कोरबा की खदानों में कथित ‘डबल खेल’—एक रास्ता बंगाल–बनारस, दूसरा लिंकेज प्लांटों के नाम!
रोज करीब 80 वाहनों में छांटकर बेहतर स्टीम कोयला भेजने का दावा; दूसरी ओर प्लांटों का अच्छा लिंकेज कोयला डिपो में उतारकर उसी वाहन में चूरा भरने का आरोप

दोनों कथित कारोबारों में अच्छा कोयला दिलाने के बदले अवैध वसूली की सूचना—खदान से प्लांट तक मिलीभगत की कितनी लंबी है श्रृंखला?
हीरा–वंदना सहित अन्य प्लांटों और चुनिंदा कोल डिपो की भूमिका पर गंभीर सवाल!
कारोबारियों के बाद अब SECL अधिकारियों की बारी—जल्द नाम और ओहदे के साथ बड़ा खुलासा!
कोरबा | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क
कोरबा की खदानों से निकलने वाले काले हीरे के कथित कारोबार में अब एक नहीं, बल्कि दो अलग-अलग खेलों की सूचना सामने आई है।
पहला आरोप—गेवर–दीपका सहित विभिन्न खदानों से प्रतिदिन करीब 80 वाहनों में चुन-छांटकर बेहतर गुणवत्ता वाला स्टीम कोयला लोड किया जाता है और ये वाहन बंगाल तथा बनारस की दिशा में भेजे जाते हैं।
दूसरा आरोप—रायपुर के कुछ बड़े उद्योगों के लिंकेज अथवा आवंटन दस्तावेजों पर खदान से बेहतर कोयला निकलता है, लेकिन प्लांट पहुंचने से पहले चुनिंदा कोल डिपो में उसे उतार लिया जाता है। उसी वाहन में मिश्रित चूरा कोयला भरकर संबंधित फैक्ट्री में खाली कराया जाता है।
दोनों कथित कारोबार अलग हैं, लेकिन आरोपों की जड़ एक ही जगह आकर मिलती है—
खदान से अच्छा कोयला निकलवाने के बदले अवैध वसूली और पूरी व्यवस्था की कथित मिलीभगत!
यदि यह सूचना सही है तो यह कोयले की सामान्य हेराफेरी नहीं, बल्कि सरकारी खदानों की छाती पर खड़ी एक कथित समानांतर मंडी है—जहां ग्रेड, गुणवत्ता और गंतव्य को नियम नहीं, अवैध रकम तय कर रही है।
पहला खेल: 80 गाड़ियां, चुनकर ‘स्टीम’ और रास्ता बंगाल–बनारस!
सूत्रों का दावा है कि गेवर–दीपका सहित कोरबा क्षेत्र की विभिन्न खदानों से प्रतिदिन करीब 80 वाहनों में छांटकर बेहतर गुणवत्ता वाला स्टीम कोयला लोड किया जा रहा है।
आरोप है कि इसके लिए संबंधित तंत्र द्वारा कथित तौर पर ₹150 प्रति टन तक की अवैध रकम ली जाती है। इसके बाद बेहतर कोयले से भरे वाहन बंगाल और बनारस की दिशा में रवाना होते हैं।
इस कथित श्रृंखला का प्लांट-लिंकेज वाले दूसरे मामले से सीधा घालमेल नहीं किया जाना चाहिए। यह अलग परिवहन और कथित वसूली का मामला है।
यदि एक वाहन में औसतन 25 से 30 टन कोयला माना जाए तो 80 वाहनों में प्रतिदिन लगभग 2,000 से 2,400 टन कोयला बैठता है। कथित ₹150 प्रति टन के आधार पर संभावित अवैध वसूली लगभग—
- ₹3 लाख से ₹3.60 लाख प्रतिदिन;
- ₹90 लाख से ₹1.08 करोड़ प्रतिमाह;
- ₹10.95 करोड़ से ₹13.14 करोड़ प्रतिवर्ष
तक पहुंच सकती है।
यह गणना सूत्रों के आरोप और अनुमानित वाहन क्षमता पर आधारित है। इसे प्रमाणित घोटाले की राशि नहीं माना जा सकता। वास्तविक आंकड़ा वाहनवार DO, कांटा-पर्ची, गेटपास और परिवहन रिकॉर्ड की जांच से ही निर्धारित होगा।
लेकिन सवाल बेहद तीखा है—
क्या ₹150 प्रति टन देकर खदान से कोयला नहीं, उसकी बेहतर गुणवत्ता खरीदी जा रही है?
कौन वाहनों का चयन करता है?
कौन बेहतर स्टीम कोयला छांटकर लोड करवाता है?
कौन ग्रेड प्रमाणित करता है?
कौन वजन और गेटपास पर मुहर लगाता है?
और कथित ₹150 की रकम नीचे से ऊपर तक किन कुर्सियों की सीढ़ियां चढ़ती है?
दूसरा खेल: लिंकेज प्लांट का, अच्छा कोयला डिपो का और फैक्ट्री के हिस्से में चूरा?
दूसरा मामला रायपुर के बड़े उद्योग घरानों के लिंकेज अथवा आवंटन दस्तावेजों से जुड़ा बताया जा रहा है।
सूत्रों के अनुसार इसकी कथित कार्यप्रणाली इस प्रकार है—
- संबंधित प्लांट के लिंकेज अथवा आवंटन दस्तावेज पर खदान से बेहतर गुणवत्ता वाला कोयला लोड कराया जाता है।
- इस बेहतर कोयले की लोडिंग के बदले कथित रूप से अवैध रकम ली जाती है।
- वाहन निर्धारित फैक्ट्री तक सीधे पहुंचने के बजाय पहले चुनिंदा कोल डिपो जाता है।
- डिपो में उच्च गुणवत्ता वाला कोयला उतारकर अलग कर लिया जाता है।
- उसी वाहन में सस्ता अथवा मिश्रित चूरा कोयला भर दिया जाता है।
- वाहन मूल कागजों के सहारे संबंधित फैक्ट्री पहुंचता है और वहां बदला हुआ माल खाली कर दिया जाता है।
- डिपो में उतारा गया बेहतर कोयला कथित रूप से दूसरे बाजार में अधिक कीमत पर खपाया जाता है।
लिंकेज प्लांट का।
दस्तावेज स्टीम कोयले के।
अच्छा माल डिपो में।
चूरा फैक्ट्री में।
यदि आरोप सही हैं तो यह रास्ते में केवल कोयला बदलने का मामला नहीं—यह सरकारी आवंटन की आत्मा बदलने का कथित कारोबार है।
हीरा–वंदना सहित अन्य प्लांटों की कथित संलिप्तता पर बड़ा सवाल!
सूत्रों से प्राप्त सूचना में हीरा ग्रुप, वंदना समूह तथा चार अन्य प्रभावशाली प्लांटों का उल्लेख किया गया है।
आरोप है कि संबंधित उद्योगों के लिंकेज अथवा आवंटन-पत्रों पर खदान से बेहतर कोयला निकाला जाता है, लेकिन वह रास्ते में चुनिंदा डिपो में उतर जाता है। उसकी जगह मिश्रित चूरा कोयला भरकर संबंधित फैक्ट्री में खाली कराया जाता है।
सूत्रों ने इस पूरी प्रक्रिया में फैक्ट्री प्रबंधन की कथित जानकारी और संलिप्तता का भी आरोप लगाया है।
ग्राम यात्रा स्पष्ट करता है कि संबंधित उद्योगों की भूमिका अभी स्वतंत्र एवं निर्णायक दस्तावेजों से प्रमाणित नहीं हुई है। सभी संबंधित पक्षों को अपना तथ्यात्मक जवाब देने का पूरा अवसर मिलना चाहिए।
लेकिन आरोप को केवल इसलिए नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, क्योंकि किसी प्लांट में कोयला प्रवेश करने के दौरान—
- वाहन की गेट एंट्री होती है;
- कांटे पर वजन किया जाता है;
- कोयले का नमूना लिया जाता है;
- प्रयोगशाला में GCV और गुणवत्ता जांची जाती है;
- माल की मात्रा एवं ग्रेड स्टॉक रजिस्टर में दर्ज होते हैं;
- उत्पादन के अनुपात में कोयले की खपत का हिसाब बनाया जाता है।
ऐसे में यदि बेहतर स्टीम कोयले के दस्तावेज पर लगातार मिश्रित चूरा फैक्ट्री पहुंचता रहा और उसे स्वीकार भी किया गया तो सवाल उठना स्वाभाविक है—
प्लांट प्रबंधन को धोखा दिया गया या प्लांट भी कथित खेल का भागीदार था?
यदि प्लांट अनजान था तो उसने खराब माल की खेप अस्वीकार क्यों नहीं की?
खदान और फैक्ट्री की GCV रिपोर्ट में अंतर मिला तो शिकायत कहां दर्ज हुई?
वाहन रास्ते में डिपो गया तो GPS विचलन पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
स्टीम कोयले के दस्तावेज पर चूरा मिलने के बावजूद भुगतान कैसे हुआ?
और यदि लंबे समय तक कोई आपत्ति नहीं की गई तो क्या यह चुप्पी कथित कारोबार की सबसे मजबूत ढाल थी?
चार नाम—जहां कथित रूप से बदलता है कोयले का चेहरा?
सूत्रों ने जांच योग्य प्रतिष्ठानों के रूप में निम्न नामों का उल्लेख किया है—
- अरशद अली से संबद्ध बताया गया कोल डिपो;
- अमित अग्रवाल से संबद्ध बताया गया कोल डिपो;
- वीरेंद्र से संबद्ध बताया गया कोल बेनीफिकेशन प्रतिष्ठान;
- मोहन अग्रवाल से संबद्ध बताया गया कोल डिपो।
आरोप है कि लिंकेज प्लांटों का बेहतर कोयला इनसे संबद्ध बताए जा रहे डिपो अथवा प्रतिष्ठानों में उतारा जाता है और उसकी जगह मिश्रित चूरा भरकर उन्हीं दस्तावेजों पर फैक्ट्री भेजा जाता है।
इन प्रतिष्ठानों की सटीक कानूनी इकाई, वास्तविक स्वामित्व, GSTIN, खनिज अनुमति, भंडारण क्षमता और संचालन स्थल की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। समान नाम वाले किसी निर्दोष व्यक्ति अथवा प्रतिष्ठान को इन आरोपों से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।
संबंधित प्रतिष्ठानों को स्पष्ट करना चाहिए—
- उनके यहां प्रतिदिन कितने वाहन आते और जाते हैं?
- कोयला किन खदानों और किन DO से आता है?
- वाहन खदान से निकलने के बाद सीधे डिपो क्यों पहुंचते हैं?
- डिपो में आने और जाने के समय वाहन का वजन कितना रहता है?
- कोयले की खरीद-बिक्री के GST दस्तावेज कहां हैं?
- स्टॉक रजिस्टर और जमीन पर उपलब्ध वास्तविक कोयले में कितना अंतर है?
- डिपो से निकला माल किन उद्योगों और खरीदारों को भेजा गया?
फैक्ट्री की कथित संलिप्तता की जांच क्यों जरूरी?
यदि किसी एक वाहन में गलती से निम्न गुणवत्ता का कोयला पहुंच जाए तो उसे लापरवाही कहा जा सकता है। लेकिन यदि यही प्रक्रिया लगातार चलती रही हो तो बिना फैक्ट्री की जानकारी अथवा कथित सहमति के इसे संचालित करना कठिन दिखाई देता है।
सूत्रों का आरोप है कि बेहतर कोयले के बदले मिश्रित चूरा स्वीकार करने से उद्योग को सस्ता ईंधन मिलता है, जबकि लिंकेज के अच्छे कोयले को दूसरे बाजार में ऊंची कीमत पर बेचने का रास्ता खुलता है।
यदि यह आरोप सही निकला तो लाभ केवल डिपो अथवा ट्रांसपोर्टर तक सीमित नहीं रहेगा। तब प्लांट के—
- खरीद विभाग;
- गेट प्रबंधन;
- कांटा संचालन;
- गुणवत्ता नियंत्रण प्रयोगशाला;
- स्टॉक विभाग;
- लेखा एवं भुगतान शाखा
की भूमिका भी जांच के दायरे में आएगी।
अच्छे कोयले के कागज पर चूरा स्वीकार करने वाला प्लांट पीड़ित है या कथित मुनाफे का साझेदार—यह रिकॉर्ड तय करेगा।
सात दिन का रिकॉर्ड दोनों खेलों की परतें खोल सकता है!
जांच एजेंसियों को दोनों कथित कारोबारों को अलग-अलग जांचना होगा।
बंगाल–बनारस भेजे जाने वाले 80 वाहनों के लिए—
- वाहनवार DO और खरीदार का नाम;
- लोडिंग पॉइंट और कोयले का घोषित ग्रेड;
- कांटा-पर्ची और गेटपास;
- RFID एवं GPS यात्रा रिकॉर्ड;
- टोल प्लाजा का ANPR और FASTag डेटा;
- अंतिम प्राप्तकर्ता की रिसीविंग;
- खदान तथा गंतव्य की गुणवत्ता रिपोर्ट।
प्लांट-लिंकेज और डिपो में कथित अदला-बदली के लिए—
- खदान से प्लांट तक वाहन की पूरी GPS यात्रा;
- डिपो के प्रवेश और निकासी रजिस्टर;
- डिपो की दोनों समय की कांटा-पर्चियां;
- डिपो और प्लांट का CCTV फुटेज;
- खदान तथा फैक्ट्री की GCV रिपोर्ट;
- ई-वे बिल और GST चालान;
- डिपो का स्टॉक एवं बिक्री रजिस्टर;
- प्लांट की प्राप्ति-पर्ची और भुगतान रिकॉर्ड;
- अस्वीकृत एवं स्वीकार की गई खेपों का विवरण।
यदि खदान से निकला वाहन रास्ते में डिपो पर रुका, वजन बदलने के बाद फैक्ट्री पहुंचा और दोनों स्थानों की गुणवत्ता रिपोर्ट अलग मिली तो कथित खेल की पूरी नस पकड़ में आ सकती है।
कोयले की कालिख मिटाई जा सकती है, लेकिन GPS, कांटे और कैमरे की गवाही नहीं।
अब SECL अधिकारियों की बारी!
दोनों मामलों का रास्ता खदान के भीतर से ही शुरू होता है। इसलिए जांच केवल कारोबारी, ट्रांसपोर्टर, डिपो और प्लांट तक सीमित नहीं रह सकती।
अब दस्तावेजी पड़ताल पहुंचेगी—
- रोड-सेल्स प्रभारी तक;
- सेल्स अधिकारी तक;
- स्टॉक एवं लोडिंग प्रभारी तक;
- तकनीकी और गुणवत्ता निरीक्षक तक;
- कांटा एवं गेट प्रभारी तक;
- कोलियरी प्रबंधन तक;
- उप-महाप्रबंधक स्तर तक;
- महाप्रबंधक और खनन प्रबंधन तक;
- नोडल तथा क्षेत्रीय कार्यालय तक।
किसने 80 वाहनों का चयन किया?
किसने चुनकर स्टीम कोयला लोड कराया?
किसने ग्रेड और स्टॉक प्रमाणित किया?
लिंकेज प्लांटों के वाहनों में अच्छा कोयला किसके निर्देश पर गया?
किसके डिजिटल हस्ताक्षर से DO आगे बढ़ा?
और कथित अवैध वसूली की रकम किन कुर्सियों तक पहुंची?
जल्द बड़ा विस्फोट—नाम और ओहदे से हटेगा पर्दा!
ग्राम यात्रा किसी निर्दोष व्यक्ति, अधिकारी या उद्योग को जांच से पहले दोषी घोषित नहीं करेगा। लेकिन सार्वजनिक संपत्ति और सरकारी पद से जुड़े निर्णयों को फाइलों की कालिख में छिपने भी नहीं दिया जाएगा।
दस्तावेज मिलने और संबंधित पक्षों का जवाब लेने के बाद अधिकारियों के—
नाम, ओहदे, कार्यकाल, आदेश, हस्ताक्षर और कथित भूमिका
जनता के सामने रखी जाएगी।
DO बोलेगा।
कांटा बोलेगा।
GPS बोलेगा।
CCTV बोलेगा।
डिपो का स्टॉक बोलेगा।
फैक्ट्री की प्रयोगशाला रिपोर्ट बोलेगी।
और जब सभी रिकॉर्ड एक साथ बोलेंगे तो किसी पद की ऊंचाई और किसी कारोबारी नाम की चमक सच को दबा नहीं पाएगी।
दो कथित खेल—लेकिन सवाल एक!
80 वाहनों में चुनकर स्टीम कोयला किसके आदेश पर बंगाल–बनारस भेजा गया?
लिंकेज प्लांटों का अच्छा कोयला रास्ते में किस डिपो पर उतरा?
उसी वाहन में चूरा किसने भरवाया?
फैक्ट्री ने बदला हुआ माल क्यों स्वीकार किया?
और दोनों कथित कारोबारों में अवैध वसूली की सीढ़ी आखिर किस कुर्सी तक पहुंची?
कारोबारियों के बाद अब SECL अधिकारियों की बारी!
नाम आएंगे—ओहदे बताए जाएंगे!
खदान की निचली चौकी से ऊंची कुर्सी तक दस्तावेज बताएंगे कि किसके आदेश से रास्ता खुला और किसकी कथित छाया में कोयले का चेहरा बदलता रहा!
दस्तावेजों का धमाका अभी बाकी है…
जिम्मेदार नामों की पड़ताल अभी बाकी है…
प्लांटों की कथित भूमिका का हिसाब अभी बाकी है…
और कई चेहरों से नकाब उतरना अभी बाकी है…
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क्रमशः—नाम, ओहदे, जवाब और दस्तावेजों के साथ जल्द महाखुलासा
संपादक – अब्दुल सुल्तान
संपादकीय सूचना: इस रिपोर्ट में उल्लिखित आरोप सूत्रों से प्राप्त सूचनाओं पर आधारित हैं। संबंधित व्यक्तियों, प्रतिष्ठानों, अधिकारियों और उद्योगों की संलिप्तता स्वतंत्र एवं निर्णायक जांच में अभी प्रमाणित नहीं हुई है। सभी संबंधित पक्षों का तथ्यात्मक एवं दस्तावेजी जवाब प्राप्त होने पर उसे प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
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