विकल्प नहीं हो सकता।
“स्टीम” निकला, रास्ते में बदला और संयंत्र पहुंचा ‘चूरा’?
ग्राम यात्रा की पूर्व रिपोर्टों में एक और गंभीर कथित तरीका सामने आया था। आरोप था कि खदान से उठने वाला बेहतर गुणवत्ता अथवा “स्टीम” श्रेणी का कोयला निर्धारित उद्योग तक सीधे पहुंचने के बजाय कथित रूप से निजी डिपो में उतार दिया जाता है। इसके बाद कथित रूप से निम्न गुणवत्ता, मिश्रित अथवा “चूरा” कोयला संबंधित उद्योग तक भेज दिया जाता है।
यदि यह आरोप सही है तो एक ही खेल में कई पक्षों को नुकसान और लाभ होता है—
– एसईसीएल की गुणवत्ता व्यवस्था संदिग्ध होती है;
– वैध खरीदार को निम्न गुणवत्ता का कोयला मिलता है;
– उच्च गुणवत्ता वाला कोयला अलग बाजार में बेचा जा सकता है;
– रॉयल्टी, कर और परिवहन अभिलेखों में अंतर पैदा होता है;
– पावर प्लांट की खपत और राख उत्पादन का वास्तविक हिसाब बिगड़ता है।
इसीलिए ग्राम यात्रा ने मांग की थी कि खदान से संयंत्र तक प्रत्येक वाहन की GPS यात्रा, FASTag, RFID, प्रवेश-निकास समय, तौल, CCTV और गंतव्य वे-ब्रिज रिकॉर्ड का मिलान कराया जाए।
धरने ने ग्राम यात्रा की जांच-मांग को दी सार्वजनिक आवाज
भारतीय जनाधिकार पार्टी के धरने में भी वही मूल मांग सामने आई—खदान से वाशरी, वाशरी से रेलवे साइडिंग अथवा पावर प्लांट और अंतिम भंडार तक प्रत्येक टन कोयले की डिजिटल कुंडली तैयार की जाए। पार्टी ने मांग की कि प्रत्येक वाशरी की स्वीकृत क्षमता और वास्तविक उत्पादन का वर्षवार मिलान कर निम्न बिंदु स्पष्ट किए जाएं—
– वाशरी को कुल कितना कच्चा कोयला मिला?
– कितना धुला कोयला तैयार हुआ?
– उच्च और निम्न ऊष्मीय रिजेक्ट कितना निकला?
– गाद और सूक्ष्म कणों का क्या हुआ?
– कितना कोयला सड़क और कितना रेलवे से भेजा गया?
– प्राप्तकर्ता संयंत्र ने कौन-सा कोयला किस मात्रा में उपयोग किया?
– अभिलेखों में दर्ज अंतिम स्टॉक और वास्तविक भंडार में कितना अंतर है?
एक करोड़ टन का दावा—स्रोत से चिमनी तक हिसाब क्यों नहीं?
धरने में दावा किया गया कि उपलब्ध अभिलेखों में प्रतिवर्ष एक करोड़ टन से अधिक कच्चे अथवा रिजेक्ट कोयले के परिवहन का विवरण सामने आता है।
सवाल यह है कि यदि संबंधित ताप विद्युत संयंत्रों को रिजेक्ट कोल आधारित संचालन की अनुमति है, तो अन्य श्रेणी का कथित रूप से पहुंचा कोयला कहां और किस उपयोग में गया?
CBI/SIT को प्रत्येक टन का स्रोत, खदान, डिलीवरी ऑर्डर, वाशरी, प्रसंस्करण, रिजेक्ट उत्पादन, वाहन अथवा रेलवे रैक, प्राप्तकर्ता और वास्तविक उपयोग जोड़कर देखना चाहिए। यदि किसी एक कड़ी में भी मात्रा बदलती है तो पूरा कथित खेल सामने आ सकता है।
₹6.50 लाख टन कथित अवैध कोयले का दावा—फिर कार्रवाई की धार कुंद क्यों?
धरने में दुबे ने दावा किया कि पूर्व कार्रवाई के दौरान संबंधित प्रतिष्ठानों में लगभग 6.50 लाख टन कथित अवैध कोयला पकड़ा गया था तथा पावर प्लांट, वाशरी और काटाघर सील किए गए थे। यदि आधिकारिक रिकॉर्ड इस दावे की पुष्टि करता है, तो यह सामान्य अनियमितता नहीं, बल्कि कोयला स्रोत, स्टॉक, परिवहन, उपयोग और संरक्षण की पूरी श्रृंखला की जांच का मामला है।
धरने में सवाल उठा कि कथित कोल लेवी प्रकरण में प्रशासनिक और खनिज अधिकारियों तथा कोयला कारोबारियों पर कार्रवाई हुई, लेकिन संबंधित औद्योगिक प्रतिष्ठानों और जिम्मेदार एसईसीएल अधिकारियों की भूमिका की जांच निर्णायक स्तर तक क्यों नहीं पहुंची?
जांच की पहली सीढ़ी—सर्वर और रिकॉर्ड तत्काल सुरक्षित हों
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क पुनः मांग करता है कि जांच की औपचारिक घोषणा से पहले निम्न रिकॉर्ड सुरक्षित किए जाएं—
1. दीपका और गेवरा के सभी रोड-सेल डिलीवरी ऑर्डर तथा संशोधन इतिहास।
2. सेल्स और लोडिंग सिस्टम की यूजर लॉगिन एवं ऑडिट ट्रेल।
3. कच्चा तौल-कांटा डेटा तथा हटाई या बदली गई प्रविष्टियों का लॉग।
4. गेट-पास, CCTV, RFID, GPS, FASTag और ANPR रिकॉर्ड।
5. वाहनवार प्रवेश, लोडिंग, निकासी और गंतव्य तक पहुंचने का समय।
6. सैंपलिंग, GCV, गुणवत्ता परीक्षण और पुनः परीक्षण रिपोर्ट।
7. खरीदार, ट्रांसपोर्टर और वाहन मालिक का कर्मचारीवार/अधिकारीवार संपर्क रिकॉर्ड।
8. बैंक, UPI, संदिग्ध नकद जमा और अन्य वित्तीय लेन-देन।
9. निजी डिपो का स्टॉक, GST चालान, खरीद-बिक्री और परिवहन रिकॉर्ड।
10. संबंधित उद्योगों के गेट, वे-ब्रिज, लैब, स्टॉक और ईंधन खपत अभिलेख।
11. FOIS, रेलवे रैक, RR और गंतव्य तौल रिकॉर्ड।
12. संबंधित अधिकारियों की तैनाती, शिकायत, स्थानांतरण और संपत्ति विवरण।
सर्वर सुरक्षित किए बिना जांच शुरू करना ऐसा होगा जैसे आग बुझने के बाद राख में सबूत खोजने का नाटक करना। जांच कंपनी की भी और संरक्षण देने वाली कुर्सियों की भी विन्देश सिंह राठौर ने धरने में कहा कि जांच केवल कंपनी तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। एसईसीएल, पर्यावरण, खनन, राजस्व, वन, श्रम, जल संसाधन और अन्य नियामक विभागों के निरीक्षण तथा कार्रवाई का भी परीक्षण होना चाहिए।
यही ग्राम यात्रा की पूर्व रिपोर्टों का केंद्रीय प्रश्न रहा है—यदि कथित वसूली और कोयले की अफरातफरी वर्षों से चल रही है, तो निगरानी अधिकारी क्या कर रहे थे?
क्या उन्हें जानकारी नहीं थी?
यदि जानकारी नहीं थी तो यह गंभीर प्रशासनिक विफलता है। यदि जानकारी थी और कार्रवाई नहीं हुई तो संरक्षण की आशंका पैदा होती है। दोनों परिस्थितियों में जवाबदेही तय होनी चाहिए। जांच नहीं तो आंदोलन का अगला चरण
दुबे ने घोषणा की कि CBI/SIT अथवा राज्य सरकार द्वारा स्वतंत्र जांच दल गठित नहीं किया गया तो—
– 2 अक्टूबर 2026 को कलेक्टर कार्यालय कोरबा के सामने 24 घंटे की गांधीवादी न्याय भूख हड़ताल होगी;
– 22 अक्टूबर 2026 से एसईसीएल मुख्यालय बिलासपुर के सामने अनिश्चितकालीन धरना प्रारंभ होगा;
– प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार 1 नवंबर 2026 को केंद्रीय कोयला मंत्री के हैदराबाद स्थित आवास के सामने धरना दिया जाएगा।
ग्राम यात्रा का सीधा सवाल
दीपका-गेवरा में कथित ₹10 से ₹50 प्रति टन “अलाउ” झूठ है तो SECL स्वतंत्र डिजिटल जांच से पीछे क्यों हटे?
गेवरा रोड-सेल से लेकर दीपका सेल्स तक एन. खुर्शीद और अन्य संबंधित अधिकारियों के कार्यकाल के DO, खरीदार प्राथमिकता, वाहन, गुणवत्ता और शिकायत रिकॉर्ड सार्वजनिक जांच में क्यों न खोले जाएं?
और यदि ग्राम यात्रा की खबरों में उठाए गए सवाल सही दिशा में हैं, तो फिर कार्रवाई किसके आदेश का इंतजार कर रही है?
अब फाइलों की भाषा नहीं—सर्वर, तौल-कांटा, GPS, बैंक रिकॉर्ड और प्रत्येक टन कोयले की यात्रा बोलेगी। खदान की काली परतों के नीचे दबा सच बाहर आया तो कथित “गब्बर टैक्स” लेने वाले हाथ ही नहीं, उन्हें संरक्षण देने वाली कुर्सियां भी जांच की आंच से बच नहीं पाएंगी।
विशेष टिप्पणी: “गब्बर टैक्स”, ₹10 से ₹50 प्रति टन कथित “कोल अलाउ”, कोयला अफरातफरी, एन. खुर्शीद अथवा अन्य अधिकारियों की भूमिका तथा औद्योगिक प्रतिष्ठानों से जुड़े विवरण शिकायतों, सूत्रों, पूर्व प्रकाशित समाचारों और धरने में लगाए गए आरोपों पर आधारित जांच योग्य विषय हैं। इन्हें दोष-सिद्धि न माना जाए। ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच की मांग करता है। एन. खुर्शीद, एसईसीएल, ACB औद्योगिक समूह तथा अन्य संबंधित पक्ष अपना दस्तावेजी पक्ष देना चाहें तो उसे प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
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